भारत में नवरात्रि का उत्सव : पर्व एक, परंपराएँ अनेक
पितृ पक्ष का अंतिम दिन, जिसे महालया या सर्वपितृ अमावस्या कहते हैं। इस दिन लोग अपने दिवंगत प्रियजनों को याद करते हैं और उन्हें तर्पण अर्पित करते हैं। इसी के साथ, एक नई शुरुआत का क्षण भी आता है।महालया इसी परिवर्तन की चौखट पर आता है, मौन स्मरण का समय समाप्त होता है और उत्सवों का दौर शुरू होता है। पितृ पक्ष विदा लेता है और देवी पक्ष का आगमन होता है।
दिलचस्प बात यह है कि पूर्वी भारत के विभिन्न क्षेत्रों में मूर्तिकार भी महालया के दिन माँ दुर्गा के आगमन की तैयारियों को एक अंतिम कलात्मक स्पर्श देते हैं। महीनों से प्रेम और श्रद्धा से गढ़ी गई दुर्गा प्रतिमाओं के नेत्रों में वे रंग भरते हैं। इस सुंदर अनुष्ठान को चक्षु दान कहा जाता है। माँ की दिव्य ऊर्जा से अभिभूत होकर मिट्टी की प्रतिमा अब नवरात्रि के उत्सव के लिए पूर्ण रूप से तैयार मानी जाती है।
ऋतु परिवर्तन के इस समय, वातावरण में महसूस होने वाली हल्की ठंडक शीत ऋतु के आगमन का संकेत देती है। पूरा देश माँ जगदंबा के स्वागत के लिए तैयार हो जाता है। भारत के अलग-अलग हिस्सों में माँ के भव्य आगमन का उत्सव अनूठी परंपराओं के साथ मनाया जाता है।
आइए, भारत की इन्हीं विविध परंपराओं की यात्रा पर चलते हैं और जानते हैं कि एक ही पर्व किस तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रंगों में खिल उठता है।
मुख्य बातें :
- दक्षिण भारत की परंपराएँ
- पश्चिम भारत की परंपराएँ
- पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत की परंपराएँ
- उत्तर और मध्य भारत की परंपराएँ
दक्षिण भारत की परंपराएँ
बथुकम्मा पुष्प सज्जा

तेलंगाना में शारदीय नवरात्रि का उत्सव विशेष भव्यता के साथ मनाया जाता है। इन उत्सवों के केंद्र में है बथुकम्मा, जो नौ दिनों तक चलने वाला एक पुष्पोत्सव है। इस उत्सव में मुख्य रूप से महिलाएँ और बालिकाएँ भाग लेती हैं। यह तेलंगाना का राज्य पर्व भी है। बथुकम्मा का आरंभ महालया अमावस्या से होता है और इसका समापन सद्दुला बथुकम्मा या पेद्दा बथुकम्मा के साथ दुर्गाष्टमी (आश्वयुज अष्टमी) के दिन होता है।
“बथुकम्मा” तेलुगु भाषा का शब्द है, जो दो शब्दों से मिलकर बना है—बथुकु, जिसका अर्थ है “जीवन” या “जीवित रहना”, और अम्मा, जिसका अर्थ है “माँ”। दोनों शब्द मिलकर माँ भगवती के प्रति एक स्नेहपूर्ण प्रार्थना का भाव व्यक्त करते हैं—“हे माँ, पुनः जीवन धारण करो!” या “हे माँ, सदैव जीवित रहो।”
बथुकम्मा को देवी सती के पुनर्जन्म लेकर देवी पार्वती (गौरी) के रूप में प्रकट होने की स्मृति से भी जोड़ा जाता है। तेलंगाना की आध्यात्मिक और लोक परंपराओं में बथुकम्मा किसी एक देवी का स्वरूप मात्र नहीं है, बल्कि इसे महागौरी (देवी पार्वती) और देवी लक्ष्मी की अभिव्यक्ति के रूप में भी देखा जाता है। महिलाएँ और युवा बालिकाएँ मंदिर के गोपुरम जैसी शंक्वाकार, कई परतों वाली पुष्प-सज्जा तैयार करती हैं। इसके शीर्ष पर हल्दी से बनी माँ गौरी की छोटी प्रतिमा स्थापित की जाती है। प्रत्येक संध्या वे इन रंग-बिरंगे पुष्प-स्तूपों के चारों ओर नृत्य करतीं हैं,गीत गाती हैं और कोलाटम करती हैं। कोलाटम एक लोकनृत्य है जिसमें छोटी-छोटी लकड़ियों को आपस में लयबद्ध ढंग से टकराया जाता है।
परंपरागत रूप से पुरुष या बालक मौसमी वन्य पुष्प एकत्र करते हैं और महिलाएँ उनसे बथुकम्मा तैयार करती हैं। नौ दिनों में प्रत्येक दिन के लिए पुष्प-सज्जा का एक विशिष्ट रूप और अलग नैवेद्य निर्धारित होता है। अंतिम दिन बथुकम्मा के पुष्पों को किसी जलस्रोत में विसर्जित किया जाता है।
अपनी सुंदरता से परे, बथुकम्मा पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान में भी गहराई से निहित है। तंगेडु (Senna auriculata) और गुनुगु (Celosia argentea) जैसे पारंपरिक मौसमी फूलों में प्राकृतिक जीवाणुरोधी गुण पाए जाते हैं, जो जलस्रोतों में विसर्जन के बाद उन्हें स्वच्छ रखने में सहायक माने जाते हैं। हल्दी और नीम की पत्तियों को भी रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले गुणों से जोड़ा जाता है। इस प्रकार, बथुकम्मा ऋतु के अनुरूप की जाने वाली ऐसी सुंदर आराधना है, जो मानव श्रद्धा और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करती है।
बथुकम्मा का उत्सव कृषि-प्रधान अतीत की एक मधुर स्मृति भी है, जहाँ उत्सवों की सजावट में मौसमी फूलों और पत्तियों को स्थान मिलता था, न कि आज के तरह इस्तेमाल करके फेंक दिए जाने वाले प्लास्टिक विकल्पों को।
गोलू (तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश)

गोलू, तमिल में बोम्मई गोलू, तेलुगु में बोम्माला कोलुवु और कन्नड़ में गोम्बे हब्बा के नाम से भी जाना जाता है। यह नवरात्रि के दौरान मनाया जाने वाला एक मनमोहक दृश्यात्मक उत्सव है। इसमें हस्तनिर्मित गुड़ियों और प्रतिमाओं को लकड़ी की सीढ़ीनुमा चौकियों पर कलात्मक ढंग से सजाया जाता है।
गोलू (जिसे कोलू भी लिखा जाता है) शब्द तमिल भाषा से आया है और इसका तेलुगु समकक्ष कोलुवु है। इसका शाब्दिक अर्थ “राजसी दिव्य उपस्थिति,” “राजदरबार” या “सभा” माना जाता है।
महालया अमावस्या की रात, यानी नवरात्रि से एक दिन पहले, परिवार लकड़ी की सीढ़ीनुमा संरचना तैयार करते हैं, जिसे गोलू पड़ी कहा जाता है। इसमें सीढ़ियों की संख्या विषम रखी जाती है—आमतौर पर 3, 5, 7, 9 या 11। यह सजावट नवरात्रि के पहले दिन (प्रतिपदा) से लेकर विजयादशमी तक बनी रहती है और इसे सांसारिक जीवन से लेकर सर्वोच्च आध्यात्मिक चेतना तक की यात्रा का प्रतीकात्मक रूप माना जाता है।
- निचली सीढ़ियाँ मानव जीवन, विभिन्न व्यवसायों, लोकजीवन और पशु-पक्षियों के दृश्यों को दर्शाती हैं। इनमें आधुनिक रचनात्मकता के रूप में छोटे-छोटे पार्क, रेल की पटरियाँ और अन्य दृश्य भी जोड़े जाते हैं।
- मध्य की सीढ़ियों पर ऋषि-मुनियों, गुरुओं, अवतारों, दशावतार तथा श्रीरामायण, महाभारत और पुराणों के विस्तृत प्रसंगों को दर्शाने वाली प्रतिमाएँ सजाई जाती हैं।
- सबसे ऊपरी सीढ़ियाँ परम देवताओं और पवित्र कलशम् के लिए आरक्षित होती हैं, जो देवी की उपस्थिति का प्रतीक माना जाता है।
इस पूरी सजावट के केंद्र में मरापाची बोम्मई भी विशेष स्थान रखती हैं। ये पारंपरिक लकड़ी से बनी स्त्री-पुरुष की गुड़िया होती हैं, जिन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिवारों में सुरक्षित रखा जाता है। इन्हें उर्वरता और सृष्टि की एकता का प्रतीक माना जाता है।
एक लोककथा के अनुसार, देवी दुर्गा को असुरों के साथ युद्ध करने के लिए अपनी समस्त शक्तियाँ प्रदान करने के बाद देवता निर्जीव गुड़ियों की तरह स्थिर हो गए थे। उनके सम्मान में परिवार पूरे नौ दिनों तक गरम सुंदल मसालों से तैयार की गई दाल या फलियों से बना प्रसाद नैवेद्य के रूप में अर्पित करते हैं। यह परंपरा इन दिनों में सामुदायिक भावना और भक्ति को विशेष महत्व देती है।
ग्यारहवें दिन कलशम् के पवित्र जल का पूरे घर में छिड़काव किया जाता है। इसके बाद गोलू की गुड़ियों को सावधानीपूर्वक समेटकर अगले नवरात्रि तक सुरक्षित रख दिया जाता है।
यह उत्सव अपनी प्रसिद्ध तंजावुर थलैयाट्टि बोम्मई के लिए भी जाना जाता है। ये पारंपरिक मिट्टी से बनी “नाचने वाली गुड़ियाएँ” होती हैं, जिनका सिर हल्के स्पर्श से हिलता है। इनके भारयुक्त आधार के कारण सिर और शरीर गोलाकार गति में लयबद्ध ढंग से हिलते हैं।
मैसूरु दशहरा (कर्नाटक)

कर्नाटक में नवरात्रि का उत्सव मैसूरु दशहरा के रूप में एक भव्य राजसी स्वरूप धारण कर लेता है। इसे नाडा हब्बा कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “भूमि का उत्सव”। देवी चामुंडेश्वरी द्वारा महिषासुर पर विजय की स्मृति में मनाया जाने वाला यह पर्व पूरे मैसूर को उत्सव के रंग में रंग देता है। इस दौरान मैसूर महल की स्वर्णिम रोशनी शहर को एक अद्भुत आभा से भर देती है।
दस दिनों तक चलने वाला यह उत्सव जम्बू सवारी के साथ अपने चरम पर पहुँचता है। यह एक भव्य शोभायात्रा होती है, जिसमें सजे हुए हाथी माँ चामुंडेश्वरी की प्रतिमा को लेकर मैसूर की सड़कों से गुजरते हैं।
शास्त्रीय संगीत, रंग-बिरंगी परंपराओं और राजसी विरासत का यह सुंदर संगम ऐसा अनुभव कराता है, मानो हम कुछ समय के लिए इतिहास के किसी भव्य युग में प्रवेश कर गए हों।
पश्चिमी भारत की परंपराएँ
गोंधल गायन (महाराष्ट्र)

महाराष्ट्र में भक्ति का एक अनोखा रूप गोंधल है, जो पूरी रात चलने वाला ऊर्जावान संगीत और धार्मिक अनुष्ठान है। यह किसी निश्चित तिथि पर होने वाला पर्व नहीं है, बल्कि परिवार विवाह के बाद के समारोह, बच्चे के जन्म या नए घर में प्रवेश जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर गोंधल का आयोजन करते हैं। हालाँकि, नवरात्रि के दौरान गोंधल पारिवारिक आयोजन के साथ-साथ सार्वजनिक सामुदायिक उत्सव का रूप भी ले लेता है। इस अवसर पर माँ भवानी, माँ रेणुका और खंडोबा (मार्तंड भैरव) का आवाहन कर उनके संरक्षण और आशीर्वाद की प्रार्थना की जाती है।
मुख्य गायक ‘चौक’ नामक एक पवित्र वेदी तैयार करता है, जहाँ कलश और दीपक स्थापित किए जाते हैं। संबल ढोल और तुंतूना जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ गोंधल मंडली भक्ति गीत गाती है और पुराणों, श्रीरामायण या वीर लोककथाओं से जुड़ी कथाएँ एवं आख्यान प्रस्तुत करती है।
पूरे आयोजन का वातावरण उत्साह और भक्ति से भर जाता है। कथा, संगीत और भक्ति का ऐसा संगम होता है कि पूरी रात समुदाय के लोग जागते हुए इस प्रस्तुति में भावपूर्वक जुड़े रहते हैं। प्रातःकाल अनुष्ठान के समापन पर कलाकार जलती हुई मशाल लेकर घर में घूमता है, अतिथियों के मस्तक पर पवित्र भस्म लगाता है और पवित्र जल का छिड़काव करता है।
गोंधल केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से लोककथाओं, परंपराओं, समुदायों के इतिहास और जीवन-मूल्यों से जुड़ी शिक्षाएँ भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती हैं। यह कलाकार समुदायों की आजीविका को भी सहारा देता है और उन्हें गाँवों के सामाजिक एवं सांस्कृतिक ताने-बाने से जोड़े रखता है। विशेष रूप से फसल के मौसम और मंदिरों के वार्षिक आयोजनों के समय इन समुदायों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
गरबा और डांडिया (गुजरात)

गुजरात और उसके आसपास के क्षेत्रों में नवरात्रि की रातें गरबा और डांडिया रास की जीवंत ऊर्जा से भर उठती हैं। भक्तजन रंग-बिरंगे शीशे की कढ़ाई वाले चनिया-चोली और केडियू पहनकर गोलाकार समूहों में घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में नृत्य करते हैं।
नृत्य के केंद्र में ‘गरबो’ स्थापित किया जाता है, जिसमें मिट्टी का जलता हुआ दीपक (गर्भ दीप) या देवी की प्रतिमा रखी जाती है। यह केंद्र गर्भ का प्रतीक माना जाता है, जबकि गोलाकार नृत्य (प्रदक्षिणा) समय और जीवन के चक्र को दर्शाता है। इसके केंद्र में दिव्य माता, अर्थात् शक्ति, विराजमान होती हैं।
नृत्य की शुरुआत तीन लयबद्ध तालियों (त्रण ताली) से होती है। इसके बाद लय धीरे-धीरे तेज होती जाती है और भक्त आनंदपूर्वक घूमते हुए नृत्य करते हैं। इसके पश्चात डांडिया रास का क्रम आता है, जिसमें डांडिया के साथ नृत्य किया जाता है। ये डांडिया बुराई के विरुद्ध अच्छाई के संघर्ष का प्रतीकात्मक रूप माने जाते हैं। गरबा में मुख्य रूप से तालियाँ, घूमना और हाथों की विभिन्न मुद्राएँ होती हैं, जबकि डांडिया रास में सजावटी लकड़ी की छड़ियों का प्रयोग इसकी प्रमुख विशेषता है। लगभग मध्यरात्रि में सामूहिक रूप से माँ अंबा की आरती के लिए नृत्य को विराम दिया जाता है।
नवरात्रि के दसवें दिन, दशहरा के अवसर पर स्थानीय परंपरा के अनुसार गरबो को विधिपूर्वक हटाया जाता है या उसका विसर्जन किया जाता है।
पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत की परंपराएँ
पूजा पंडाल (पश्चिम बंगाल)

बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, असम और त्रिपुरा में लोग माँ दुर्गा का स्वागत केवल महिषासुरमर्दिनी, अर्थात् असुर महिषासुर का वध करने वाली योद्धा देवी के रूप में ही नहीं करते, बल्कि उन्हें अपनी प्रिय पुत्री के रूप में भी देखते हैं, जो षष्ठी से दशमी (विजयादशमी) तक अपने मायके लौटकर आती हैं। वे अपने बच्चों—माँ लक्ष्मी, माँ सरस्वती, भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय—के साथ आती हैं और भव्य कलात्मक संरचनाओं, जिन्हें पंडाल कहा जाता है, में विराजमान होती हैं।
ये पंडाल अक्सर ऐसे विशाल, कलात्मक और दर्शनीय स्थल होते हैं, जिनमें लोग भीतर से होकर गुजर सकते हैं। इन्हें स्थानीय विरासत, पर्यावरण या सामाजिक संदेशों जैसे विभिन्न विषयों पर सजाया जाता है। कोलकाता की दुर्गा पूजा को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता प्राप्त है। इन पंडालों के कारण पूरा शहर एक विशाल खुली कला प्रदर्शनी जैसा दिखाई देने लगता है। षष्ठी से दशमी तक वातावरण भक्ति और उत्सव की भावना से ओत-प्रोत रहता है। इस दौरान लोग सामूहिक रूप से पुष्पांजलि अर्पित करते हैं और सामुदायिक भोग में सम्मिलित होते हैं।
धुनुची नृत्य (पश्चिम बंगाल)

जीवंत पूजा पंडालों में भक्ति का उत्साह धुनुची नृत्य के साथ अपने चरम पर पहुँच जाता है। यह पारंपरिक रूप से संध्या आरती के समय किया जाने वाला ऊर्जावान नृत्य है, जिसके माध्यम से भक्त माँ दुर्गा के प्रति आनंद, कृतज्ञता और पूर्ण समर्पण की भावना व्यक्त करते हैं।
भक्त मिट्टी के पात्रों, जिन्हें ‘धुनुची’ कहा जाता है, को हाथों में धारण करते हैं। इन पात्रों में जलते हुए नारियल के छिलके, कपूर और सुगंधित धूना राल रखी जाती है। ढाक की तेज और गूँजती थाप तथा पीतल की झाँझ की ध्वनि के साथ नर्तक घूमते, लय में झूमते और नीचे की ओर झुकते हुए नृत्य करते हैं। कुछ कुशल नर्तक अपने दाँतों के बीच एक तीसरी जलती हुई धुनुची को भी संतुलित करते हैं।
धूना राल से उठने वाला सुगंधित धुआँ वातावरण को पवित्र और सुगंधित बनाता है तथा पूजा के लिए एक विशेष आध्यात्मिक वातावरण तैयार करता है। धुनुची नृत्य संध्या आरती के दौरान माँ दुर्गा के प्रति कृतज्ञता, भक्ति और पूर्ण समर्पण की जीवंत अभिव्यक्ति है।
सिंदूर खेला

विजयादशमी की सुबह, माँ दुर्गा के कैलाश प्रस्थान से पहले पूजा पंडाल का वातावरण भावुक हो उठता है। पारंपरिक लाल और सफेद रेशमी साड़ियों में सजी महिलाएँ ‘ठाकुर बोरण’ की रस्म के लिए एकत्र होती हैं। वे माँ दुर्गा को मिठाई अर्पित करती हैं और विदाई के भावपूर्ण क्षणों में उनके मस्तक और चरणों पर लाल सिंदूर लगाती हैं।
यह शांत और भावपूर्ण श्रद्धा शीघ्र ही सिंदूर खेला के उल्लासपूर्ण उत्सव में बदल जाती है। महिलाएँ एक-दूसरे के गालों और चूड़ियों पर सिंदूर लगाती हैं। यह परंपरा आरंभ में वैवाहिक जीवन की दीर्घायु की प्रार्थना के रूप में की जाती थी, लेकिन समय के साथ यह नारी सौहार्द और एकता के सुंदर उत्सव का रूप ले चुकी है।
शंखध्वनि और महिलाओं की ऊँची उलुध्वनि के बीच माँ दुर्गा की प्रतिमा को नदी में विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। भक्त भावपूर्ण स्वर में कहते हैं—“आसछे बोछोर आबार होबे”, अर्थात् “अगले वर्ष फिर होगा!” और माँ के अगले वर्ष पुनः आगमन की आशा के साथ उन्हें विदा करते हैं।
उत्तर और मध्य भारत की परंपराएँ
सांझी-झाँझी परंपरा (हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश)

हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में प्रचलित सांझी एक लोककला परंपरा है, जिसे मुख्य रूप से युवा और अविवाहित लड़कियाँ निभाती हैं। यह परंपरा सांझी माता की पूजा और आराधना से जुड़ी है। इसके माध्यम से परिवार के कल्याण और सुख-समृद्धि से भरे भविष्य की कामना की जाती है।
मंदिर सांझी का आयोजन पितृ पक्ष के सोलह दिनों के दौरान किया जाता है, विशेष रूप से एकादशी से अमावस्या तक के अंतिम पाँच दिनों में यह परंपरा अधिक प्रमुखता से निभाई जाती है।
घर में मनाई जाने वाली सांझी का उत्सव नवरात्रि के प्रथम दिन (आश्विन शुक्ल प्रतिपदा) से शुरू होता है और लगभग 9–10 दिनों तक चलता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार इसका समापन दशहरा (विजयादशमी) या अमावस्या के दिन सांझी के विसर्जन के साथ होता है।
यह उत्सव सांझी माता की आराधना को समर्पित है, जिन्हें कुछ परंपराओं में माँ पार्वती या राधा रानी का स्वरूप माना जाता है। इस पूजा के माध्यम से परिवार के कल्याण, गृहस्थ जीवन से जुड़े कौशल और उपयुक्त जीवनसाथी की प्राप्ति की कामना की जाती है।
लड़कियाँ दीवार पर मिट्टी या गोबर से सांझी देवी की आकृति बनाती हैं और उसे रंगों, सिंदूर, फूलों, चूड़ियों तथा कागज से बने सूर्य, चंद्रमा और तारों जैसे अलंकारों से सजाती हैं। इसके साथ वे मिट्टी से ‘झाँझी’ नामक एक दीपयुक्त पात्र भी तैयार करती हैं।
नौ रातों तक आस-पड़ोस की महिलाएँ देवी की आकृति के सामने एकत्र होती हैं। वे तालियाँ बजाती हैं, लोकगीत गाती हैं और गोल घेरा बनाकर नृत्य करती हैं। कई स्थानों पर महिलाएँ जलती हुई झाँझी को लेकर घर-घर जाती हैं, जिससे पूरे मोहल्ले में उत्सव और उल्लास का वातावरण बन जाता है।
उत्सव का समापन दशहरा के दिन होता है। इस अवसर पर सांझी देवी की आकृति को श्रद्धापूर्वक नदी या किसी अन्य जलाशय में विसर्जित किया जाता है।
इसके बाद एकत्र किए गए अनाज और सिक्कों का उपयोग सामूहिक प्रसाद या सामुदायिक भोज तैयार करने में किया जाता है। ब्रज में सांझी कला को श्रीकृष्ण और राधा रानी के प्रति भक्ति-भाव से की जाने वाली एक सेवा और अर्पण के रूप में देखा जाता है।
इस उत्सव के माध्यम से युवा महिलाएँ भक्ति, हस्तकला और सामूहिक लोकगायन जैसी परंपराओं से परिचित होती हैं और समुदाय के साथ मिलकर इन्हें आगे बढ़ाती हैं।
कन्या भोज (उत्तर भारत)

महाअष्टमी या महानवमी के दिन किया जाने वाला कन्या भोज (या कंजक) उत्तर और मध्य भारत में प्रचलित एक सुंदर परंपरा है। इसमें नौ छोटी कन्याओं को नवदुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतिनिधि माना जाता है और एक छोटे बालक को भैरव का स्वरूप मानकर घर में आदरपूर्वक आमंत्रित किया जाता है। इस प्रकार कन्याओं और बालक को दिव्य शक्ति के जीवंत स्वरूप के रूप में सम्मान दिया जाता है।
कन्या भोज चैत्र नवरात्रि (मार्च–अप्रैल) के दौरान भी किया जाता है, लेकिन इसका प्रमुख रूप से आयोजन शारदीय नवरात्रि में किया जाता है।
आमंत्रित कन्याओं और बालक के चरण प्रक्षालन के बाद उनके मस्तक पर लाल तिलक लगाया जाता है और कलाई पर पवित्र मौली बाँधी जाती है। इसके बाद उन्हें प्रेमपूर्वक गरम पूरियाँ, काले चने की सब्ज़ी और सूजी का हलवा परोसा जाता है। कन्याओं के चरण धोकर उनका आशीर्वाद लेना अहंकार का त्याग और विनम्रता का प्रतीक माना जाता है।
भोजन के बाद परिवार के सदस्य उनकी आरती करते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनके चरण स्पर्श करते हैं। अतिथियों को दक्षिणा, बालों की सजावट की वस्तुएँ या लेखन-सामग्री भेंट की जाती है। विदाई के समय समृद्धि की मंगलकामना के लिए उनके द्वारा घर के द्वार पर हल्दी मिश्रित अक्षत बिखेरे जाते हैं।
अंत में परिवार के सदस्य शेष प्रसाद ग्रहण करके नवरात्रि के व्रत का पारण करते हैं।
कन्या भोज युवा कन्याओं में नवदुर्गा और एक बालक में भैरव के स्वरूप की पूजा के माध्यम से उनमें विद्यमान दिव्य शक्ति का सम्मान करता है। यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा और चेतना के संतुलन का प्रतीक माना जाता है।
पवित्रता के प्रतीक इन बाल स्वरूपों का सम्मान कर भक्त दिव्य कृपा का माध्यम बनने की भावना रखते हैं।
आप भी नवदुर्गा साधना के माध्यम से देवी के नौ स्वरूपों की आराधना कर सकते हैं। इसके लिए 11 से 20 अक्टूबर 2026 तक साधना ऐप में सिंह आइकन पर क्लिक करें।
कुल्लू दशहरा (हिमाचल प्रदेश)

हिमालय की ऊँची पर्वतशृंखलाओं के बीच मनाया जाने वाला कुल्लू दशहरा एक विशिष्ट और आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है। यह एक सप्ताह तक चलने वाला उत्सव है, जो उस दिन विजयादशमी से शुरू होता है, जिस दिन देश के अधिकांश हिस्सों में नवरात्रि का समापन होता है।
इस अवसर पर स्थानीय देवी-देवताओं की सैकड़ों प्रतिमाएँ और विग्रह उनके पर्वतीय मंदिरों से सुंदर ढंग से सजी पालकियों में लाए जाते हैं। श्रद्धालु इन्हें ढालपुर मैदान तक लेकर आते हैं, जहाँ वे अधिष्ठाता देवता भगवान रघुनाथ के प्रति श्रद्धा अर्पित करते हैं।
ठंडी पर्वतीय हवाओं और पारंपरिक ढोल-नगाड़ों की गूँज के बीच देवताओं का यह पवित्र समागम पूरे कुल्लू घाटी को जीवंत और आध्यात्मिक उत्सव में बदल देता है।
नवरात्रि की परंपराएँ केवल हर वर्ष मनाए जाने वाले उत्सव नहीं हैं, बल्कि वे हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने वाली कड़ियाँ हैं। चाहे महाराष्ट्र का गोंधल गायन हो, तेलंगाना की मौसमी पुष्प सजावट हो या उत्तर भारत में कन्याओं के चरण प्रक्षालन की परंपरा, प्रत्येक अनुष्ठान अपने भीतर एक गहरा आध्यात्मिक संदेश समेटे हुए है।
इतनी समृद्ध विरासत तभी जीवित रह सकती है, जब हम इसके गहरे अर्थ को समझने और इसे जागरूकता के साथ अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। हमें इन परंपराओं को सहेजना चाहिए और इनसे जुड़ी कथाओं को अपने बच्चों तक पहुँचाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी जान सकें कि जब शरद ऋतु की ठंडी हवाएँ चलने लगें और शारदीय नवरात्रि का समय आए, तब इन परंपराओं को किस प्रकार निभाया जाता है।
आप इस वर्ष नवरात्रि कैसे मना रहे हैं? अपने क्षेत्र और परिवार में प्रचलित नवरात्रि की परंपराओं के बारे में हमें बताएँ। हमें आपके अनुभव और परंपराओं के बारे में जानकर खुशी होगी।
We are proud Sanatanis, and spreading Sanatan values and teachings, our core mission. Our aim is to bring the rich knowledge and beauty of Sanatan Dharm to every household. We are committed to presenting Vedic scriptural knowledge and practices in a simple, accessible, and engaging manner so that people can benefit and internalize them in their lives.
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