देवशयनी एकादशी : योगनिद्रा, आत्मचिंतन और नवचेतना का पावन काल
सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम् ।
विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत्सर्वं चराचरम् ॥
-उत्तर पर्व, भविष्य पुराण।
"हे जगन्नाथ! जब आप योगनिद्रा में जाते हैं, तब सम्पूर्ण जगत निद्रा में चला जाता है। और जब आप जागते हैं, तब सम्पूर्ण चराचर सृष्टि भी आपके साथ जाग उठती है।"
सनातन धर्म में देवशयनी एकादशी वह पावन अवसर है, जब श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। श्रीहरि ही वह दिव्य शक्ति हैं, जो संपूर्ण सृष्टि का पालन और संचालन करते है। जब वे अपनी चेतना को बाह्य जगत से समेटकर अंतर्मुखी होते हैं, तो यह समय हमें भी अपने भीतर झाँकने और आत्मचिंतन करने की प्रेरणा देता है।
यह अवस्था अगले चार महीनों, अर्थात चातुर्मास, तक रहती है। शिव पुराण के अनुसार, इस अवधि में भगवान शिव सृष्टि के संचालन का दायित्व संभालते हैं। यही कारण है कि श्रीहरि के योगनिद्रा में प्रवेश करने के कुछ समय बाद ही पवित्र श्रावण (सावन) मास का आरंभ होता है।
श्रीहरि की यह दिव्य योगनिद्रा देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी के दिन समाप्त होती है। इसके साथ ही सनातन धर्म में मांगलिक कार्यों और उत्सवों का शुभारंभ होता है।
आइए, इस ब्लॉग में जानें देवशयनी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व, श्रीहरि की दिव्य योगनिद्रा का रहस्य, पंढरपुर वारी की अद्भुत परंपरा और इनसे जुड़ी महत्त्वपूर्ण तिथियाँ।
- देवउठनी और देवशयनी एकादशी क्या हैं?
- देवशयनी एकादशी की कथा क्या है?
- चातुर्मास में शुभ कार्य क्यों नहीं किए जाते?
- महाराष्ट्र में पंढरपुर वारी क्यों मनाई जाती है?
- देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह क्यों किया जाता है?
- तुलसी विवाह कब और कैसे मनाया जाता है?
- देवशयनी और देवउठनी एकादशी का व्रत करने के क्या लाभ हैं?
- वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी कब है?
देवउठनी और देवशयनी एकादशी क्या हैं?

( श्री हरि योगनिद्रा में )
देवउठनी और देवशयनी, ये दो एकादशी तिथियाँ श्रीहरि विष्णु की चार महीने की योगनिद्रा अर्थात चातुर्मास के आरम्भ और समापन का प्रतीक हैं।
देवशयनी एकादशी को हरिशयनी, आषाढ़ी, टोली तथा महा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। यह आषाढ़ मास (जून–जुलाई) के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। देवशयनी एकादशी से चातुर्मास का आरंभ होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह चार महीनों का अत्यंत पवित्र काल है, जो आध्यात्मिक अनुशासन, तप, व्रत तथा ईश्वर-भक्ति के लिए समर्पित माना जाता है।
यह अवधि देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी के दिन समाप्त होती है, जब श्रीहरि योगनिद्रा से जागृत होते हैं। प्रबोधिनी एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है।
देवशयनी एकादशी की कथा क्या है?
पुराणों के अनुसार, इस दिन श्रीहरि नारायण योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं और क्षीरसागर में शेषनाग पर विश्राम करते हैं। पुराणों, विशेषकर श्रीमद्भागवत महापुराण और विष्णु पुराण के अनुसार, त्रेतायुग में असुरराज बलि ने तीनों लोको (पृथ्वीलोक, स्वर्गलोक और पाताललोक) पर विजय प्राप्त कर देवताओं का स्थान ले लिया। अपनी विजय को स्थापित करने के लिए उन्होंने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया।
तब श्रीहरि विष्णु ने वामन (बटुक) अवतार धारण किया। उन्होंने राजा बलि से केवल तीन पग भूमि का दान माँगा। राजा बलि ने सहर्ष उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।
अपने पहले ही पग में उन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी, आकाश और सभी दिशाओं को नाप लिया। दूसरे पग में उन्होंने सम्पूर्ण स्वर्गलोक को अपने अधीन कर लिया। तीसरे पग के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा, तब राजा बलि ने अपना वचन निभाने के लिए विनम्रतापूर्वक अपना सिर अर्पित कर दिया।
राजा बलि के त्याग, सत्यनिष्ठा और समर्पण से प्रसन्न होकर श्रीहरि विष्णु ने उन्हें सुतल लोक (पृथ्वी के नीचे स्थित, किंतु पाताल से श्रेष्ठ लोक) का अधिपति बनाया और अमरत्व का वरदान प्रदान किया। इसके बाद राजा बलि ने श्रीहरि से सुतल लोक में उनके साथ निवास करने का अनुरोध किया, जिसे श्रीहरि ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।
बाद में जब माता लक्ष्मी को यह ज्ञात हुआ कि उनके पति इस वचन से बँध गए हैं, तब उन्होंने राजा बलि को अपना भाई बनाया और श्रीहरि को इस वचन से मुक्त करने का अनुरोध किया। लेकिन अपना वचन निभाने के लिए भगवान विष्णु ने प्रत्येक वर्ष चार महीने वहाँ निवास करने का निर्णय लिया। इसी पवित्र अवधि की शुरुआत देवशयनी एकादशी से होती है।
एक अन्य कथा के अनुसार, सतयुग में धर्मात्मा राजा मान्धाता के राज्य में भयंकर अकाल पड़ा। मार्गदर्शन के लिए उन्होंने महर्षि अंगिरा की शरण ली। महर्षि ने उन्हें श्रीहरि विष्णु को प्रसन्न करने के लिए आषाढ़ मास की शयनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।
राजा ने उनके निर्देश का पालन किया। शीघ्र ही उनके राज्य में वर्षा हुई और अकाल समाप्त हो गया। तभी से शयनी एकादशी का व्रत करने की परम्परा प्रचलित हुई।
चातुर्मास में शुभ कार्य क्यों नहीं किए जाते?
चातुर्मास में श्रीहरि योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। योगनिद्रा सामान्य निद्रा नहीं है, बल्कि परम चेतना और गहन ध्यान की अवस्था है, जिसके माध्यम से श्रीहरि सम्पूर्ण सृष्टि का पालन और संचालन करते हैं। चूँकि सृष्टि के पालनकर्ता योगनिद्रा में होते हैं, इसलिए माना जाता है कि इस समय ब्रह्मांडीय ऊर्जा भीतर की ओर प्रवाहित होती है।
इसी कारण विवाह, गृहप्रवेश, नामकरण आदि जैसे शुभ मांगलिक कार्य परंपरागत रूप से स्थगित कर दिए जाते हैं। इसके स्थान पर यह समय आत्मचिंतन, आत्मसंयम, व्रत और गहन आध्यात्मिक साधना के लिए समर्पित माना जाता है। साधु-संत और श्रद्धालु इन चार महीनों का उपयोग ध्यान, साधना तथा मन और शरीर की शुद्धि के लिए करते हैं।
यह श्रीहरि की उपासना और ध्यान का भी उत्तम समय है। इस दौरान आप उनके द्वादशाक्षरी मंत्र का जप कर सकते हैं या साधना ऐप पर विष्णु सहस्रनाम साधना कर सकते हैं।
महाराष्ट्र में पंढरपुर वारी क्यों मनाई जाती है?
वारी, जिसे दिंडी यात्रा या वारी के नाम से भी जाना जाता है, लगभग 800 वर्षों से चली आ रही एक वार्षिक पदयात्रा है। यह यात्रा महाराष्ट्र के पंढरपुर स्थित भगवान विठोबा मंदिर तक की जाती है और भगवान विठोबा को समर्पित है, जिन्हें भगवान विष्णु के श्रीकृष्ण स्वरूप का अवतार माना जाता है। इस यात्रा में 'वारकरी' कहलाने वाले लाखों श्रद्धालु लगभग 21 दिनों तक पैदल चलकर 250 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करते हुए पवित्र विठोबा मंदिर पहुँचते हैं।

(आषाढ़ी एकादशी पर विठोबा मंदिर में उत्सव मनाते श्रद्धालु)
महाराष्ट्र के भक्ति आंदोलन से जुड़ी पालखी सोहला भी इस उत्सव का महत्वपूर्ण भाग है। इसमें श्रद्धालु महाराष्ट्र के पूजनीय संत-कवियों, संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम की पवित्र रजत पादुकाओं को सुसज्जित पालकियों में लेकर चलते हैं।
यह यात्रा आषाढ़ी एकादशी के शुभ दिन विठोबा मंदिर पहुँचती है। श्रद्धालु चातुर्मास से पहले की इस लगभग 250 किलोमीटर की कठिन पदयात्रा को शरीर और मन की शुद्धि के लिए एक तपस्या मानते हैं, ताकि वे आने वाले चार महीनों के संयमपूर्ण जीवन के लिए स्वयं को तैयार कर सकें।
देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह क्यों किया जाता है?
देवउठनी एकादशी का यह पावन दिन तुलसी विवाह के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन तुलसी माता का विवाह श्रीहरि विष्णु (या उनके शालिग्राम स्वरूप) से कराया जाता है।
पद्म पुराण के अनुसार, पूर्वजन्म में माता तुलसी वृंदा नाम से श्रीहरि की परम भक्त थीं। उनका विवाह पराक्रमी असुरराज जालंधर से हुआ था। वे अत्यंत पतिव्रता और धर्मनिष्ठ थीं। उनकी भक्ति और पतिव्रत धर्म ने एक ऐसा सुरक्षा कवच बना दिया था, जो उनके पति की रक्षा करता था। इसी सुरक्षा कवच के कारण जालंधर युद्ध में अजेय हो गया था और लगातार देवताओं को पराजित कर रहा था, जिससे सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा।
तब श्रीहरि ने अपनी दिव्य लीला से वृंदा का यह सुरक्षा कवच भंग कर दिया, जिसके कारण जालंधर का वध संभव हो सका। अपने पति की मृत्यु से दुःखी वृंदा ने श्रीहरि विष्णु को शाप दिया कि जैसे उन्होंने पत्थर की तरह कठोर व्यवहार किया है, वैसे ही उन्हें भी पत्थर बनना पड़े। इसी शाप के कारण श्रीहरि शालिग्राम स्वरूप में प्रकट हुए।
वृंदा की अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीहरि ने उन्हें पवित्र तुलसी के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि तुलसीदल के बिना उन्हें अर्पित कोई भी भोग स्वीकार नहीं होगा। इसके बाद उन्होंने प्रबोधिनी एकादशी के शुभ दिन तुलसी से विवाह करने का वचन दिया। इसी दिन चातुर्मास की चार महीने की अवधि समाप्त होती है।
तुलसी विवाह कब और कैसे मनाया जाता है?

(तुलसी विवाह का उत्सव)
तुलसी विवाह पवित्र तुलसी के पौधे का श्रीहरि विष्णु (या उनके शालिग्राम स्वरूप) के साथ सम्पन्न होने वाला वैदिक विवाह है। इसके साथ ही हिंदू धर्म में विवाह सहित अन्य सभी मांगलिक कार्यों का पुनः शुभारम्भ हो जाता है।
यह मुख्य रूप से कार्तिक मास (अक्टूबर–नवंबर) की एकादशी तिथि को मनाया जाता है, जो दीपावली के 11वें दिन पड़ती है। हालांकि, कुछ परम्पराओं में इसे द्वादशी तिथि (12वीं तिथि) को भी मनाते है। उत्तर भारत में विवाह का मंडप गन्ने से बनाया जाता है, जो संबंधों में मधुरता और आर्थिक समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
दक्षिण भारतीय राज्यों में तुलसी विवाह विभिन्न नामों से मनाया जाता है—
- तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में इसे क्षीराब्धि द्वादशी कहा जाता है।
- कर्नाटक में यह उत्तान द्वादशी के नाम से प्रसिद्ध है।
- तमिलनाडु में इसे तुलसी कल्याणम् कहा जाता है।
कुछ क्षेत्रों में शालिग्राम के स्थान पर आँवले (आमलकी) के वृक्ष की एक शाखा, जो श्रीहरि विष्णु का प्रतीक मानी जाती है, तुलसी के पौधे के साथ स्थापित की जाती है। श्रद्धालु आँगन से पूजाघर तक चावल के घोल से भगवान विष्णु के चरणों की सुंदर आकृतियाँ बनाकर, घी के दीप जलाकर, घंटियाँ बजाकर और "उत्तिष्ठ गोविन्द" जैसे मंत्रों का उच्चारण कर भगवान विष्णु का प्रतीकात्मक जागरण करते हैं।
इस दिन को स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना जाता है। इसका अर्थ है कि यह पूरा दिन इतना शुभ और पवित्र होता है कि विवाह जैसे मांगलिक कार्यों के लिए अलग से शुभ मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान के जागरण से सम्पूर्ण सृष्टि दिव्य और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाती है, जिससे ग्रहों की प्रतिकूल स्थितियों और दोषों का प्रभाव कम हो जाता है।
वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी कब है?
वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी शनिवार, 25 जुलाई 2026 को मनाई जाएगी।
- एकादशी तिथि प्रारम्भ : 24 जुलाई 2026, प्रातः 9:12 बजे
- एकादशी तिथि समाप्त : 25 जुलाई 2026, प्रातः 11:34 बजे
- पारण का समय : व्रत का पारण 26 जुलाई 2026 को प्रातः 5:39 बजे से 8:22 बजे के बीच करना चाहिए।
वर्ष 2026 में देवउठनी एकादशी कब है?
वर्ष 2026 में देवउठनी एकादशी शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 को मनाई जाएगी।
- एकादशी तिथि प्रारम्भ : 20 नवंबर 2026, प्रातः 7:15 बजे
- एकादशी तिथि समाप्त : 21 नवंबर 2026, प्रातः 6:31 बजे
- पारण का समय : व्रत का पारण 21 नवंबर 2026 को दोपहर 1:11 बजे से 3:18 बजे के बीच करना चाहिए।
देवशयनी और देवउठनी एकादशी के आध्यात्मिक लाभ
पद्म पुराण के अनुसार, देवशयनी एकादशी का पालन करने से पापकर्मों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। श्रद्धापूर्वक इस एकादशी का व्रत करना सम्पूर्ण सृष्टि तथा त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शिव) की उपासना के समान माना गया है।
जो साधक चातुर्मास के नियमों, जैसे भूमि पर शयन करना, दीपदान करना और ब्रह्मचर्य का पालन करना, के साथ इस व्रत का पालन करते हैं, वे श्रीहरि को अत्यंत प्रिय हो जाते हैं। साथ ही, भगवान वामन और राजा बलि की कथा का श्रवण या पाठ करने मात्र से उन्हें अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है।
पद्म पुराण में यह भी कहा गया है कि देवउठनी एकादशी पर रात्रि भर जागरण करने से साधक श्रीहरि के परम धाम को प्राप्त करता है और पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है। साथ ही, श्रीहरि की कृपा से उसके पितर, परिजन और वंशज भी उस दिव्य धाम को प्राप्त करते हैं।
इस दिन तुलसी माता की विशेष महिमा बताई गई है। तुलसी के पौधे दर्शन, स्पर्श, रोपण, ध्यान, उनकी महिमा का श्रवण या वर्णन तथा उन्हें जल अर्पित करने से स्थायी सुख की प्राप्ति होती है और साधक श्रीहरि के नित्य धाम को प्राप्त करता है। श्रीहरि को अर्पित एक तुलसीदल भी बहुमूल्य रत्नों के उपहार से श्रेष्ठ माना गया है।
स्कन्द पुराण के कार्तिक मास माहात्म्य में कार्तिक मास को श्रीहरि की भक्ति के लिए सबसे पवित्र महीना बताया गया है। इस दौरान दान, स्नान, जप, शास्त्रों का अध्ययन, पूजा और दान विशेष पुण्यदायी माने गए हैं। विशेष रूप से भागवत पुराण का पाठ या श्रवण करने से लौकिक सुख और मोक्ष, दोनों की प्राप्ति होती है।
Frequently Asked Questions
Clearing doubts on your sacred journey
इन एकादशियों पर चातुर्मास के दौरान कौन-से व्रत या नियम अपनाए जाते हैं?
क्या केवल एक ही एकादशी का व्रत रखने से भी लाभ मिलता है?
क्या देवशयनी या देवउठनी एकादशी पर तुलसी के पत्ते तोड़ सकते हैं?
इन व्रतों के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
We are proud Sanatanis, and spreading Sanatan values and teachings, our core mission. Our aim is to bring the rich knowledge and beauty of Sanatan Dharm to every household. We are committed to presenting Vedic scriptural knowledge and practices in a simple, accessible, and engaging manner so that people can benefit and internalize them in their lives.
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