पितृ पक्ष 2026 : क्या करें, क्या न करें ?

पितृ पक्ष 2026 : क्या करें, क्या न करें ?

पितृ पक्ष की इस पावन अवधि में अनुष्ठानों, परंपराओं और प्राचीन मान्यताओं को लेकर मन में कई प्रश्न उठना स्वाभाविक है। पितृ पक्ष के दौरान क्या-क्या खा सकते हैं? क्या महिलाएँ श्राद्ध कर्म कर सकती हैं? क्या इस अवधि में बाल कटवाना चाहिए या नहीं?

आपकी इन जिज्ञासाओं का समाधान करने और इस पवित्र अवधि में आपका मार्गदर्शन करने के लिए हमने पितृ पक्ष से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर प्रस्तुत किए हैं। इन उत्तरों को प्रामाणिक शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर तैयार किया गया है। आइए, आगे पढ़ें और अपने प्रश्नों के उत्तर जानें! 

मुख्य बातें 

पितृ पक्ष 2026 कब शुरू होगा?

पितृ पक्ष 2026 का आरंभ रविवार, 27 सितंबर 2026 से होगा और इसका समापन शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को सर्व पितृ अमावस्या के साथ होगा। 26 सितंबर 2026 को पूर्णिमा श्राद्ध किया जाएगा। इस दिन उन पितरों के लिए श्राद्ध कर्म किया जाता है, जिनका देहांत पूर्णिमा तिथि को हुआ हो।

हालाँकि, पितृ पक्ष का औपचारिक आरंभ प्रतिपदा तिथि से होता है, इसलिए 27 सितंबर 2026 से पितृ पक्ष की शुरुआत मानी जाएगी।

क्या पितृ पक्ष अशुभ माना जाता है?

पितृ पक्ष अपने आप में अशुभ नहीं माना जाता। यह श्राद्ध और तर्पण जैसे पितरों से जुड़े धार्मिक कार्यों के लिए विशेष समय माना जाता है। यह अवधि दिवंगत पूर्वजों के सम्मान और स्मरण के लिए समर्पित होती है, इसलिए कई परिवार इस दौरान उत्सव मनाने या नए कार्य शुरू करने से बचते हैं।

इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, संपत्ति या वाहन खरीदना, नए अनुबंध करना या नया व्यवसाय शुरू करना जैसे कार्य आमतौर पर नहीं किए जाते। मान्यता है कि इन 16 दिनों का समय पितरों के सम्मान और उनसे जुड़े कर्मों के लिए समर्पित होना चाहिए, न कि नए कार्यों या अन्य मंगल कार्यों के लिए।

क्या पितृ पक्ष में मांसाहारी भोजन कर सकते हैं?

पितृ पक्ष के दौरान परंपरागत रूप से मांसाहारी भोजन से बचने की सलाह दी जाती है, विशेषकर श्राद्ध के दिन। इसका मुख्य कारण भोजन में सात्त्विकता बनाए रखना है। मांसाहारी भोजन के साथ प्याज और लहसुन को भी तामसिक  माना जाता है, इसलिए शरीर और मन की शुद्धता बनाए रखने के लिए इस अवधि में इन्हें भोजन से दूर रखा जाता है।

इसके अलावा, श्राद्ध के दौरान पितरों, देवताओं, कौओं और अन्य जीवों के लिए भोजन अर्पित किया जाता है। परंपरा के अनुसार, ये अर्पण सात्त्विक और शुद्ध शाकाहारी होने चाहिए। इसलिए श्राद्ध कर्म में मांसाहारी भोजन का सेवन या भोग लगाना उचित नहीं माना जाता।

श्रीमद्भागवत पुराण के सप्तम स्कंध (7.15.7) में भी श्राद्ध कर्म में मांस, अंडे या मछली अर्पित न करने की बात कही गई है।

हालाँकि, बंगाल, असम या ओडिशा के कुछ क्षेत्रीय समुदायों में अलग पारंपरिक रीति-रिवाज प्रचलित हैं, जिनमें विशेष प्रकार की मछली या मांसाहारी भोजन का भोग भी शामिल हो सकता है। फिर भी, सामान्य हिंदू परंपरा में पितृ पक्ष के पूरे 16 दिनों में मांसाहारी भोजन से बचने की सलाह दी जाती है। 

पितृ पक्ष में किन खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए?

सामान्य रूप से, परिवारों में प्रतिदिन ताजा भोजन बनाया जाता है। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार, भोजन करने से पहले उसका पहला भाग पितरों, ब्राह्मणों, गायों, कौओं और अन्य जीवों को अर्पित किया जाता है। इस दौरान तामसिक भोजन से बचने की परंपरा है। इसमें शामिल हैं:

  • मांसाहारी भोजन: सभी प्रकार के मांस, चिकन, मछली, समुद्री भोजन और अंडे।
  • तामसिक सामग्री: प्याज, लहसुन और अत्यधिक तीखे या मसालेदार पदार्थ।
  • दालें और फलियाँ: मसूर की दाल, काला चना, उड़द की दाल, राजमा और छोले।
  • सब्जियाँ: बैंगन, मूली, चुकंदर, गाजर और मशरूम।
  • नशीले पदार्थ और प्रसंस्कृत भोजन: शराब, तंबाकू, बासी या बचा हुआ भोजन और पैकेट में मिलने वाला जंक फूड।

टिप्पणी: ये सामान्य प्रचलित नियम हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार भोजन से जुड़े नियमों में थोड़ा अंतर हो सकता है। 

श्राद्ध में पारंपरिक रूप से खीर और पूरी का क्या महत्व है?  

खीर और पूरी को पारंपरिक रूप से शुद्ध एवं सात्त्विक आहार माना जाता है। खीर गाय के दूध से बनाई जाती है, जबकि पूरी बनाने में परंपरागत रूप से गाय के घी का प्रयोग किया जाता है। वैदिक परंपरा में दूध और घी को पवित्र माना गया है तथा इन्हें आध्यात्मिक शुद्धि से भी जोड़ा जाता है।

चावल (अक्षत) को पूर्णता, अखंडता, चिरस्थायित्व और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। खीर में चावल का प्रयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है कि यह परिवार की वंश-परंपरा के अखंड, चिरस्थायी और समृद्ध बने रहने की कामना को दर्शाता है।

पारंपरिक हिंदू आहार संबंधी नियमों में भोजन को कच्चा खाना (पानी में उबालकर या पकाकर बनाए गए भोजन, जैसे रोटी या दाल) और पक्का खाना (घी या तेल में तले हुए भोजन, जैसे पूरी) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। पक्का खाना लंबे समय तक चलने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान उपयुक्त माना जाता है।

श्राद्ध में अभावग्रस्त जनों को भोजन कराने से पितरों को पोषण प्राप्त होता है। खीर और पूरी एक समृद्ध, और पौष्टिक भोजन का प्रतीक हैं। इन्हें अर्पित करना अपने पूर्वजों और बड़ों के प्रति सम्मान, प्रेम और कृतज्ञता की भावना को दर्शाता है।

इसके अलावा, पितृ पक्ष वर्षा ऋतु से शरद ऋतु में परिवर्तन के समय आता है। आयुर्वेद के अनुसार, इस ऋतु परिवर्तन के दौरान शरीर में पित्त (गर्मी और अम्लता) स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। खीर एक प्राकृतिक शीतल आहार के रूप में कार्य करती है, जो पित्त को शांत करने, पेट को आराम देने और शरीर को सहज ऊर्जा प्रदान करने में सहायक मानी जाती है।

क्या पितृ पक्ष में बाल कटवा सकते हैं? 

परंपरागत रूप से पितृ पक्ष के दौरान बाल कटवाने, दाढ़ी बनाने या नाखून न काटने की सलाह दी जाती है, विशेषकर उस व्यक्ति को जो श्राद्ध या तर्पण करता है।

प्राचीन ग्रंथों, जैसे गृह्य सूत्र, पुराण और मुहूर्त शास्त्र, में इन कार्यों को क्षौर कर्म कहा गया है। इन्हें केवल व्यक्तिगत स्वच्छता से जुड़ा कार्य नहीं, बल्कि शारीरिक और आध्यात्मिक शुद्धि से जुड़े संस्कार के रूप में भी देखा जाता है। मान्यता है कि इनसे बचने से व्यक्ति का ध्यान श्राद्ध कर्मों और पितरों के सम्मान पर केंद्रित रहता है। 

इसी कारण कई लोग पितृ पक्ष शुरू होने से पहले ही बाल और नाखून कटवा लेते हैं। यदि आप श्राद्ध कर्म नहीं करते हैं, फिर भी पारंपरिक रीति का पालन करना चाहते हैं, तो इन 16 दिनों में या विशेष रूप से जिस दिन घर में श्राद्ध हो उस दिन बाल और नाखून काटने से परहेज़ करना चाहिए। 

टिप्पणी : गया या प्रयागराज जैसे तीर्थस्थलों पर विशेष रूप से पितरों से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान के अंतर्गत किया जाने वाला मुंडन इसका अपवाद है, क्योंकि यह आध्यात्मिक शुद्धि के लिए किया जाता है।

क्या पितृ पक्ष में मंदिर जा सकते हैं?

हाँ, पितृ पक्ष के दौरान मंदिर जाना बिल्कुल उचित है। इस अवधि में मंदिर जाने, दर्शन करने या नियमित पूजा-पाठ करने पर कोई रोक नहीं है।

मंदिर जाने से बचने की धारणा संभवतः विवाह और गृह प्रवेश जैसे बड़े उत्सवों या मांगलिक कार्यों से जुड़ी परंपराओं को नियमित पूजा-पाठ से जोड़ने के कारण बनी है। इसलिए इस दौरान मंदिर जाकर शांतिपूर्वक पूजा और प्रार्थना की जा सकती है। पारिवारिक श्राद्ध कर्म पूरा करने के बाद मंदिर जाना भी उचित माना जाता है।

पितरों की मुक्ति से जुड़े तीर्थस्थल, जैसे गया (बिहार), वाराणसी और प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) तथा त्र्यंबकेश्वर (महाराष्ट्र), इस अवधि में विशेष रूप से पवित्र माने जाते हैं।

यदि पितृ पक्ष में बच्चे का जन्म हो तो क्या होता है? 

पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान बच्चे का जन्म शुभ माना जाता है और इसे पितरों के आशीर्वाद का संकेत माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस अवधि में जन्म लेने वाले बच्चे पर पितरों की विशेष कृपा होती है।

परंपरा और वैदिक ज्योतिष में भी इस पवित्र अवधि में जन्म को परिवार के लिए शुभ और आशीर्वाद स्वरूप माना गया है। कुछ पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, किसी पूर्वज की आत्मा उसी परिवार में बच्चे के रूप में पुनः जन्म ले सकती है, ताकि अपने अधूरे दायित्व पूरे कर सके या परिवार को आशीर्वाद दे सके।  

ऐसे बच्चों को पारंपरिक मान्यताओं में भाग्यशाली, रचनात्मक, भावुक और परिवार से जुड़े हुए माना जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि वे घर में सुख और समृद्धि लेकर आते हैं।

बच्चे के जन्म के बाद परिवार में सामान्यतः 10 से 12 दिनों की जन्म संबंधी धार्मिक अवधि होती है, जिसे सूतक कहा जाता है। सूतक के दौरान निकट परिवार के सदस्य नियमित धार्मिक अनुष्ठान और श्राद्ध कर्म नहीं करते। इसके बजाय, इन कार्यों को पूरा करने के लिए परिवार के अन्य सदस्य या पुरोहित की सहायता ली जा सकती है।

परिवार अक्सर नामकरण संस्कार, पालना समारोह, अन्नप्राशन आदि जैसे उत्सव पितृ पक्ष की समाप्ति के बाद करने का निर्णय लेते हैं। हालांकि, नवजात शिशु की देखभाल, पहला स्नान, घर में सामान्य पूजा और प्रार्थना तथा चिकित्सा संबंधी आवश्यक कार्य पहले की तरह किए जाते हैं।

पितृ पक्ष में किसी की मृत्यु होने पर क्या होता है? 

पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में प्राकृतिक मृत्यु को शुभ माना जाता है और ऐसा माना जाता है कि दिवंगत आत्मा को पितरों की विशेष कृपा प्राप्त होती है। मृत्यु के बाद अंत्येष्टि और अन्य अंतिम संस्कार सामान्य रूप से किए जाते हैं।

गरुड़ पुराण, अग्नि पुराण और ब्रह्म पुराण जैसे ग्रंथों में पितृ पक्ष के दौरान पितरों के पृथ्वी के निकट आने का उल्लेख मिलता है। ऐसी भी मान्यता है कि इस अवधि में पितृ लोक के द्वार खुले रहते हैं। इसलिए, इस समय दिवंगत होने वाली आत्मा को पितरों की कृपा प्राप्त होती है और वह सहज रूप से पितृ लोक की ओर अग्रसर होती है। 

गरुड़ पुराण, अग्नि पुराण और ब्रह्म पुराण जैसे ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि इस अवधि में दिवंगत पितर आध्यात्मिक रूप से पृथ्वी के अधिक निकट आते हैं। यह भी माना जाता है कि इस पूरे समय पितृ लोक के द्वार खुले रहते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दौरान दिवंगत होने वाली आत्मा का पितरों द्वारा प्रेमपूर्वक स्वागत किया जाता है और वह सहज रूप से पितृ लोक की ओर अग्रसर होती है।

यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु पितृ पक्ष के दौरान होती है, तो उसकी वार्षिक मृत्यु तिथि  श्राद्ध तिथि  भी प्रत्येक वर्ष पितृ पक्ष में ही आती है। इससे उसके श्राद्ध कर्म इस अवधि में नियमित रूप से किए जा सकते हैं।  

परिवार में किसी की मृत्यु होने पर 10 से 13 दिनों की शोक अवधि होती है, जिसे पातक या सूतक कहा जाता है। इस दौरान निकट परिवार के सदस्य अन्य पितरों के लिए किए जाने वाले नियमित पितृ पक्ष के श्राद्ध कर्म रोक देते हैं।

हाल में ही दिवंगत व्यक्ति के लिए 13 दिनों के शोक और संबंधित संस्कार पूरे होने के बाद परिवार सामान्य धार्मिक और दैनिक कार्य फिर से शुरू कर सकता है। यदि सूतक की अवधि के दौरान ही पितृ पक्ष समाप्त हो जाए, तो परिवार अन्य पितरों के लिए सर्वपितृ अमावस्या पर सामूहिक तर्पण या श्राद्ध कर सकता है।

इसके अलावा, एकादशी जैसे निर्धारित दिनों पर भी ये कर्म किए जा सकते हैं।

क्या महिलाएँ श्राद्ध कर सकती हैं?

हाँ, महिलाओं द्वारा श्राद्ध किया जा सकता है। सनातन हिंदू शास्त्रों में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि महिलाओं को पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मों, पिंडदान और तर्पण करने का अधिकार है। यदि पुत्र न हो या वह इन कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो, तो ये कर्म पुत्री, पुत्रवधू या विधवा द्वारा किए जा सकते हैं।

गरुड़ पुराण सारोद्धार (अध्याय 11, श्लोक 13) के अनुसार, पुत्र की अनुपस्थिति में पुत्रवधू को अंतिम संस्कार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, इसी ग्रंथ के अध्याय 12, श्लोक 71 में कहा गया है कि श्रीहरि विष्णु उस स्त्री को पतिव्रता मानते हैं, जो अपने दिवंगत पति के परलोक संबंधी संस्कार (और्ध्वदैहिक), वार्षिक श्राद्ध (क्षयाह) तथा पाक्षिक श्राद्ध (पाक्षिक या महालय श्राद्ध) का पालन करती है। पति के परलोक संबंधी संस्कार (और्ध्वदैहिक), वार्षिक श्राद्ध (क्षयाह) तथा पाक्षिक श्राद्ध (पाक्षिक या महालय श्राद्ध) का विधिपूर्वक पालन करती है। 

एक प्रचलित स्थानीय कथा के अनुसार, जब श्रीराम और श्री लक्ष्मण को श्राद्ध के लिए आवश्यक सामग्री लाने में देर हो गई, तब माता सीता ने गया में फल्गु नदी के तट पर अपने ससुर, राजा दशरथ, का श्राद्ध किया। कहा जाता है कि राजा दशरथ प्रकट हुए और अपने पुत्रों की प्रतीक्षा करने से इनकार करते हुए माता सीता से ही पिंड प्राप्त करने का अनुरोध किया। जिस स्थान पर यह घटना हुई, वह सीता कुंड के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह स्थान बिहार के गया में प्रसिद्ध श्री विष्णुपद मंदिर के ठीक सामने स्थित है।

हिंदू दर्शन में कर्म करने वाले व्यक्ति की निष्ठा, भक्ति (भाव) और प्रेम को लिंग से कहीं अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। पूर्वजों के प्रति सच्ची कृतज्ञता और श्रद्धा से किए गए अर्पण को स्वीकार किया जाता है, चाहे वह किसी पुरुष द्वारा किया गया हो या किसी महिला द्वारा।

पितृ पक्ष में कौन-कौन से शुभ कार्य करने चाहिए?

पितरों के सम्मान और जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए किए गए कार्यों को इस अवधि में विशेष रूप से अच्छा माना जाता है। इसलिए पितृ पक्ष में तर्पण और श्राद्ध जैसे कर्म करना उचित माना जाता है। इस दौरान धार्मिक ग्रंथों का पाठ भी किया जा सकता है, विशेषकर श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2, 11 और 15 तथा गरुड़ पुराण का।

इसके अलावा, आप ये कार्य भी कर सकते हैं:

  • पंचबलि भोग: भोजन करने से पहले पके हुए भोजन का एक भाग इन पाँच के लिए अलग रखें: गाय, कुत्ते, कौए, चींटियाँ और ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति। विशेष रूप से कौओं को पितृ लोक का संदेशवाहक माना जाता है।
  • दान करें: जरूरतमंदों, साधुओं या ब्राह्मणों को अन्न, गर्म कपड़े, जूते-चप्पल, छाता, तिल, गुड़ या घी का दान करें।
  • दीपक जलाएँ: दक्षिण दिशा की ओर घी या सरसों के तेल का दीपक जलाना शुभ माना जाता है, क्योंकि दक्षिण दिशा को भगवान यम और पितरों से जुड़ा माना जाता है। इसे प्रतिदिन शाम को मुख्य द्वार, पूजा स्थान या पीपल के वृक्ष के नीचे रखा जा सकता है।
  • जल अर्पित करें: पीपल, बरगद या तुलसी के पौधे में थोड़े दूध और काले तिल मिले हुए जल को अर्पित करें। इन पौधों को पारंपरिक रूप से पितरों के आशीर्वाद से जुड़ा माना जाता है। 
  • पितृ पक्ष भय या दुर्भाग्य का समय नहीं, बल्कि प्रेम, स्मरण और कृतज्ञता का एक पवित्र काल है। अपने हृदय को पवित्र और अपनी श्रद्धा को अटूट रखकर आप अपने पूर्वजों की स्मृति और उनके आशीर्वाद को जीवंत बनाए रखते हैं। यह पवित्र पक्ष पखवाड़ा आपके पितरों को शांति और आपके परिवार में सुख, सौहार्द एवं समृद्धि लेकर आए! 
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