सनातन ऋषियों का स्मरण: ऋषि पंचमी का पावन महत्त्व
ऊर्ध्वरेताः तपस्योग्रो नियताशी न संशयी।
शापानुग्रहयोः शक्तः सत्यसन्धो भवेदृषिः॥
— स्कन्द पुराण, माहेश्वर खण्ड, कौमारीका खण्ड, 5.118
“जो सदाचारी व्यक्ति कठोर तपस्या करता है, अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है, सत्य बोलता है तथा शाप और वरदान देने में समर्थ होता है, उसे ऋषि कहा जाता है।”
जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 16, श्लोक 1–3) में बताया गया है, ऋषि वह है जो अभयम् अर्थात् निर्भयता को अपनाता है, दानम् अर्थात् दान और यज्ञ करता है तथा क्रोध जैसे नकारात्मक गुणों पर विजय प्राप्त करता है। वह अलोलुप्त्वम् अर्थात् लोभ से मुक्त रहता है और शुद्धि, सत्यम् अर्थात् सत्यनिष्ठा तथा अहिंसा जैसे दिव्य गुणों को अपने जीवन में विकसित करता है।
इस प्रकार, ऋषि का पद जन्म से प्राप्त नहीं होता, बल्कि तप और ऋत अर्थात् परम सत्य की ओर आध्यात्मिक साधना एवं निरंतर प्रयास के द्वारा अर्जित किया जाता है। व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि चाहे जो भी हो, उसकी साधना, आचरण और आध्यात्मिक उन्नति ही उसे ऋषि के योग्य बनाती है।
सनातन धर्म में ऋषियों को अत्यंत सम्मान प्राप्त है विशेष रूप से सप्तर्षियों को, जिन्हें मानव सभ्यता, वंश-परंपरा (गोत्र) का मुख्य आधार कहा जाता है। साथ ही ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्यों और ज्ञान के प्रमुख स्रोत हैं। वेदों के पवित्र मंत्रों के साक्षात्कार से लेकर बदलते युगों में मानवता का मार्गदर्शन करने तक, हमारी आध्यात्मिक परंपरा को समृद्ध करने में उनका योगदान अतुलनीय है।
भाद्रपद मास में मनाई जाने वाली ऋषि पंचमी इन प्राचीन आध्यात्मिक आचार्यों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने, आत्मशुद्धि करने और उनका स्मरण करने के लिए समर्पित एक विशेष दिन है। हमारे प्राचीन ऋषि और उनकी महान परंपरा के बारे में अधिक जानने के लिए ब्लॉग पढ़ें।
मुख्य बातें:
- ऋषि पंचमी क्या है?
- सप्तर्षि कौन हैं?
- ऋषियों को वेदों के प्राकट्य का श्रेय क्यों दिया जाता है?
- सनातन धर्म में सप्तर्षियों को अत्यंत श्रद्धेय क्यों माना जाता है?
- ऋषि पंचमी की तिथि और शुभ मुहूर्त
- घर पर ऋषि पंचमी का व्रत कैसे रखें?
- ऋषि पंचमी के दौरान किन आहार-संबंधी नियमों का पालन किया जाता है?
ऋषि पंचमी क्या है?
ऋषि पंचमी (ऋषि पंचम या सामा पंचम) भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण हिंदू धार्मिक पर्व है। यह हरितालिका तीज (तृतीया तिथि) और गणेश चतुर्थी (चतुर्थी तिथि) के बाद आने वाली पंचमी तिथि है। यह दिन सात महान ऋषियों अर्थात् सप्तर्षियों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने और आंतरिक शुद्धि के लिए समर्पित है।
ऋषि पंचमी में ऋषि-परंपरा के प्रति श्रद्धा के साथ-साथ आत्मशुद्धि का अवसर भी है। यह स्वीकार करते हुए कि मनुष्य के आचरण से अनजाने में भी त्रुटियाँ हो सकती हैं, यह दिन उन भूलों के लिए क्षमा प्रार्थना करने और धर्म के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः दृढ़ करने का अवसर प्रदान करता है।
सप्तर्षि कौन हैं?

( महादेव के साथ सप्तर्षि )
सप्तर्षि सात महान ऋषि हैं, जिन्हें वैदिक ज्ञान, आध्यात्मिक ज्ञान और ऋषि-परंपरा का प्रतिनिधि माना जाता है। सनातन ब्रह्मांड-विज्ञान के अनुसार, समय चक्रीय है और इसे मन्वंतर नामक अलग-अलग अवधियों में बाँटा गया है।प्रत्येक मन्वंतर में सात ऋषियों के नाम अलग-अलग हो सकते हैं, जिनका उल्लेख विभिन्न शास्त्रों में मिलता है।
वर्तमान सातवें (वैवस्वत) मन्वंतर के सप्तर्षियों की सबसे प्रचलित सूची विष्णु पुराण में मिलती है। इसमें ऋषि पराशर वर्तमान मन्वंतर के सात ऋषियों का उल्लेख करते हुए कहते हैं—
वशिष्ठकाश्यपोऽत्रिर्जमदग्निस्सगौतमः।
विश्वामित्रभरद्वाजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।।॥
— विष्णु पुराण 3.1.32
“वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज—ये सातों सप्तर्षि हैं।”
ऐसा माना जाता है कि ये सात ऋषि आध्यात्मिक प्रकाश की सात किरणों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो सृष्टि को धारण करती है और ऋत अर्थात् ब्रह्मांडीय व्यवस्था को बनाए रखने में सहायक होती हैं।
हिंदू ज्योतिष एवं खगोल परंपरा में इन सात ऋषियों की पहचान सप्तऋषि मंडल के तारों के रूप में की जाती है, जिन्हें आधुनिक खगोल विज्ञान में सप्तर्षि तारामंडल के नाम से जाना जाता है।
परंपरागत रूप से इसका नाम भगवान् ब्रह्मा के मानस-पुत्रों के एक प्राचीन समूह — मरीचि, वशिष्ठ, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु — के नाम पर रखा गया है। इस विशिष्ट वंश-परंपरा का उल्लेख ज्योतिष के ग्रंथों में व्यापक रूप से मिलता है, जैसे वराहमिहिर की बृहत्संहिता (अध्याय 13) में।।
बृहदारण्यक उपनिषद् (2.2.4) में इनके महत्व को समझाने के लिए इन्हें रूपक रूप में शरीर की सात ज्ञानेंद्रियों से जोड़ा गया है। सप्तर्षि महादेव, के नेतृत्व में ब्रह्मांड को संतुलित बनाए रखने में सहायक हैं और वे अमर माने जाते हैं। वे जन्म और मृत्यु के चक्र से परे स्थित हैं।
सनातन धर्म में ऋषियों को अत्यंत सम्मान प्राप्त है विशेष रूप से सप्तर्षियों को, जिन्हें मानव सभ्यता, वंश-परंपरा (गोत्र) का मुख्य आधार कहा जाता है। साथ ही वे ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्यों और ज्ञान के प्रमुख स्रोत हैं। वेदों के पवित्र मंत्रों के साक्षात्कार से लेकर बदलते युगों में मानवता का मार्गदर्शन करने तक, हमारी आध्यात्मिक परंपरा को समृद्ध करने में उनका योगदान अतुलनीय है।
ऋग्वेद में 27 ऋषिकाओं का उल्लेख मिलता है, जिनमें देवी लोपामुद्रा, अदिति, इन्द्राणी, घोषा, वागाम्भृणी और अपाला प्रमुख हैं।
ऋषियों को वेदों के प्राकट्य का श्रेय क्यों दिया जाता है?
वेद अपौरुषेय हैं, अर्थात् उनकी रचना किसी मनुष्य ने नहीं की। ऋषियों ने गहन ध्यान और अंतर्दृष्टि के माध्यम से आकाश में विद्यमान उस परम सत्य का सूक्ष्म तरंग स्वरूप में साक्षात्कार किया और उन्हें मंत्रों के उच्चारण के रूप में प्रकट किया।
इसलिए ऋषियों को वेदों के मंत्रों का रचयिता या लेखक नहीं माना जाता। उन्होंने इस दिव्य ज्ञान का साक्षात्कार कर उसे वेदों के मंत्रों के रूप में मानवता के लिए प्रकट किया, ताकि यह ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहे और मानवता का मार्गदर्शन करता रहे।
इसी कारण ऋषियों को ‘मंत्रद्रष्टा’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है—“मंत्र का साक्षात्कार करने वाला।”
ऋग्वेद में प्रत्येक मंडल (पुस्तक) का संबंध किसी विशेष ऋषि या ऋषि-वंश परंपरा से माना जाता है। उदाहरण के लिए, द्वितीय मंडल का संबंध ऋषि गृत्समद से, तृतीय मंडल का संबंध विश्वामित्र से और इसी प्रकार अन्य मंडलों का संबंध विभिन्न ऋषियों या ऋषि-परंपराओं से है।
ऋषि आध्यात्मिक उन्नति की विभिन्न अवस्थाओं से आगे बढ़ते हैं—ऋषि से महर्षि और अंततः ब्रह्मर्षि तक। ब्रह्मर्षि सर्वोच्च अवस्था मानी जाती है, जिसे वे प्राप्त करते हैं जिन्होंने परम ब्रह्म का पूर्ण साक्षात्कार कर लिया हो।
इसके अतिरिक्त देवर्षि नामक एक विशिष्ट और दुर्लभ श्रेणी भी है। देवर्षि नारद जी इसके प्रमुख उदाहरण हैं। देवर्षियों को दिव्य ऋषि माना जाता है और कहा जाता है कि वे तीनों लोकों में स्वतंत्र रूप से विचरण कर सकते हैं।
सनातन धर्म में सप्तर्षियों को अत्यंत श्रद्धेय क्यों माना जाता है?

(मानवता के लिए ब्रह्मांडीय ज्ञान को संहिताबद्ध करते ऋषि)
सनातन धर्म में सप्तर्षियों को मानव सभ्यता, ज्ञान और वंश-परंपरा के मूल आधार-निर्माताओं के रूप में माना जाता है। वे केवल ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं हैं, बल्कि ऐसे दिव्य स्वरूप माने जाते हैं जो मानवता को परम सत्य से जोड़ने का कार्य करते हैं।
- वे भगवान ब्रह्मा के मानसपुत्र हैं।ऋषि भारद्वाज ऋषिपुत्र (ऋषियों के पुत्र) थे, लेकिन अपने स्वयं के पुरुषार्थ और योग्यता के बल पर ऋषि बने।दूसरी ओर, भृगु, अत्रि, अंगिरस, पुलह, क्रतु, मनु, दक्ष, वसिष्ठ और पुलस्त्य भगवान ब्रह्मा के मानसपुत्र अर्थात् उनके मन से उत्पन्न पुत्र माने जाते हैं। मानसपुत्रों को जन्म से ही परब्रह्म के ज्ञान से संपन्न माना गया है।
- मंत्रद्रष्टा: ऋषियों ने गहन समाधि में मंत्रों का साक्षात्कार किया और उन्हें सुव्यवस्थित रूप में प्रकट किया। इसलिए उन्हें मंत्रों का प्रमुख गुरु तथा उस गुरु-शिष्य परंपरा की प्रथम कड़ी माना जाता है, जिसके माध्यम से वेदों का ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित रहा है।
- मानव वंश-परंपराओं के पूर्वज (गोत्र): सनातन धर्म में प्रत्येक परिवार अपनी आध्यात्मिक या जैविक उत्पत्ति को किसी न किसी ऋषि से जोड़ता है। व्यक्ति का गोत्र यह बताता है कि वह किस ऋषि की वंश-परंपरा से संबंधित है। यह परंपरा पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों, पारिवारिक परंपराओं और विवाह संबंधी नियमों को भी प्रभावित करती है। इस प्रकार, प्रत्येक पीढ़ी में हमारे प्राचीनतम ऋषि-पूर्वजों की स्मृति जीवित रहती है।
- देवताओं, राजाओं और मानवता के गुरु: पुराणों और इतिहास ग्रंथों में प्रत्येक सप्तर्षि को देवताओं और राजाओं के गुरु के रूप में वर्णित किया गया है। ऋषि वसिष्ठ इक्ष्वाकु वंश के राजगुरु थे। ऋषि विश्वामित्र राजाओं के संरक्षक थे और उन्होंने युवा राजकुमार श्रीराम को शिक्षा-दीक्षा प्रदान करने वाले प्रथम गुरुओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऋषि अत्रि, गौतम, भारद्वाज, जमदग्नि और कश्यप प्रमुख आचार्य, धर्म-विधानों के प्रतिनिधि तथा अनेक महत्वपूर्ण वंश-परंपराओं के प्रवर्तक माने जाते हैं।
- विज्ञान और कला के संरक्षक: वेदों के अतिरिक्त, सप्तर्षियों ने प्राचीन वैज्ञानिक ज्ञान के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। ऋषि भारद्वाज को आयुर्वेद के माध्यम से चिकित्सा और उपचार-विज्ञान को मानव समाज तक पहुँचाने वाले महान ऋषि के रूप में श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। खगोल विज्ञान और गणित के क्षेत्र में वसिष्ठ और गौतम जैसे ऋषियों ने प्रारंभिक खगोलीय निरीक्षणों और पंचांग प्रणालियों के विकास में योगदान दिया। ऋषि विश्वामित्र और जमदग्नि ने धनुर्वेद (सैन्य विज्ञान) तथा नैतिक विधानों से संबंधित ग्रंथों की रचना की।
ऋषियों को दिव्यता का सजीव स्वरूप माना जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण स्वयं ऋषि भृगु (10.25), देवर्षि नारद (10.26) और महर्षि वेदव्यास (10.37) को अपनी विभूतियों के रूप में वर्णित करते हैं।
ऋषि पंचमी की तिथि और शुभ मुहूर्त
ऋषि पंचमी मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी।
पंचमी तिथि प्रारंभ — 14 सितंबर 2026 को रात 10:14 बजे
पंचमी तिथि समाप्त — 15 सितंबर 2026 को रात 11:29 बजे
ऋषि पंचमी पूजा का शुभ मुहूर्त — सुबह 11:48 बजे से दोपहर 02:18 बजे तक
अवधि — 2 घंटे 29 मिनट
ऋषि पंचमी का व्रत घर पर कैसे रखें?
सप्तर्षियों को समर्पित यह पर्व मुख्य रूप से शरीर, मन और आत्मा को संचित अथवा अनजाने में हुए पापों से शुद्ध करने पर केंद्रित है। इस दिन शारीरिक शुद्धि, सप्तर्षियों की पूजा (पूजा विधि) और आहार संबंधी कठोर अनुशासन (व्रत) का पालन किया जाता है। इस व्रत के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण बातें ध्यान रखने योग्य हैं:
- परंपरागत रूप से दाँत साफ करने और मुखशुद्धि के लिए अपामार्ग (चिरचिटा) की डंडी का उपयोग किया जाता है। अपामार्ग को ‘वनस्पतियों का स्वामी’ माना गया है और इसमें शक्तिशाली रक्षोघ्न अर्थात् नकारात्मक ऊर्जा और अशुभ प्रभावों का नाश करने वाले तथा पापरोगनाशक अर्थात् पाप और रोगों का शमन करने वाले गुण माने जाते हैं। मुखशुद्धि के लिए इसका प्रयोग प्रार्थना से पहले वाणी और वचन से जुड़ी अशुद्धियों को दूर करने का प्रतीकात्मक साधन माना जाता है। इसकी डंडी या पत्तियों को गंगाजल, तिल, दही, दूध तथा अन्य औषधीय वनस्पतियों के साथ स्नान के जल में भी मिलाया जा सकता है।
- पूजा के लिए सप्तर्षियों और अरुंधती (ऋषि वसिष्ठ की पत्नी) को एक चौकी पर स्थापित किया जाता है। इसके लिए सात सुपारी या कच्चे चावल के छोटे-छोटे ढेर बनाए जा सकते हैं।
- इसी क्रम के अनुसार षोडशोपचार पूजा की जाती है। हालांकि, भक्त अपने-अपने क्षेत्रों में प्रचलित पूजा-विधि का पालन भी कर सकते हैं और अंत में आरती की जाती है।
ऋषि पंचमी के दौरान किन आहार संबंधी नियमों का पालन किया जाता है?
ऋषि पंचमी के दिन आहार संबंधी नियम विशेष होते हैं। इनमें जीव-जंतुओं के प्रति पूर्ण अहिंसा पर विशेष बल दिया जाता है और प्राचीन ऋषियों की सरल तथा आत्मनिर्भर जीवनशैली का अनुसरण किया जाता है।
इस दिन ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन वर्जित माना जाता है, जिन्हें हल चलाकर तैयार किए गए खेतों में या पालतू पशुओं की सहायता से उगाया जाता है। यह व्रत बैलों के परिश्रम के प्रति सम्मान व्यक्त करता है, इसलिए इस दिन मुख्य रूप से प्राकृतिक रूप से उगने वाले या हाथ से उगाए गए खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाता है। परंपरागत रूप से पूरे दिन केवल एक बार हल्का भोजन किया जाता है, जो दोपहर में सप्तर्षि पूजा पूर्ण करने के बाद ग्रहण किया जाता है।
बैल या हल की सहायता से उगाए गए सभी प्रकार के अनाज और खेती की गई दालों के साथ-साथ प्याज, लहसुन, परिष्कृत बीजों के तेल, सामान्य आयोडीनयुक्त नमक, सरसों के बीज और अधिक मात्रा में उपयोग किए जाने वाले मसालों का भी सेवन नहीं किया जाता।
इस दिन मुख्य रूप से सामा के चावल खाए जाते हैं, जिन्हें बर्नयार्ड मिलेट, मोरैयो या भगर के नाम से भी जाना जाता है। यह एक जंगली बीज है, जो बिना जुताई के प्राकृतिक रूप से उगता है। इसे ऋषिची भाजी के साथ खाया जाता है, जो महाराष्ट्र और गोवा में बनाई जाने वाली मौसमी और पोषक तत्वों से भरपूर सब्ज़ी है। यह व्यंजन हाथ से एकत्र की गई, बिना खेती की गई सामग्रियों जैसे विभिन्न प्रकार के कंद, जंगली जड़ें, हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ और मूंगफली से बनाया जाता है तथा इसे गाय के घी में पकाया जाता है।
सप्तर्षियों की विरासत का सम्मान करते हुए, ऋषि पंचमी आज भी आत्मशुद्धि, कृतज्ञता और नैतिक अनुशासन की एक शाश्वत स्मृति बनी हुई है। महादेव के प्रथम शिष्यों के रूप में, सप्तर्षियों ने उनसे आदिगुरु के रूप में योग के गहन विज्ञानों की प्रत्यक्ष शिक्षा प्राप्त की। साथ ही, उन्होंने देवी पार्वती के साथ उनके पवित्र विवाह का मार्ग प्रशस्त करके ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सप्तर्षियों की पवित्रता और तपस्या का प्रभाव इतना गहरा था कि वह स्वयं युगों से भी अधिक समय तक बना रहा। इसलिए, इस पवित्र दिन का सार हमारे मन को शुद्ध करने, अहंकार का त्याग करने और हमारे प्राचीन ऋषियों के गहन ज्ञान एवं सद्गुणों को अपनाने में निहित है।
We are proud Sanatanis, and spreading Sanatan values and teachings, our core mission. Our aim is to bring the rich knowledge and beauty of Sanatan Dharm to every household. We are committed to presenting Vedic scriptural knowledge and practices in a simple, accessible, and engaging manner so that people can benefit and internalize them in their lives.
Presented By Team Sadhana
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