करवा चौथ : प्रेम और वैवाहिक जीवन का उत्सव
करवा चौथ विवाहित महिलाएँ बड़े प्रेम और श्रद्धा के साथ मनाती हैं। हममें से कई लोग इससे जुड़ी वर्तमान परंपराओं के बारे में जानते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पवित्र व्रत का संबंध प्राचीन धार्मिक ग्रंथों से भी जोड़ा जाता है?
करवा चौथ से जुड़ी एक प्रचलित कथा हमें महाभारत के समय में ले जाती है। वनवास के दौरान जब अर्जुन दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करने के लिए इंद्रकील पर्वत पर तपस्या करने गए, तब बाकी पांडवों को कई कठिनाइयों और संकटों का सामना करना पड़ा।
अपने पति की सुरक्षा को लेकर चिंतित द्रौपदी ने श्रीकृष्ण से सहायता माँगी। श्रीकृष्ण ने उन्हें करवा चौथ का व्रत रखने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि देवी पार्वती ने भी भगवान महादेव के कल्याण के लिए यह व्रत किया था। श्रीकृष्ण की सलाह मानकर द्रौपदी ने पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखा। कुछ समय बाद अर्जुन सकुशल लौट आए और पांडवों ने भी अपनी कठिनाइयों पर विजय प्राप्त की।
समय के साथ करवा चौथ मनाने के तरीकों में बदलाव आया है, लेकिन इसकी मुख्य परंपराएँ आज भी बनी हुई हैं। आइए, जानते हैं कि आज के दौर में पति-पत्नी इन परंपराओं को कैसे निभा सकते हैं, व्रत के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
मुख्य बातें :
- करवा चौथ का इतिहास और महत्त्व
- करवा चौथ का व्रत क्यों रखा जाता है?
- करवा चौथ पूजा का शुभ मुहूर्त कितने बजे है ?
- करवा चौथ व्रत कथा
- माँ गौरी और चंद्रमा की पूजा क्यों की जाती है?
- करवा चौथ की पूजा विधि: चरण-दर-चरण
- करवा चौथ व्रत के नियम क्या हैं?
- करवा चौथ पर पति क्या करें?
- क्या अविवाहित महिलाएँ भी करवा चौथ का व्रत रख सकती हैं?
करवा चौथ का इतिहास और महत्त्व
करवा चौथ, जिसे करक चतुर्थी भी कहा जाता है, उत्तर और पश्चिम भारत में प्रमुखता से मनाया जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएँ सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक बिना अन्न-जल ग्रहण कर व्रत रखती हैं। इसे निर्जला व्रत कहा जाता है।
इस पर्व के नाम का संबंध इसकी पूजा-विधि और तिथि से है। ‘करवा’ एक मिट्टी का छोटा कलश है, जिसका उपयोग पूजा के दौरान किया जाता है। वहीं, ‘चौथ’ का अर्थ है चतुर्थी यानी चौथा दिन। यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है, जो आमतौर पर अक्टूबर या नवंबर में पड़ती है।
नारद पुराण में इस व्रत का उल्लेख करक व्रत के नाम से मिलता है। इसमें व्रत से जुड़ी पूजा-विधि का भी विस्तार से वर्णन किया गया है।
करवा चौथ का व्रत क्यों रखा जाता है?
परंपरागत रूप से करवा चौथ का व्रत पति की उत्तम स्वास्थ्य, लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता रहा है। समय के साथ यह पर्व पति-पत्नी के आपसी प्रेम, विश्वास और जीवनभर साथ निभाने के संकल्प का उदाहरण बन गया।
यह पर्व गृहस्थ आश्रम के महत्त्व को दर्शाता है, जहाँ परिवार, प्रेम और आपसी सहयोग को जीवन का आधार माना जाता है।
प्रेम और समर्पण की भावना से जुड़ा यह पर्व कई सुंदर उद्देश्यों को अपने भीतर समेटे हुए है:
सुखी वैवाहिक जीवन के लिए मंगलकामना:
महिलाएँ अखंड सौभाग्य यानी जीवनभर सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद पाने के लिए प्रार्थना करती हैं। यह परंपरा प्रेमपूर्ण और सुखी दांपत्य जीवन की कामना का प्रतीक है।
ससुराल के रिश्तों में प्रेम और अपनापन:
यह पर्व परिवार की अलग-अलग पीढ़ियों को करीब लाता है। सरगी (सूर्योदय से पहले सास द्वारा बहू को दिया जाने वाला भोजन) और बाया (सास को दिए जाने वाले उपहार) जैसी परंपराएँ आपसी सम्मान, स्नेह और अपनापन बढ़ाती हैं।
सामूहिक उत्सव और सखियों का साथ:
शाम की पूजा, व्रत कथा और पारंपरिक गीत महिलाओं को एक साथ आने का अवसर देते हैं। इससे आपसी मेलजोल बढ़ता है और साझा संस्कृति व परंपराओं के प्रति जुड़ाव मजबूत होता है।
करवा चौथ पूजा का शुभ मुहूर्त कितने बजे है ?
करवा चौथ 2026 के व्रत, पूजा और चंद्र दर्शन से जुड़े महत्वपूर्ण समय और शुभ मुहूर्त यहाँ जानें।
| विवरण | तिथि और समय |
| करवा चौथ की तिथि | गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 |
| चतुर्थी तिथि प्रारंभ | 29 अक्टूबर 2026 को रात 1:06 बजे |
| चतुर्थी तिथि समाप्त | 29 अक्टूबर 2026 को रात 10:09 बजे |
| करवा चौथ व्रत का समय | प्रातः 6:31 बजे से रात्रि 8:17 बजे तक (13 घंटे) |
| करवा चौथ संध्या पूजा मुहूर्त | सायं 5:38 बजे से 6:56 बजे तक (1 घंटा 17 मिनट) |
| करवा चौथ पर चंद्रोदय का समय | रात्रि 8:17 बजे (नई दिल्ली) |
ध्यान दें: चंद्रोदय का समय शहर के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
करवा चौथ के दिन की एक झलक
| समय | क्या करें |
| सूर्योदय से पहले | अपनी सास या परिवार की किसी बुज़ुर्ग महिला द्वारा भेजी गई सरगी ग्रहण करें। |
| दिन के समय (सूर्योदय से सूर्यास्त तक) | बिना अन्न और जल ग्रहण किए निर्जला व्रत रखें। |
| दोपहर में | मेहंदी लगाएँ और सोलह शृंगार करें। |
| दोपहर के बाद | करवा चौथ की पूजा की थाली तैयार करें। इसमें जल से भरा मिट्टी का करवा, घी का दीपक, धूप, ताज़े फूल, अक्षत, कुमकुम, मिठाई और छलनी रखें। |
| शाम को पूजा के समय | सखियों और परिवार की महिलाओं के साथ एकत्रित होकर माँ पार्वती की पूजा करें, करवा चौथ व्रत कथा सुनें, थाली फेरें, करवा बदलें और बड़ों का आशीर्वाद लें। |
| चंद्रोदय के समय | खुले स्थान पर जाकर पहले छलनी से चंद्रमा के दर्शन करें और फिर उसी छलनी से अपने पति को देखें। चंद्रमा को जल और मिठाई का अर्घ्य अर्पित करें। |
| चंद्र दर्शन के बाद | पति के हाथों जल और मिठाई ग्रहण करके व्रत खोलें। |
(पूजा की संपूर्ण विधि नीचे चरणबद्ध तरीके से दी गई है।)
करवा चौथ व्रत कथा

( करवा चौथ व्रत कथा )
करवा चौथ की व्रत कथा वीरावती के जीवन पर आधारित है। वीरावती, विद्वान ब्राह्मण वेद शर्मा और उनकी पत्नी लीलावती की पुत्री थीं। वे शुक्रप्रस्थपुर (वर्तमान दिल्ली) में रहते थे। वीरावती के सात वीर भाई थे, जो उनसे बहुत प्रेम करते थे।
विवाह योग्य होने पर वीरावती का विवाह एक विद्वान ब्राह्मण से हुआ। विवाह के बाद कार्तिक मास में, जब वीरावती ने पहली बार करवा चौथ का व्रत रखा, तो उन्होंने अपनी भाभियों के साथ यह व्रत किया।
शाम को स्नान करने के बाद वीरावती ने श्रद्धापूर्वक वटवृक्ष का चित्र बनाया, जिसके नीचे भगवान शिव, माँ गौरी, श्री गणेश और भगवान कार्तिकेय विराजमान थे। उन्होंने पूरी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना की और करवा चौथ की व्रत कथा सुनी। शाम होते-होते भूख और प्यास के कारण वे बहुत कमज़ोर महसूस करने लगीं और चंद्रमा के निकलने की प्रतीक्षा करने लगीं।
वीरावती को कष्ट में देखकर उनके भाई दुखी हो उठे। वे उन्हें भूख-प्यास से व्याकुल नहीं देख पा रहे थे। इसलिए वे पास की एक पहाड़ी पर चढ़ गए और वहाँ एक वटवृक्ष की शाखाओं के पीछे दीपक रख दिया। फिर उन्होंने वीरावती से कहा कि चंद्रमा निकल आया है।
भाइयों की बात पर विश्वास करके वीरावती ने चंद्रमा को अर्घ्य दिया और अपना व्रत खोल लिया। लेकिन जैसे ही उन्होंने भोजन किया, एक के बाद एक अशुभ घटनाएँ होने लगीं। भोजन के पहले कौर में उन्हें बाल मिला, दूसरे कौर के साथ उन्हें छींक आ गई और तीसरा कौर खाते ही समाचार मिला कि उनके पति अचानक बीमार पड़ गए हैं और उनका देहांत हो गया है।
वीरावती ने भगवान शिव की गहरी श्रद्धा के साथ प्रार्थना की और एक वर्ष तक उपवास रखा। अगले वर्ष उन्होंने सभी रीति-रिवाजों का पालन करते हुए पूरी निष्ठा और श्रद्धा से फिर करवा चौथ का व्रत किया।
उस दिन अप्सराओं के साथ देवराज इंद्र की पत्नी देवी इंद्राणी (जिन्हें शची के नाम से भी जाना जाता है) स्वयं स्वर्गलोक से वीरावती के साथ करक चतुर्थी का व्रत करने के लिए पृथ्वी पर आईं।
वीरावती ने देवी इंद्राणी से कहा, “मैंने पूरी श्रद्धा और निष्ठा से करवा चौथ का व्रत किया था, फिर भी मेरे पति की मृत्यु हो गई। मैं नहीं जानती कि मुझसे ऐसा कौन-सा कार्य हुआ, जिसके कारण मुझे यह दुःख सहना पड़ा। हे माता! आप कृपा करके यहाँ पधारी हैं। कृपया मेरे पति को पुनः जीवित करके मेरी सहायता करें।
देवी इंद्राणी ने वीरावती को समझाया कि पिछले वर्ष उन्होंने वास्तविक चंद्रोदय से पहले ही अर्घ्य अर्पित कर दिया था। इसी कारण उनके पति की मृत्यु हुई थी। हालाँकि, देवी इंद्राणी ने उन्हें आश्वासन दिया कि यदि वे उचित विधि-विधान के अनुसार व्रत करेंगी, तो उनके पति पुनः जीवित हो जाएँगे।
वीरावती ने सभी रीति-रिवाजों का पूरी श्रद्धा से पालन किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी इंद्राणी ने उनके पति को फिर से जीवित कर दिया।
वीरावती की अटूट श्रद्धा के फलस्वरूप उनके पति को दीर्घायु, धन और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।
यह कथा हमें सिखाती है कि किसी भी व्रत को जल्द पूरा करने की जल्दबाजी में नहीं, बल्कि धैर्य, सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ करना चाहिए। करवा चौथ का व्रत पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और मंगल की कामना का प्रतीक है।
माँ गौरी और चंद्रमा की पूजा क्यों की जाती है?
करवा चौथ पर भक्त माँ गौरी (माँ पार्वती), भगवान शिव और श्री गणेश की पूजा करते हैं। माँ पार्वती को अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि उन्होंने हर जन्म में भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया। इसी मान्यता के अनुसार, करवा चौथ पर विवाहित महिलाएँ चंद्रमा के माध्यम से माँ पार्वती से सुखी और मंगलमय वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद माँगती हैं।
श्री गणेश के आशीर्वाद से पावन मानी जाने वाली चतुर्थी का चंद्रमा भक्तों के जीवन में आरोग्य और दीर्घायु का आशीर्वाद लेकर आता है।
करवा चौथ की पूजा विधि: चरण-दर-चरण
यहाँ विवाहित महिलाओं, पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं और नवविवाहितों के लिए करवा चौथ व्रत की पूरी विधि आसान चरणों में दी गई है।
सूर्योदय से पहले की तैयारी
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें: सूर्योदय से पहले उठें और स्नान करके व्रत की तैयारी करें।
- सरगी: कुछ क्षेत्रों में सूर्योदय से पहले सरगी खाने की परंपरा है। इसे सास अपनी बहू के लिए तैयार करती हैं। सरगी में आमतौर पर फल, मेवे, मिठाइयाँ, मठरी और घर का बना भोजन शामिल होता है, ताकि दिनभर व्रत रखने के लिए पर्याप्त ऊर्जा बनी रहे।
- पर्याप्त पानी पिएँ: सूर्योदय से पहले अच्छी तरह पानी पिएँ, क्योंकि इसके बाद निर्जला व्रत शुरू हो जाता है, जिसमें भोजन और पानी दोनों का त्याग किया जाता है।
- व्रत का संकल्प लें: अपने जीवनसाथी के सुख, स्वास्थ्य और कल्याण की कामना करते हुए पूरी श्रद्धा से व्रत रखने का संकल्प लें।
- मेहंदी लगाएँ: हाथों पर सुंदर मेहंदी लगाएँ और शाम की पूजा के लिए तैयार हों।
दोपहर के बाद की तैयारी
- सोलह शृंगार करें: लाल, मैरून या पीले रंग के पारंपरिक कपड़े, जैसे साड़ी, लहँगा या सूट पहनें। इसके बाद सोलह शृंगार करें।
- शाम की पूजा की तैयारी करें: पूजा के स्थान पर देवी पार्वती (गौरा), भगवान महादेव और भगवान गणेश की तस्वीर या मूर्ति रखें। साथ ही करवा चौथ की पूजा से संबंधित चित्र या कैलेंडर भी रखें।
- करवा तैयार करें: मिट्टी के पात्र (करवा) में पानी भरें और उसमें गंगाजल की कुछ बूँदें डालें। करवे में गेहूँ की कुछ बालियाँ रखें। इसके बाद करवे को मिट्टी की प्लेट से ढक दें और उसके ऊपर अक्षत (चावल के साबुत दाने) रखें। साथ ही, एक सिंघाड़ा या कोई छोटा फल, एक लड्डू और कुछ फूल भी रखें।
- पूजा की थाली सजाएँ: थाली में घी का जलता हुआ दीपक, धूपबत्ती, ताजे फूल, अक्षत, कुमकुम, मिठाई और छलनी रखें। चंद्रमा के दर्शन और पूजा के समय छलनी का उपयोग किया जाता है।
शाम की पूजा-विधि

(थाली फेरा की रस्म निभाती महिलाएँ)
-
पूजा-अर्चना करें: चंद्रोदय से पहले, पूजा के शुभ मुहूर्त में करवा माता को प्रणाम करें और उन्हें नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद माँ गौरी की षोडशोपचार पूजा करें।
आप यह पूजा साधना ऐप पर माँ दुर्गा के मंदिर (कदंब वन) में भी कर सकते हैं। - थाली फेरने की रस्म: इसके बाद, एक दूसरे करवे में पानी भरकर उसे माँ गौरी को समर्पित करें। फिर अपने पास बैठी महिला के साथ करवे को सात बार दक्षिणावर्त दिशा में बदलें और इस दौरान यह मंत्र बोलें, “सदा सुहागन करवा लेही, करवा लेही।” इसका भाव है—करवे का आदान-प्रदान करते हुए हम अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करते हैं।
- व्रत कथा सुनें: अपने हाथ में चावल के 16 दाने लेकर करवा चौथ की व्रत कथा सुनें। कथा सुनने के बाद किसी सुहागिन महिला को नैवेद्य, अक्षत और दक्षिणा अर्पित करें। यह महिला आपकी सास, किसी ब्राह्मण की पत्नी या करवा चौथ की व्रत कथा सुनाने वाली महिला हो सकती हैं।
व्रत पारण की विधि
- चंद्र दर्शन और पूजा: चाँद निकलने पर छत या किसी खुले स्थान पर जाएँ। पूजा की थाली में दीपक जलाएँ और उसे छलनी के अंदर या उसके पास रखें। करवे से चंद्रमा को अर्घ्य दें और छलनी से चंद्रमा के दर्शन करें। इसके बाद उसी छलनी से अपने पति का चेहरा देखें।
- व्रत खोलें: इसके बाद आपके पति करवे से आपको पानी पिलाएँ और मिठाई का एक छोटा-सा टुकड़ा खिलाएँ। इस तरह आप व्रत का पारण कर सकती हैं।
ध्यान दें: करवा चौथ की पूजा-विधि और परंपराएँ हर परिवार में अलग-अलग हो सकती हैं। पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे अपने परिवार की परंपराओं के अनुसार व्रत और पूजा करें।
करवा चौथ व्रत के नियम क्या हैं?
करवा चौथ के दिन व्रत रखते समय कुछ परंपरागत नियमों का पालन किया जाता है। आइए, जानते हैं इनके बारे में।
- निर्जला व्रत: परंपरा के अनुसार, महिलाएँ सूर्योदय से लेकर रात में चंद्र दर्शन तक बिना कुछ खाए-पिए व्रत रखती हैं। इस दौरान भोजन और पानी का सेवन नहीं किया जाता।
- सरगी ग्रहण करने का समय: सरगी सूर्योदय से पहले खा लेनी चाहिए। सूर्योदय होते ही व्रत शुरू हो जाता है।
- वस्त्रों के रंग का चुनाव: परंपरागत रूप से विवाहित महिलाएँ व्रत के दिन काले और सफेद रंग के कपड़े पहनने से बचती हैं। इसके बजाय लाल, गुलाबी, मैरून, नारंगी और पीले जैसे शुभ माने जाने वाले रंगों को प्राथमिकता दी जाती है।
- पति के साथ व्रत का पारण: चंद्र दर्शन और पूजा के बाद पति अपनी पत्नी को पानी पिलाकर और भोजन का पहला निवाला खिलाकर व्रत का पारण करवाते हैं।
- स्वास्थ्य के अनुसार व्रत में छूट: गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं, बुजुर्गों तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों को अपनी सेहत का विशेष ध्यान रखना चाहिए। वे अपनी ज़रूरत के अनुसार पानी, दूध और फल आदि ले सकते हैं या निर्जला व्रत रखने के बजाय शाम की पूजा में शामिल हो सकते हैं। स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए व्रत के नियमों में बदलाव करना उचित है।
करवा चौथ पर पति क्या करें?

(करवा चौथ आपसी प्रेम और अटूट साथ का उत्सव है)
आज के दौर में करवा चौथ पति-पत्नी के बीच आपसी प्रेम, सम्मान और सहयोग को दर्शाने का अवसर भी है। पति इस दिन अपनी पत्नी का साथ देकर और छोटी-छोटी खुशियों का ध्यान रखकर इसे और खास बना सकते हैं।
- सुबह सरगी की तैयारी में हाथ बटाएँ: सूर्योदय से पहले सरगी तैयार करने या परोसने में पत्नी की मदद करें। दिन की शुरुआत में आपका यह छोटा-सा प्रयास उनके प्रति आपके प्रेम और परवाह को दर्शाता है।
- पत्नी का साथ दें: दिनभर उनके सामने खाने-पीने से परहेज़ करने की कोशिश करें। घर के कामों, बच्चों की देखभाल और रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारियों में हाथ बँटाएँ, ताकि निर्जला व्रत के दौरान उन्हें कम थकान हो।
- शाम की पूजा की तैयारी करें: चंद्र दर्शन और पूजा के लिए छलनी, दीपक, मिठाई, पानी से भरा करवा और ताजे फूल जैसी ज़रूरी चीज़ें समय पर तैयार रखने में मदद करें।
- प्यार से दें कोई खास उपहार: करवा चौथ पर पत्नी को उपहार देना प्रेम और सराहना जताने का एक सुंदर तरीका है। आप उन्हें आभूषण, पारंपरिक कपड़े, स्पा में आराम का समय या उनकी पसंद की कोई खास चीज़ दे सकते हैं।
- व्रत के पारण में साथ रहें: चाँद निकलते ही पत्नी के साथ छत या खुले स्थान पर मौजूद रहें। चंद्र दर्शन और पूजा के बाद उन्हें प्यार से पानी पिलाएँ और मिठाई खिलाएँ। इसके बाद दोनों के लिए हल्के और पौष्टिक रात्रिभोज की व्यवस्था करें।
- पत्नी के साथ व्रत रखें: कई पति भी अपनी पत्नी के साथ व्रत रखते हैं। यह आपसी प्रेम, समान भागीदारी और एक-दूसरे के प्रति समर्पण जताने का एक सुंदर तरीका हो सकता है।
क्या अविवाहित महिलाएँ भी करवा चौथ का व्रत रख सकती हैं?
हाँ, अविवाहित महिलाएँ भी करवा चौथ का व्रत रख सकती हैं। वे आमतौर पर मनचाहा और योग्य जीवनसाथी पाने की कामना से या सगाई होने पर अपने मंगेतर के सुख-स्वास्थ्य और कल्याण के लिए यह व्रत रखती हैं।
हालाँकि, अविवाहित महिलाओं के लिए व्रत की कुछ परंपराएँ विवाहित महिलाओं से अलग हो सकती हैं।
- चंद्रमा के बजाय तारों के दर्शन: कुछ परंपराओं में अविवाहित महिलाएँ चाँद के बजाय तारे के दर्शन करके अर्घ्य देती हैं। इसके लिए वे छलनी या दुपट्टे का उपयोग कर सकती हैं। हालाँकि, यह परंपरा परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
- सरगी की व्यवस्था: चूँकि उनकी सास नहीं होतीं, इसलिए उनकी माँ या परिवार की कोई बड़ी महिला सूर्योदय से पहले खाने के लिए फल, मिठाई और अन्य पकवान दे सकती हैं।
- व्रत का पारण: तारों के दर्शन और अर्घ्य देने के बाद वे पानी पीकर और कुछ खाकर अपना व्रत पूरा कर सकती हैं। सगाई हो चुकी हो, तो कुछ महिलाएँ तारों या चंद्रमा के दर्शन के बाद अपने मंगेतर की तस्वीर देखकर या उनसे बात करके इस पल को खास बनाती हैं।
- व्रत में अपनी सुविधा का ध्यान रखें: परिवार की परंपराओं और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार अविवाहित महिलाएँ निर्जला व्रत के बजाय फलाहार या हल्का व्रत भी रख सकती हैं। व्रत के दौरान अपनी सेहत का ध्यान रखना ज़रूरी है।
समय के साथ करवा चौथ मनाने के तरीकों में बदलाव आया है, लेकिन इस पर्व का मूल भाव आज भी वही है—ऐसे रिश्ते का उत्सव, जो समय की हर कसौटी पर खरा उतरता है। भागदौड़ भरी ज़िंदगी में यह दिन हमें ठहरकर अपने जीवनसाथी के साथ, प्रेम और आपसी समर्पण के रिश्ते को संजोने का अवसर देता है।
कामना है कि आपकी प्रार्थनाएँ पूरी हों और हर बीतते साल के साथ आपके रिश्ते में प्रेम, विश्वास और अपनापन और भी गहरा होता जाए।
करवा चौथ से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आपकी पावन आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ी जिज्ञासाओं के समाधान
करवा चौथ पर किस रंग के कपड़े पहनने से बचना चाहिए?
क्या करवा चौथ पर बाल धो सकते हैं?
करवा चौथ 28 या 29 अक्टूबर को है?
क्या गर्भावस्था के दौरान करवा चौथ का व्रत छोड़ सकती हैं?
क्या पीरियड्स के दौरान करवा चौथ का व्रत रख सकते हैं?
क्या करवा चौथ पर ब्रश कर सकते हैं?
We are proud Sanatanis, and spreading Sanatan values and teachings, our core mission. Our aim is to bring the rich knowledge and beauty of Sanatan Dharm to every household. We are committed to presenting Vedic scriptural knowledge and practices in a simple, accessible, and engaging manner so that people can benefit and internalize them in their lives.
Presented By Team Sadhana
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