निर्जला एकादशी 2026 : व्रत विधि, पौराणिक कथा, महत्व और नियम
महाभारत के महान योद्धा भीमसेन अपनी अद्भुत शक्ति और पराक्रम के लिए प्रसिद्ध थे। कहा जाता है कि उनमें दस हज़ार हाथियों के समान बल था। किंतु एक चुनौती ऐसी थी, जो उनके लिए किसी भी युद्ध से अधिक कठिन थी, अपनी भूख पर नियंत्रण रखना।
भीमसेन को छोड़कर अन्य सभी पांडव वर्ष भर आने वाली एकादशियों का व्रत रखते थे, परन्तु उनके लिए बार-बार उपवास करना संभव नहीं था। जब उन्होंने इस समस्या का समाधान जानने के लिए महर्षि व्यास से मार्गदर्शन माँगा, तब उन्हें एक ऐसे व्रत का उपदेश मिला, जिसके पालन से वर्ष भर की सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होने की मान्यता है। यह व्रत है निर्जला एकादशी का व्रत।
निर्जला एकादशी की महिमा, व्रत-विधि, शुभ मुहूर्त, तथा भीमसेन से जुड़ी इस पौराणिक कथा को विस्तार से जानने के लिए इस लेख को अंत तक अवश्य पढ़ें।
प्रमुख बातें
- निर्जला एकादशी क्या है?
- निर्जला एकादशी (2026) कब है?
- निर्जला एकादशी व्रत कथा
- निर्जला एकादशी पूजा विधि
- निर्जला एकादशी के लाभ
- निर्जला एकादशी के दिन किन वस्तुओं का दान शुभ होता है?
- निर्जला एकादशी व्रत नियम
निर्जला एकादशी क्या है?
हिंदू पंचांग के अनुसार सामान्यतः एक वर्ष में 24 एकादशियाँ होती हैं, किंतु इस वर्ष अधिक मास के कारण दो अतिरिक्त एकादशियाँ होने से इनकी कुल संख्या 26 है। इनमें निर्जला एकादशी को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। 'निर्जला' शब्द संस्कृत के दो शब्दों, 'निर्' (बिना) और 'जल' (पानी), से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है "जल के बिना"। इस व्रत में अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है।
इसी प्रकार 'उपवास' शब्द भी संस्कृत के दो शब्दों, 'उप' (निकट) और 'वास' (समीप या निकट रहना), से मिलकर बना है। अतः उपवास का वास्तविक अर्थ केवल भोजन का त्याग करना नहीं, बल्कि भगवान के समीप रहना है। उपवास भक्त को सांसारिक विषयों से दूर होकर भगवान विष्णु के चिंतन, भक्ति और स्मरण में अधिक समय व्यतीत करने का अवसर प्रदान करता है।
निर्जला एकादशी (2026) कब है?
निर्जला एकादशी प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आती है।
एकादशी तिथि प्रारम्भ - जून 24, 2026 को 06:12 पी एम बजे।
एकादशी तिथि समाप्त - जून 25, 2026 को 08:09 पी एम बजे।
26 जून को पारण (व्रत तोड़ने का) समय - 05:25 ए एम से 08:13 ए एम।
निर्जला एकादशी व्रत कथा

(महर्षि वेदव्यास भीमसेन को निर्जला एकादशी व्रत की महिमा बताते हुए)
पद्म पुराण के उत्तर खंड एवं ब्रह्मवैवर्त पुराण में निर्जला एकादशी का उल्लेख मिलता है। इस एकादशी का संबंध महाभारत काल से है। पाँचों पाण्डव (युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव) भगवान विष्णु के परम भक्त थे। इसलिए भीम को छोड़कर सभी पाण्डव तथा द्रौपदी गहन श्रद्धा और विधिपूर्वक सभी एकादशियों का व्रत करते थे। किंतु वायु-पुत्र भीम के लिए भूखा रहना अत्यंत कठिन था। वे कुछ घंटों से अधिक उपवास नहीं कर पाते थे।
भगवान विष्णु के परम भक्त होने के बावजूद उनकी प्रिय और महत्त्वपूर्ण एकादशियों का व्रत न कर पाने के कारण भीमसेन अत्यंत ग्लानि अनुभव करते थे। समय के साथ उनकी यह पीड़ा और बढ़ती गई। अंततः एक दिन वे अपनी समस्या लेकर महर्षि वेदव्यास के पास पहुँचे। उन्होंने सरल शब्दों में अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहा, "मैं व्रत नहीं रख पाता, लेकिन भगवान विष्णु की सेवा करना चाहता हूँ। कृपया कोई उपाय बताइए।"
तब महर्षि व्यासदेव ने भीमसेन से कहा, "भगवान श्रीकृष्ण, जो अपने हाथों में गदा, चक्र, शंख और कमल धारण करते हैं, उन्होंने स्वयं मुझे बताया है कि वर्षभर की सभी एकादशियों के उपवास से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह इस एक निर्जला एकादशी के व्रत से भी प्राप्त हो जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है।"
इसके बाद महर्षि व्यास ने भीमसेन को निर्जला एकादशी व्रत की विधि बताते हुए कहा कि वे केवल इस एक एकादशी का पालन करें। सूर्योदय से अगले दिन के सूर्योदय तक अन्न और जल का त्याग करके, पूर्ण निष्ठा के साथ भगवान विष्णु के भजन, जप और उपासना में अपना समय व्यतीत करें।
महर्षि ने आगे बताया कि जो व्यक्ति इस व्रत का श्रद्धापूर्वक पालन करता है, उसे सभी एकादशियों के पुण्य के समान फल प्राप्त होता है, साथ ही अनेक आध्यात्मिक लाभ भी मिलते हैं। महर्षि व्यास से यह उपदेश प्राप्त करने के बाद भीमसेन ने पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा के साथ निर्जला एकादशी का व्रत करना आरंभ कर दिया। इसी कारण यह एकादशी भीम एकादशी और भीमसेनी एकादशी के नाम से भी प्रसिद्ध हुई।
निर्जला एकादशी पूजा विधि

(विष्णु सहस्रनाम का पाठ और भजन-कीर्तन के माध्यम से श्री विष्णु की आराधना करते श्रद्धालु)
निर्जला एकादशी का पालन केवल अन्न और जल का त्याग करने तक सीमित नहीं है। इस व्रत की पूर्णता भगवान विष्णु की श्रद्धापूर्वक पूजा, मंत्र-जप और भक्ति में निहित है। यदि आप भी निर्जला एकादशी के इस पावन अवसर पर श्री विष्णु की भक्ति में लीन होना चाहते हैं, तो साधना ऐप पर आयोजित तीन-दिवसीय विष्णु सहस्रनाम साधना में सहभागी होकर उनकी कृपा के पात्र बन सकते हैं।
निर्जला एकादशी व्रत की चरणबद्ध पूजा विधि:
ब्रह्ममुहूर्त में जागें - सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पीले या सफेद वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है, क्योंकि पीला रंग भगवान विष्णु को प्रिय है।
व्रत पालन का निश्चय करें - भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के समक्ष बैठकर श्रद्धापूर्वक निर्जला एकादशी का निश्चय करें। साथ ही यह दृढ़ संकल्प लें कि द्वादशी को पारण करने तक आपका मन श्रीहरि के स्मरण, साधना, नाम-जप, कीर्तन और भक्ति में निरंतर लीन रहेगा।
पूजा सामग्री तैयार करें - तुलसी पत्र, पीले पुष्प, पंचामृत, चंदन, घी का दीपक, अगरबत्ती, ऋतुफल तथा ताजा जल आदि पूजा सामग्री एकत्र करें। भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी और पीले पुष्पों का विशेष महत्व है।
मंत्र-जप एवं शास्त्रों का अध्ययन करें - दिनभर भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करें। श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ, श्रीकृष्ण महामंत्र का जप तथा हरिनाम संकीर्तन करना विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।
सायंकालीन आरती करें - सूर्यास्त के समय भगवान विष्णु की आरती करें, तुलसी पत्र अर्पित करें और घी का दीपक जलाकर प्रार्थना करें। इस समय निर्जला एकादशी व्रत कथा का श्रवण भी किया जा सकता है।
रात्रि जागरण करें - एकादशी की रात्रि में यथासंभव जागरण करें तथा श्रीहरि की भक्ति में समय व्यतीत करें।
द्वादशी को पारण करें - अगले दिन द्वादशी तिथि में निर्धारित समय पर व्रत का पारण करें। पारण से पूर्व भगवान विष्णु की पूजा कर ब्राह्मणों, गौमाता अथवा जरूरतमंदों को यथाशक्ति दान देना शुभ माना जाता है।
निर्जला एकादशी के लाभ
एकादशी का अर्थ है पूर्णिमा तथा अमावस्या के बाद आने वाला ग्यारहवाँ दिन। इस दिन भगवान विष्णु और उनके दिव्य अवतारों की उपासना, जप तथा उपवास के माध्यम से करने की अनुशंसा की जाती है।
एकादशी पर उपवास का विधान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहन आध्यात्मिक दृष्टिकोण भी निहित है। मान्यता है कि इस दिन पृथ्वी तथा प्रकृति की ऊर्जा एक विशेष अवस्था में होती है, जिसका प्रभाव मानव शरीर और मन पर भी पड़ता है। यदि साधक इस दिन अपने शरीर को हल्का रखे, इन्द्रियों को संयमित करे तथा मन को भगवान के स्मरण में लगाए, तो उसकी चेतना स्वाभाविक रूप से भीतर की ओर उन्मुख होने लगती है।
इसी कारण एकादशी को आत्मचिंतन, जप, ध्यान और साधना के लिए अत्यंत अनुकूल माना गया है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन अंतर्मन के द्वार अधिक सहजता से खुल सकते हैं और साधक अपने वास्तविक आध्यात्मिक स्वरूप का अनुभव करने के निकट पहुँच सकता है। इसके विपरीत, यदि मनुष्य केवल भौतिक सुखों और शारीरिक तृप्ति में ही लीन रहे, तो वह इस सूक्ष्म अवसर का लाभ नहीं उठा पाता। एकादशी हमें बाह्य जगत से कुछ समय के लिए विराम लेकर अपने भीतर स्थित दिव्यता की ओर दृष्टि करने का अवसर प्रदान करती है।
पञ्चप्रवहणान्येव भवाब्धौ मज्जतां नृणाम्।
विष्णुरेकादशी गीता तुलसी विप्रधेनवः॥ २,३२.१००॥
गरुड़ पुराण, प्रेतकाण्ड (धर्मकाण्ड)
अर्थात् भवसागर में डूबते मनुष्यों के लिये सागर पार करने के ये पाँच ही माध्यम हैं – श्रीविष्णु, एकादशी, गीता, तुलसी, और (ब्राह्मण की) गायें।
निर्जला एकादशी का व्रत पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा के साथ करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- अतीत और वर्तमान जन्मों में जानबूझकर या अनजाने में किए गए सभी पाप क्षमा कर दिए जाते हैं। पूर्व जन्मों के कर्म समाप्त हो जाते हैं।
- पद्म पुराण के अनुसार, एकादशी व्रत का पालन करने वाले मनुष्य को मृत्यु के समय भगवान विष्णु के दिव्य दूत वैकुण्ठ ले जाने के लिए आते हैं।
- उपवास शरीर की ऊर्जा को भारी भोजन के पाचन में लगाने के बजाय उसे भीतर की ओर केंद्रित करने में सहायक होता है, जिससे आपके आंतरिक द्वार खुलते हैं। उपवास शरीर से विषैले तत्वों तथा संचित अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने में सहायक माना जाता है और पाचन तंत्र को विश्राम प्रदान करता है। इसलिए उपवास हमारे मानसिक और शारीरिक दोनों स्तरों के प्राकृतिक शुद्धीकरण में सहायक होता है।
- भक्ति, जप और आध्यात्मिक साधना में समय व्यतीत करने से मानसिक शांति, भावनात्मक संतुलन तथा मन पर नियंत्रण विकसित होता है।
निर्जला एकादशी के दिन किन वस्तुओं का दान शुभ होता है?
सनातन धर्म में दान को करुणा, सेवा और धर्म का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। निर्जला एकादशी पर किया गया दान विशेष रूप से पुण्यदायी माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, व्रत के साथ दान-पुण्य करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। महर्षि वेदव्यास ने भीमसेन को बताया था कि निर्जला व्रत पूर्ण करने के बाद जरूरतमंदों और ब्राह्मणों को भोजन कराना अत्यंत शुभ होता है। चूँकि यह एकादशी वर्ष के सबसे गर्म महीनों में आती है, इसलिए जलदान का महत्व और भी बढ़ जाता है। स्वयं निर्जल उपवास करने वाला व्यक्ति प्यास की अनुभूति को समझता है, इसलिए इस दिन प्यासे लोगों की सेवा को विशेष पुण्यकारी माना गया है।
निर्जला एकादशी पर निम्नलिखित वस्तुओं का दान किया जा सकता है:
- जल अथवा शीतल पेय
- मिट्टी के घड़े (मटके)
- हाथ के पंखे
- छाते
- मौसमी फल
- भोजन एवं अन्न
- वस्त्र
- जूते-चप्पल
यदि इन वस्तुओं का दान करना संभव न हो, तो भी श्रद्धापूर्वक किसी प्यासे व्यक्ति को एक गिलास जल पिलाना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। निर्जला एकादशी का वास्तविक संदेश केवल उपवास नहीं, बल्कि सेवा, करुणा और परोपकार की भावना को जीवन में अपनाना भी है।
निर्जला एकादशी व्रत नियम
- इस व्रत में अन्न और जल का सेवन न करें। यदि आप ऐसी दवाइयाँ लेते हैं जिनके साथ भोजन करना आवश्यक है, तो अपने चिकित्सक के निर्देशों का पालन करें।
- सात्विक विचार रखें।
- क्रोध और विवाद से दूर रहें।
- श्री विष्णु की भक्ति में लीन रहें।
*इस ब्लॉग में प्रयुक्त सभी चित्र प्रतीकात्मक हैं और एआई द्वारा निर्मित किए गए हैं।
’ऊँ नमो नारायणाय
Frequently Asked Questions
Clearing doubts on your sacred journey
निर्जला एकादशी को बड़ी ग्यारस क्यों कहते हैं ?
क्या गर्भवती महिलाएँ निर्जला एकादशी का व्रत कर सकती हैं ?
निर्जला एकादशी का व्रत करते समय यदि गलती से पानी पी लिया हो, तो क्या करें?
निर्जला एकादशी व्रत का संकल्प कैसे करें?
एकादशी को सिर धोना चाहिए?
निर्जला एकादशी को और किन नामों से जाना जाता है?
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