श्री हनुमान से जुड़े दस महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर।

श्री हनुमान से जुड़े दस महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर।

श्री हनुमान से जुड़ी कहानियाँ और किस्से हम बचपन से सुनते आ रहे हैं, लेकिन उनके जीवन से जुड़े कई ऐसे रोचक तथ्य भी हैं, जिनके बारे में आज भी बहुत कम लोगों को जानकारी है। आज के हमारे इस ब्लॉग में हम श्री हनुमान के जीवन से जुड़े दस महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर आपको बताएँगे।

प्रश्न 1: हनुमान जी ने सूर्य को निगलने का प्रयास क्यों किया? इसकी कथा क्या है?

उत्तर: श्री हनुमान बाल्यकाल से ही अत्यंत बलशाली थे। महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण के किष्किंधा कांड के 66वें अध्याय में जाम्बवंत जी, श्री हनुमान को बताते हैं कि बाल्यकाल में उन्होंने नारंगी रंग के चमकीले सूर्य को फल समझकर आकाश में उड़ान भरी थी। उनके इस कृत्य को अहंकार समझते हुए, जब वे सूर्यदेव को निगलने ही वाले थे, तब भगवान इंद्र ने अपने वज्र से उन पर प्रहार किया। यह प्रहार श्री हनुमान के हनु (ठोड़ी) पर लगा और तभी से उनका नाम 'हनुमान' पड़ा, अर्थात् जिसकी ठोड़ी विकृत या प्रभावित हो।

प्रश्न 2: हनुमान जी की पहली भेंट श्री राम से कैसे हुई? उस मिलन का क्या महत्व है?

उत्तर: भगवान राम और श्री हनुमान की प्रथम भेंट का उल्लेख रामायण के 'किष्किंधा कांड' में मिलता है। यह भेंट ऋष्यमूक पर्वत के निकट हुई थी, जब श्री राम माता सीता की खोज में निकले थे। श्री हनुमान ने ब्राह्मण वेश धारण कर श्री राम और लक्ष्मण जी से भेंट की। भगवान राम ने हनुमान जी के कर्ण-कुंडलों को देखकर उन्हें पहचान लिया, जो केवल उनके आराध्य देव ही देख सकते थे।

यह मिलन 'जागृति के क्षण' का प्रतीक है, जब जीवात्मा (देहधारी आत्मा) एक लंबी खोज के बाद अपने मूल स्रोत (परमात्मा) को पहचान लेती है। यह 'समर्पण' का भी प्रतीक है। व्याकरण और तर्कशास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान होने के बावजूद, श्री हनुमान अपने 'ज्ञान' (अहंकार) का त्याग कर भक्ति और सेवा का मार्ग चुनते हैं।

प्रश्न 3: श्री हनुमान को सिंदूर क्यों चढ़ाया जाता है? इसकी कथा क्या है?

उत्तर: हनुमान जी की आराधना में सिंदूर का विशेष महत्व होता है। यह उनकी श्रीराम के प्रति अटूट भक्ति का प्रतीक है। लोककथा के अनुसार, एक बार हनुमान जी ने माता सीता से पूछा कि प्रभु श्रीराम को क्या प्रिय है। माता सीता ने बताया कि प्रभु के लिए कोई भी विशेष नहीं है; वे सभी के प्रति समभाव रखते हैं। एक दिन हनुमान जी ने माता सीता को सिंदूर लगाते हुए देखा। जब हनुमान जी ने इसका कारण पूछा, तो माता सीता ने कहा कि यह सुहाग का प्रतीक है और प्रभु इससे प्रसन्न होते हैं। तब उन्होंने भी अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया। यह देखकर श्रीराम प्रसन्न हुए और उन्हें गले लगाया। तभी से सिंदूर चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई।

प्रश्न 4: हनुमान चालीसा किसने और कब लिखी?

उत्तर: हनुमान चालीसा की रचना 16वीं शताब्दी में संत गोस्वामी तुलसीदास ने की थी। एक प्रचलित लोककथा के अनुसार, मुगल सम्राट अकबर ने तुलसीदास जी को अपने दरबार में बुलाया और उनसे कोई चमत्कार दिखाने अथवा श्रीराम के दर्शन करवाने को कहा। तुलसीदास जी ने विनम्रता से कहा कि वे कोई चमत्कारी नहीं हैं। वे केवल श्रीराम को ही अपना सम्राट मानते हैं, जो समस्त शक्तियों के स्रोत हैं। इस उत्तर से क्रोधित होकर अकबर ने उन्हें फतेहपुर सीकरी स्थित कारागार में डाल दिया। वहीं उन्होंने हनुमान चालीसा की रचना आरंभ की, जो चालीस दिनों में पूर्ण हुई। तभी वहाँ अचानक असंख्य वानरों का उपद्रव शुरू हो गया। इसे दिव्य संकेत मानते हुए अकबर को अपनी गलती का अनुभव हुआ और तुलसीदास जी को सम्मान के साथ मुक्त कर दिया गया।

प्रश्न 5: हनुमान चालीसा की प्रारंभिक चौपाई का अर्थ और महत्व क्या है?

उत्तर: हनुमान चालीसा की प्रारंभिक चौपाई निम्नलिखित है:

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।।

(अर्थ - पवनपुत्र वीर हनुमान आपकी जय हो! आप समस्त शास्त्र ज्ञान एवं सद्गुणों के सागर हैं। श्री हनुमान की जय हो! आप वानरों में सर्वश्रेष्ठ हैं और आपकी कीर्ति तीनों लोकों में फैली हुई है।)

अपनी पुस्तक Mahaviri (महावीरी) में संस्कृत विद्वान एवं लेखक नित्यानंद मिश्रा हनुमान चालीसा की प्रथम चौपाई की व्याख्या करते हुए कहते हैं:

"इस चौपाई के पहले भाग में तुलसीदास जी श्री हनुमान की अलौकिक महिमा का वर्णन करते हैं, और दूसरे भाग में उनके लौकिक (सांसारिक) पूर्णत्व का।"

(Mahaviri, Misra Nityananda, 2018)

प्रश्न 6: हनुमान चालीसा में वर्णित हनुमान जी के 8 नाम कौन-कौन से हैं और उनका क्या अर्थ है?

उत्तर: हनुमान चालीसा में वर्णित हनुमान जी के 8 नाम निम्नलिखित है:

  • हनुमान: जिनके हनु (जबड़े) पर आघात हुआ हो, जो अत्यंत बलवान हों।
  • अंजनी-पुत्र: माता अंजनी के पुत्र।
  • पवनसुत: पवन देव (वायु) के पुत्र।
  • महावीर: अत्यंत साहसी और पराक्रमी।
  • रामदूत: भगवान श्रीराम के दूत।
  • कपीश: वानरों के ईश्वर।
  • केसरी नंदन: वानरराज केसरी के पुत्र
  • शंकर सुवन: भगवान शंकर के पुत्र।

प्रश्न 7: महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ पर हनुमान जी क्यों बैठे थे?

उत्तर: महाभारत युद्ध के दौरान अर्जुन 'कपिध्वज' के नाम से जाने जाते थे। कपिध्वज अर्थात् जिनके ध्वज पर वानर, यानी श्री हनुमान, विराजमान थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार अर्जुन रामेश्वरम गए और राम सेतु के अवशेषों को देखकर वे गर्वित हो गए। उन्होंने सोचा कि वे पत्थरों के स्थान पर बाणों से ही सेतु (पुल) का निर्माण कर सकते थे।

उसी समय श्री हनुमान पास ही एक वृद्ध वानर के वेश में उपस्थित थे। हनुमान जी ने कहा कि बाणों से बना सेतु वानरों का भार कभी सहन नहीं कर पाएगा। इस पर अर्जुन और भगवान हनुमान के बीच शर्त लगी कि अर्जुन बाणों से सेतु बनाएँगे, और यदि कोई वानर उस पर चलकर उसे तोड़ दे, तो अर्जुन अग्नि में प्रवेश करेंगे।

अर्जुन ने एक भव्य सेतु का निर्माण किया, लेकिन जब वह वृद्ध वानर (श्री हनुमान) 'श्रीराम' का नाम जपते हुए उस पर चले, तो सेतु टूट गया। ऐसा दो बार और हुआ। शर्त के अनुसार अर्जुन अग्नि में प्रवेश करने ही वाले थे, तभी श्रीकृष्ण एक ब्राह्मण के वेश में वहाँ प्रकट हुए।

उन्होंने दोनों से कहा कि यह परीक्षा पुनः की जाए, क्योंकि पहले वहाँ कोई साक्षी उपस्थित नहीं था। अर्जुन ने एक बार फिर बाणों से सेतु का निर्माण किया, लेकिन इस बार भगवान श्रीकृष्ण ने उसके नीचे सुदर्शन चक्र स्थापित कर उसे सहारा दिया। (कुछ कथाओं में यह भी कहा जाता है कि उन्होंने कछुए, अर्थात् कूर्म रूप धारण कर पुल को सहारा दिया था।)

इस बार जब हनुमान जी उस सेतु पर चले, तो वह अडिग बना रहा। तब हनुमान जी ने यह जान लिया कि श्रीकृष्ण और कोई नहीं, स्वयं श्रीराम हैं। उन्होंने अपना विराट रूप धारण किया और उन्हें प्रणाम किया। अर्जुन को भी अपने अहंकार का बोध हुआ।

श्रीकृष्ण के अनुरोध पर श्री हनुमान अर्जुन के रथ के ध्वज पर विराजमान होने के लिए सहमत हुए। साथ ही, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को हनुमान द्वादशाक्षरी मंत्र की दीक्षा भी दी। द्वादशाक्षरी मंत्र साधना के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें।

प्रश्न 8: शनिवार और मंगलवार के दिन श्री हनुमान जी की पूजा क्यों की जाती है?

उत्तर: मंगलवार और शनिवार का दिन श्री हनुमान जी को समर्पित हैं। एक कथा के अनुसार, जब वानर सेना रामसेतु निर्माण में व्यस्त थी, तब शनिदेव की दृष्टि श्री हनुमान पर पड़ी। उन्होंने घोषणा की कि हनुमान जी पर साढ़े साती का प्रभाव रहेगा। श्री हनुमान ने इसे सहजता से स्वीकार किया। जब शनिदेव उनके मस्तक पर आए, तो उन्हें स्वयं असहनीय पीड़ा होने लगी। उन्होंने क्षमा माँगी और श्री हनुमान से वरदान माँगने को कहा। श्री हनुमान ने अपने भक्तों की रक्षा का वरदान माँगा कि जो उनकी शरण में आएँ, वे शनिदेव के अशुभ प्रभाव से सुरक्षित रहें। तभी से शनिवार को उनकी पूजा की परंपरा आरंभ हुई।

मंगलवार का दिन भी भगवान श्री हनुमान को समर्पित माना जाता है, क्योंकि अनेक परंपराओं के अनुसार यह उनका जन्म दिवस है। इसके अतिरिक्त, ज्योतिष में मंगलवार का संबंध ग्रह मंगल से होता है, जो शक्ति, साहस, उत्साह और ऊर्जा का प्रतीक है। हनुमान जी इन सभी गुणों के प्रतीक हैं। उनकी पूजा करने से मंगल ग्रह के अशुभ प्रभाव कम होते हैं तथा जीवन में स्थिरता, शांति और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

प्रश्न 9: क्या महिलाएँ हनुमान जी की पूजा कर सकती हैं?

उत्तर- हाँ, महिलाएँ बिल्कुल हनुमान जी की पूजा कर सकती हैं। शास्त्रों में इस पर कोई प्रतिबंध नहीं है। रामायण, रामचरितमानस या किसी भी प्रमुख धर्मग्रंथ में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि महिलाएँ हनुमान जी की पूजा नहीं कर सकतीं। श्री हनुमान पिता के समान हैं। श्री हनुमान भक्ति के प्रतीक हैं, शक्ति और संरक्षण के दाता हैं, और उनकी कृपा सभी भक्तों के लिए समान है, स्त्री या पुरुष का कोई भेद नहीं है।

जब हम भगवान श्री हनुमान को एक पिता के रूप में देखते हैं, तो एक पुत्री को उनके पास जाने और अपना स्नेह व्यक्त करने में संकोच क्यों होना चाहिए? वास्तव में, यह हमारी अपनी धारणाएँ और सामाजिक संस्कार (कंडीशनिंग) ही हैं, जिन्होंने हमें सीमित कर दिया है।

प्रश्न 10: हनुमान जी का वाहन क्या है?

उत्तर: अन्य देवताओं के विपरीत, भगवान श्री हनुमान को किसी वाहन (पशु-वाहन) पर विराजमान रूप में चित्रित नहीं किया जाता है। वायुदेव के पुत्र होने के कारण हनुमान जी मन की गति से भी अधिक तीव्र गति से यात्रा कर सकते हैं। हालाँकि, राजस्थान और दक्षिण भारत की कुछ क्षेत्रीय परंपराओं में ऊँट को कभी-कभी भगवान हनुमान के वाहन के रूप में दर्शाया जाता है। कुछ हनुमान मंदिरों में बाहर प्रतीक्षा करते हुए ऊँट की प्रतिमा भी देखी जा सकती है। हनुमान सूक्तम् में भी हनुमान जी को 'उष्ट्रारूढ़' (अर्थात् ऊँट पर आरूढ़) कहा गया है।

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