रामलीला : कथा एक रंग अनेक

रामलीला : कथा एक रंग अनेक

Published: October 19, 2026 Last Updated: October 21, 2026

राम कहानी सुनो रे राम कहानी

कहत सुनत आवे, अँखियों में पानी   

शरद ऋतु का आगमन हो चुका है। देवी पक्ष के उत्सव का उत्साह चरम पर है, पर साथ ही मोहल्लों और गलियों में एक और कथा गूँजायमान है। कहीं श्रीराम के वनगमन का प्रसंग जीवंत हो रहा है, तो कहीं वानरराज बाली रावण के अभिमान को चुनौती दे रहे है। कही जनकनंदिनी माता सीता के त्याग, धैर्य और अग्निपरीक्षा को देख मन चिंतित है, तो कहीं पवनपुत्र हनुमान की अनन्य भक्ति का स्मरण हृदय को प्रभु-प्रेम से भर रहा है।

यह कथा है रामायण की—मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की। उनका जीवन केवल एक युग की गाथा नहीं, बल्कि युगों-युगों से मानवता के लिए धर्म, कर्तव्य, करुणा और मर्यादा का आदर्श रहा है। 

रामलीला, श्रीराम की कथा को मात्र मंच पर सुनाने या प्रस्तुत करने का नाम नहीं है। जब कलाकार मंच पर प्रस्तुति देते है तो ऐसा लगता है, मानो रामायण के पात्र हमारे बीच ही जीवंत हो उठे हो। उनके सुख-दुःख हमारे अपने हों, उनके प्रश्न हमारे प्रश्न हों और उनके आदर्श जीवन की राह दिखाने वाले दीपक। हर वर्ष, हर पीढ़ी और हर क्षेत्र में यह कथा नए भावों के साथ सामने आती है, फिर भी इसकी आत्मा वही रहती है।

भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक, अलग-अलग भाषाओं, लोककलाओं, नृत्य-नाट्यों और परंपराओं में रामकथा ने अपनी जगह बनाई। कहीं वह रामलीला बनकर मंच पर उतरी, कहीं यक्षगान और कथकली में भावों से अभिव्यक्त हुई, तो कहीं लोकगीतों और कथावाचन के द्वारा जनमानस तक पहुँची। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि भारत ही नहीं विश्व के अलग-अलग हिस्सों में रामकथा का मंचन किया जाता है। 

आइए, इस लेख में भारत और विश्व के अन्य हिस्सों में होने वाली रामलीला और रामकथा की यात्रा करें। 

मुख्य बातें : 

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रामलीला 

भारत में रामकथा केवल किताबों तक सीमित नहीं है। कहीं पूरा शहर एक रंगमंच बन जाता है, तो कहीं ढोल-मंजीरों और गीतों के साथ रातभर भगवान राम के जीवन की गाथा गाई जाती है। रामलीला की यही खूबी है कि कथा परिचित होते हुए भी उसे कहने का ढंग हर क्षेत्र का अपना है।

रामलीला क्या है?

‘रामलीला’ का अर्थ है—भगवान राम की लीला। इसमें रामायण के प्रसंगों को अभिनय, गायन, कथावाचन, पाठ और संवाद द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। उत्तर भारत की अनेक रामलीलाओं का प्रमुख आधार तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस है। 

यूनेस्को ने साल 2008 में रामलीला को ‘’अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’’ की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया। यह गीत, कथावाचन, पाठ और संवाद से सजी ऐसी परंपरा है, जो दशहरे के समय उत्तर भारत के गाँवों और शहरों में जीवंत होती है। इसकी विशेषता सामुदायिक भागीदारी है, जहाँ लोग अभिनय से लेकर वेशभूषा, सजावट और मंच की तैयारी तक में योगदान देते हैं।

उत्तर भारत में रामलीला

( उत्तर प्रदेश के विभिन क्षेत्रों की रामलीला ) 

उत्तर प्रदेश के, अयोध्या, प्रयागराज और लखनऊ, बनारस एवं रामनगर की रामलीला के जरिए भगवान श्रीराम की कथा मंचित होती है।वहीं रामनगर की रामलीला और अयोध्या दीपोत्सव इसमें और रंग भरते हैं। 

यहाँ रामलीला किसी एक मंच पर नहीं होती—नगर के अलग-अलग स्थान अयोध्या, चित्रकूट, पंचवटी और लंका बनते हैं। दर्शक भी कलाकारों के साथ एक जगह से दूसरी जगह जाते हुए कथा का हिस्सा बनते हैं। 

भगवान राम, माता सीता और श्री लक्ष्मण की भूमिका निभाने वाले कलाकारों को रामनगर के नाट्य परंपराओं में ‘स्वरूप’  कहा जाता है। भक्त उन्हें केवल पात्र नहीं, बल्कि दिव्य चरित्रों के प्रतीक मानते हैं। 

ब्रज की गलियाँ शरद ऋतु की शुरुआत के साथ जीवंत रंगमंच में बदल जाती हैं। मथुरा-वृंदावन में रामलीला के साथ भक्ति-संगीत, रामचरितमानस का गायन और राम-बारात जैसे जुलूस आकर्षण का केंद्र होते हैं। सजी हुई झाँकियों और बैंड-बाजे के साथ लोग कथा के प्रसंगों से जुड़ते हैं।  

हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, बिहार और झारखंड में रामलीला का रूप स्थानीय परंपरा के अनुसार बदलता है। 

उत्तराखंड : कुमाऊँ और गढ़वाल की रामलीला 

उत्तराखंड में रामलीला को स्थानीय मंडलियाँ और समुदाय मिलकर आयोजित करते हैं। यह आयोजन प्रायः नवरात्रि और दशहरे के आसपास होता है और कई जगहों पर 10 से 30 दिनों तक चलता है। कुमाऊँ की रामलीला में संवादों के साथ गायन विशेष रूप से प्रमुख है, जबकि गढ़वाल में क्षेत्रीय लोकसंगीत और प्रस्तुति-शैलियों का प्रभाव दिखता है। रामलीला के दौरान शोभायात्राएँ, मंच-सज्जा और सामुदायिक अभिनय इसे पहाड़ों की जीवंत परंपरा बनाते हैं। 

दिल्ली : रामलीला मैदान 

( दिल्ली रामलीला मैदान एवं भारतीय कला केंद्र की रामलीला ) 

 दिल्ली के रामलीला आयोजन का इतिहास 19वीं शताब्दी तक जाता है। पहले यह अजमेरी गेट के आसपास रामलीला का आयोजन होता था और 1876 तक चाँदनी चौक से शोभायात्रा निकालकर रामलीला मनाने की परंपरा प्रचलित थी। मुगल सम्राट  बहादुर शाह ज़फ़र भी इस परंपरा से जुड़े थे। बाद में, 1930 के दशक में वार्षिक रामलीला को यमुना के रेतीले मैदानों से वर्तमान रामलीला मैदान में लाया गया, जो आगे चलकर इसी नाम से प्रसिद्ध हुआ। आज शहर में सैकड़ों रामलीला आयोजन होते हैं। लाल किले के मैदान में लव-कुश और श्री धार्मिक लीला जैसी समितियाँ बॉलीवुड कलाकारों, हाइड्रोलिक क्रेन और 3D मैपिंग से भव्य मंचन करती हैं, जबकि श्रीराम भारतीय कला केंद्र रामकथा को शास्त्रीय नृत्य-नाटिका के रूप में प्रस्तुत करता है।  

श्रीराम भारतीय कला केंद्र : रामकथा की शास्त्रीय नृत्य-नाटिका

दिल्ली का श्रीराम भारतीय कला केंद्र रामायण को पारंपरिक रामलीला से अलग, शास्त्रीय नृत्य-नाटिका के रूप में प्रस्तुत करता है। वर्ष 1957 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की पहल पर केंद्र ने गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस से प्रेरित ‘श्री राम’  नृत्य-नाटिका तैयार की। लगभग सवा दो घंटे की इस प्रस्तुति में भगवान राम के जन्म से लेकर उनके राज्याभिषेक तक की कथा को नृत्य, संगीत और अभिनय के माध्यम से मंचित किया जाता है। शुरुआत में फ़िरोज़ शाह कोटला मैदा (वर्तमान अरुण जेटली स्टेडियम) में प्रदर्शित यह नृत्य-नाटिका बाद में केंद्र के अपने परिसर में मंचित होने लगी। सात दशकों से अधिक की अपनी यात्रा में केंद्र ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपराओं के माध्यम से रामकथा को एक विशिष्ट कलात्मक पहचान दी है।

 पूर्व भारत: रामकथा के क्षेत्रीय रंग  

(ओडिशा, पश्चिम बंगाल और असम की पारंपरिक रामकथा ) 

पश्चिम बंगाल,असम और ओडिशा में रामकथा केवल मंचीय रामलीला तक सीमित नहीं है। यहाँ यह स्थानीय भाषा के गीतों, कथावाचन, लोकनाट्य और मंदिर-उत्सवों में अलग-अलग रूप लेती है। 

पश्चिम बंगाल और असम के राजबंशी समुदायों में ‘कृत्तिवासी रामायण’ पर आधारित कुशन पाला  रामायण की कथा को गीत, संवाद, संगीत और नृत्य के साथ प्रस्तुत करता है। कथावाचक बेऩा  नाम का एकतंत्री वाद्य बजाते हुए कथा गाते हैं, जबकि सहायक कलाकार स्थानीय बोली में दर्शकों से संवाद करते हैं। 

 14वीं शताब्दी में माधव कंदली ने संस्कृत वाल्मीकि रामायण का असमिया में प्रारंभिक काव्यानुवाद किया, जिसने क्षेत्रीय भाषा में रामकथा के प्रसार को नई दिशा दी। आगे चलकर संत-कवि श्रीमंत शंकरदेव की वैष्णव परंपरा ने रामकथा को नाट्य और लोककलाओं से जोड़ा। उनके नाटक राम-विजय का मंचन अंकिया नाट और भाओना शैली में किया जाता है। 

ओजापाली असम की एक प्राचीन लोकनाट्य और कथा-वाचन परंपरा है, जिसमें लोकनृत्य, संगीत और अभिनय का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। इसके पारंपरिक रूपों में से एक, गौवा ओजापाली, रामायण की कथा को एक मुख्य कथावाचक (ओजा) और उनके सहयोगी समूह (पालियों) के माध्यम से जीवंत करता है। इस प्रकार, असम की रामलीला क्षेत्र की जीवंत लोक-सांस्कृतिक परंपराओं का अभिन्न अंग बन गई है।।

ओडिशा में रामलीला का मंचन कई जगह रामनवमी के आसपास होता है। देवगढ़ जिले के सरकारी विवरण के अनुसार, स्थानीय और आमंत्रित मंडलियाँ रामलीला मंदिर परिसर में प्रस्तुत करती हैं; कथा सामान्यतः ओड़िया में होती है और उसमें शास्त्रीय तथा मध्यकालीन ओड़िया साहित्य के अंश भी शामिल हो सकते हैं। 

बलांगीर नगर की एक प्राचीन रामलीला रामनवमी के बाद शुरू होकर 21 दिनों तक चलती है। इसमें संगीत, नृत्य, रंगीन सामग्री और अभिनय का मेल है; कलाकार पारंपरिक लकड़ी के मुखौटे भी पहनते हैं। 

उत्तर-पूर्वी भारत में रामलीला :    

( भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में रामलीला के विभिन्न रंग ) 

मणिपुर में रामकथा केवल भक्ति का आख्यान नहीं, बल्कि यहाँ की लोक-संस्कृति और कलात्मक विरासत का एक अनूठा संगम है। यहाँ पारंपरिक एक-तंत्रीय वाद्य 'पेना' की मधुर झंकार के साथ जब लोकगायक रामायण के प्रसंग सुनाते हैं, तो कथा सीधे दिल में उतर जाती है। कभी मणिपुर की पहचान रही 'जात्रा रामलीला'  (पूर्वी  भारत की एक नाट्य शैली) में रोमांचक कलाबाज़ियों, चुटीले हास्य और नाटकीयता का अद्भुत मेल दिखता था, जो आज विलुप्ति की कगार पर पहुँचकर भी अपनी अमिट छाप छोड़ता है। 

त्रिपुरा में रामलीला की परंपरा लोक-गीत, सामूहिक कीर्तन और जनजातीय संस्कृतियों के सुंदर ताने-बाने से बुनी गई है। यहाँ गाँव-घर के अनुष्ठानों में गाई जाने वाली सरल ‘राम पांचाली’ जहाँ कथा को पारिवारिक संस्कारों से जोड़ती है, वहीं सर्दियों की लंबी रातों में चलने वाला ‘रामायण पाला कीर्तन’ संगीत, नृत्य और संवादों के ज़रिए भक्ति का एक जादुई संसार रच देता है। 

चरक पूजा के उल्लास में ‘कथामोस’ की पारंपरिक मंडलियाँ राम-गाथा को ओजस्वी नृत्य-नाट्य में ढालती हैं, तो दूसरी ओर चाय बागानों के संथाल और मुंडा समुदाय अपनी अनूठी लोक-धुनों से इस पर्व को सजाते हैं।

मिज़ोरम की पहाड़ियों में रामकथा किसी भव्य मंचीय नाट्य के रूप में नहीं, बल्कि मौखिक लोक-स्मृतियों और जनविश्वास के एक शांत प्रवाह के रूप में बसती है। यहाँ यह कथा खुले मैदानों के बजाय बुजुर्गों के किस्सों, लोक-कहावतों और पारंपरिक मान्यताओं में रची-बसी है। 

मिज़ो लोक-संस्कृति में यह आख्यान 'खेना और राम' (राम और लक्ष्मण) के नाम से प्रचलित है, जिसे यहाँ के परिवेश के अनुकूल एक नया लोक-रंग दिया गया। अनुष्ठानों से लेकर दैनिक जीवन की कहावतों तक, राम और खेना की यह गाथा सत्य, बंधुत्व और मर्यादा की ऐसी अंतर्निहित सीख है, जो बिना किसी आडंबर के लोक-मन को सदियों से आलोकित करती आ रही है। 

दक्षिण भारत की परंपरा :  

( भारत के दक्षणी राज्यों में रामलीला का मंचन ) 

कर्नाटक : यक्षगान में जीवंत होती रामकथा 

कर्नाटक में रामायण के प्रसंगों को प्रस्तुत करने वाली प्रमुख लोकनाट्य परंपराओं में यक्षगान का विशेष स्थान है। इसमें कलाकार रंगीन वेशभूषा, बड़े मुकुट और आकर्षक श्रृंगार के साथ नृत्य, संगीत और अभिनय के माध्यम से रामकथा को जीवंत करते हैं। इस प्रस्तुति में भागवत  नामक मुख्य गायक गीतों के माध्यम से कथा को आगे बढ़ाता है, जबकि ढोल और अन्य वाद्ययंत्र वातावरण को ऊर्जावान बनाते हैं। यक्षगान की कई पारंपरिक प्रस्तुतियाँ रातभर चलती हैं। इसकी एक खास विशेषता यह है कि कलाकार पारंपरिक कथा के आधार पर संवादों को अपनी अभिनय शैली में विस्तार भी देते हैं। इससे रामायण के परिचित प्रसंग हर प्रस्तुति में एक नया रंग लेते हैं। 

केरल : आँखों और भावों में जीवंत होती रामकथा

केरल में रामायण के प्रसंग कथकली, कूटियाट्टम और रमनाट्टम जैसी विशिष्ट नाट्य परंपराओं के माध्यम से प्रस्तुत किए जाते हैं। कथकली में कलाकारों का भव्य श्रृंगार, रंगीन वेशभूषा और आँखों के सूक्ष्म भाव कथा को जीवंत बनाते हैं। वहीं, कूटियाट्टम में हाथों की मुद्राओं और चेहरे के भावों से पात्रों की मनःस्थिति व्यक्त की जाती है। 

केरल की एक विशेष ऐतिहासिक परंपरा रमनाट्टम है, जिसकी शुरुआत 17वीं शताब्दी में कोट्टारक्करा तंपुरान से जुड़ी मानी जाती है। इसमें भगवान श्रीराम के जीवन पर आधारित आठ नाट्य-प्रसंग प्रस्तुत किए जाते थे। रमनाट्टम को कथकली के विकास की महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। इस प्रकार, केरल में रामकथा केवल सुनाई नहीं जाती, बल्कि अभिनय, संगीत और भावों के माध्यम से अनुभव की जाती है।  

आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु : लोककला और मंदिरों में रामकथा 

उत्तर भारत की भव्य रामलीला और रावण दहन की परंपरा से इतर, दक्षिण के राज्यों—आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु—में प्रभु श्री राम की यह अमर गाथा एक बेहद समृद्ध और शास्त्रीय रूप में जीवंत होती है। यहाँ रामकथा खुले मैदानों से निकलकर प्राचीन मंदिरों के प्रांगणों और उत्सव-मंचों तक पहुँचती है। 

तेलुगु भाषी क्षेत्रों में जहाँ बुर्ड़कथा ( आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की एक पारंपरिक लोककथा-वाचन कला है।) के ओजस्वी लोकगायक और तोलुबोम्मलाटा (छाया कठपुतली) के फनकार रामायण के प्रसंगों में प्राण फूंकते हैं, वहीं तमिलनाडु में कंब रामायणम् की काव्यात्मक मिठास तेरुक्कुत्तु (लोक नुक्कड़ नाटक) और भरतनाट्यम की सजीव मुद्राओं के जरिए नवरात्रि व ब्रह्मोत्सव पर मंचित होती है। 

 भारत के बाहर सुदूर देशों में रामलीला   

( भारत के बाहर रामलीला का मंचन ) 

थाईलैंड (रामकियेन) 

थाईलैंड में रामकियेन राष्ट्रीय महाकाव्य के रूप में प्रतिष्ठित है। भारतीय रामायण से प्रेरित इस कथा का मंचन पारंपरिक मुखौटा-नाट्य खोन और शास्त्रीय नृत्य के माध्यम से किया जाता है। बैंकॉक के वाट फ्रा काएव मंदिर की भित्तिचित्रों में रामकियेन के प्रसंग चित्रित हैं। इस थाई रूपांतरण में हनुमान का चरित्र विशेष रूप से ओजस्वी, साहसी और चंचल रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

कंबोडिया ( रीमके  / रामकेर्ति) 

अंकोरवाट की नक्काशीदार दीवारों पर अंकित यह कथा 'ल्खोन खमेर' शास्त्रीय नृत्य-नाट्य के रूप में प्रस्तुत की जाती है। बौद्ध मूल्यों से गहराई से जुड़ी इस परंपरा में हनुमान और मत्स्य-कन्या सुवर्णमच्छा जैसे अनूठे प्रसंग मंचित होते हैं।

इंडोनेशिया (ककाविन रामायण / सेंद्रतारी)

9वीं सदी के प्राचीन जावानीस काव्य पर आधारित इस कथा को प्रम्बनन मंदिर और बाली के खुले मंचों पर भव्य 'सेंद्रतारी' नृत्य-बैले के रूप में पेश किया जाता है, जिसमें संगीत, अभिनय और युद्ध-कौशल का सम्मोहक संगम होता है।

म्यांमार (यामा ज़ातडॉ)

यहाँ पारंपरिक रंगमंच और कठपुतली कला के द्वारा रामायण का मंचन होता है। स्थानीय बर्मी सौंदर्यशास्त्र और बौद्ध संदर्भों में ढलकर यह कथा जन-जन तक पहुँचती है।

लाओस (फ्रा लक फ्रा लाम)

लाओ बौद्ध संस्कृति में गहराई से रची-बसी इस परंपरा में राम और लक्ष्मण के चरित्र को बराबरी का महत्व मिलता है। इसे जीवंत लोक-कथाओं और पारंपरिक नृत्य-नाटिकाओं के जरिए पेश किया जाता है।

मलेशिया (हिकायत सेरी राम) 

मलय साहित्य की इस समृद्ध विधा को पारंपरिक वायांग (छाया-कठपुतली) और लोक-रंगमंच पर दिखाया जाता है। इस संस्करण में लक्ष्मण के त्याग और पराक्रम को विशेष प्रमुखता दी जाती है।

श्रीलंका (स्थानीय परंपराएँ / जानकी हरण) 

महाकाव्य 'जानकी हरण' से लेकर मंदिर उत्सवों और लोक-अनुष्ठानों तक, यहाँ रावण, सीता और राम से जुड़े ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्थलों के जीवंत आख्यान लोक-परंपरा में मौजूद हैं।

नेपाल (भानुभक्त रामायण) 

आदिकवि भानुभक्त की नेपाली रामायण के पाठ और स्थानीय रामकथा का मंचन दशहरा (दशैं) के दौरान नगर-नगर होता है। जनकपुर और काठमांडू जैसे क्षेत्रों में पारंपरिक रामलीला अत्यंत श्रद्धा से खेली जाती है।

गिरमिटिया देश (मॉरीशस, फिजी, गुयाना, त्रिनिदाद और टोबैगो, सूरीनाम) 

19वीं सदी के भारतीय प्रवासियों द्वारा शुरू की गई यह परंपरा खुले मैदानों में कई दिनों तक चलती है। यहाँ अवधी और भोजपुरी गीतों, चौपाइयों और पारंपरिक वेशभूषा के साथ नवरात्रि व दशहरे पर भव्य रामलीला मंचित होती है।

दक्षिण अफ्रीका, सिंगापुर, मलेशिया (प्रवासी समुदाय) 

यहाँ के हिंदू मंदिरों और सामुदायिक सभागारों में वार्षिक रामलीला का आयोजन होता है। उत्तर भारतीय रामलीला के प्रारूप पर आधारित ये प्रस्तुतियाँ स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक परिवेश का सुंदर सामंजस्य पेश करती हैं।

अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, नीदरलैंड्स  

प्रवासी संस्थाओं, मंदिरों और स्कूलों द्वारा इसे संगीतमय नाट्य के रूप में कुछ रातों में मंचित किया जाता है; जैसे कैलिफोर्निया का माउंट मडोना स्कूल (कैलिफोर्निया): यहाँ 1970 के दशक से हर साल छात्रों द्वारा पश्चिमी गोलार्ध की सबसे बड़ी रामलीला मंचित की जाती है। 

इसमें भारतीय और अमेरिकी छात्र मिलकर अभिनय, भरतनाट्यम, समकालीन संगीत और आधुनिक स्टेज लाइटिंग का उपयोग करते हैं। 

संभवतः  रामकथा की यही महिमा है—इसे जितनी बार सुना जाए, उतनी ही बार इसके भीतर अर्थ की कोई नई परत खुलती है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी प्रभु की महिमा की असीमता को स्वीकार करते हुए लिखा है—

राम कृपा बिनु सुनु खगराई।

जानि न जाइ राम प्रभुताई॥

                        (श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड)

प्रभु श्रीराम की महिमा को पूरी तरह जान पाना उनकी कृपा के बिना संभव नहीं—यह भाव हमें विनम्रता के साथ उनकी कथा के निकट ले जाता है। 

                                               

!! बोलो सियावर रामचंद्र की जय !!

Frequently Asked Questions

Clearing doubts on your sacred journey

रामलीला कब से शुरू हुई?

रामलीला की परंपरा सदियों पुरानी है; गोस्वामी तुलसीदास जी की रामचरितमानस से प्रेरित रामलीला के प्रसार को विशेष गति मिली।

दिल्ली का रामलीला मैदान कहाँ स्थित है?

रामलीला मैदान पुरानी दिल्ली में अजमेरी गेट और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के निकट स्थित है।

रामायण का सबसे अच्छा प्रसंग कौन-सा है?

 यह व्यक्तिगत पसंद पर निर्भर करता है; राम-भरत मिलाप, हनुमान जी की लंका यात्रा और राम-रावण युद्ध लोकप्रिय प्रसंग हैं।

भारत की सबसे बड़ी रामलीला कौन-सी है?

 रामनगर, वाराणसी की रामलीला अपनी व्यापकता और लगभग एक महीने तक चलने वाली परंपरा के लिए प्रसिद्ध है।

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