नागपंचमी : आध्यात्मिक महत्व, पौराणिक कथाएँ और परंपराएँ
सर्वे नागा: प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथ्वीतले।
-भविष्य पुराण, ब्रह्म पर्व
सनातन धर्म में नागों को अत्यंत पूजनीय स्थान प्राप्त है। सृष्टि के पालनकर्ता श्रीहरि विष्णु शेषनाग की शय्या पर विराजमान हैं (भुजंगशयनम्), जबकि अज्ञान का नाश करने वाले भगवान शिव नाग को अपने आभूषण के रूप में धारण करते हैं (भुजंगभूषणम्)।
इतना ही नहीं, श्रीहरि विष्णु के विभिन्न अवतारों में भी नागों से उनका विशेष संबंध दिखाई देता है। भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलराम तथा भगवान श्रीराम के अनुज लक्ष्मण, दोनों को ही शेषनाग का मानव अवतार माना जाता है।
सनातन धर्म में नाग केवल सर्प नहीं हैं, बल्कि वे असीम आध्यात्मिक शक्ति और अनंत कालचक्र के प्रतीक भी माने जाते हैं। वे ब्रह्मांडीय संतुलन के रक्षक हैं तथा प्रत्येक जीव के भीतर सुप्त अवस्था में विद्यमान दिव्य कुण्डलिनी शक्ति का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।
भगवान गणेश अपने उदर पर नाग धारण करते हैं, जिसे उदरबन्ध कहा जाता है, यह गहन आध्यात्मिक संदेश देता है। यह दर्शाता है कि मनुष्य सांसारिक अनुभवों को आत्मसात करे, लेकिन उन्हें लोभ और आसक्ति में परिवर्तित न होने दे। नाग इसी आत्मसंयम और विवेक का प्रतीक है।
इसी प्रकार भगवान कार्तिकेय का भी नागों से गहरा संबंध है। कर्नाटक स्थित कुक्के सुब्रह्मण्य मंदिर में उनकी पूजा नागस्वरूप में की जाती है। वहाँ वे उस दिव्य उपचारात्मक शक्ति के प्रतीक माने जाते हैं, जो विष और समस्त नकारात्मकता का नाश करती है।
नागों के इसी आध्यात्मिक महत्व के कारण श्रावण मास में नाग पंचमी का पावन पर्व मनाया जाता है। इस दिन नागों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करते हुए भक्त अहिंसा, इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण तथा आध्यात्मिक उन्नति का संकल्प लेते हैं।
आखिर नाग पंचमी क्यों मनाई जाती है? इस पवित्र परंपरा के पीछे कौन-सी कथा है, और भारत के विभिन्न क्षेत्रों में यह पर्व किस प्रकार मनाया जाता है?
आइए, नाग पंचमी से जुड़े इन सभी प्रश्नों के उत्तर विस्तार से जानते हैं।
प्रमुख बातें
- नाग पंचमी क्या है और वर्ष 2026 में यह कब मनाई जाएगी?
- नाग पंचमी की पौराणिक कथा क्या है?
- नाग पंचमी से श्रीकृष्ण और कालिया नाग की कथा का क्या संबंध है?
- नाग पंचमी पर किसान भूमि की खुदाई या जुताई क्यों नहीं करते?
- सनातन धर्म में अष्टनाग कौन हैं?
- नाग पंचमी पर नागों को दूध क्यों अर्पित किया जाता है?
- नाग देवताओं को समर्पित प्रमुख मंदिर कौन-से हैं?
नाग पंचमी क्या है और वर्ष 2026 में यह कब मनाई जाएगी?
नाग पंचमी सनातन धर्म का अत्यंत पावन पर्व है, जो नाग देवताओं की पूजा को समर्पित है। यह भारत, नेपाल तथा विश्वभर के हिंदू समुदायों द्वारा श्रावण (सावन) मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि (जुलाई या अगस्त) को श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। सनातन धर्म में नागों को अत्यंत पूजनीय स्थान प्राप्त है। नागों को पाताल लोक का अधिपति माना जाता है। वे महर्षि कश्यप और कद्रू की संतान हैं, और इस प्रकार देवता और सर्प का संबंध एक ही वंश से है।
नाग पंचमी का यह पावन पर्व नाग देवताओं की कृपा से सुख-समृद्धि, संरक्षण और कल्याण की कामना करने का अवसर है। साथ ही, यह धरती पर रहने वाले नागों को अनजाने में हुई किसी भी हानि के लिए क्षमा याचना करने का भी दिन है। यह पावन पर्व मनुष्य, प्रकृति और समस्त जीव-जंतुओं के बीच विद्यमान गहरे आध्यात्मिक संबंध का भी उत्सव है।
वर्ष 2026 में अमांत पंचांग (जिसमें प्रत्येक मास का आरंभ अमावस्या के अगले दिन से होता है) के अनुसार नाग पंचमी का पर्व 17 अगस्त 2026, सोमवार को मनाया जाएगा।
- पंचमी तिथि प्रारंभ: 16 अगस्त 2026, सायं 4:52 बजे
- पंचमी तिथि समाप्त: 17 अगस्त 2026, सायं 5:00 बजे
- नाग पंचमी पूजा मुहूर्त: 17 अगस्त 2026, प्रातः 5:51 बजे से 8:29 बजे तक
पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार, नाग पंचमी का पर्व 1 सितंबर 2026, मंगलवार को भाद्रपद मास में मनाया जाएगा।
नाग पंचमी की पौराणिक कथा क्या है?
नागपंचमी से जुड़ी यह कथा श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वादश स्कंध, छठे अध्याय तथा महाभारत के आदि पर्व में वर्णित है। इसके अनुसार, अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित की मृत्यु नागराज तक्षक के सर्पदंश से हुई थी। अपने पिता की मृत्यु से शोक और क्रोध से भरकर उनके पुत्र राजा जनमेजय ने समस्त नागों का संहार करने के उद्देश्य से सर्पसत्र नामक एक महायज्ञ का आयोजन किया।

(राजा जनमेजय सर्पसत्र यज्ञ करते हुए।)
इस यज्ञ की शक्ति इतनी प्रबल थी कि दूर-दूर से हज़ारों नाग खिंचे चले आए और यज्ञ की अग्नि में गिरने लगे। जब संपूर्ण नाग जाति के विनाश का संकट उत्पन्न हुआ, तब देवी मनसा के पुत्र बाल ऋषि आस्तिक ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने अपने ज्ञान और आध्यात्मिक तेज से राजा जनमेजय को संतुष्ट किया और वरदान के रूप में सर्पसत्र को रोकने का वचन प्राप्त किया।
जिस दिन आस्तिक मुनि ने नागवंश का संपूर्ण विनाश होने से बचाया, उसी दिन की स्मृति में नाग पंचमी का पावन पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि यज्ञ की अग्नि से झुलसे और व्याकुल नागों को शीतलता प्रदान करने के लिए उन्हें दूध और शीतल जल अर्पित किया गया था।
नाग पंचमी से श्रीकृष्ण और कालिया नाग की कथा का क्या संबंध है?
नाग पंचमी से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध कथा श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध के 16वें अध्याय में वर्णित है।
वृंदावन की यमुना नदी में कालिया नामक एक विषैला नाग रहता था। उसका विष इतना प्रबल था कि यमुना का जल उबलने लगता और उसके विष से आसपास के वृक्ष, पक्षी तथा अन्य जीव-जंतु तक नष्ट होने लगे थे।
एक दिन अपने सखाओं के साथ गेंद खेलते समय श्रीकृष्ण जानबूझकर यमुना में उतर गए। कालिया ने उन्हें अपने विशाल फनों से जकड़ लिया, किंतु श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य स्वरूप का विस्तार किया, जिससे कालिया उन्हें बाँधकर नहीं रख सका।
इसके बाद श्रीकृष्ण कालिया नाग के विशाल फनों पर चढ़कर दिव्य नृत्य किया, जिसे कालिया मर्दन के नाम से जाना जाता है। श्रीकृष्ण की इस लीला से कालिय नाग का अहंकार नष्ट हो गया और उसके विष का प्रभाव समाप्त हो गया।

(श्रीकृष्ण द्वारा कालिय नाग का दमन।)
जब कालिया घायल होकर अचेत-सा हो गया, तब उसकी पत्नियों (नागपत्नियों) ने श्रीकृष्ण से उसके प्राणों की रक्षा की प्रार्थना की। उनकी विनती स्वीकार करते हुए श्रीकृष्ण ने कालिया को क्षमा कर दिया, लेकिन यह आदेश दिया कि वह सदैव के लिए यमुना छोड़कर समुद्र में स्थित रमणक द्वीप चला जाए।
परंपरा के अनुसार, यह दिव्य घटना श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को हुई थी। तभी से नाग पंचमी का पर्व अधर्म पर धर्म की विजय, अहंकार के दमन और नागों के संरक्षण के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।
नाग पंचमी पर किसान भूमि की खुदाई या जुताई क्यों नहीं करते?
नाग पंचमी से जुड़ी यह लोकप्रिय लोककथा विशेष रूप से कृषि प्रधान क्षेत्रों में प्रचलित कई परंपराओं का आधार मानी जाती है।
एक किसान वर्षा ऋतु में अपने खेत की जुताई कर रहा था। अनजाने में उसके हल से भूमि के भीतर छिपे नवजात नाग शावकों का एक बिल नष्ट हो गया और वे मारे गए। जब उनकी माँ (एक नागिन) वापस लौटी और अपने बच्चों को मृत पाया, तो वह शोक और क्रोध से भर उठी। उसने किसान का पता लगाया और उसे, उसकी पत्नी तथा उसके सभी बच्चों को डस लिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। केवल किसान की एक बेटी उस समय घर पर नहीं थी।
जब नागिन उसे डसने पहुँची, तो उसने देखा कि वह कन्या श्रद्धापूर्वक नाग देवता की प्रतिमा की पूजा कर रही है। उसने नाग देवता को ताज़ा दूध अर्पित किया और प्रार्थना की कि यदि उसके परिवार से अनजाने में कोई अपराध हुआ हो, तो उन्हें क्षमा कर दिया जाए।
कन्या की भक्ति, विनम्रता और निष्कपट भाव से नागिन का हृदय पिघल गया। उसने परिवार को क्षमा कर दिया और दिव्य अमृत के प्रभाव से किसान तथा उसके परिवार को पुनः जीवित कर दिया। यह कथा भक्ति, क्षमा और नाग पूजा के महत्व का संदेश देती है।
इसी लोककथा के आधार पर नाग पंचमी के दिन किसान भूमि की खुदाई, जुताई या खोदने जैसे कार्यों से बचते हैं, ताकि अनजाने में भूमि के भीतर रहने वाले नागों के बिलों या उनके अंडों को कोई हानि न पहुँचे।
सनातन धर्म में अष्टनाग कौन हैं?
अष्टनाग वे आठ प्रमुख दिव्य नाग देवता हैं, जिनका उल्लेख विभिन्न हिंदू शास्त्रों और पुराणों में मिलता है। प्रमुख देवताओं के साथ-साथ इन दिव्य नागों की भी श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है।

(अष्टनाग)
सनातन परंपरा में नवनागों का भी उल्लेख मिलता है। नवनाग स्तोत्र में नौ प्रमुख नाग देवताओं का आवाहन कर उनकी कृपा और संरक्षण की प्रार्थना की जाती है। ये नौ नाग हैं—अनंत, वासुकि, शेष, पद्मनाभ, कंबल, शंखपाल, धृतराष्ट्र, तक्षक और कालिया।
नाग पंचमी पर नागों को दूध क्यों अर्पित किया जाता है?
नाग पंचमी पर नागों को दूध अर्पित करना श्रद्धा, सम्मान और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि दूध नागों के भोजन के रूप में नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक अर्पण या प्रतीकात्मक अभिषेक के रूप में चढ़ाया जाता है।
पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, नाग पंचमी के दिन नाग देवता की प्रतिमा, नाग शिला, नाग मंदिरों तथा चींटी के बिलों (बाँबियों) पर दूध अर्पित किया जाता है। वहीं आधुनिक विशेषज्ञों के अनुसार, जीवित साँपों को जबरन दूध नहीं पिलाना चाहिए, क्योंकि यह उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। इसी कारण अनेक स्थानों पर श्रद्धालु जीवित नागों को दूध पिलाने के बजाय नागों के बिल, बाँबी या नाग देवता की शिला के समीप प्रतीकात्मक रूप से दूध अर्पित करते हैं।
- आयुर्वेद में दूध को प्राकृतिक शीतल पदार्थ माना गया है। मान्यता है कि सर्पसत्र की प्रचंड अग्नि से झुलसे और अत्यधिक गर्मी से व्याकुल नागों को शीतलता तथा राहत प्रदान करने के लिए उन पर ठंडा दूध, जल और चंदन अर्पित किया गया।
- दूध अर्पित करने की एक अन्य मान्यता वासुकि नाग से भी जुड़ी है। समुद्र मंथन के समय वासुकि नाग ने मंदराचल पर्वत के चारों ओर लिपटकर मंथन की रस्सी का कार्य किया था। इस मंथन के दौरान उत्पन्न घर्षण और विष के प्रभाव से उन्हें अत्यंत कष्ट हुआ। मान्यता है कि उन्हें शीतलता प्रदान करने और उनके प्रति सम्मान एवं संरक्षण का भाव प्रकट करने के लिए दूध अर्पित किया जाता है।
- सनातन धर्म में दूध को सबसे पवित्र और सात्त्विक पदार्थों में से एक माना गया है। विषैले नाग को दूध अर्पित करना भय और हिंसा के स्थान पर श्रद्धा, शांति तथा अहिंसा के भाव को अपनाने का प्रतीक माना जाता है।
- नाग पंचमी वर्षा ऋतु के श्रावण मास में मनाई जाती है। लोकमान्यता के अनुसार, इस दौरान वर्षा के कारण नागों के भूमिगत बिलों में पानी भर जाता है, जिससे वे बाहर निकलकर मानव बस्तियों के आसपास आने लगते हैं। ऐसे में नागों को दूध अर्पित करना उनके प्रति सद्भाव, सम्मान और संरक्षण की प्रार्थना का प्रतीक माना जाता है, ताकि वे किसी को हानि न पहुँचाएँ।
सनातन धर्म में नागों का विष हमारे भीतर मौजूद क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और विनाशकारी इच्छाओं जैसे नकारात्मक भावों का प्रतीक माना जाता है। वहीं दूध को संपूर्ण, पवित्र और सात्त्विक आहार माना गया है। इसलिए नागों को दूध अर्पित करना इस बात का प्रतीक है कि हम अपने भीतर के विषैले विचारों और अहंकार को ईश्वर को समर्पित कर उन्हें आध्यात्मिक अमृत के समान पवित्र और कल्याणकारी बनने की प्रार्थना करते हैं।
नाग देवताओं को समर्पित प्रमुख मंदिर कौन-से हैं?
भारत में नाग देवताओं को समर्पित या नाग पूजा से जुड़े अनेक प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर हैं।

(नाग पूजा को समर्पित प्रसिद्ध मंदिर)
- केरल के अलप्पुझा (आलाप्पुड़ा) जिले में स्थित मन्नारसाला श्री नागराजा मंदिर भारत का सबसे बड़ा और सबसे प्रसिद्ध नाग मंदिर माना जाता है। इस मंदिर में नाग देवताओं की 30,000 से अधिक पत्थर की प्रतिमाएँ स्थापित हैं। यह एक पवित्र वन क्षेत्र (सर्पकावु) के मध्य स्थित है और नागराज को समर्पित है। इस मंदिर की एक अनूठी विशेषता यह है कि परंपरागत व्यवस्था से अलग यहाँ की मुख्य प्रशासक और प्रधान पुजारिन एक महिला होती हैं, जिन्हें श्रद्धापूर्वक मन्नारसाला वलियम्मा कहा जाता है।
- कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले में पश्चिमी घाट की मनोरम पर्वतमालाओं के बीच स्थित कुक्के श्री सुब्रह्मण्य मंदिर नाग उपासना के प्रमुख तीर्थों में से एक है। यहाँ भगवान कार्तिकेय की पूजा भगवान सुब्रह्मण्य के रूप में की जाती है। मान्यता है कि उन्होंने नागराज वासुकि को गरुड़ देव से संरक्षण प्रदान किया था। मंदिर के गर्भगृह में भगवान सुब्रह्मण्य की प्रतिमा इस प्रकार स्थापित है कि वे बहुफनधारी नागराज वासुकि की रक्षा करते हुए दिखाई देते हैं। यह मंदिर ज्योतिषीय दोषों के निवारण हेतु विश्वभर में प्रसिद्ध है।
- तमिलनाडु के नागरकोइल में स्थित अरुल्मिगु श्री नागराजा मंदिर दक्षिण भारत के प्रमुख नाग मंदिरों में से एक है। मान्यता है कि 'नागरकोइल' नगर का नाम इसी मंदिर के नाम पर पड़ा है, जिसका अर्थ है "नागराज का मंदिर"। इस मंदिर के मुख्य देवता स्वयंभू पंचमुखी नागस्वरूप श्री नागराजा स्वामी हैं। मंदिर के गर्भगृह के दोनों ओर स्थित द्वारपाल भी पारंपरिक मानव आकृतियों के स्थान पर धरणेन्द्र और पद्मावती नामक नाग एवं नागिनी के रूप में स्थापित हैं।
- मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर, महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में स्थित है। यह मंदिर महाकालेश्वर मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित है। इस मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की एक प्राचीन एवं दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा में वे बहुफनधारी आदिशेष के कुंडलित शरीर से बने सिंहासन पर विराजमान हैं। इस मंदिर की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि इसके कपाट वर्ष में केवल एक बार, नाग पंचमी के अवसर पर, 24 घंटे के लिए ही श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोले जाते हैं।
- भुजंग देव मंदिर गुजरात के कच्छ क्षेत्र के भुज नगर में स्थित ऐतिहासिक भुजिया पहाड़ी के शिखर पर स्थित है। माना जाता है कि भुज नगर का नाम भी इसी विशेष नाग देवता भुजंग के नाम पर पड़ा है, जिन्हें शेषनाग का भाई माना जाता है। क्षेत्रीय लोककथाओं के अनुसार, भुजंग देव ने कच्छ क्षेत्र को अत्याचारी दानवों से मुक्त कराया था।
नागपंचमी केवल एक पर्व या धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह हमें आत्मचिंतन करने और जीवन के सूक्ष्म संतुलन का सम्मान करने की प्रेरणा देती है। इस पावन अवसर पर जब हम श्रद्धापूर्वक नाग देवता को दूध अर्पित कर अपनी प्रार्थनाएँ समर्पित करते हैं, तब आइए यह संकल्प लें कि हम अपने भीतर के भय को ज्ञान से, प्रकृति के प्रति उपेक्षा को सम्मान से और अपने हृदय तथा परिवार में असामंजस्य को प्रेम एवं सद्भाव से बदलेंगे।
Frequently Asked Questions
Clearing doubts on your sacred journey
नागपंचमी पर क्या करना चाहिए?
नागपंचमी पर क्या नहीं करना चाहिए?
भारत के विभिन्न भागों में नागपंचमी कैसे मनाई जाती है?
नागपंचमी का भगवान शिव से क्या संबंध है?
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