हनुमान अंश : नीब करौरी बाबा के जीवन की अनकही कथा

हनुमान अंश : नीब करौरी बाबा के जीवन की अनकही कथा

राघव ट्रेडमिल पर दौड़ रहा था और कानों में “मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान” के भावपूर्ण स्वर गूँज रहे थे। इस गीत में कुछ अलग था। इसके सुर सीधे उसके हृदय को छू रहे थे। चौबीस वर्षीय राघव बचपन से ही भगवान हनुमान का भक्त था। उसके लिए भक्ति ही शक्ति थी। लेकिन यह गीत कुछ अलग कह रहा था। इसमें समर्पण की एक शांत भाषा थी।

बुंदेलखंडी हिंदी के सहज और देसी शब्द, लोकगायन जैसी शैली में गाए गए ये स्वर, समर्पण को केवल एक भाव नहीं, बल्कि एक सच्चे अनुभव जैसा बना रहे थे। 

गीत सुनते-सुनते राघव के मन में उसके संघर्षों की पूरी कहानी जैसे किसी चलचित्र की तरह चलने लगी—स्कूल में दूसरों का उसे परेशान करना, कम वेतन वाली नौकरी, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और अपने ही सपनों का भारी बोझ। इस गीत ने उसके मन के एक गहरे विश्वास को और पक्का कर दिया। परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन रही हों, भगवान हनुमान हमेशा चट्टान की तरह उसके साथ खड़े रहे थे।

गीत से प्रभावित राघव ने उत्सुकता से अपनी स्क्रीन की ओर देखा। यह गीत हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म ‘हनुमान अंश’ का था। 

जिज्ञासा से राघव ने इंटरनेट पर खोज शुरू की। उसे उम्मीद थी कि सामने हमेशा की तरह हनुमान जी का वही भव्य स्वरूप दिखाई देगा। लेकिन इसके बजाय उसकी नज़र एक ऐसे वृद्ध, भारी शरीर वाले व्यक्ति की तस्वीर पर पड़ी, जो साधारण कंबल ओढ़े हुए थे। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी और आँखों में शरारत की एक झलक।

तस्वीर के नीचे एक ऐसा नाम लिखा था, जिसे राघव ने पहले कभी नहीं सुना था—नीब करौरी बाबा। 

तस्वीर के ठीक पास बाबा जी की मुख्य शिक्षाएँ लिखी थीं— 

  • सबसे प्रेम करो, 
  • सबकी सेवा करो, 
  • सबको भोजन कराओ और
  • भगवान का स्मरण करो।

इस गीत और फिल्म ‘हनुमान अंश’ के दूसरे गीतों की ओर खिंचाव महसूस करने वाला राघव अकेला नहीं था। बच्चों से लेकर युवाओं और बुजुर्गों तक, हर आयु वर्ग के लोगों को कैंची धाम के संत की कहानी से तुरंत जुड़ाव महसूस हुआ।लेकिन राघव स्क्रीन पर टकटकी लगाए देखता रहा और उसके मन में जिज्ञासा की एक नई लहर उठी। 

बाबा जी के जीवन को लेकर लोगों के मन में उठने वाले कुछ सामान्य प्रश्नों के उत्तर देने का यह ब्लॉग एक छोटा-सा प्रयास है।

मुख्य बातें 

नीब करौरी (नीम करौली) बाबा कौन थे?  

नीब करौरी बाबा, जिन्हें आमतौर पर नीम करौली बाबा या महाराज जी के नाम से जाना जाता है, भारत के महान संत श्री हनुमान के परम भक्त और आध्यात्मिक गुरु थे। उनका जीवन सादगी, निस्वार्थ प्रेम और सेवा के लिए जाना जाता है। भारत के साथ-साथ पश्चिमी देशों में भी उनके प्रति गहरी श्रद्धा रही और उनका आध्यात्मिक प्रभाव दूर-दूर तक पहुँचा। 

महाराज जी अपने निस्वार्थ प्रेम, कठोर धार्मिक नियमों से परे सहज दृष्टिकोण और अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों को एक साथ जोड़ने के लिए जाने जाते थे। उनके अनुयायियों को किसी एक वर्ग या समूह में सीमित नहीं किया जा सकता।  

आधुनिक तकनीकी युग के कुछ प्रभावशाली विचारकों से लेकर गाँव के किसानों और रोज़ कमाकर जीवन चलाने वाले श्रमिकों तक, हर वर्ग के लोगों ने उन्हें श्रद्धा से देखा। उनके अनुयायी यहूदी, ईसाई, सिख और सूफी या मुस्लिम पृष्ठभूमि से भी रहे हैं।

अमेरिकी चिकित्सक, महामारी विशेषज्ञ और परोपकारी डॉ. लैरी ब्रिलियंट बाबा जी के अनन्य भक्तों में से एक थे। बाबा जी के मार्गदर्शन में डॉ. ब्रिलियंट विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के चेचक उन्मूलन कार्यक्रम से जुड़े और इसमें सक्रिय भूमिका निभाई। देश की पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी जैसी राजनीतिक हस्तियाँ भी बाबा जी से मार्गदर्शन और आशीर्वाद लेने आती थीं।

महाराज जी उन सभी के प्रति करुणा रखते थे, यहाँ तक कि उन लोगों के प्रति भी, जिनसे अतीत में गलतियाँ हुई थीं। वे किसी व्यक्ति को उसके अतीत के आधार पर नहीं आँकते थे, बल्कि उसे स्वयं में सुधार लाने और बेहतर बनने के लिए प्रेरित करते थे।

नीम करौली बाबा का वास्तविक नाम क्या था और उनकी यात्रा कैसे शुरू हुई?

नीब करौरी बाबा का जन्म वर्ष 1900 में उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में लक्ष्मण नारायण शर्मा के रूप में हुआ था। बचपन से ही उनका मन आध्यात्मिकता की ओर आकर्षित था। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, उनका जन्म मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। 

कम उम्र में ही उन्होंने अपनी माता को खो दिया। 11 वर्ष की आयु में उनके माता-पिता ने उनका विवाह कर दिया। लेकिन उनका मन गृहस्थ जीवन में नहीं लगा। वे घर छोड़कर उत्तर भारत में एक युवा साधु के रूप में भटकने लगे। उनके पास केवल एक चिमटा, कमंडल और साधारण वस्त्र थे। भोजन और रहने की व्यवस्था के लिए वे स्वयं को पूरी तरह भगवान की इच्छा पर छोड़ देते थे। 

नीब करौरी बाबा  कौन-कौन सी साधनाएँ कीं 


 ( महाराज जी द्वारा निर्मित हनुमान मंदिर ) 

महाराज जी अपनी साधनाओं के बारे में बहुत कम बात करते थे। फिर भी, उनके प्रारंभिक जीवन से जुड़े विवरणों में गहन और पारंपरिक साधनाओं का उल्लेख मिलता है।

उत्तर भारत में भटकते साधु के रूप में अपने शुरुआती वर्षों के दौरान वे घंटों एक तालाब में ध्यानमग्न रहते थे। इसी कारण उन्हें “तलैया बाबा” के नाम से जाना जाने लगा।

बाद में वे उत्तर प्रदेश के नीब करौरी गाँव पहुँचे। गाँव के लोग उनसे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने प्रिय “लक्ष्मण दास बाबा” के लिए एक भूमिगत गुफा बनवा दी। बाबा जी कई-कई दिनों तक इसी गुफा में अकेले रहकर मौन साधना में गहराई से लीन रहते थे।

इसी गुफा के ऊपर उन्होंने श्री हनुमान जी का मंदिर बनवाया। मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के दिन उन्होंने अपनी जटाएँ कटवा लीं और साधु के रूप में पहने जाने वाले वस्त्रों को छोड़कर साधारण सूती धोती धारण कर ली। 

नीब करौरी बाबा से “नीम करौली बाबा” नाम कैसे मिला ?

        ( रुकी हुई ट्रेन के पास बैठे महाराज जी ) 

यह नाम एक प्रसिद्ध लोककथा से जुड़ा है। कहा जाता है कि एक दिन महाराज जी बिना टिकट ट्रेन में सवार हो गए। जब ब्रिटिश अधिकारियों को इस बात का पता चला, तो उन्होंने संत को तुरंत ट्रेन से उतारने का आदेश दिया और उन्हें नीब करौरी गाँव में ट्रेन से उतार दिया।

लेकिन इसके बाद ट्रेन आगे ही नहीं बढ़ी। कई इंजीनियर ने प्रयास किया, लेकिन इंजन किसी भी तरह आगे नहीं बढ़ रहा था। 

 आखिरकार रेलवे अधिकारी महाराज जी के पास पहुँचे। उन्होंने अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी और उनसे वापस ट्रेन में बैठने का अनुरोध किया।

महाराज जी ने लौटने की सहमति दी, लेकिन दो शर्तें रखीं—

  • पहली, नीब करौरी गाँव के लोगों के लिए वहाँ एक रेलवे स्टेशन बनाया जाए। 
  • और दूसरी, भविष्य में साधुओं के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करने का वचन दिया जाए।

जैसे ही वे दोबारा ट्रेन में सवार हुए, ट्रेन चल पड़ी। इसके बाद वे “नीब करौरी वाले बाबा” के नाम से प्रसिद्ध हो गए। स्थानीय बोली में समय के साथ इसका उच्चारण नीब करौरी, निब करौरी और नीम करौली जैसे अलग-अलग रूपों में किया जाने लगा। आगे चलकर जब बाबा जी की प्रसिद्धि भारत से बाहर भी फैली, तो आसानी से बोले जाने वाला नाम “नीम करौली बाबा” सबसे अधिक प्रचलित हो गया।

क्या नीम करौली बाबा गृहस्थ थे ?

इसका उत्तर संभवतः  आपको चौंका दे। हाँ, उनका परिवार था।

मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद, अपने पिता के आग्रह पर महाराज जी अंततः घर लौट आए और उन्होंने गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियाँ स्वीकार कीं। वे अपनी पत्नी राम बेटी देवी के साथ रहे। उनके तीन बच्चे थे—दो पुत्र, अनेक सिंह शर्मा और धर्म नारायण शर्मा, और एक पुत्री गिरिजा देवी, जिन्हें बाद में गिरिजा देवी भटेल के नाम से जाना गया। 

नीब करौरी बाबा ने सांसारिक जीवन का पूर्ण त्याग कब किया?

कुछ वर्षों तक उन्होंने पति और पिता के रूप में अपने कर्तव्यों को निभाया और साथ ही अपनी आध्यात्मिक साधना भी जारी रखी। उनका परिवार उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा, लेकिन उनका हृदय सदैव हनुमान जी में लगा रहा।

समय के साथ महाराज जी ने गृहस्थ जीवन का त्याग कर पुनः संन्यास ग्रहण कर लिया। उन्होंने सांसारिक मोह-ममता से स्वयं को अलग कर पूरी तरह हनुमान भक्ति, राम-नाम, सेवा और जनसेवा को अपना जीवन समर्पित कर दिया। 

कैंची धाम : नीब करौरी बाबा का आश्रम

उत्तराखंड के नैनीताल स्थित हनुमान घाटी या हनुमान गढ़ी को नीब करौरी महाराज द्वारा स्थापित पहला आश्रम माना जाता है। बताया जाता है कि इसकी स्थापना 1951 में हुई थी। इसके बाद नैनीताल–अल्मोड़ा मार्ग पर कैंची गाँव के पास जंगल में एक पवित्र स्थान ने महाराज जी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। मान्यता है कि इसी स्थान पर पहले साधु प्रेमी बाबा और सोमबारी महाराज रहते थे और यज्ञ किया करते थे।

इसी पवित्र भूमि पर 1962 में कैंची धाम की नींव रखी गई। 15 जून 1964 को हनुमान जी की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा की गई। इसके साथ ही कैंची धाम विधिवत एक आश्रम के रूप में स्थापित हो गया।

धीरे-धीरे दूर-दूर से साधक और जिज्ञासु आश्रम आने लगे। रिचर्ड अल्पर्ट (राम दास), जेफ्री कैगल (कृष्ण दास) और डॉ. लैरी ब्रिलियंट भी इसी क्रम में कैंची धाम पहुँचे।

एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स 1974 में भारत आए। वे नीब करौरी बाबा से मिलने और बौद्धिक उत्तरों के बजाय भीतर से मिलने वाली स्पष्टता की खोज में यहाँ पहुँचे थे। लेकिन तब तक बाबा जी 11 सितंबर 1973 को वृंदावन में महासमाधि ले चुके थे।

फिर भी, कैंची धाम की आध्यात्मिक ऊर्जा ने जॉब्स की सोच और जीवन-दृष्टि को गहराई से प्रभावित किया। वर्षों बाद, फेसबुक में एक कठिन दौर के दौरान, मार्क जुकरबर्ग ने जॉब्स की विशेष सलाह पर कैंची धाम की यात्रा की, ताकि वे भी अपने जीवन के उद्देश्य को लेकर स्पष्टता पा सकें।

नीब करौरी बाबा का गुप्त मंत्र क्या था?

( महाराज जी राम नाम लिखते हुए ) 

महाराज जी अक्सर राम-नाम का जप करते और उसे लिखा भी करते थे। उनके लिए राम-नाम केवल एक मंत्र का उच्चारण नहीं था, बल्कि हर श्वास के साथ प्रभु को हृदय में स्मरण करने का एक माध्यम था।

महाराज जी अक्सर कहते थे—“राम नाम करने से सब पूरा हो जाता।” अर्थात निरंतर राम-नाम का जप करने से जीवन में पूर्णता आती है।

वे भंडारे की परंपरा को भी विशेष महत्व देते थे—जहाँ आने वाले हर व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के निरंतर भोजन कराया जाता था। उनका भाव था कि भूखे व्यक्ति के रूप में स्वयं भगवान भोजन ग्रहण करने आते हैं।

राम-नाम के जप की शक्ति क्या है?

राम दास और सिद्धि माँ जैसे भक्त बताते हैं कि नीब करौरी बाबा अपने अनुयायियों को लगातार “राम नाम करो”, अर्थात् श्रीराम के नाम का जप करने की प्रेरणा देते थे। वे अपने भक्तों को नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करने के लिए भी प्रोत्साहित करते थे।

महाराज जी के भक्त राम दास बताते हैं कि “राम, राम” या “श्री राम जय राम जय जय राम” का बार-बार जप करने से मन वर्तमान क्षण में लौटता है और भीतर ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव होने लगता है। जब मन किसी के प्रति निर्णय, आलोचना या चिंता में उलझ जाता है, तब केवल नाम-स्मरण की ओर लौटना हृदय को सहज बनाता है और अहंकार के प्रभाव को कम करता है।

राम-नाम का जप मन में करुणा जगाता है और सेवा-भाव को जन्म देता है। यही हनुमान भक्ति का सार है—निस्वार्थ भाव से सेवा करना। 

 ( आप भी श्रीराम के नाम से अपनी साधना की शुरुआत कर सकते हैं। साधना ऐप पर किष्किंधा में राम-नाम जप की साधना करें और भक्ति के इस सरल मार्ग से जुड़ें। )  

राम-नाम लिखना भी एक प्रकार का सक्रिय ध्यान है, जिसमें हाथ, आँखें और मन एक साथ एक ही साधना में जुड़ जाते हैं।  आज गीत, पुस्तक या कैंची धाम की यात्रा के माध्यम से नीब करौरी बाबा को जानने वाले लाखों लोगों के लिए उनका संदेश बेहद सरल है—हम सभी में हनुमान अंश को जागृत करने की क्षमता है। इसके लिए निस्वार्थ प्रेम, भक्ति और श्री हनुमान की तरह सेवा करने की भावना आवश्यक है।

महाराज जी को समझने की यात्रा भले ही बाहर से शुरू हो, लेकिन उसकी वास्तविक गंतव्य  हमेशा हमारे भीतर ही होता है।

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