दीपावली 2026 : आरोग्य, समृद्धि और प्रकाश का उत्सव
संक्षिप्त परिचय: दीपावली 2026 पाँच दिनों का प्रमुख हिंदू त्योहार है, जिसमें धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज शामिल हैं। इन दिनों में लक्ष्मी पूजन, पारंपरिक रीति-रिवाज और सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है। प्रत्येक दिन का अपना धार्मिक महत्व, पूजा विधि और शुभ मुहूर्त होता है।
हर वर्ष कुम्हार के चाक पर मिट्टी के दीये आकार लेते हैं। रंगोली के रंगों से आँगन सजते हैं और रंग-बिरंगी रोशनी से बाज़ार जगमगा उठते हैं। दीपावली हर साल आती है, लेकिन सदियों बाद भी इसका उत्साह कम नहीं हुआ। आखिर क्यों?
क्योंकि दीपावली केवल रोशनी का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, परंपरा और अपनेपन का उत्सव है। यह हमें परिवार और समाज के साथ जोड़ता है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती ये परंपराएँ ही दीपावली को जीवंत बनाए रखती हैं। इसी समृद्ध परंपरा को वैश्विक पहचान मिली, जब 10 दिसंबर 2025 को दीपावली को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया।
पाँच दिवसीय दीपोत्सव के हर पर्व से जुड़ी अपनी पौराणिक कथा और विशेष धार्मिक मान्यता है। आइए, इन पर्वों के महत्त्व और उनसे जुड़ी परंपराओं के बारे में बात करने से पहले जानते हैं कि इस वर्ष दीपोत्सव कब से शुरू होगा।
पूजा मुहूर्त की संक्षिप्त जानकारी:
| पर्व | शुभ मुहूर्त | अवधि | तिथि प्रारंभ | तिथि समाप्त |
| धनतेरस | प्रदोष काल 05:33 PM – 08:09 PM | 2 घंटे 32 मिनट | 6 नवंबर, 10:30 AM | 7 नवंबर, 10:47 PM |
| काली चौदस | 11:57 PM – 12:48 AM | 51 मिनट | 7 नवंबर, 10:47 AM | 8 नवंबर, 11:27 AM |
| लक्ष्मी पूजन | प्रदोष काल 05:31 PM – 08:09 PM | 2 घंटे 32 मिनट | 8 नवंबर, 11:27 AM | 9 नवंबर, 12:31 PM |
| गोवर्धन पूजा | 03:46 PM – 06:02 | 2 घंटे 16 मिनट | 9 नवंबर, 12:31 PM | 10 नवंबर, 02:00 PM |
| भाई दूज | 01:30 PM – 03:46 PM | 2 घंटे 16 मिनट | 10 नवंबर, 02:00 PM | 11 नवंबर, 03:53 PM |
मुख्य बातें :
- वैदिक ज्योतिष में दीपावली का महत्व
- धनतेरस या धन त्रयोदशी
- नरक चतुर्दशी
- दीपावली और लक्ष्मी पूजन
- गोवर्धन पूजा और अन्नकूट उत्सव
- भाई दूज (भैय्या दूज)
वैदिक ज्योतिष में दीपावली का महत्व
वैदिक ज्योतिष में दीपावली का विशेष महत्त्व है। इस समय सूर्य (आत्मा) और चंद्रमा (मन) तुला राशि में स्थित होते हैं। तुला राशि के स्वामी शुक्र हैं, जिन्हें ज्योतिष में सौंदर्य, वैभव, सुख-सुविधाओं और भौतिक समृद्धि से जोड़ा जाता है। वहीं, माँ लक्ष्मी धन, ऐश्वर्य और सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी हैं।
इस प्रकार, तुला राशि और शुक्रग्रह का संबंध लक्ष्मी पूजन को एक विशेष सांस्कृतिक और ज्योतिषीय संदर्भ प्रदान करता है। यह अवसर हमें बाहरी समृद्धि के साथ जीवन में संतुलन, सद्बुद्धि और आंतरिक शांति का महत्त्व भी याद दिलाता है।
पांच दिन के दीपोत्सव की एक झलक
| पर्व | तिथि (2026) | प्रमुख देवता | मूल भाव | प्रमुख परंपरा |
| धनतेरस | 6 नवंबर | भगवान धन्वंतरि, माँ लक्ष्मी, कुबेर देव | स्वास्थ्य और समृद्धि |
सोना, चाँदी, बर्तन की खरीदारी; यमदीप प्रज्वलन |
| नरक चतुर्दशी | 7 नवंबर | श्रीकृष्ण, माँ काली | बुराई पर अच्छाई की जीत | अभ्यंग स्नान, दीप प्रज्वलन |
| दीपावली / माँ लक्ष्मी पूजन | 8 नवंबर | माँ लक्ष्मी, भगवान गणपति, कुबेर देव, माँ सरस्वती | प्रकाश की अंधकार पर विजय, समृद्धि | माँ लक्ष्मी पूजन, दीपोत्सव |
| गोवर्धन पूजा | 9 नवंबर | श्रीकृष्ण, गिरिराज जी | प्रकृति के प्रति कृतज्ञता | अन्नकूट भोग उत्सव |
| भाई दूज | 11 नवंबर | यमदेव, माँ यमुना | भाई-बहन का स्नेह | भाई के माथे पर तिलक |
धनतेरस धन त्रयोदशी
धनतेरस या धन त्रयोदशी से दीपावली के पाँच दिवसीय उत्सव की औपचारिक शुरुआत होती है। धनतेरस दो शब्दों से मिलकर बना है—‘धन’, जिसका अर्थ है समृद्धि और संपन्नता, और ‘तेरस’, यानी त्रयोदशी तिथि। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली त्रयोदशी, सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य, और आर्थिक स्थिरता की कामना के लिए विशेष है।
धनतेरस तिथि :
त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ - 06 नवंबर, 2026 को 10:30 AM
त्रयोदशी तिथि समाप्त - 07 नवम्बर, 2026 को 10:47 AM
पूजा के लिए उपर्युक्त मुहूर्त :
- प्रदोष काल - 05:33 PM से 08:09 PM
- वृषभ काल - 06:02 PM से 07:57 PM
धनतेरस पर प्रदोष काल में स्थिर लग्न के दौरान पूजा करना शुभ होता है। मान्यता है कि इस समय माँ लक्ष्मी की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। वृषभ लग्न को स्थिर लग्न माना जाता है, इसलिए इसे पूजा के लिए विशेष महत्त्व दिया जाता है।
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से जुड़ी दो प्रमुख पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं:
1. भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य
श्रीमद्भागवत महापुराण ( 34-35.8 ) के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया, तब कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए। वे श्री विष्णु के अवतार माने जाते हैं। उनके हाथों में अमृत से भरा कलश और आयुर्वेद के पवित्र ग्रंथ थे।
भगवान धन्वंतरि आयुर्वेद और आरोग्य के देवता हैं। इसलिए धनतेरस के दिन उनकी पूजा करके भक्त अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु और निरोगी जीवन की कामना करते हैं।
2. राजा हिम के पुत्र की कथा (यमदीप की कथा)
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा हिम के सोलह वर्षीय पुत्र की कुंडली में विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से मृत्यु होने का योग था। जब वह रात आई, तो उसकी बुद्धिमान पत्नी ने अपने पति को सोने नहीं दिया। उसने कमरे के दरवाज़े पर सोने-चाँदी के आभूषण और सिक्के रख दिए और चारों ओर बहुत सारे दीपक जला दिए। पूरी रात वह अपने पति को जगाए रखने के लिए गीत गाती रही और कहानियाँ सुनाती रही।
जब मृत्यु के देवता यमराज सर्प का रूप धारण करके वहाँ पहुँचे, तो दीपकों की तेज़ रोशनी और सोने-चाँदी की चमक से उनकी दृष्टि चकाचौंध हो गई। वे भीतर प्रवेश नहीं कर सके और आभूषणों के ढेर पर बैठकर पूरी रात गीत सुनते रहे। सुबह होते-होते राजकुमार की मृत्यु का निर्धारित समय बीत गया और यमराज बिना उसे कोई हानि पहुँचाए लौट गए।
मान्यता है कि तभी से धनतेरस की शाम दक्षिण दिशा में यमराज के नाम से दीप जलाने की परंपरा चली आ रही है। इसे यमदीप कहते हैं। यह दीप परिवार के सदस्यों की अकाल मृत्यु से रक्षा और उनकी दीर्घायु की कामना का प्रतीक है।
धनतेरस क्यों मनाया जाता है?

( धनतेरस में पूजा करते भक्त )
- स्वास्थ्य और आरोग्य का महत्त्व : इस दिन भगवान धंनवंतरि पूजा अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु और रोगों से मुक्ति की कामना के लिए की जाती है। इसे राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।
धनतेरस पर सोने-चाँदी और आभूषणों की खरीदारी का विशेष चलन है, लेकिन इसका मूल संदेश हमें याद दिलाता है कि धन से पहले स्वास्थ्य अनमोल है।
- धन और समृद्धि के लिए : धनतेरस पर माँ लक्ष्मी और देवताओं के कोषाध्यक्ष भगवान कुबेर की पूजा की जाती है। भक्त घर में सुख-समृद्धि और आर्थिक खुशहाली की कामना करते हैं। इस दिन दुकानदार और व्यापारी अपने प्रतिष्ठानों की सफ़ाई करते हैं और पूजा करते हैं। गुजराती और मारवाड़ी व्यापारी परंपराओं में इस समय पुराने हिसाब-किताब का समाधान करने की भी प्रथा रही है।
- धातु खरीदने की परंपरा: धनतेरस के दिन सोना, चाँदी, ताँबा, पीतल या नए बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई वस्तुएँ घर में माँ लक्ष्मी की कृपा, सुख-समृद्धि और खुशहाली लेकर आती हैं।
नरका (नरक) चतुर्दशी
नरक चतुर्दर्शी तिथि एवं अभ्यंग स्नान मुहूर्त
- चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ - 07 नवम्बर, 2026 को 10:47 AM
- चतुर्दशी तिथि समाप्त - 08नवम्बर, 2026 को 11:27 AM
अभ्यंग स्नान : 5:41 AM - 6:48 AM ( अवधि 57 मिनट )
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को नरका चतुर्दशी मनाई जाती है। इसे छोटी दिवाली भी कहते हैं। भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में इस पर्व को वहाँ की विशेष परंपराओं के अनुसार अलग-अलग नामों से जाना जाता है।
काली चौदस:
गुजरात और पश्चिमी भारत में प्रचलित इस पर्व पर माँ काली और कई स्थानों पर भगवान हनुमान की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इससे नकारात्मक शक्तियों और बुरी प्रभावों से रक्षा होती है।
काली चौदस पूजा मुहूर्त -
शनिवार, नवंबर 7, 2026
पूजा मुहूर्त - 11:39 PM (नवंबर 7) से 12:48 AM (नवंबर 8), 2026 (अवधि 52 मिनट )
रूप चौदस या रूप चतुर्दशी:
इस दिन सुंदरता, स्वच्छता और स्वयं पर विशेष ध्यान दिया जाता है। सूर्योदय से पहले तेल मालिश और उबटन लगाकर स्नान करने की परंपरा है, जिसे अभ्यंग स्नान कहते हैं। इसे तन-मन की अशुद्धियों और नकारात्मकता को दूर करके दीपावली पर माँ लक्ष्मी के स्वागत की तैयारी के रूप में भी देखा जाता है।
भूत चतुर्दशी:
बंगाल में इस दिन पूर्वजों की स्मृति में 14 मिट्टी के दीपक जलाए जाते हैं, जिन्हें चौद्दो प्रदीप कहते हैं। मान्यता है कि ये दीप पूर्वजों की आत्माओं का मार्ग रोशन करते हैं और बुरी शक्तियों को दूर रखते हैं। इस दिन 14 प्रकार की पत्तेदार सब्जियाँ खाने की परंपरा भी है, जिसे चौद्दो शाक कहा जाता है।
पौराणिक कथाएँ
1. नरकासुर का वध (नरक चतुर्दशी की कथा)

( श्री कृष्ण नरकासुर का वध करते हुए )
श्रीमद्भागवत पुराण (10.59) के अनुसार, प्राग्ज्योतिषपुर का राजा नरकासुर, जो भूदेवी के पुत्र थे, अपार शक्ति प्राप्त करने के बाद अहंकारी हो गये। उसने स्वर्गलोक पर आक्रमण करके इंद्रदेव को पराजित किया। वे भगवान वरुण का छत्र, देवताओं की माता देवी अदिति के कुंडल और देवताओं के क्रीड़ास्थल मणिपर्वत को भी छीन लिया। इसके अलावा, उसने 16,100 स्त्रियों को बंदी बना लिया।
देवताओं की सहायता के लिए श्रीकृष्ण अपनी पत्नी देवी सत्यभामा के साथ गरुड़ देव पर सवार होकर नरकासुर के राज्य पहुँचे। देवी सत्यभामा को भूदेवी का अवतार माना जाता है। श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से नरकासुर का वध किया और सभी बंदी स्त्रियों को मुक्त कराया। उन्होंने देवी अदिति के छीने गए कुंडल भी वापस लौटा दिए।
इसी विजय की स्मृति में नरका (नरक) चतुर्दशी मनाई जाती है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
2. माँ काली की आराधना और रक्षा की कामना (काली चौदस)
काली चौदस पर माँ काली और कई स्थानों पर भगवान हनुमान की पूजा की जाती है। भक्त नकारात्मकता और बुरी शक्तियों से रक्षा की कामना करते हैं और दीपावली के स्वागत की तैयारी करते हैं। इस दिन की अँधेरी रात को माँ काली की साधना के लिए विशेष महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इसी परंपरा के कारण यह पर्व काली चौदस कहलाता है।
हालाँकि, बंगाल में माँ काली की विशेष पूजा कार्तिक अमावस्या यानी दीपावली की रात को की जाती है।
दीपावली और लक्ष्मी पूजन
दीपावली शब्द संस्कृत के दो शब्दों—दीप (दीया) और आवली (पंक्ति)—से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है दीपों की पंक्ति। दीपावली के पाँच दिवसीय उत्सव में लक्ष्मी पूजन का विशेष महत्त्व है। यह पूजा कार्तिक अमावस्या यानी दीपावली के दिन की जाती है। अमावस्या की रात वर्ष की सबसे अँधेरी रातों में से एक होती है। ऐसे में दीप जलाना केवल अँधेरे को दूर करने का ही नहीं, बल्कि जीवन के भौतिक, आध्यात्मिक और आर्थिक अभावों को दूर करने का भी प्रतीक है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के समय इसी दिन माँ लक्ष्मी क्षीरसागर से प्रकट हुई थीं। वहीं, त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की खुशी में नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। हर वर्ष माँ लक्ष्मी कार्तिक अमावस्या के दिन धरती पर आती हैं। इन दोनों प्रसंगों से जुड़ी आस्था दीपावली को समृद्धि, धर्म की विजय और शुभ आगमन का पर्व बनाती है।
इस दिन माँ लक्ष्मी उन घरों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में पधारती हैं, जहाँ स्वच्छता हो, दीपों से उजाला हो और उनका स्वागत श्रद्धा से किया जाए। माँ लक्ष्मी के साथ विघ्नहर्ता भगवान गणेश, स्वर्गलोक के कोषाध्यक्ष भगवान कुबेर और ज्ञान एवं बुद्धि की देवी माँ सरस्वती की भी पूजा की जाती है।
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लक्ष्मी पूजन मुहूर्त -
- प्रदोष काल - 05:31 PM से 08:09 PM
- वृषभ काल - 05:54 PM से 07:50 PM
- अमावस्या तिथि प्रारम्भ - 08 नवम्बर, 2026 को 11:27 AM
- अमावस्या तिथि समाप्त - 09 नवम्बर, 2026 को 12:31 PM
वसु वरस या वाघ बारस - 5 नवंबर 2026
गुजरात में दीपावली के उत्सव की शुरुआत वाघ बारस से होती है। इसे गोवत्स द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन गाय और बछड़े की पूजा करने की परंपरा है।
चोपड़ा पूजन - 8 नवंबर 2026
दीपावली के दिन गुजरात के व्यापारी समुदायों में चोपड़ा पूजन की विशेष परंपरा है। चोपड़ा का अर्थ है बही-खाता, इस अवसर पर व्यापारी अपने नए बही-खातों और लेखा पुस्तकों का पूजन करते हैं।
गुजराती नववर्ष (बेस्टु वरस) - 10 नवंबर 2026
गुजराती नववर्ष को बेस्टु वरस कहा जाता है। इसी दिन गुजराती विक्रम संवत 2083 का आरंभ होगा।
गोवर्धन पूजा और अन्नकूट उत्सव

( श्री कृष्ण की गोवर्धन लीला )
गोवर्धन पूजा भगवान श्रीकृष्ण की उस दिव्य लीला का स्मरण कराती है, जब उन्होंने अपनी कनिष्ठिका (छोटी उँगली) पर गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाया था। यह प्रसंग भक्तों को विश्वास दिलाता है कि जो भगवान की शरण में आते हैं, वे उन्हें संकटों में भी अकेला नहीं छोड़ते।
गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त - मंगलवार, 10 नवम्बर, 2026
- 06:40 AM से 08:50 AM ( अवधि - 02 घण्टे 10 मिनट्स )
- प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ - 09 नवम्बर, 2026 को 12:31 PM
- प्रतिपदा तिथि समाप्त - 10 नवम्बर, 2026 को 02:00 PM
इस दिन भक्त गोवर्धन पर्वत और गिरिराज महाराज की पूजा करते हैं तथा भगवान श्रीकृष्ण को अन्नकूट का भोग अर्पित करते हैं।
भाई दूज (भैय्या दूज)
दीपावली के उल्लास के बीच भाई दूज रिश्तों में बसे स्नेह और अपनत्व को समर्पित पर्व है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर गए थे। यमुना ने प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया और उनके मंगल की कामना की। इसी परंपरा में बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर उनकी सुख-समृद्धि और दीर्घायु के लिए प्रार्थना करती हैं।
भाई दूज मुहूर्त : बुधवार, 11 नवम्बर, 2026
- भाई दूज - 01:30 PM से 03:46 PM ( अवधि - 02 घण्टे 16 मिनट्स)
- द्वितीया तिथि प्रारम्भ - नवम्बर 10, 2026 को 02:00 पी एम बजे
- द्वितीया तिथि समाप्त - नवम्बर 11, 2026 को 03:53 पी एम बजे
“शुभं करोति कल्याणम्, आरोग्यं धनसंपदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय, दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते॥’’
धनतेरस से भाई दूज तक, दीपावली के पाँचों पर्व हमें आरोग्य, सदाचार, समृद्धि, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और पारिवारिक प्रेम का संदेश देते हैं। इन उत्सवों की सार्थकता तभी पूर्ण होती है, जब दीपों का प्रकाश हमारे विचारों और कर्मों में भी उतर आए।
! ! दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ ! !
दिवाली से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आपकी पावन आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ी जिज्ञासाओं के समाधान
गोवर्धन पूजा क्यों मनाई जाती है?
गोवर्धन जी की पूजा कैसे की जाती है?
नरक चौदस क्यों मनाई जाति है ?
2026 में लक्ष्मी पूजन का मुहूर्त कब है?
2026 में गोवर्धन पूजा कब है?
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