हरियाली तीज : भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन का पावन उत्सव
सावन के महीने में वर्षा ऋतु की रिमझिम फुहार जब धरती को भिगोती है, तो हरियाली चुनर ओढ़े धरती माँ नववधू की भाँति प्रतीत होती है। चारों ओर फैली हरियाली, मंद-मंद बहती पवन और फुहारों से वातावरण में एक अनोखा उत्साह छा जाता है।
श्रावण मास भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना जाता है। इसी कारण इस दौरान भक्त सावन सोमवार का व्रत रखते हैं और पवित्र कांवड़ यात्रा में शामिल होते हैं। हरियाली तीज भगवान शिव और देवी पार्वती के दिव्य प्रेम का स्मरण कराते हुए इस पावन ऋतु की आध्यात्मिक गरिमा को और बढ़ाती है।
प्रकृति के इस नवश्रृंगार के साथ मन भी उमंग और उल्लास से भर उठता है। सावन के इसी पावन माह में मनाया जाता है भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन का पावन पर्व - हरियाली तीज।
चाहे आप हरे रंग के परिधान पहनकर हरियाली तीज मनाने की तैयारी कर रही हों या इस सुंदर पर्व से जुड़ी कथा के बारे में जानने की इच्छुक हों, इस ब्लॉग में आपको हरियाली तीज से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण बातें जानने को मिलेंगी।
ब्लॉग की मुख्य बातें :
- हरियाली तीज क्या है?
- हरियाली तीज क्यों मनाई जाती है?
- हरियाली तीज की पौराणिक कथा क्या है?
- हरियाली तीज कब है और पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है ?
- हरियाली तीज से पहले सिंजारा क्यों दिया जाता है?
- हरियाली तीज, हरतालिका तीज और कजरी तीज में क्या अंतर है?
हरियाली तीज क्या है?
हरियाली तीज या सिंधारा तीज, भारत में मनाए जाने वाले तीन प्रमुख तीज पर्वों में से एक है। अन्य दो प्रमुख तीज पर्व कजरी तीज और हरतालिका तीज हैं। ये पर्व श्रावण और भाद्रपद मास में, यानी लगभग जुलाई से सितंबर के बीच मनाए जाते हैं।
‘हरियाली’ शब्द का अर्थ है हरी-भरी प्रकृति। वहीं, ‘तीज’ शब्द पंचांग की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को संदर्भित करता है। श्रावण मास की रिमझिम वर्षा के बाद चारों ओर हरियाली छा जाती है, इसलिए हरियाली तीज श्रावण मास में मनाई जाती है।
यह तीज विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इस पावन दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। विवाहित महिलाएँ अपने पति के सुख, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करते हुए भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।
हरियाली तीज को इन नामों से भी जाना जाता है :
- श्रावणी तीज : श्रावण मास में मनाए जाने के कारण इसे श्रावणी तीज कहा जाता है।
- सावन की तीज : हिंदी भाषी क्षेत्रों में प्रचलित नाम, जो सावन माह को दर्शाता है।
- छोटी तीज : इसे कजरी तीज से अलग पहचानने के लिए छोटी तीज कहा जाता है। कजरी तीज को बड़ी तीज भी कहा जाता है और यह हरियाली तीज के लगभग पंद्रह दिन बाद भाद्रपद मास में मनाई जाती है।
भारतीय संस्कृति में मनाए जाने वाले अन्य तीज पर्वों में अखा तीज (अक्षय तृतीया) और गणगौर तृतीया भी शामिल हैं, जो क्रमशः चैत्र और वैशाख मास में, यानी लगभग मार्च से मई के बीच मनाए जाते हैं।
हरियाली तीज क्यों मनाई जाती है?

(भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए देवी पार्वती की तपस्या)
पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए 108 जन्मों तक कठोर तपस्या की। उन्होंने जंगलों में रहकर बिना अन्न और जल ग्रहण किए घोर तप किया। उनकी अटूट भक्ति, दृढ़ संकल्प और त्याग से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। यह दिव्य मिलन श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हुआ माना जाता है। इसी कारण इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती के दिव्य मिलन का उत्सव मनाया जाता है।
हरियाली तीज दृढ़ संकल्प, अटूट श्रद्धा और सच्चे प्रेम की शक्ति का प्रतीक है। इस दिन महिलाएँ अपने जीवनसाथी के सुख, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करते हुए दिनभर का निर्जला व्रत रखती हैं। वे मेहंदी लगाती हैं, लोकगीत गाती हैं और झूले झूलकर इस पर्व का आनंद लेती हैं। अविवाहित महिलाएँ भी मनचाहा जीवनसाथी पाने की कामना से इस व्रत और पूजा में शामिल होती हैं।
हरियाली तीज मनाने के पीछे की कथा क्या है?
हरियाली तीज व्रत की कथा भगवान शिव और देवी पार्वती के पुनर्मिलन से जुड़ी है। मान्यता है कि भगवान शिव ने स्वयं देवी पार्वती को उनके पूर्वजन्म के स्मरण के लिए यह कथा सुनाई थी। उन्होंने देवी को बताया कि किस प्रकार उन्होंने उन्हें पति रूप में प्राप्त करने के लिए हिमालय में कठोर तपस्या की थी।
शिव पुराण के रुद्र संहिता के पार्वती खंड में वर्णित कथा के अनुसार, देवी पार्वती भगवान शिव के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित थीं और उन्हें पति रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। इसी दौरान नारद ऋषि राजा हिमवान के महल में आए और उनकी पुत्री देवी पार्वती से मिले। देवी के मन में भगवान शिव को पति रूप में पाने की गहरी इच्छा को समझकर नारद ऋषि ने बताया कि आदियोगी भगवान शिव को सच्ची और समर्पित तपस्या के माध्यम से प्रसन्न किया जा सकता है। उन्होंने देवी पार्वती को भगवान शिव का पंचाक्षरी मंत्र जपने और उनकी आराधना करने का मार्ग बताया।
नारद ऋषि के मार्गदर्शन से प्रेरित होकर देवी पार्वती ने भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या करने का संकल्प लिया। उन्होंने ऋतु-दर-ऋतु अनेक कठिनाइयों का सामना किया। भीषण गर्मी में वे चारों ओर जलती अग्नि के बीच बैठकर तप करती थीं। वर्षा ऋतु में तेज बारिश के बीच खुले आकाश के नीचे, धरती या कठोर चट्टानों पर बैठकर साधना करती थीं। कड़ाके की सर्दी में वे बर्फीले जल में रहकर भी अपनी साधना और प्रार्थना से विचलित नहीं हुईं। बर्फीली हवाओं और हिमपात के बीच भी उनकी तपस्या निरंतर जारी रही।
समय के साथ देवी पार्वती ने अपने आहार को भी धीरे-धीरे कम कर दिया। पहले वर्ष उन्होंने केवल फलों का सेवन किया। दूसरे वर्ष वे केवल पत्तों पर निर्भर रहीं। अंततः उन्होंने पत्तों का सेवन भी त्याग दिया और पूर्ण रूप से निराहार होकर तपस्या करने लगीं। पत्ते अर्थात ‘पर्ण’ का त्याग करने के कारण देवताओं ने उन्हें ‘अपर्णा’ नाम दिया, जिसका अर्थ है - वह जो तपस्या के दौरान पत्ते तक ग्रहण नहीं करतीं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी पार्वती ने तीन हज़ार वर्षों तक इसी प्रकार कठोर तप और साधना जारी रखी। उनकी अटूट भक्ति, दृढ़ संकल्प और तपस्या से प्रसन्न होकर अंततः भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया।

(चिंतित देवता महादेव के पास पहुँचे)
देवी पार्वती की कठोर तपस्या का प्रभाव तीनों लोकों में दिखाई देने लगा। तब भगवान ब्रह्मा और श्रीहरि सहित अन्य देवता, ऋषि और दिव्य प्राणी भगवान शिव के पास पहुँचे। उन्होंने भगवान शिव से देवी पार्वती को स्वीकार करने का आग्रह किया, जिसे महादेव ने स्वीकार कर लिया।
हालाँकि, महादेव देवी पार्वती की भक्ति की गहराई और उनके संकल्प की दृढ़ता को परखना चाहते थे। इसलिए उन्होंने सप्तर्षियों को देवी की परीक्षा लेने के लिए भेजा। ऋषियों ने देवी पार्वती की परीक्षा ली और पाया कि भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने का उनका संकल्प अटूट था।
इसके बाद महादेव ने स्वयं देवी की भक्ति की परीक्षा लेने का निर्णय किया। उन्होंने ‘जटिल’ नामक जटाधारी तपस्वी का रूप धारण किया और देवी पार्वती के सामने भगवान शिव के स्वरूप और उनके व्यक्तित्व की आलोचना करने लगे। देवी ने स्पष्ट कहा कि महादेव साधारण मानवीय मापदंडों से परे हैं और उन्होंने भगवान शिव के बारे में किसी भी प्रकार की निंदा सुनना स्वीकार नहीं किया।
तभी भगवान शिव ने देवी पार्वती के सामने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया और उनकी निर्मल एवं अटूट भक्ति को स्वीकार किया। उन्होंने देवी पार्वती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में अपना लिया।
देवी पार्वती की अटूट तपस्या और भगवान शिव द्वारा उन्हें स्वीकार किया जाना सच्ची भक्ति, धैर्य और दृढ़ संकल्प के विजय का प्रतीक है।
हरियाली तीज 2026 मनाने का शुभ मुहूर्त क्या है?
हरियाली तीज 2026 शनिवार, 15 अगस्त 2026 को मनाई जाएगी। यह तिथि उदय तिथि के आधार पर निर्धारित की गई है।
तृतीया (तीज) तिथि प्रारंभ : 14 अगस्त 2026 को शाम 06:46 बजे
तृतीया (तीज) तिथिसमाप्त : 15 अगस्त 2026 को शाम 05:28 बजे
हरियाली तीज 2026 के शुभ पूजा मुहूर्त
- ब्रह्म मुहूर्त : सुबह 04:50 बजे से 05:35 बजे तक
- अभिजीत मुहूर्त : दोपहर 12:17 बजे से 01:08 बजे तक
- विजय मुहूर्त : दोपहर 02:51 बजे से 03:42 बजे तक
- अमृत काल : सुबह 08:34 बजे से 10:13 बजे तक
- प्रदोष काल (संध्या पूजा) : शाम 07:06 बजे से रात 09:18 बजे तक
- चौघड़िया मुहूर्त : सुबह 07:29 बजे से 09:08 बजे तक, दोपहर 02:04 बजे से 03:43 बजे तक और दोपहर 03:43 बजे से शाम 05:22 बजे तक
हरियाली तीज की पूजा विधि क्या है?

( हरियाली तीज का उत्सव मनाती हुई महिलायें )
हरियाली तीज की पूजा विधि में भगवान शिव और देवी पार्वती की श्रद्धापूर्वक पूजा और उनका आवाहन किया जाता है। सामान्य रूप से पूजा के प्रमुख चरण इस प्रकार हैं:
- मंडप की स्थापना : पूजा स्थल को साफ करके वहाँ लकड़ी की चौकी रखें और उसे लाल या पीले वस्त्र से ढकें। इसके बाद चौकी पर भगवान शिव और देवी पार्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- कलश स्थापना और पूजन : जल से भरे कलश में एक सिक्का और सुपारी रखें। कलश के मुख पर आम के पत्ते रखें और उसके ऊपर लाल वस्त्र में लिपटा हुआ नारियल रखें। पूजा का आरंभ प्रथम पूज्य भगवान गणेश की आराधना से करें, ताकि सभी विघ्न दूर हों।
- देवी-देवताओं का श्रृंगार और पूजन : देवी पार्वती को लाल चुनरी और सोलह श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें। साथ ही कुमकुम, फूल और मिठाई अर्पित करें। भगवान शिव का जल या दूध से अभिषेक करें और उन्हें चंदन, बेलपत्र, धतूरा तथा पुष्प अर्पित करें। प्रसाद के रूप में घर पर बनी मिठाइयाँ, जैसे घेवर, खीर या हलवा, और मौसमी फल अर्पित किए जा सकते हैं।
- मंत्र जाप: आप साधना ऐप में अत्यंत पूजनीय शिव पंचाक्षरी मंत्र का जप भी कर सकते हैं।
- हरियाली तीज व्रत कथा का पाठ : घी का दीपक और धूप जलाएँ। हाथ में थोड़े चावल और पुष्प लेकर हरियाली तीज व्रत कथा का पाठ करें या श्रद्धापूर्वक सुनें। कथा पूरी होने के बाद चावल और पुष्प देवी-देवताओं को अर्पित करें।
- आरती और प्रसाद वितरण : भगवान शिव और देवी पार्वती की आरती करें। पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा प्रार्थना करें और प्रसाद वितरित करें। परिवार के बड़ों के चरण स्पर्श करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।
हरियाली तीज की पूजा विधि क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इसलिए अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा करना उचित माना जाता है।
सिंजारा, जिसे सिंधारा या संझारा भी कहा जाता है, हरियाली तीज से जुड़ी एक पारंपरिक प्रथा है। कई समुदायों में इसे हरियाली तीज से एक दिन पहले या पर्व के दिन सुबह मनाया जाता है। सिंजारा की यह परंपरा मुख्य रूप से श्रृंगार और सौभाग्य से जुड़ी है।
इस परंपरा के तहत विवाहित बेटी का मायका उसके लिए प्रेमपूर्वक तैयार किए गए उपहारों का एक पैकेट या टोकरी भेजता है। यह उपहार स्नेह, आशीर्वाद और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है। सिंजारा बेटी के सुख, समृद्धि और वैवाहिक जीवन की खुशहाली के लिए माता-पिता के प्रेम और आशीर्वाद को दर्शाता है।
पारंपरिक सिंजारा में हरे या लाल रंग के वस्त्र, काँच की चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, सौंदर्य प्रसाधन, आभूषण, फल, सूखे मेवे और घेवर जैसी तीज की मिठाइयाँ शामिल हो सकती हैं।
कुछ परिवारों में ससुराल पक्ष की ओर से भी बहू को इसी तरह के उपहार दिए जाते हैं। महिलाएँ इन अवसरों पर मेहंदी लगाती हैं, नए वस्त्र और आभूषण पहनती हैं और हरियाली तीज के उत्सव एवं व्रत की तैयारी करती हैं।
इस प्रकार, सिंजारा केवल उपहार देने की परंपरा नहीं, बल्कि बेटी के प्रति मायके के स्नेह, आशीर्वाद और शुभकामनाओं को व्यक्त करने का एक सुंदर माध्यम है।
हरियाली तीज, हरतालिका तीज और कजरी तीज में क्या अंतर है?
हालाँकि तीनों पर्व देवी पार्वती और भगवान शिव को समर्पित हैं और वैवाहिक सुख एवं परिवार की समृद्धि की कामना से जुड़े हैं, लेकिन हरियाली तीज, कजरी तीज और हरतालिका तीज अलग-अलग तिथियों पर मनाए जाते हैं और इनसे जुड़ी क्षेत्रीय परंपराएँ भी अलग हैं।
हरियाली तीज, जिसे छोटी तीज भी कहा जाता है, इन तीनों में सबसे पहले मनाई जाती है। यह मानसून के आगमन के बाद प्रकृति के हरे-भरे रूप में परिवर्तन का उत्सव है। चारों ओर फैली हरियाली विकास, उर्वरता और वैवाहिक जीवन में नए उत्साह का प्रतीक मानी जाती है। यह पर्व देवी पार्वती और भगवान शिव के दिव्य मिलन की स्मृति में मनाया जाता है।
कजरी तीज, जिसे बड़ी तीज या सातूड़ी तीज भी कहा जाता है, हरियाली तीज के लगभग पंद्रह दिन बाद भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। इसका नाम ‘कजरा’ शब्द से जुड़ा माना जाता है, जिसका संबंध मानसून के गहरे, वर्षा से भरे बादलों से है। यह पर्व गहन भक्ति और विरह की भावना से जुड़ा है। ऐतिहासिक रूप से वर्षा ऋतु में व्यापार के लिए घर से दूर गए पतियों की प्रतीक्षा करती महिलाओं की भावनाओं से भी इसे जोड़ा जाता है।
कजरी तीज मुख्य रूप से राजस्थान, विशेष रूप से बूंदी, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार में मनाई जाती है। इस दिन नीम के पवित्र वृक्ष की पूजा करना प्रमुख परंपराओं में शामिल है। व्रत रखने वाले चंद्रमा के दर्शन के बाद विशेष रूप से तैयार किए गए सत्तू का सेवन करके व्रत का पारण करते (व्रत खोलते) हैं।
हरतालिका तीज कजरी तीज के लगभग पंद्रह दिन बाद भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को ( गणेश चतुर्थी के एक दिन पूर्व) मनाई जाती है। ‘हरतालिका’ नाम ‘हरित’ और ‘आलिका’ शब्दों से बना माना जाता है, जिनका अर्थ क्रमशः हरण करना और सखी होता है। यह नाम उस पौराणिक कथा से जुड़ा है, जिसमें देवी पार्वती की सखियाँ उन्हें गुप्त रूप से घने वन में ले गई थीं, ताकि उनका विवाह भगवान विष्णु से न हो और वे भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए अपनी कठोर तपस्या पूरी कर सकें।
मान्यता है कि इस दिन देवी पार्वती ने रेत से पवित्र शिवलिंग बनाया था। देवी पार्वती की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें विवाह का वरदान दिया।
हरतालिका तीज बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और नेपाल में विशेष रूप से मनाई जाती है। यह पर्व देवी पार्वती की अटूट भक्ति, दृढ़ संकल्प और भगवान शिव के प्रति उनके समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
मानसून की वर्षा जब धरती को नई ऊर्जा और जीवन से भर देती है, तब हरियाली तीज प्रकृति के इसी मनमोहक रूप और भगवान शिव एवं देवी पार्वती के शाश्वत मिलन का उत्सव मनाती है। इस पावन अवसर पर जब आप हरी चूड़ियाँ पहनें, मेहंदी सजाएँ और अपने प्रियजनों के साथ इस पर्व का आनंद लें, तो आपके घर-आँगन में प्रेम, उल्लास और चिरस्थायी समृद्धि बनी रहे।
Frequently Asked Questions
Clearing doubts on your sacred journey
क्या अविवाहित लड़कियाँ हरियाली तीज का व्रत रख सकती हैं?
हरियाली तीज पर महिलाएँ हरे रंग के कपड़े क्यों पहनती हैं?
हरियाली तीज पर मेहंदी क्यों लगाई जाती है?
झूलन उत्सव क्या है?
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