दक्षिण भारत में हनुमान उपासना की अनोखी परंपराएँ
एवंववधो यस्य दूतो न भवेत् पावथिवस्य तु।
विद्ध्यन्ति वि कथं तस्य कार्याणां गतयोऽनघ॥
-किष्किन्धा काण्ड, सर्ग 3, श्लोक 34
“हे निष्पाप लक्ष्मण! जिस राजा के पास इनके (श्री हनुमान) समान दूत न हो, वह अपने कार्यों में सफलता कैसे प्राप्त कर सकता है?” — श्रीराम ने हनुमान जी से ऋष्यमूक पर्वत पर अपनी पहली भेंट के समय ऐसा ही कहा था।
इसके बाद भक्त और भगवान के बीच एक अद्भुत संबंध की शुरुआत हुई। भगवान श्रीराम के प्रति अपनी अतुलनीय भक्ति के कारण, श्री हनुमान को “वानरकुलथिन थोंडाइमान” (अर्थात “वानर कुल के महान सेवक-नेता”) के नाम से भी जाना जाने लगा।
प्रभु श्रीराम के प्रति गहन श्रद्धा और भक्ति के कारण ही श्री हनुमान ने यह संकल्प लिया था कि जब तक उनके प्रभु की कथा का श्रवण और पाठ धरती पर होता रहेगा, तब तक वे पृथ्वी पर उपस्थित रहेंगे। कलियुग में श्री हनुमान धर्म के रक्षक, मार्गदर्शक और संरक्षक के रूप में पूजे जाते हैं—उत्तर भारत के ‘बजरंगबली’ से लेकर दक्षिण भारत के योगी, विद्वान और चमत्कारी ‘आंजनेय’ तक।
श्री हनुमान किसी ग्रंथ में वर्णित देवता मात्र नहीं हैं, बल्कि वे एक लोकनायक, इस भूमि के पुत्र और दक्षिण भारत के शाश्वत रक्षक के रूप में पूजनीय हैं। दक्षिण भारत में उन्हें कई अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। अंजनाद्रि में वे ‘मारुति’, अर्थात् पवन देव के पुत्र, माने जाते हैं। कन्नड़-भाषी क्षेत्रों में वे ‘हनुमन्था’ और ‘आंजनेय’ कहलाते हैं, जबकि तेलुगू-भाषी उन्हें ‘हनुमंतुडु’ और ‘आंजनेयुडु’ कहते हैं। तमिल परंपरा में वे ‘आंजनेयार’ के नाम से प्रसिद्ध हैं और विद्वानों के बीच उन्हें ‘सोलिन सेल्वन’—अर्थात् शब्दों के स्वामी—भी कहा जाता है।
श्रीराम से उनकी भेंट, लंका जाने का उनका दिव्य अभियान और रावण पर विजय—ये सभी प्रसंग दक्षिण भारत की धरती में गहराई से रचे-बसे हैं और यहाँ के मंदिरों की नक्काशी, लोककथाओं तथा भक्ति-परंपराओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। आइए, दक्षिण भारत और श्री हनुमान के उस प्राचीन और अटूट संबंध को समझें—जहाँ वे देवी अंजना के पुत्र होने के कारण प्रेमपूर्वक आंजनेय स्वामी के नाम से पूजे जाते हैं।
प्रमुख बातें
- श्री हनुमान का हम्पी से क्या संबंध है?
- दक्षिण भारत में आंजनेय स्वामी के प्रसिद्ध मंदिर कौन-कौन से हैं?
- दक्षिण भारत में श्री हनुमान की उपासना इतनी विशेष क्यों है?
- दक्षिण भारत में आंजनेय स्वामी से जुड़े प्रमुख स्थल कौन-कौन से हैं?
- स्थानीय साहित्य में आंजनेय स्वामी (हनुमान जी) की महिमा का वर्णन किस प्रकार किया जाता है?
श्री हनुमान का हम्पी से क्या संबंध है?
श्री हनुमान की जीवन गाथा को समझने की यात्रा आज के हम्पी (कर्नाटक) से आरंभ होती है, जिसे महर्षि वाल्मीकि की रामायण में किष्किंधा कहा गया है। इसी हम्पी स्थित अंजनाद्रि पर्वत पर वानरराज केसरी की पत्नी माता अंजना ने कठोर तपस्या की थी, जिसके फलस्वरूप उनके पुत्र मारुति का जन्म हुआ (क्योंकि वायुदेव उनके दिव्य पिता माने जाते हैं)।
अंजनाद्रि पहाड़ी मंदिर से तुंगभद्रा नदी का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है। यहाँ पहाड़ी के शिखर पर चट्टान से तराशी गई श्री हनुमान की अद्भुत प्रतिमा विराजमान है।अंजनयाद्री पहाड़ी के नीचे हनुमानहल्ली, अर्थात् “हनुमान का गाँव”, स्थित है।
दक्षिण भारत में आंजनेय स्वामी के प्रसिद्ध मंदिर कौन-कौन से हैं?
श्री हनुमान, जिन्हें मारुति के नाम से भी जाना जाता है, इस भूमि के पुत्र हैं। दक्षिण भारत में उनकी प्राचीन उपस्थिति कई भव्य मंदिरों में दिखाई देती है। ये मंदिर लगभग 3,000 वर्षों से भी अधिक पुराने माने जाते हैं।
🚩केरल के आलथियूर श्री हनुमान स्वामी मंदिर

(३००० वर्ष पुराने अलाथियूर श्री हनुमान स्वामी मंदिर, केरल)
स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस मंदिर में स्थापित श्री हनुमान की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा स्वयं महर्षि वशिष्ठ द्वारा की गई थी। हालाँकि इस मंदिर के मुख्य देवता श्रीराम हैं, फिर भी यह मंदिर अपनी अनोखी हनुमान प्रतिमा के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इस प्रतिमा में श्री हनुमान को हल्का बाईं ओर झुका हुआ दर्शाया गया है, मानो वे लंका जाने से पहले श्रीराम के निर्देशों को ध्यानपूर्वक सुन रहे हों।
🚩यंत्रोद्धारक मंदिर हम्पी

(पवित्र षट्कोणीय यंत्र के भीतर श्री हनुमान: यंत्रोद्धारक हनुमान मंदिर)
इस मंदिर की उत्पत्ति से जुड़ी कथा अत्यंत रोचक है। 15वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य के राजगुरु और दार्शनिक श्री व्यासराज ने श्री हनुमान का चित्र बनाने का प्रयास किया, लेकिन वह चित्र बार-बार जीवित होकर बाहर निकल जाता था। ऐसा बारह बार हुआ।
तब श्री व्यासराज ने भगवान हनुमान को एक स्थान पर स्थापित करने के लिए उनकी आकृति के चारों ओर एक पवित्र यंत्र बनाया, जिसके परिणामस्वरूप श्री हनुमान उसी यंत्र में स्थापित हो गए।इस मंदिर में श्री हनुमान को ध्यानमग्न पद्मासन मुद्रा में, एक पवित्र षट्कोणीय यंत्र के भीतर विराजमान दर्शाया गया है।
यह दुर्लभ मुद्रा उनके योगी स्वरूप और आध्यात्मिक सिद्धि का प्रतीक मानी जाती है। इस घटना से प्रेरित होकर, विजयनगर साम्राज्य की रक्षा के लिए श्री व्यासराज ने अंततः पूरे राज्य में श्री हनुमान की 732 प्रतिमाएँ स्थापित कीं।
🚩तमिलनाडु का नमक्कल अंजनेयार मंदिर

(नामक्कल मंदिर में स्थित 18 फीट ऊँचा विग्रह)
तमिल क्षेत्र के हृदयस्थल में श्री हनुमान की विशाल प्रतिमाओं का स्वरूप और भी भव्य हो जाता है। 7वीं शताब्दी में निर्मित नामक्कल अंजनेयार मंदिर भी एक रोचक कथा से जुड़ा है। जब श्री हनुमान हिमालय से संजीवनी पर्वत लेकर लौट रहे थे, तब वे नेपाल की गंडकी नदी से एक विशाल शालिग्राम शिला भी अपने साथ लाए थे। उसी स्थान (नामक्कल) पर उनकी माता लक्ष्मी से भेंट हुई, जहाँ श्री विष्णु ने उन्हें जाने का निर्देश दिया था, क्योंकि माता लक्ष्मी नरसिंह अवतार के दर्शन करना चाहती थीं।
श्री हनुमान ने संध्या पूजा के लिए स्नान करने तक उस शालिग्राम शिला को माता लक्ष्मी को सौंप दिया और उनसे निवेदन किया कि वे उसे भूमि पर न रखें। किंतु वह शिला धीरे-धीरे अत्यंत भारी हो गई, और अंततः माता लक्ष्मी के पास उसे नीचे रखने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचा।
जब श्री हनुमान वापस लौटे, तब वह शिला अत्यंत विशाल हो चुकी थी और अपने स्थान से हिल भी नहीं रही थी। उस शिला की सतह पर माता लक्ष्मी और श्री हनुमान दोनों ने नरसिंह अवतार के दर्शन किए। वही शालिग्राम शिला आज नामगिरी पर्वत के रूप में विद्यमान है। यह प्रतिमा बिना गोपुरम (सजावटी प्रवेश द्वार) के स्थापित है। यह समीप स्थित नरसिंह स्वामी मंदिर की ओर निरंतर आराधना करती हुई प्रतीत होती है।
🚩श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर, तमिलनाडु
(श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर)

तमिलनाडु के रामेश्वरम में स्थित यह मंदिर अपनी पाँच मुखों वाली (पंचमुखी) हनुमान प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ रामायण काल के “तैरते हुए पत्थर” भी देखे जा सकते हैं, जिनका संबंध रामसेतु से माना जाता है।मंदिर में स्थापित 18 फीट ऊँची यह प्रतिमा एक ही पत्थर से बनाई गई है, जो दक्षिण भारत की सबसे बड़ी पंचमुखी हनुमान मूर्तियों में से एक है।
दक्षिण भारतीय मंदिरों में भगवान हनुमान को प्रायः श्रीराम मंदिर के समक्ष हाथ जोड़े हुए (अंजलि मुद्रा में) दर्शाया जाता है, जो उनके श्रीराम के सेवक (रामदास) स्वरूप को उजागर करता है।

(श्री हनुमान "योग अंजनेयार" के रूप में)
श्री हनुमान को योग अंजनेयार के रूप में भी पूजा जाता है, जहाँ वे ध्यानमग्न योग मुद्रा में बैठे हुए दिखाई देते हैं।यह उनका एक दुर्लभ चतुर्भुज स्वरूप है, जिसमें वे शंख, चक्र और जपमाला धारण किए हैं, और एक हाथ ज्ञान मुद्रा में है। यह रूप कई मंदिरों में पूजित है, जिनमें तमिलनाडु का योग अंजनेयार मंदिर विशेष रूप से प्रसिद्ध है। दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में आंजनेय को मार्शल आर्ट्स और शारीरिक शक्ति के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। अभ्यास शुरू करने से पहले, मार्शल आर्टिस्ट श्री हनुमान से उनकी अद्भुत फुर्ती और गदा चलाने की शक्ति पाने के लिए प्रार्थना करते हैं।
दक्षिण भारत में श्री हनुमान की उपासना इतनी विशेष क्यों है?
दक्षिण भारत में आंजनेय स्वामी की पूजा-विधियाँ अत्यंत विशिष्ट एवं भावपूर्ण होती हैं। श्री हनुमान की उपासना से जुड़ी परंपराएँ प्राचीन आयुर्वेद तथा ज्योतिषीय सिद्धांतों पर आधारित हैं। इनका उद्देश्य श्री हनुमान के ‘उग्र’ (तीव्र) स्वरूप को ‘शीतल’ (शांत) तत्वों के माध्यम से संतुलित करना होता है। आइए, दक्षिण भारत की कुछ प्रमुख परंपराओं को समझते हैं।
🚩वेनै काप्पु (मक्खन या बेन्ने अलंकरण)
तमिलनाडु के किसी भी मंदिर में प्रवेश करते ही आप श्री हनुमान की प्रतिमा को पूरी तरह सफेद मक्खन से ढका हुआ देख सकते हैं। इस अनुष्ठान को वेनै काप्पु (बेन्ने अलंकरण) कहा जाता है, जो उनके शरीर को शीतलता प्रदान करने का प्रतीक है।
सुचिंद्रम थानुमलयन मंदिर में श्री हनुमान की 22 फीट ऊँची ‘विश्वरूप’ प्रतिमा को प्रतिदिन मक्खन से सजाया जाता है। ‘सुचिंद्र स्थल महात्म्य’ (मंदिर की स्थानीय कथा) के अनुसार, लंका दहन के बाद श्री हनुमान इस स्थान पर आए थे। उनकी पूंछ में जलन इतनी तीव्र थी कि उसे शांत करने के लिए वे समुद्र में कूद पड़े। इसी कारण भक्त उनकी इस जलन को शांत करने के लिए मक्खन अर्पित करते हैं।
एक अन्य कथा के अनुसार, युद्ध के दौरान रावण ने श्री हनुमान को घायल कर दिया था, जिससे उनके शरीर से रक्त बहने लगा। तब भगवान श्रीराम ने स्नेहपूर्वक उनके शरीर पर मक्खन लगाकर उनका उपचार किया।
इस अनुष्ठान के बाद वही मक्खन हटाकर प्रसाद के रूप में भक्तों में वितरित किया जाता है। यह परंपरा एक रक्षक को शीतलता देने के भाव का प्रतीक मानी जाती है। भक्तों का मानना है कि यह प्रसाद के रूप में मिला मक्खन हनुमान जी की ऊर्जा से अभिमंत्रित होकर औषधीय गुणों से युक्त हो जाता है।
ऐसा ही मक्खन अलंकरण का अनुष्ठान नमक्कल अंजनेयार मंदिर में भी किया जाता है, जहाँ एक बार के श्रृंगार में लगभग 120 किलो तक मक्खन उपयोग किया जाता है। वहीं बेंगलुरु के प्रसिद्ध श्री प्रसन्न वीर आंजनेय स्वामी मंदिर में लगभग 420 किलो मक्खन से श्रृंगार किया जाता है।
🚩वड़ा माला
दक्षिण भारत की एक और रोचक परंपरा है नमकीन “वड़ा” की माला चढ़ाने की, जो आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में अत्यंत लोकप्रिय है।इस परंपरा का संबंध ज्योतिषशास्त्र से भी माना जाता है।उड़द दाल का संबंध राहु से और काली मिर्च का संबंध शनि ग्रह से माना जाता है।मान्यता है कि जब ये दोनों सामग्री वड़ा माला के रूप में भगवान हनुमान को अर्पित की जाती हैं, तो इससे राहु और शनि के दुष्प्रभाव कम होते हैं और विपरीत ग्रह दशाओं से सुरक्षा मिलती है।

( हनुमान जयंती पर 1.08 लाख वड़ों से सुशोभित अंजनेयर स्वामी, नमक्कल)
🚩वैत्तल माला (पान के पत्तों की माला)
बेंगलुरु के कार्य सिद्धि आंजनेय मंदिर और तमिलनाडु के श्री अष्टांश वरद आंजनेयर मंदिर जैसे अनेक मंदिरों में आंजनेय स्वामी को पान के पत्तों की माला अर्पित करने की विशेष परंपरा है। पान के पत्तों का हरा रंग जीवन-ऊर्जा और विजय का प्रतीक माना जाता है। यह उस क्षण का भी स्मरण कराता है, जब श्री हनुमान ने माता सीता को प्रभु श्रीराम के कुशल-क्षेम का संदेश सुनाया था। कुछ लोककथाओं के अनुसार, अशोक वाटिका में माता सीता ने स्वयं पवनपुत्र हनुमान को वैत्तल (पान के पत्तों) की माला पहनाई थी। मान्यता है कि पान के पत्तों की माला अर्पित करने से ‘कार्य में सफलता’ प्राप्त होती है।

दक्षिण भारत में आंजनेय स्वामी से जुड़े प्रमुख स्थल कौन-कौन से हैं?
दक्षिण भारत की इस पावन धरती पर अनेक ऐसे स्थान हैं, जो आंजनेय स्वामी के जीवन प्रसंगों से हमारा परिचय कराते हैं।
एतानीह नगस्यास्य शिलासङ्कटशालिनः।
शिखराणि महेन्द्रस्य स्थिराणि सुमहान्ति च॥
(किष्किंधा कांड, सर्ग 67, श्लोक 36)
महेन्द्र पर्वत
किष्किंधा कांड में वर्णन मिलता है कि “महेंद्र पर्वत विशाल शिलाओं और ऊँची चट्टानों से ढका हुआ है, और इसकी चोटियाँ अत्यंत सुदृढ़ हैं।”
तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में स्थित यह महेंद्र पर्वत उसी पौराणिक भूमि से जुड़ा है, जहाँ वानरराज जाम्बवंत ने श्री हनुमान को उनके दिव्य स्वरूप और सुप्त शक्तियों का स्मरण कराया था।
रामेश्वरम
महाभारत में वर्णित है कि कुरुक्षेत्र युद्ध से पूर्व पांडव राजकुमार अर्जुन की भेंट रामेश्वरम द्वीप के तट पर श्री हनुमान से होती है। उस समय वे वहाँ एक वृद्ध वानर के वेश में उपस्थित थे। अर्जुन ने उनसे यह प्रश्न किया कि भगवान श्रीराम ने सेतु निर्माण के लिए बाणों के स्थान पर पत्थरों का उपयोग क्यों किया।
इस पर श्री हनुमान ने उन्हें बाणों से पुल बनाकर दिखाने की चुनौती दी। अर्जुन ने प्रयास किया, किंतु वह प्रयास असफल रहा। अंततः श्रीकृष्ण के हस्तक्षेप के पश्चात् उन्हें सफलता प्राप्त हुई।तब अर्जुन को श्री हनुमान की दिव्य शक्ति का बोध हुआ। प्रसन्न होकर श्री हनुमान ने उन्हें वचन दिया कि वे उनके रथ के ध्वज पर विराजमान होकर उनकी रक्षा करेंगे। तभी से वह “कपि ध्वज” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
रामेश्वरम के निकट स्थित एक अन्य पवित्र स्थल साक्षी हनुमान मंदिर है। ‘साक्षी’ का अर्थ है गवाह। माना जाता है कि श्री हनुमान इस क्षेत्र की अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं के साक्षी रहे हैं, जिनमें श्रीराम की सेना का एकत्र होना भी शामिल है।

स्थानीय साहित्य में आंजनेय स्वामी (हनुमान जी) की महिमा का वर्णन किस प्रकार किया जाता है?
दक्षिण भारत की स्थानीय परंपराएँ श्री हनुमान का केवल उनकी अपार शक्ति के लिए ही नहीं, बल्कि एक विद्वान, बुद्धिमान पंडित और कुशल वक्ता के रूप में भी सम्मान करती हैं। इन गुणों का उल्लेख प्राचीन वाल्मीकि रामायण में भी मिलता है, जहाँ उन्हें “नव-व्याकरणार्थ-वेत्ता” कहा गया है—अर्थात् वे जो नौ व्याकरणों के ज्ञान में पारंगत हैं।
छठी से दसवीं शताब्दी के मध्य उन्हें उनकी भक्ति और शक्ति के लिए पूजा जाता था, जिसका श्रेय तमिल अलवार और नयनार संतों (भगवान विष्णु और शिव के भक्त संत-कवि) को जाता है। उन्होंने व्यक्तिगत भक्ति परंपरा को व्यापक रूप से लोकप्रिय बनाया। अलवार संतों ने श्रीराम भक्ति के माध्यम से श्री हनुमान की उपासना को प्रोत्साहित किया, जबकि नयनारों ने उन्हें शिव के रुद्र अवतार के रूप में देखा, जिससे वे वैष्णव और शैव परंपराओं के बीच एक सेतु बन गए।
तेरहवीं शताब्दी में संत माधवाचार्य ने उन्हें वायु के प्रथम अवतार माना, जो श्री विष्णु और भक्तों के बीच एक कड़ी की तरह कार्य करते हैं। इसी कारण कर्नाटक की माधव परंपरा में उनकी पूजा “मुख्य प्राण” (प्राण शक्ति) के रूप में की जाती है। माधवाचार्य ने मोक्ष या चमत्कारी शक्तियाँ प्राप्त करने से अधिक बल निष्काम भाव से अपने आराध्य की सेवा करने को दिया।
कर्नाटक में नरहरि (जिन्हें कुमार वाल्मीकि भी कहा जाता है) द्वारा रचित तोरवे रामायण में श्री हनुमान को “प्राण देव” कहा गया है—अर्थात जीवन प्रदान करने वाली शक्ति और भगवान नारायण (श्रीराम) तक पहुँचने का प्रमुख माध्यम।
वहीं दूसरी ओर, कवि कंबर द्वारा रचित कंब रामायणम् में श्री हनुमान को पंचमहाभूतों से जोड़ा गया है। एक प्रसिद्ध श्लोक के अनुसार उन्हें वायु के पुत्र के रूप में वर्णित किया गया हैं, जो जल (समुद्र) को पार करते हैं, आकाश में उड़कर पृथ्वी की पुत्री (सीता) तक पहुँचते हैं और लंका को जला देते हैं।”
इसके अतिरिक्त, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भक्तों द्वारा अत्यंत लोकप्रिय, ऊर्जावान और काव्यात्मक स्तोत्र श्री आंजनेय दंडकम् का भी पाठ किया जाता है, जिसमें उन्हें समर्पित, आध्यात्मिक और योगस्वरूप स्वरूप में वर्णित किया गया है।

निःस्वार्थ सेवा के प्रतीक
आंजनेय स्वामी एक आदर्श भक्त-योगी हैं, जो आंतरिक शांति और स्थिरता का प्रतीक हैं। वे वैष्णव और शैव परंपरा के बीच एक सेतु की तरह काम करते हैं। उनका दक्षिण भारत की भक्ति परंपरा में एक विशेष स्थान हैं। वे केवल एक विद्वान, योगी और रक्षक ही नहीं हैं, बल्कि यह भी सिखाते हैं कि सच्ची शक्ति निःस्वार्थ सेवा में होती है। इसी कारण दक्षिण भारत में उनके अनेक रूपों में पूजा जाना मात्र संयोग नहीं माना जाता। भक्ति सनातन और शाश्वत है, और श्रीराम के दूत हनुमान जी भी इसी भक्ति और पूर्ण समर्पण के सच्चे स्वरूप हैं।
*इस ब्लॉग में प्रयुक्त सभी चित्र प्रतीकात्मक हैं और एआई द्वारा निर्मित किए गए हैं।
We are proud Sanatanis, and spreading Sanatan values and teachings, our core mission. Our aim is to bring the rich knowledge and beauty of Sanatan Dharm to every household. We are committed to presenting Vedic scriptural knowledge and practices in a simple, accessible, and engaging manner so that people can benefit and internalize them in their lives.
Presented By Team Sadhana