हरतालिका तीज: संकल्प से शिवत्व तक

हरतालिका तीज: संकल्प से शिवत्व तक

भाद्रशुक्लतृतीयायां व्रतं वै हरितालकम्।
कुर्याद्भक्त्या विधाननेन पाद्यार्घ्यर्चनापूर्वकम्॥
 — नारद पुराण, पूर्वभाग-चतुर्थपाद, अध्याय 112, श्लोक 30

“भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भक्तिपूर्वक हरितालिका व्रत का पालन करना चाहिए। इस व्रत में निर्धारित विधि के अनुसार सर्वप्रथम पाद्य (चरण प्रक्षालन हेतु जल), अर्घ्य और तत्पश्चात पूजन करना चाहिए।”

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला हरतालिका तीज केवल एक व्रत नहीं, बल्कि देवी पार्वती की उस अडिग तपस्या और अखंड निष्ठा का स्मरण है, जिसके बल पर उन्होंने भगवान शिव को अपने मनचाहे वर के रूप में प्राप्त किया। सखियों द्वारा हर कर (हरण करके) घने वन में ले जाई गईं पार्वती ने वहीं कठोर तपस्या करते हुए भगवान शिव को पति रूप में पाने का संकल्प लिया। इसी कथा से इस व्रत का नाम ‘हरतालिका’ पड़ा।

यह पर्व स्त्री-शक्ति के उस दिव्य स्वरूप को नमन करता है, जो प्रेम में निष्ठा, तप में धैर्य और संकल्प में दृढ़ता का प्रतीक है। निर्जला व्रत रखकर स्त्रियाँ बालू या मिट्टी से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाकर उनका पूजन करती हैं।

यह व्रत भाद्रपद (जिसे भादो भी कहा जाता है) मास में मनाया जाता है। भाद्रपद नाम संस्कृत के शब्द भद्र से लिया गया है, जिसका अर्थ है—मंगल, कृपा या सौभाग्य प्रदान करने वाला।

हालाँकि, हरितालिका तीज केवल रंग-बिरंगे परिधानों, सुंदर मेहंदी और उत्सवपूर्ण मेल-मिलाप का पर्व नहीं है। यह निःस्वार्थ प्रेम, परम त्याग और अडिग आध्यात्मिक संकल्प का उत्सव है।

माँ पार्वती के अटूट संकल्प और भक्ति का स्मरण करते हुए, भक्त स्वयं देवी द्वारा किए गए मूल अनुष्ठानों का अनुसरण करते हैं। नदी की शुद्ध मिट्टी (बालू रेत) या चिकनी मिट्टी से भगवान शिव और माँ पार्वती के पवित्र विग्रहों को अपने हाथों से गढ़ने से लेकर रात्रि जागरण करने और कठोर व्रत का पालन करने तक, हरितालिका तीज की ये विशिष्ट परंपराएँ इसे अन्य पर्वों से अलग पहचान देती हैं।

यह पर्व केवल वैवाहिक सुख और आध्यात्मिक अनुशासन  का उत्सव ही नहीं है, बल्कि अटूट आस्था और भक्ति का भी प्रतीक है।   

इस ब्लॉग में हम आपको हरितालिका तीज की पौराणिक कथा, इसके गहन आध्यात्मिक महत्व और पूजा के शुभ मुहूर्त के बारे में विस्तार से बताएँगे।

ब्लॉग की मुख्य बातें:

हरतालिका तीज क्या है और इसे क्यों मनाया जाता है?

हरतालिका तीज हिंदू धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जो भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया (शुक्ल पक्ष का तीसरा दिन) को मनाया जाता है। यह पर्व गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले आता है।

यह पर्व देवी पार्वती की उस दिव्य यात्रा और उनकी अटूट भक्ति का सम्मान करने के लिए मनाया जाता है, जिसके माध्यम से उन्होंने भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया। लिंग पुराण और शिव पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की। इसी दिन उन्होंने नदी की मिट्टी से शिवलिंग का निर्माण किया, कठोर व्रत रखा और पूरी रात भगवान शिव की महिमा का गान एवं उनका ध्यान करती रहीं। उनकी इसी अडिग भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया।

इसे ‘हरतालिका’ तीज क्यों कहा जाता है?

इस पवित्र व्रत को हरतालिका इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह नाम संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है — हरत् (अर्थात् “हर ले जाना”) और आलिका (अर्थात् “सखी” या महिला मित्र)। यह उस घटना की स्मृति में मनाया जाता है जब देवी पार्वती की सखियाँ उन्हें गुप्त रूप से एक घने वन में ले गईं, ताकि भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की उनकी पवित्र इच्छा सुरक्षित रह सके और उनके विवाह का निर्णय उनकी इच्छा के विरुद्ध न हो। 

‘तीज’ का अर्थ पवित्र तृतीया तिथि (तीसरा दिन) है। प्रमुख तीज पर्वों में हरियाली तीज श्रावण मास में मनाई जाती है, जबकि कजरी तीज और हरतालिका तीज भाद्रपद मास में मनाई जाती हैं। इनके साथ वसंत ऋतु में मनाए जाने वाले गणगौर (चैत्र मास) और अक्षय तृतीया (वैशाख मास) जैसे पर्व भी तृतीया तिथि की इसी पवित्र परंपरा से जुड़े हुए हैं।    

हरतालिका तीज व्रत कथा क्या है?

(महादेव देवी पार्वती को कथा सुनाते हुए)

हरतालिका तीज व्रत कथा का विशेष आध्यात्मिक महत्व है, क्योंकि इसे स्वयं भगवान शिव ने देवी पार्वती को सुनाया था। बर्फ से ढकी हिमालय की मनोहर चोटियों से घिरे कैलाश पर्वत पर एक बार देवी पार्वती ने भगवान शिव से पूछा, “हे प्रभु, मैंने अपने पूर्व जन्म में ऐसा कौन-सा पुण्य कर्म, तपस्या या उपासना की थी, जिसके फलस्वरूप मैंने आपको अपने पति के रूप में प्राप्त किया?”

देवी पार्वती के प्रश्न पर भगवान शिव ने प्रेमपूर्वक मुस्कुराते हुए उनका हाथ थामा और उन्हें उनके पूर्व जन्म की कथा स्मरण कराई। उन्होंने बताया कि उस जन्म में देवी पार्वती का जन्म हिमवान, अर्थात् हिमालय के अधिपति राजा, की पुत्री के रूप में हुआ था। बहुत छोटी आयु से ही उनके हृदय में भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करने की प्रबल इच्छा थी। वे न तो धन की कामना करती थीं, न सुख-सुविधाओं की, न राजसी वैभव की और न ही किसी अन्य पुरुष से विवाह करना चाहती थीं। उनके हृदय में केवल भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प था।

भगवान शिव ने उन्हें स्मरण कराया कि इस इच्छा को पूर्ण करने के लिए देवी पार्वती ने कठोर तपस्या की थी। शिव पुराण के पार्वती-खंड में वर्णित है कि वे उस स्थान पर पहुँचीं, जहाँ कभी महादेव ने तपस्या की थी और भगवान कामदेव (प्रेम के देवता) को भस्म किया था। वहाँ महादेव को उपस्थित न पाकर देवी पार्वती अत्यंत व्यथित हुईं और उन्हें पुकारते हुए रो पड़ीं। किंतु शीघ्र ही उन्होंने स्वयं को संभाला और शृंगीतीर्थ नामक स्थान पर पूरी निष्ठा और गंभीरता के साथ अपनी तपस्या आरंभ कर दी। बाद में देवी के सम्मान में इसी स्थान का नाम गौरी-शिखर अर्थात् “गौरी की चोटी” रखा गया। 

उन्होंने तीन हज़ार वर्षों तक महादेव का ध्यान करते हुए कठोर तपस्या की। ग्रीष्म ऋतु में वे चारों ओर प्रज्वलित अग्नियों के बीच तप करती थीं, जिसे परंपरागत रूप से पंचाग्नि तप कहा जाता है, और निरंतर भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र का जप करती रहती थीं। वर्षा ऋतु में वे खुले धरातल पर बैठकर तपस्या करतीं और मूसलाधार वर्षा को सहन करती थीं। शीत ऋतु में वे गहन भक्ति के साथ जल में स्थित रहकर तप करती थीं। हिमपात और रात्रि के समय भी उन्होंने अपने व्रत और तपस्या का त्याग नहीं किया। समय के साथ उन्होंने धीरे-धीरे अन्न का त्याग कर दिया और केवल फलों पर रहने लगीं, फिर सूखे पत्तों का सेवन करने लगीं और अंततः केवल वायु के सहारे जीवन यापन करते हुए अपनी तपस्या जारी रखी।

देवी पार्वती के दुर्बल होते शरीर और कठिन तपस्वी जीवन को देखकर उनके पिता, राजा हिमवान, चिंतित और दुःखी हो गए। वे सोचने लगे कि उनकी कोमल पुत्री इतनी कठोर तपस्या क्यों कर रही हैं। वे चाहते थे कि उनकी पुत्री को सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण और सुरक्षित जीवन मिले। व्यापक रूप से प्रचलित हरतालिका व्रत कथा की परंपरा में देवी पार्वती के लिए भगवान विष्णु को योग्य वर के रूप में प्रस्तावित किया गया और राजा हिमवान ने अपनी पुत्री के सुख और कल्याण की चिंता करते हुए इस प्रस्ताव पर स्नेहपूर्वक विचार किया। 

देवी पार्वती की सखियाँ उन्हें गुप्त रूप से वन में क्यों ले गईं?

जब राजा हिमवान ने अपनी पुत्री के लिए श्रीहरि विष्णु को वर के रूप में चुना, तो देवी पार्वती का हृदय अत्यंत व्यथित हो गया, क्योंकि वे मन ही मन भगवान शिव को अपना पति स्वीकार कर चुकी थीं। जब उन्होंने अपनी सखियों, अर्थात् आलिका (महिला मित्रों), से कहा कि वे किसी अन्य से विवाह नहीं कर सकतीं, तब उनकी सखियाँ उन्हें गुप्त रूप से नदी के किनारे एक गुफा के पास स्थित एक एकांत वन में ले गईं। 

(देवी पार्वती शिवलिंग का निर्माण करतीं हुई)

वहाँ उन्होंने भगवान शिव की उपासना जारी रखी। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को उन्होंने कठोर व्रत रखा और पूर्ण भक्ति के साथ भगवान शिव की पूजा की। देवी पार्वती ने नदी की मिट्टी से शिवलिंग बनाया, उसकी विधिपूर्वक पूजा की, स्तुतियाँ गाईं और बिना एक बूंद जल ग्रहण किए पूरी रात गहन ध्यान में जागरण किया।

देवी पार्वती के निर्मल प्रेम, त्याग और दृढ़ संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके समक्ष प्रकट हुए और उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने का वचन दिया।

बाद में जब राजा हिमवान को देवी पार्वती के वन में होने का पता चला, तो उन्होंने उनसे घर छोड़ने का कारण पूछा। देवी पार्वती ने उन्हें अपने मन की बात और भगवान शिव को पति रूप में पाने के अपने दृढ़ संकल्प के बारे में बताया। उनकी सच्ची भावना को समझकर राजा हिमवान ने उनके निर्णय को स्वीकार कर लिया। समय आने पर देवी पार्वती और भगवान शिव का विवाह संपन्न हुआ।

यह कथा सिखाती है कि सच्ची भक्ति, धैर्य और दृढ़ संकल्प के साथ व्यक्ति अपने जीवन के धर्मपूर्ण लक्ष्य के प्रति अडिग रह सकता है। 

भगवान शिव ने कथा का समापन करते हुए कहा कि जो महिलाएँ सच्ची श्रद्धा, आत्मसंयम और माँ गौरी तथा भगवान शिव के प्रति भक्ति के साथ इस व्रत का पालन करती हैं, उन्हें देवी की कृपा प्राप्त होती है। विवाहित स्त्रियाँ सुखी दांपत्य जीवन और सौभाग्य की कामना से यह व्रत करती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएँ योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति और धर्म के मार्ग पर आधारित जीवन के लिए यह व्रत करती हैं। 

2026 में हरतालिका तीज व्रत की तिथि और पूजा का समय क्या है?

  • हरतालिका तीज 2026 सोमवार, 14 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी (उदय तिथि के आधार पर)।
  • तृतीया तिथि प्रारंभ — 13 सितंबर 2026 को प्रातः 07:08 बजे
    तृतीया तिथि समाप्त — 14 सितंबर 2026 को प्रातः 07:06 बजे
  • प्रातःकालीन हरतालिका पूजा मुहूर्त — प्रातः 06:05 बजे से 07:06 बजे तक
    अवधि — 01 घंटा 01 मिनट

नोट: वर्ष 2026 में प्रदोष काल (सूर्यास्त के आसपास का समय) का हरतालिका पूजा मुहूर्त केवल उन क्षेत्रों और परिवारों के लिए मान्य है, जहाँ उदय तिथि (सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि) के अनुसार 14 सितंबर के बजाय 13 सितंबर 2026, रविवार को व्रत रखा जाता है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि तृतीया तिथि 13 सितंबर को प्रातः 07:08 बजे से शुरू होकर 14 सितंबर को प्रातः 07:06 बजे समाप्त हो रही है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, तृतीया तिथि का प्रदोष काल के साथ संयोग अत्यंत शुभ माना जाता है।  प्रदोष कालीन हरतालिका पूजा मुहूर्त — 13 सितंबर 2026 को शाम 06:15 बजे से रात 08:39 बजे तक
अवधि — 02 घंटे 24 मिनट

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में हरतालिका तीज के अन्य नाम

( महादेव एवं देवी पार्वती का पूजन करती महिलायें )

हरतालिका तीज को भारत के विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों में कई क्षेत्रीय नामों तथा स्थानीय रूपों से जाना जाता है:

  • हरतालिका तृतीया व्रत: महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में प्रचलित नाम, जिसमें तृतीया तिथि और व्रत के धार्मिक महत्व पर विशेष जोर दिया जाता है।
  • केवड़ा तीज (या केवड़ा त्रीज): गुजरात में प्रचलित नाम। इसका संबंध उस सुगंधित केवड़ा पुष्प से है, जिसे पूजा में भगवान शिव और देवी पार्वती को अर्पित किया जाता है।
  • बड़ी तीज: राजस्थान और उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में हरतालिका तीज को छोटी तीज (हरियाली तीज) से अलग पहचान देने के लिए इस नाम का प्रयोग किया जाता है।
  • निशिवासर निर्जला व्रत: उत्तर भारत, विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के कुछ क्षेत्रों में प्रचलित नाम, जो दिन-रात (निशिवासर) निर्जल (निर्जला) व्रत रखने की परंपरा को दर्शाता है।
  • गौरी हब्बा या गौरी विरथम: कर्नाटक में गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले मनाया जाने वाला पर्व। इसकी तिथि हरतालिका तीज के समान होती है। स्थानीय परंपराओं में कुछ भिन्नताएँ हो सकती हैं, लेकिन इसका संबंध माँ गौरी (पार्वती) के मायके आने और उनकी दिव्य भक्ति से जोड़ा जाता है।
  • तीजा या हरतालिका तीजा: मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की स्थानीय बोलियों में प्रचलित नाम।
  • थडिया गौरी अम्मा व्रतम: आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मुख्यतः विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला व्रत। इसे गौरी तड़िया या थडिया नोमु भी कहा जाता है और सौभाग्य — स्वास्थ्य, दीर्घायु तथा समृद्धि  की कामना से किया जाता है।

हरतालिका तीज और देवी पार्वती की कथा हमें भक्ति और ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग दिखाती है। यह कथा सिखाती है कि तपस्या आत्म-परिवर्तन का साधन है। देवी पार्वती की कठोर तपस्या अहंकार और भौतिक आसक्तियों के क्षय का प्रतीक है। यह दर्शाती है कि आध्यात्मिक उपलब्धि या उच्चतर आत्मा (परब्रह्म शिव) के साथ एकत्व वास्तव में साधना, धैर्य और अंतःकरण की शुद्धि के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है।

‘भौतिक आहार का त्याग’ करके देवी पार्वती ने भौतिक जगत पर अपनी निर्भरता को पूर्णतः हटाकर आध्यात्मिक ऊर्जा (प्राण) पर केंद्रित किया। यह उस योगिक आदर्श को दर्शाता है, जिसमें मन दिव्य सत्ता में पूर्णतः लीन होकर शरीर की भौतिक आवश्यकताओं से परे उठता है।

उनका नदी की मिट्टी से शिवलिंग बनाना, न कि किसी बहुमूल्य धातु से, इस सत्य का प्रतीक है कि सच्ची उपासना के लिए न तो धन की आवश्यकता है और न ही भव्य साधनों की केवल भक्ति और शुद्ध संकल्प ही पर्याप्त हैं।  

‘रात्रि जागरण’ की परंपरा में अंधकार अज्ञान का प्रतीक है, जबकि पूरी रात जागरण निरंतर सजगता बनाए रखने का संकेत देता है। इस प्रकार, यह अचेतनता और तमस की अवस्था पर विजय पाने का प्रतीक है।

अंततः, हरतालिका तीज प्रकृति (गतिशील स्त्री-शक्ति) के पुरुष (दिव्य चेतना) के साथ पुनर्मिलन का उत्सव है। यह स्मरण कराता है कि धैर्य, श्रद्धा और समर्पण के माध्यम से साधक जीवात्मा और परमात्मा के बीच की दूरी को समाप्त कर सकता है।

Frequently Asked Questions

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क्या अविवाहित लड़कियाँ हरतालिका तीज का व्रत रख सकती हैं?

हाँ। विवाहित महिलाएँ और अविवाहित लड़कियाँ, दोनों ही हरतालिका तीज का व्रत रख सकती हैं। पूजा का संकल्प व्यक्ति की व्यक्तिगत और पारिवारिक परंपरा के अनुसार अलग हो सकता है। विवाहित महिलाएँ सामान्यतः अपने पति और परिवार के सुख-समृद्धि एवं कल्याण की कामना से यह व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित लड़कियाँ देवी पार्वती और महादेव की पूजा योग्य एवं अनुकूल जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए करती हैं।

देवी पार्वती को “उमा” नाम कैसे मिला?

शिव पुराण के पार्वती-खंड के अनुसार, देवी पार्वती ने महादेव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या करने का संकल्प लिया। जब उन्होंने अपने पिता राजा हिमवान को यह बात बताई, तो उन्होंने सहर्ष इसकी अनुमति दे दी, क्योंकि उन्हें लगा कि इससे परिवार का सौभाग्य बढ़ेगा। लेकिन देवी पार्वती की माता मेना इसके लिए तैयार नहीं थीं। वे चाहती थीं कि उनकी कोमल पुत्री वन में जाकर कठोर तपस्या करने के बजाय घर पर ही रहे।

हालाँकि, पार्वती के दृढ़ संकल्प और शांत निश्चय ने अंततः उनकी माता का हृदय बदल दिया। इसी प्रसंग से देवी पार्वती को “उमा” नाम प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि उनकी माता ने व्याकुल होकर उन्हें रोकते हुए कहा था— “उ मा”, अर्थात् “अरे!, ऐसा मत करो” या “मत जाओ।” यही प्रेमपूर्ण पुकार आगे चलकर देवी पार्वती के प्रसिद्ध नाम उमा के रूप में प्रसिद्ध हुई।

हरतालिका तीज पर देवी पार्वती को 16 पत्तियाँ (सोलह पत्री) क्यों अर्पित की जाती हैं?

हरतालिका तीज की पूजा में भगवान शिव और देवी पार्वती को अर्पित की जाने वाली सोलह पत्री में 16 प्रकार के पवित्र पत्ते शामिल होते हैं। इनमें बिल्व पत्र (बेल के पत्ते), जती पत्र (चमेली के पत्ते), सेवंतिका (गुलदाउदी के पत्ते), बाँस के पत्ते, देवदार पत्र, चंपा, कनेर के पत्ते, अगस्त्य, भृंगराज, धतूरा, आम के पत्ते, नीम, अशोक के पत्ते, पान के पत्ते, केले के पत्ते और शमी पत्र शामिल हैं।

इनकी संख्या 16 होना पूर्णता का प्रतीक माना जाता है और इसका संबंध षोडशोपचार पूजा से भी जोड़ा जाता है, जिसमें देवता की पूजा 16 प्रकार के उपचारों द्वारा की जाती है। गौरी-शंकर पूजा के दौरान इन पत्तों को श्रद्धापूर्वक अर्पित किया जाता है। यह पूजा प्रायः मिट्टी या रेत से निर्मित शिवलिंग तथा देवी पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमाओं के साथ की जाती है।

प्रत्येक पत्ते या वनस्पति का अर्पण एक विशेष मंगलकामना से जोड़ा जाता है, जैसे दांपत्य सुख, समृद्धि, संतान, पारिवारिक सौहार्द, साहस, स्वास्थ्य और शांति। इस प्रकार सोलह पत्री केवल पत्तों का अर्पण नहीं, बल्कि प्रकृति, भक्ति और देवी-देवताओं के प्रति कृतज्ञता का भी प्रतीक है। 

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