श्रावण (सावन) मास : भगवान शिव की उपासना का सर्वोत्तम माह

श्रावण (सावन) मास : भगवान शिव की उपासना का सर्वोत्तम माह

ज्येष्ठ माह की भीषण गर्मी के बाद जब आषाढ़ की पहली वर्षा धरती माँ को तृप्त करती है, तब प्रकृति मानो एक गहरी साँस लेकर नवजीवन का स्वागत करती है। वर्षा की शीतल बूँदें अपने स्पर्श से वातावरण में ठंडक घोलती हैं और मिट्टी की सौंधी महक मन को आनंदित कर देती है। यह वह समय होता है जब प्रकृति अपने वार्षिक चक्र के पावन मास सावन (श्रावण) के आगमन की घोषणा करती है। 

हाँ, श्रावण मास या सावन, वही सावन, जिसकी महिमा ऋषियों ने ग्रंथों में गाई, जिसके सौंदर्य ने कवियों को अमर कृतियाँ रचने की प्रेरणा दी, और जिसकी प्रतीक्षा आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं के हृदय में वर्षा की पहली बूँद के साथ जाग उठती है। जैसे ही मेघ आकाश में उमड़ने लगते हैं, जन-मानस के मन में एक प्रश्न सहज ही उठने लगता है - "सावन कब से लग रहा है?"

 समस्त प्रकृति मानो हरियाली की चुनर धारण कर लेती है। वृक्ष नवयौवन से लहलहा उठते हैं, नदियाँ उल्लास से भर जाती हैं, मोर नृत्य करने लगते हैं और वातावरण में एक अद्भुत चेतना का संचार होने लगता है। परंतु क्या श्रावण केवल एक भौगोलिक या ऋतु परिवर्तन है, जो समस्त चराचर जगत में नई ऊर्जा भर देता है? अथवा इसके पीछे कोई गहन आध्यात्मिक रहस्य भी निहित है?

आइए जानें कि सनातन धर्म में सावन का महीना इतना पवित्र क्यों माना गया है, भगवान शिव से इसका क्या संबंध है, और सावन सोमवार व्रत का आध्यात्मिक तथा धार्मिक महत्व क्या है।

प्रमुख बातें  

श्रावण (सावन) मास कब से आरम्भ हो रहा है ? 

हिन्दू पंचांग में चन्द्र मास की गणना दो प्रमुख प्रणालियों पूर्णिमान्त और अमान्त के आधार पर की जाती है। पूर्णिमान्त पद्धति में मास का समापन पूर्णिमा पर माना जाता है, जबकि अमान्त पद्धति में अमावस्या के साथ एक मास समाप्त होकर नया मास आरम्भ होता है। इसी कारण विभिन्न क्षेत्रों में श्रावण मास की तिथियों में अंतर देखने को मिलता है। गुजरात, महाराष्ट्र तथा दक्षिण और पूर्व भारत के अधिकांश प्रदेश अमान्त परंपरा का अनुसरण करते हैं, जबकि उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में पूर्णिमान्त पद्धति प्रचलित है।

 पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार

  •  सावन प्रारंभ तिथि - 30 जुलाई , 2026 
  •  सावन समापन तिथि - 28 अगस्त , 2026 

अमांत पंचांग के अनुसार 

  • सावन प्रारंभ तिथि - 13 अगस्त, 2026 
  • सावन समापन तिथि - 11 सितंबर , 2026 

शास्त्रों में श्रावण (सावन) माह की महिमा 

स्कन्द पुराण से लेकर वायु पुराण तक  प्रत्येक प्रमुख ग्रंथों में श्रावण को सर्वश्रेष्ठ मास घोषित किया है। इन ग्रंथों में न केवल व्रत और पूजा की विधि बताई गई है, बल्कि यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस मास में अर्पित की गई जल की एक बूँद भी भगवान शिव को अत्यंत  प्रसन्न करती है। 

आइए देखें हमारे शास्त्र इस पावन मास के बारे में क्या कहते हैं।

  1. स्कन्द पुराण (काशीखण्ड) - श्रावण मास में काशी में निवास करके भगवान शिव की पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। सावन के सोमवार का व्रत और जलाभिषेक का सर्वाधिक विस्तृत वर्णन इसी ग्रंथ में मिलता है।
  2. शिवपुराण - विद्येश्वरसंहिता में बारह महीनों में श्रावण को भगवान शिव का सर्वप्रिय मास कहा गया है। बेलपत्र, जल और दुग्ध अभिषेक का फल इसी संहिता में वर्णित है।
  3. लिंग पुराण - श्रावण में प्रतिदिन शिवलिंग पर जलधारा चढ़ाने से सौ यज्ञों के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है।
  4. श्रीमद्भागवतम् (द्वादश स्कन्ध) - श्रावण मास को व्रतों का राजा कहा गया है। इस मास में की गई उपासना का फल अन्य किसी मास में संभव नहीं।
  5. वायुपुराण - श्रावण मास में नदी स्नान, दान और शिव पूजन को मोक्षदायक बताया गया है।

भगवान शिव को क्यों अत्यंत प्रिय है श्रावण मास ? 

सनातन धर्म के बारह महीनों में श्रावण मास का स्थान विशेष माना गया है। यह केवल वर्षा ऋतु का मास नहीं, बल्कि भगवान शिव की असीम कृपा का पावन काल है। यह मास भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। श्रावण में की गई प्रत्येक साधना, पूजा, व्रत और जलाभिषेक का फल सहस्रगुना हो जाता है। कई कथाएँ है जो सावन माह को अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती हैं ।

 आइए विस्तार से इन कथाओं के बारे में जानते हैं। 

समुद्र मंथन एवं विष पान 

( समुद्र मंथन के समय भगवान शिव हलाहल विष का पान करते हुए) 

सबसे रोचक और महत्वपूर्ण कथा आती है समुद्र मंथन की, जब देवताओं और दानवों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया लेकिन इस महामंथन से सबसे पहले जो निकला वह अमृत नहीं था। वह था 'हलाहल', एक ऐसा भयंकर विष जिसने उत्पन्न होते ही समस्त सृष्टि को असंतुलित कर दिया।

भगवान विष्णु के कहने पर देवताओं एवं दानवों ने देवाधिदेव महादेव से इस विपत्ति से बचने के लिए प्रार्थना की, भगवान आशुतोष ने विषपान करने का निर्णय लिया, हलाहल ग्रहण करते समय माँ पार्वती ने हलाहल को उनके कंठ में ही रोक दिया , विष के कारण उनका कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए।

हलाहल पान से उत्पन्न ऊष्मा को कम करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव का जलाभिषेक करना प्रारंभ किया, इससे भगवान आशुतोष को अत्यंत शांति मिली, कहते हैं वह मास सावन ही था। इसी कारण सावन में भगवान शंकर का जलाभिषेक अत्यंत फलदायी माना जाता है। लिंग पुराण में भी कहा गया है कि जो श्रावण मास में शिवलिंग पर जल अर्पित करता है, वह भगवान नीलकण्ठ की उस त्याग-भावना में सहभागी होता है। 

मार्कण्डेय ऋषि - मृत्युञ्जय मंत्र से मिली अमरता 

शिव पुराण में कथा आती है कि मृकण्डु ऋषि और उनकी पत्नी मरुद्वती को कोई संतान न थी। उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा। ऋषि मृकुण्डु और उनकी पत्नी ने पुत्र प्राप्ति का वर माँगा । 

भगवान शिव ने कहा, ‘’मैं आपको दो विकल्प देता हूँ, एक दीर्घायु पुत्र किंतु अल्पबुद्धि वाला, या एक अल्पायु पुत्र जिसकी उम्र मात्र 16 वर्ष होगी, पर वह महाज्ञानी और तपस्वी होगा। ऋषि मृकण्डु ने अल्पायु किंतु महाज्ञानी पुत्र का वर माँगा। फलस्वरूप ऋषि मार्कण्डेय का जन्म हुआ। ऋषि मृकण्डु ने अपने पुत्र को भगवान शिव की आराधना के लिए मार्गदर्शन प्रदान किया । इस तरह बालक मार्कण्डेय ने अपनी आराधना आरम्भ की ,जन्म के सोलहवें वर्ष, वरदान का प्रभाव समाप्त होने पर, यमराज बालक मार्कण्डेय का  प्राण हरने के लिए आए। 

 जब यमराज ने मृत्युपाश फेंका तो उस समय बालक मार्कण्डेय शिवलिंग के समक्ष बैठकर महामृत्युंजय मंत्र का जप कर रहे थे। इस प्रकार पाश बालक मार्कण्डेय के साथ शिवलिंग पर भी जा पड़ा। उसी क्षण भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने यमराज को अपना पाश वापस लेने का आदेश दिया। साथ ही, बालक मार्कण्डेय को चिरंजीवी होने का अभयदान प्रदान किया। 

माँ पार्वती की तपस्या एवं सावन में व्रत की परंपरा  

(भगवान शिव को पति रूप में पाने हेतु माता पार्वती की कठिन तपस्या।

पूर्वजन्म में माता पार्वती, दक्ष-पुत्री सती थीं और भगवान शिव की पत्नी थीं। प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान शिव का अपमान होने पर देवी सती ने यज्ञ-कुण्ड में अपने प्राण त्याग दिए। अगले जन्म में वे पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती बनीं। बाल्यकाल से ही उनकी आकांक्षा थी कि वे भगवान शिव को पति रूप में पाएं। 

देवर्षि नारद ने देवी पार्वती को भगवान शिव के परम प्रिय पंचाक्षरी मंत्र "ॐ नमः शिवाय" का उपदेश दिया। इस मंत्र द्वारा ही माँ  पार्वती ने हिमालय पर वर्षों तक कठोर तप किया। प्रारंभ में उन्होंने केवल फल-फूल ग्रहण किए, फिर केवल जल पर जीवन व्यतीत किया और अंत में पत्तों का सेवन भी त्याग दिया। पत्तों का सेवन छोड़ देने के कारण ही उन्हें 'अपर्णा' नाम प्राप्त हुआ, अर्थात् वह जो पत्तों का भी सेवन नहीं करती।

मान्यता है कि देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए श्रावण मास में ही कठोर तपस्या की थी। उनकी अटल निष्ठा, तप और साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अंततः उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। माँ पार्वती की तपस्या से प्रेरणा प्राप्त कर आज भी भारत देश में महिलाएँ सावन में व्रत रखती हैं, विशेषतः सावन के सोमवार। 

श्रावण (सावन) सोमवार व्रत एवं इसकी महिमा 

श्रावण मास में आने वाले सोमवार विशेष रूप से भगवान शिव को समर्पित माने जाते हैं। शास्त्रों और लोक परंपराओं के अनुसार इस दिन व्रत, उपवास, रुद्राभिषेकम्, जलाभिषेक तथा पंचाक्षरी मंत्र ‘’ॐ नमः शिवाय’’ का जप करने से शिवकृपा प्राप्त होती है। अविवाहित कन्याएँ योग्य वर की प्राप्ति तथा विवाहित स्त्रियाँ पारिवारिक सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत रखती हैं। श्रावण (सावन) सोमवार व्रत केवल कामनाओं की पूर्ति का साधन नहीं, बल्कि आत्मसंयम, श्रद्धा और भगवान शिव के प्रति समर्पण का पर्व भी है। इसलिए इसे शिवभक्तों के लिए अत्यंत पुण्यदायक और फलदायी माना गया है। 

श्रावण में आने वाले सोमवार

साल 2026 में श्रावण (सावन) मास में कुल चार सोमवार आयेंगे  

  • 3 अगस्त, 2026 -  प्रथम सावन सोमवार (कृष्ण पंचमी)
  • 10 अगस्त, 2026 - द्वितीय सावन सोमवार (कृष्ण द्वादशी)
  • 17 अगस्त, 2026  - तृतीय  सावन सोमवार एवं नाग पंचमी 
  • 24 अगस्त, 2026 - चतुर्थ  सावन सोमवार (शुक्ल द्वादशी) 

 श्रावण मास को भक्त किस प्रकार मनाते हैं?

 ( उज्जैन में बाबा महाकाल की शोभायात्रा का दृश्य ) 

उज्जैन में श्रावण मास का उत्सव सावन सवारी या महाकाल सवारी के रूप में मनाया जाता है। इस भव्य शोभायात्रा में भगवान शिव के महाकालेश्वर स्वरूप की प्रतिमा को रजत (चाँदी) से सुसज्जित रथ पर विराजमान कर श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को उज्जैन नगर में भ्रमण कराया जाता है। अंतिम सवारी को शाही सवारी कहा जाता है। मान्यता है कि इस सवारी के माध्यम से स्वयं भगवान महाकाल उज्जैन की प्रजा और अपने भक्तों को दर्शन देकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

जम्मू-कश्मीर स्थित अमरनाथ गुफा हिन्दू धर्म के सर्वाधिक पवित्र तीर्थों में से एक है। यहाँ प्राकृतिक रूप से निर्मित हिम शिवलिंग के दर्शन केवल पवित्र श्रावण मास (जुलाई–अगस्त) के दौरान ही संभव होते हैं। भक्त इस हिमलिंग को भगवान शिव की सनातन उपस्थिति तथा सृष्टि और संहार के शाश्वत चक्र का जीवंत प्रतीक मानते हैं। ऐसी मान्यता है कि इसी पवित्र स्थान पर भगवान शिव ने माता पार्वती को मोक्ष का दिव्य रहस्य प्रदान किया था।

वहीं, गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर, जिसे बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है, श्रावण मास में एक महान आध्यात्मिक केंद्र बन जाता है। यहाँ लाखों श्रद्धालु रुद्राभिषेक करते हैं, सोमवार व्रत का पालन करते हैं तथा वैवाहिक सुख, समृद्धि और मोक्ष की कामना से भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

शिव पुराण और स्कन्द पुराण में वर्णन मिलता है कि सोमनाथ वह पवित्र स्थल है जहाँ भगवान शिव अनंत ज्योति-स्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे। इसी स्थान पर चंद्रदेव ने भगवान शिव की उपासना करके अपना क्षीण हुआ तेज पुनः प्राप्त किया था। इसलिए सनातन परंपरा में सोमनाथ को ग्रहजनित कष्टों से मुक्ति और आध्यात्मिक कल्याण प्रदान करने वाला अत्यंत पवित्र तीर्थ माना जाता है।

सावन माह कांवड़ यात्रा का महत्व  

सावन मास और कांवड़ यात्रा परस्पर अभिन्न हैं। भगवान शिव को समर्पित एक महत्वपूर्ण तीर्थयात्रा है, जिसका उल्लेख स्कन्द पुराण के केदार खंड में मिलता है। इसमें गंगाजल लाकर शिवलिंग पर अर्पित करने की विधि तथा उसके आध्यात्मिक महत्व का वर्णन किया गया है।

कांवड़ यात्रा का मूल भाव भक्ति, श्रद्धा और आत्मिक साधना में निहित है, जैसा कि प्राचीन शास्त्रों में बताया गया है। उदाहरण के लिए, शिव पुराण में उल्लेख मिलता है कि श्रावण मास में भगवान शिव को गंगाजल अर्पित करना अत्यंत पुण्यदायी और आध्यात्मिक फल प्रदान करने वाला माना गया है।

हालाँकि, आज के समय में कांवड़ यात्रा जिस प्रकार आयोजित की जाती है - जैसे ट्रकों का उपयोग, तेज़ ध्वनि में संगीत बजाना आदि -उसे पारंपरिक शास्त्रीय प्रथाओं की अपेक्षा आधुनिक सामाजिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों का रूप अधिक माना जा सकता है। शास्त्र मुख्य रूप से यात्रा के भक्ति-भाव, संयम, श्रद्धा और भगवान शिव के प्रति समर्पण पर बल देते हैं, न कि उसके बाहरी स्वरूप पर।

श्रावण मास की प्रमुख तिथियाँ एवं व्रत 

(श्रावण मास में भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते श्रद्धालु) 

शास्त्रों में तो सम्पूर्ण श्रवण मास को ही अत्यंत पवित्र एवं फलदायी बताया गया है, किंतु इस माह में पड़ने वाली कुछ तिथियाँ प्रमुख हैं। इन तिथियों में विशेष अनुष्ठान, व्रत एवं दान की परंपरा है । 

  • 30 जुलाई, 2026 - श्रावण  मास आरम्भ (प्रतिपदा)
  • 3 अगस्त, 2026   -  प्रथम सावन सोमवार 
  • 11 अगस्त, 2026  -  सावन प्रदोष व्रत एवं प्रथम सावन शिवरात्रि 
  • 12 अगस्त, 2026  -  हरियाली अमावस्या 
  • 17 अगस्त, 2026  -  नाग पंचमी एवं सावन तृतीय सोमवार (सोमवार)
  • 24 अगस्त, 2026  - पुत्रदा एकादशी (सोमवार)
  • 26 अगस्त, 2026  -  सावन प्रदोष व्रत 
  • 28 अगस्त, 2026  -  रक्षाबंधन , श्रावण पूर्णिमा  

     विशेष संयोग

  • 17 अगस्त, 2026 - इस दिन नाग पंचमी और सावन का सोमवार एक साथ आ रहे हैं, जो इस संयोग को और भी दुर्लभ एवं विशेष बनाते हैं।
  • 28 अगस्त, 2026 - रक्षाबंधन और पूर्णिमा 

भगवान शिव को प्रसन्न करने वाले मंत्र 

भगवान शिव की आराधना में मंत्र जप का विशेष महत्व माना गया है। शिवभक्तों के बीच पंचाक्षरी मंत्र ( ॐ नमः शिवाय")  और महामृत्युंजय मंत्र सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। पंचाक्षरी मंत्र को भगवान शिव का मूल मंत्र माना जाता है, जिसका नियमित जप मन को शांति, स्थिरता और आध्यात्मिक बल प्रदान करता है। वहीं ऋग्वेद में वर्णित महामृत्युंजय मंत्र भगवान शिव के मृत्युंजय स्वरूप को समर्पित है और इसे आरोग्य, साहस तथा मानसिक दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है।

श्रावण मास में इन मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जप विशेष फलदायी माना गया है। नियमित मंत्र जप से एकाग्रता, आत्मविश्वास और आंतरिक शांति में वृद्धि होती है, जिससे साधना अधिक प्रभावी और सार्थक बनती है। आप साधना ऐप में पंचाक्षरी मंत्र एवं महामृत्युंजय मंत्र का जप कर सकते हैं। 

श्रावण (सावन) मास आहार गाइड 

श्रावण मास संयम और शुद्धि का पर्व है। इस दौरान ऐसा आहार चुनें जो शरीर को हल्का और मन को शांत रखे। मौसमी फल, दुग्ध पदार्थ, एवं सब्जियाँ और घर का ताजा भोजन उत्तम माना जाता है। वहीं भारी, तामसिक और अधिक तले खाद्य पदार्थों से दूरी बनाकर रखना स्वास्थ्य तथा आध्यात्मिक साधना, दोनों के लिए लाभदायक माना गया है।

क्यों अपनाएँ सात्विक  आहार 

आयुर्वेद संतुलित आहार की अनुशंसा करता है - अर्थात् सात्त्विक आहार की। आधुनिक पोषण विज्ञान की तरह यह भी मानता है कि हमारा भोजन स्वास्थ्यवर्धक होना चाहिए। किंतु आयुर्वेद इससे आगे बढ़कर इस बात पर भी बल देता है कि भोजन सात्त्विक हो, स्वादिष्ट हो और व्यक्ति की प्रकृति तथा उसके शरीर के अनुकूल भी हो।

(ओम् स्वामी, द वेलनेस सेंस, पृ. 105)  

श्रावण मास में सात्त्विक आहार अपनाने का उद्देश्य केवल धार्मिक नियमों का पालन करना नहीं, बल्कि शरीर और मन को शुद्ध एवं संतुलित रखना भी है। सात्त्विक भोजन, जैसे ताजे फल, दूध, घी, अनाज और हल्की सब्जियाँ, पाचन में सरल होते हैं तथा शरीर को आवश्यक पोषण प्रदान करते हैं। 

इस समय वातावरण में बढ़ी हुई नमी के कारण शरीर के त्रिदोष क्रमशः,वात,पित्त एवं कफ असंतुलित हो सकते हैं। आयुर्वेद में वर्णित ऋतुचर्या (ऋतु के अनुसार आहार-विहार और जीवनशैली में परिवर्तन) की अवधारणा इसी तथ्य को स्पष्ट करती है। इसलिए सावन ऋतु में आहार के प्रति विशेष सावधानी रखने की सलाह दी गई है।

आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु में पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है, इसलिए हल्का और शुद्ध आहार स्वास्थ्य के लिए अधिक हितकारी माना गया है। साथ ही, सात्त्विक भोजन मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मकता को बढ़ावा देता है, जिससे साधना, जप, ध्यान और आध्यात्मिक विकास में वृद्धि होती हैं।

श्रावण में ताजे फल, दूध, घी, मूंग, लौकी,परवल, साबूदाना खिचड़ी (चावल और दाल से बना हल्का एवं सुपाच्य व्यंजन) का सेवन लाभकारी माना जाता है। भोजन ताज़ा, गर्म और संतुलित मात्रा में होना चाहिए, जिससे पाचन तंत्र पर अनावश्यक भार न पड़े। वहीं अत्यधिक तला-भुना, बासी, अधिक मसालेदार और भारी भोजन से बचना चाहिए। 

साधना के दृष्टिकोण से प्याज, लहसुन, मांसाहार और मद्यपान का त्याग भी किया जाता है। इस प्रकार श्रावण का सात्त्विक आहार केवल आध्यात्मिक साधना का ही अंग नहीं, बल्कि आयुर्वेद की दृष्टि से वर्षा ऋतु में वात, पित्त और कफ के संतुलन को बनाए रखने का एक प्रभावी माध्यम भी है।

Frequently Asked Questions

Clearing doubts on your sacred journey

सावन कब से शुरू है ?

इस वर्ष सावन मास पूर्णिमा पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार 

  • सावन प्रारंभ तिथि - 30 जुलाई, 2026 
  • सावन समापन तिथि - 28 अगस्त, 2026 

अमांत पंचांग के अनुसार 

  • सावन प्रारंभ तिथि - 13 अगस्त, 2026 
  • सावन समापन तिथि - 11 सितंबर, 2026 
सावन में कितने सोमवार हैं ?

 इस वर्ष पूरे सावन मास में चार सोमवार हैं । 

  • 3 अगस्त, 2026 -  पहला सावन सोमवार (कृष्ण पंचमी)
  • 10 अगस्त, 2026 - दूसरा सावन सोमवार (कृष्ण द्वादशी)
  • 17 अगस्त, 2026  - तीसरा सावन सोमवार एवं नाग पंचमी 
  • 24 अगस्त, 2026 - चौथा सावन सोमवार (शुक्ल द्वादशी) 
सावन की शिवरात्रि 2026 में कब है?

सावन कि पहली शिवरात्रि 11 अगस्त, 2026 को है वहीं सावन की दूसरी और अंतिम शिवरात्रि 27 अगस्त 2026 को है ।

सावन सोमवार व्रत विधि क्या है?

सावन सोमवार व्रत में प्रातः स्नान, शिवलिंग पर पंचामृत अभिषेक, बेलपत्र अर्पण, मंत्र जप और दिन में फलाहार के बाद सायं एक सात्विक भोजन का विधान है।  

आप साधना ऐप में श्री रुद्रम द्वारा भगवान शिव का अभिषेक कर सकते हैं  । 

सावन में शिवजी को क्या चढ़ाएं?

भगवान शिव को बेलपत्र, पवित्र गंगाजल, दूध, धतूरा के फल एवं पुष्प, आक (मदार) के फूल, भांग, श्वेत चंदन तथा शहद अर्पित किए जा सकते हैं। ध्यान दें कि सनातन परंपरा के अनुसार भगवान शिव को तुलसी दल और केतकी के पुष्प अर्पित नहीं किए जाते।

सावन पूर्णिमा कब है 2026?

सावन पूर्णिमा 28 अगस्त, 2026 को है । 

क्या महिलाएं मासिक धर्म में सावन का व्रत रख सकती हैं?

मासिक धर्म एक सामान्य एवं प्राकृतिक प्रक्रिया है। सनातन शास्त्रों के अनुसार, मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के लिए धार्मिक उपासना और ईश्वर-भक्ति पर कोई प्रतिबंध नहीं है। यदि आप स्वयं को शारीरिक रूप से स्वस्थ अनुभव करती हैं, तो आप बिना किसी संकोच या भय के साधना एवं आध्यात्मिक अनुष्ठानों में सम्मिलित हो सकती हैं।

सावन में कौन-कौन से व्रत-त्योहार आते हैं?

सावन में हरियाली अमावस्या, हरियाली तीज, नाग पंचमी, सावन शिवरात्रि और रक्षाबंधन (पूर्णिमा) जैसे प्रमुख त्योहार आते हैं।

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