पावन शक्तिपीठ : पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
—दुर्गा सप्तशती
भावार्थ - हम उस आदिशक्ति देवी माँ को प्रणाम करते हैं, जो समस्त प्राणियों में ऊर्जा और शक्ति के रूप में विद्यमान हैं।
क्या आप जानते हैं कि “शक्ति” का वास्तविक अर्थ क्या है? अक्सर हम इसे देवी माँ के स्वरूप तक ही सीमित करने की भूल करते हैं, और इसी कारण इसके गहन और व्यापक अर्थ को समझ नहीं पाते। वास्तव में वे हम सभी के अंदर क्रिया-शक्ति के रूप में सक्रिय है। सनातन धर्म में शक्ति का मतलब ब्रह्मांडीय ऊर्जा की साकार अभिव्यक्ति है। एक ऐसी ऊर्जा जो सृष्टि की रचियता भी है, पालनहार भी है, और समय आने पर सृष्टि को परिवर्तित करने का सामर्थ्य भी रखती है।
लेखिका कविता चिन्नियन अपनी पुस्तक Shakti Rising : Embracing Shadow and Light on the Goddess Path to Wholeness में उल्लेख करती हैं:
‘’देवी माँ आकाशगंगाओं की वह गति हैं, जो नए तारों और ब्लैक होल्स को जन्म देती है। पाचन अग्नि के रूप में वे भोजन को पोषणदायी शक्ति में परिवर्तित करती हैं। जाग्रत अवस्था में वे प्रत्येक विचार, भावना और क्रिया के रूप में प्रकट होती हैं। स्वप्न अवस्था में वे अवचेतन मन की वह लीला हैं, जहाँ मन अपने भय और कल्पनाओं को जीता और अभिव्यक्त करता है। गहरी निद्रा की अवस्था में वे चेतना का विश्राम में लीन हो जाना हैं। सृष्टि में ऐसा कुछ भी नहीं है जो शक्ति, उस दिव्य मातृ-ऊर्जा, की अभिव्यक्ति न हो।’’
(Chinnaiyan, 2017. Ch 1: The Hidden Path)
ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम् देवी माँ के अनंत गुणों और स्वरूपों का विस्तार से वर्णन करता है। वे इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति—तीनों का साकार रूप हैं (इच्छाशक्तिज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिस्वरूपिणी)। शक्ति, स्थिर और चेतन-प्रधान भगवान शिव का सक्रिय रूप है। दोनों मिलकर संपूर्ण सृष्टि के अद्वैत स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे शिव-शक्ति (शिवशक्त्यैक्यरूपिणी, 999वाँ नाम) कहा जाता है।
शक्तिपीठ वास्तव में उस पराशक्ति के ऊर्जा केंद्र हैं। हमारे इस ब्लॉग में हम उत्तर भारत में स्थित कुछ प्रमुख शक्तिपीठ और उनके महत्व के बारे में बात करेंगे, तो आइए देवी माँ के इन दिव्य धामों की पावन यात्रा आरंभ करते हैं।
इस ब्लॉग की प्रमुख बातें:
- उमा शक्तिपीठ, मिथिला (बिहार)
- मंगला गौरी शक्तिपीठ, गया (बिहार)
- विशालाक्षी शक्तिपीठ, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
- पंचसागर शक्तिपीठ, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
- ललिता देवी शक्तिपीठ, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)
- कात्यायनी शक्तिपीठ, वृंदावन (उत्तर प्रदेश)
- शिवानी देवी शक्तिपीठ, रामगिरि (उत्तर प्रदेश)
- भद्रकाली शक्तिपीठ, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)
- त्रिपुरमालिनी देवी शक्तिपीठ, जालंधर (पंजाब)
- ज्वालाजी शक्तिपीठ, कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)
उमा शक्तिपीठ, मिथिला (बिहार)

(माँ उमा के रूप में देवी पार्वती, उमा शक्तिपीठ)
मिथिला एक प्राचीन क्षेत्र है, जो वर्तमान समय में बिहार और नेपाल के कुछ भागों में फैला हुआ है। यह माँ सीता की जन्मभूमि है। मिथिला के दरभंगा नगर में स्थित यह शक्तिपीठ वह स्थान है, जहाँ देवी सती का वाम स्कंध (बायाँ कंधा) गिरा था।
इस शक्तिपीठ पर देवी माँ की पूजा माँ उमा के रूप में की जाती है, जिन्हें महादेवी भी कहा जाता है। वे कृपा, भक्ति और आध्यात्मिक शक्ति का स्वरूप हैं। उनके भैरव महोदर के रूप में पूजे जाते हैं, जिन्हें महेश्वर भी कहा जाता है। वे देवी के साथ भगवान शिव की संरक्षक उपस्थिति का प्रतिनिधित्व करते हैं।
मंगला गौरी शक्तिपीठ, गया (बिहार)

(मंगला गौरी शक्तिपीठ, गया, बिहार)
यहाँ देवी माँ की पूजा सर्वमंगला के रूप में की जाती है। सर्वमंगला अर्थात् सबका मंगल करने वाली। आदि शंकराचार्य के ग्रंथों में भी इस स्थान का विशेष उल्लेख मिलता है। यहाँ देवी सती के स्तन गिरे थे, इसलिए यह स्थल अत्यंत पवित्र माना जाता है। ओडिशा का तारा-तारिणी शक्ति पीठ भी इसी अंग से जुड़ा हुआ माना जाता है।
सर्वमङ्गल माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
—देवी महात्म्यम्
“हे नारायणी (नारायण की बहन), मैं आपको नमन करता हूँ। जो कुछ भी शुभ है, उसमें आप ही शुभ हैं। स्वयं शुभता, शिव की प्रिय (शिवे), आप सभी शुभ गुणों से पूर्ण हैं; आप वही हैं जो भक्त की समस्त इच्छाओं की पूर्ति का मार्ग प्रशस्त करती हैं। आप एकमात्र आश्रय हैं, तीन नेत्र वाली देवी (त्र्यम्बके : उनके तीन नेत्र सूर्य, चंद्र और अग्नि हैं)—जो भूत, वर्तमान और भविष्य को देख सकती हैं—और जिनका रूप सौम्य और आकर्षक है (गौरी)।”
मंगला गौरी शक्तिपीठ एक महत्वपूर्ण श्राद्ध पीठ भी है, जहाँ लोग अपने पितरों के लिए तर्पण और प्रार्थना करते हैं। माँ गौरी से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार, महादेव को प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या करने के कारण माँ पार्वती का शरीर काला और दुर्बल हो गया था। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें गंगा के पवित्र जल से स्नान कराया। जब उनकी त्वचा की वह काली बाहरी परत हटी, तो उससे एक अन्य शक्तिशाली देवी प्रकट हुईं, जिन्हें कौशिकी (या कालिका) के नाम से जाना गया।
इस छाया-रूप से मुक्त होने के बाद पार्वती ने अपना उज्ज्वल स्वर्णिम वर्ण पुनः प्राप्त कर लिया और वे माँ महागौरी के नाम से प्रसिद्ध हुईं—अर्थात् वे जो उज्ज्वल, पवित्र और तेजस्विनी हैं। माँ दुर्गा के आठवें स्वरूप देवी महागौरी की संपूर्ण कथा आप यहाँ पढ़ सकते हैं।
मंगलागौरी शक्तिपीठ में देवी माँ की पूजा दो पवित्र पिंडियों (गोलाकार शिलाओं) के रूप में की जाती है, जो उनकी शाश्वत उपस्थिति का प्रतीक हैं। यहाँ उन्हें जीवनदायिनी माता के रूप में पूजा जाता है, जो अपने भक्तों को संतति, संरक्षण और कृपा का आशीर्वाद देती हैं। यहाँ भगवान शिव महेश्वर के रूप में विराजमान हैं। विवाहित स्त्रियाँ अपने पति के कल्याण, दीर्घायु तथा सुखी और सामंजस्यपूर्ण दांपत्य जीवन की कामना से माँ मंगला गौरी की श्रद्धापूर्वक पूजा करती हैं।
विशालाक्षी शक्तिपीठ, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

(विशालाक्षी शक्तिपीठ, वाराणसी)
विशालाक्षी का अर्थ है- बड़ी आँखों वाली। स्कंद पुराण के अनुसार, जब काशी में किसी ने भी महर्षि वेदव्यास को भिक्षा नहीं दी, तब देवी विशालाक्षी ने उन्हें भोजन कराया था। माँ अन्नपूर्णा से जुड़ी देवी विशालाक्षी उस समय एक साधारण गृहिणी के रूप में प्रकट हुईं और उन्होंने स्नेहपूर्वक महर्षि वेदव्यास को भोजन कराया।
यह मंदिर मीर घाट (वाराणसी) के पास, लाहोटी टोला में स्थित है। मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती के दाहिने कान का मणि-कुण्डल गिरा था। इसी कारण विशालाक्षी देवी को मणिकर्णी देवी के नाम से भी जाना जाता है। रोचक बात यह है कि इस मंदिर के निकट ही प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट स्थित है। मान्यता है कि इस घाट का नाम देवी के मणि-कुण्डल से जुड़ी इस पौराणिक कथा के कारण पड़ा है।
यहाँ भगवान शिव, देवी माँ के साथ काल भैरव के रूप में विराजमान हैं। कालभैरव अर्थात् मृत्यु के स्वामी। देवी विशालाक्षी को मातृशक्ति के तीन महान स्वरूपों में से एक माना जाता है। अन्य दो स्वरूप हैं मदुरै की देवी मीनाक्षी और कांचीपुरम की माँ कामाक्षी। तांत्रिक विद्वान इन तीनों पवित्र मंदिरों को प्रतीकात्मक रूप से श्रीचक्र मंडल की अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं।
पंचसागर शक्तिपीठ, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

(माँ वाराही)
यह शक्तिपीठ माँ वाराही को समर्पित है। यह वह पवित्र स्थल माना जाता है जहाँ देवी का निचला जबड़ा (या निचले दाँत) गिरा था। माँ वाराही को प्रायः वराह (शूकर) के मुख के साथ दर्शाया जाता है, जो उनकी अपार शक्ति अर्थात् आदिशक्ति के स्वरूप का प्रतीक है। वे अपने हाथ में प्रायः भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र के समान एक चक्र धारण करती हैं। उनका वाहन कभी सिंह, कभी जंगली वराह, तो कभी भैंस के रूप में भी दर्शाया जाता है। देवी के इस रूप से जुड़ी अनेक कथाएँ प्रचलित हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं।
माँ वाराही और भगवान विष्णु का वराह अवतार
देवी माहात्म्य के अनुसार, जब देवताओं ने शक्तिशाली असुरों चंड, मुंड, शुंभ और निशुंभ का संहार करने के लिए देवी माँ का आवाहन किया, तब देवताओं के शरीरों से अनेक दिव्य शक्तियाँ प्रकट हुईं। ये शक्तियाँ सप्तमातृकाओं, अर्थात् सात मातृ देवियों के रूप में प्रकट हुईं। इनमें से एक माँ वाराही थीं, जो भगवान विष्णु के वराह अवतार की शक्ति के रूप में प्रकट हुईं और श्री विष्णु के उस वराह रूप के समान ही शक्ति और संरक्षण का प्रतीक मानी जाती हैं।
शैव परंपरा में माँ वाराही
वाराणसी में माँ वाराही, जिन्हें माँ बाराही के नाम से भी जाना जाता है, का संबंध भगवान शिव से माना जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, देवी का यह रूप चौसठ योगिनियों में से एक है। ये योगिनियाँ शक्ति के अत्यंत शक्तिशाली स्वरूप मानी जाती हैं, जो तांत्रिक उपासना से जुड़ी हैं।
हिरण्याक्ष वध की कथा
एक अन्य कथा माँ वाराही को उस प्रसंग से जोड़ती है जिसमें भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण कर असुर हिरण्याक्ष से युद्ध किया था, ताकि पृथ्वी को ब्रह्मांडीय सागर में डूबने से बचाया जा सके। कुछ परंपराओं के अनुसार, इस युद्ध में भगवान वराह की सहायता के लिए माँ वाराही प्रकट हुईं। वे उस स्त्री-शक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं, जो दिव्य कार्य के साथ उपस्थित रहकर उसे समर्थ और सशक्त बनाती है।
ललिता देवी शक्तिपीठ, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)

(मध्य में माँ ललिता, उनके साथ माँ सरस्वती और माँ काली)
ललिता देवी शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में पवित्र नदियों के संगम पर स्थित है।
अंगुली-वृन्दं हस्तस्य प्रयागे ललिता भव।
शक्तिपीठ स्तोत्र का यह श्लोक बताता है कि देवी सती के हाथ की अंगुलियों का समूह (अंगुली-वृंद) प्रयागराज में गिरा था, जिससे यह स्थान एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली केंद्र बन गया। माँ ललिता का अर्थ है “वे जो लीला करने वाली और अत्यंत सौम्य एवं मनोहर हैं।” तंत्र चूडामणि के अनुसार, प्रयागराज में देवी माँ की पूजा माधवेश्वरी और राजराजेश्वरी (राजाओं की अधिपति) के रूप में भी की जाती है।
उन्हें माँ त्रिपुरसुंदरी का भी अभिन्न अंग माना जाता है, जो शक्ति का सर्वोच्च स्वरूप हैं और तीनों लोकों का संचालन करती हैं। इस शक्तिपीठ में उनके साथ विराजमान भैरव को भव कहा जाता है, जो अस्तित्व के शाश्वत तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं।
कात्यायनी शक्तिपीठ, वृंदावन (उत्तर प्रदेश)

(कात्यायनी शक्तिपीठ, वृंदावन, उत्तर प्रदेश)
यमुना के तट पर स्थित कात्यायनी शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र के पवित्र नगर वृंदावन में स्थित है। पुराणों में वर्णन मिलता है कि माँ कात्यायनी, जो माँ दुर्गा का एक स्वरूप हैं, का प्राकट्य ऋषि कात्यायन के यहाँ हुआ था। वे महिषासुर नामक असुर का वध करने वाली देवी मानी जाती हैं।
कात्यायनी शक्तिपीठ वह स्थान है जहाँ देवी सती के केश (बाल) गिरे थे। इस शक्तिपीठ में उनके साथ विराजमान भैरव को भैरव भूतेष कहा जाता है, जो भगवान शिव की संरक्षक उपस्थिति का प्रतीक हैं।
वैष्णव परंपराओं के अनुसार, श्रीमती राधारानी और ब्रज की गोपियों ने श्री कृष्ण को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए माँ कात्यायनी की आराधना की थी। इस पूजा का वर्णन भागवत पुराण में मिलता है, जिसे कात्यायनी व्रत कहा जाता है। यह भी माना जाता है कि श्री कृष्ण ने अपने मामा कंस का सामना करने और उनका वध करने से पहले माँ कात्यायनी से आशीर्वाद लिया था, जो देवी माँ की दिव्य शक्ति को स्वीकार करने का प्रतीक है।
मंदिर में माँ कात्यायनी की मूर्ति तलवार धारण किए हुए हैं, जो देवी की शक्ति का प्रतीक है। यह शक्ति अज्ञान को काटने और भक्तों के अहंकार का नाश करने के लिए है, ताकि वे आध्यात्मिक जागरण की ओर अग्रसर हो सकें।
शिवानी देवी शक्तिपीठ, रामगिरि (उत्तर प्रदेश)

(शिवानी देवी शक्तिपीठ, रामगिरी, उत्तर प्रदेश)
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित यह शक्तिपीठ माँ शिवानी को समर्पित है। शिवानी, अर्थात् भगवान शिव की पत्नी, माँ शिवानी देवी माँ का सौम्य और समर्पित रूप हैं। इस स्वरूप में देवी माँ भगवान शिव की तपस्वी ऊर्जा को गृहस्थ जीवन की दिशा में प्रवाहित करती हैं।
शिवानी देवी शक्तिपीठ वह पवित्र स्थान है जहाँ देवी सती का दायां स्तन गिरा था। इस शक्तिपीठ में उनके साथ विराजमान भैरव को भैरव चंड कहा जाता है, जो भगवान शिव का एक उग्र रूप हैं और इस पवित्र स्थल की रक्षा करते हैं।
चित्रकूट के आसपास का यह क्षेत्र गहरी आध्यात्मिक महत्ता रखता है, क्योंकि यहीं श्री राम ने माता सीता और लक्ष्मण के साथ अपने वनवास का एक महत्वपूर्ण समय बिताया। रामगिरि की पवित्र भूमि का उल्लेख शास्त्रीय संस्कृत साहित्य में भी मिलता है। ऐसा माना जाता है कि महान कवि कालिदास ने अपने काव्यों में इस क्षेत्र का वर्णन करते हुए इसे सौंदर्य, भक्ति और आध्यात्मिक प्रेरणा का स्थल बताया है।
भद्रकाली शक्तिपीठ, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)

(भद्रकाली शक्तिपीठ, कुरुक्षेत्र, हरियाणा)
यह शक्तिपीठ हरियाणा के कुरुक्षेत्र में, ब्रह्म सरोवर के निकट स्थित है, जिसका संबंध महाभारत के युद्ध से है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का टखना (एड़ी का ऊपरी भाग) गिरा था। इस स्थान पर देवी की आराधना उनके उग्र और संरक्षक स्वरूप भद्रकाली के रूप में की जाती है, और यहाँ के भैरव को स्थाणु कहा जाता है। संस्कृत में स्थाणु का अर्थ होता है — अचल, दृढ़ या स्तंभ के समान स्थिर। हमारे शास्त्रों में भगवान शिव को स्थाणु इसलिए कहा गया है क्योंकि वे एक अनंत ज्योतिर्मय स्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे, जो निरंतर परिवर्तनशील ब्रह्मांड के बीच पूर्ण स्थिरता और शाश्वतता का प्रतीक है।
स्थानीय परंपरा के अनुसार, पांडवों ने श्री कृष्ण के साथ महाभारत के युद्ध से पूर्व इसी मंदिर में देवी की आराधना की थी। आज भी भक्त यहाँ शक्ति, संरक्षण और जीवन की कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने के लिए देवी माँ की आराधना करते हैं।
त्रिपुरमालिनी देवी शक्तिपीठ, जालंधर (पंजाब)

(त्रिपुरमालिनी देवी)
त्रिपुरमालिनी देवी शक्तिपीठ जालंधर, पंजाब में स्थित है और इसे देवी तालाब मंदिर के नाम से पहचाना जाता है। यहाँ देवी सती का बायाँ स्तन गिरा था, जो पोषण, करुणा और देवी माँ की पालनहार शक्ति का प्रतीक है। इसलिए इस मंदिर को स्तनपीठ के नाम से भी जाना जाता है।
देवी त्रिपुरमालिनी, माँ का एक शक्तिशाली स्वरूप हैं, और उनका संबंध महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली की दिव्य ऊर्जाओं से है। ये तीनों स्वरूप ज्ञान, समृद्धि और परिवर्तनकारी शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इस शक्तिपीठ में उनके साथ विराजमान भैरव को भीषण कहा जाता है, जो भगवान शिव का उग्र रूप हैं और इस पवित्र स्थल की रक्षा करते हैं। भक्त मानते हैं कि इस मंदिर में भक्ति और समर्पण से पूजा करने पर मनोकामनाएँ शीघ्र पूर्ण होती हैं, जिसके कारण देवी को स्नेहपूर्वक माँ तुरत्पूर्णि कहा जाता है, अर्थात् वे माँ जो अपने भक्तों की प्रार्थनाओं को शीघ्र पूर्ण करती हैं।
ज्वालाजी शक्तिपीठ, कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)

(देवी का अनन्त अग्नि (ज्योति) स्वरूप।)
हिमाचल प्रदेश की शांत और सुंदर कांगड़ा घाटी में स्थित ज्वालाजी शक्तिपीठ में देवी सती की जिह्वा (जीभ) गिरी थी। दुर्गा शतनाम स्तोत्रम् में माँ दुर्गा को अग्निज्वाला, रौद्रमुखी, कालरात्रि और तपस्विनी के नामों से भी संबोधित किया गया है। हिंदू परंपरा में अग्नि की सात लहराती ज्वालाओं को अग्निदेव की सात जिह्वाएँ (सप्तजिह्वा) माना जाता है।
अधिकांश मंदिरों के विपरीत, ज्वालाजी पीठ में कोई प्रतिमा नहीं है। देवी की पूजा प्राकृतिक और शाश्वत ज्वालाओं के रूप में की जाती है। ये ज्वालाएँ गर्भगृह के भीतर एक पवित्र कुंड में रखी चट्टान की दरारों से प्रकट होती हैं। ये नौ ज्वालाएँ नौ देवियों—महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विद्या वासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका और अंजी देवी, का प्रतिनिधित्व करती हैं। यहाँ उपस्थित भैरव का स्वरूप उन्मत्त के नाम से जाना जाता है।
स्थानीय परंपराओं के अनुसार, कांगड़ा के शासक कटोच वंश के राजा भूमि चंद को एक दिव्य स्वप्न आया, जिसके बाद उन्होंने इस पवित्र स्थान की खोज की और यहाँ मंदिर का निर्माण कराया।
इस ब्लॉग में भारत की पावन भूमि पर देवी माँ की दिव्य और व्यापक उपस्थिति की एक झलक प्रस्तुत की गई है। नवरात्रि का पावन समय शक्ति की उपासना के लिए अत्यंत उपयुक्त होता है। देवी माँ के साथ गहन संबंध स्थापित करने के लिए हम आपको 19 से 28 मार्च 2026 तक साधना ऐप पर आयोजित होने वाली नवरात्रि साधना में आमंत्रित करते हैं। नवदुर्गा साधना कर देवी माँ की कृपा और संरक्षण प्राप्त करें। हमारी अगली यात्रा में हम शेष शक्तिपीठों का और अधिक गहराई से अध्ययन करेंगे।
ॐ श्री मात्रे नमः!
संदर्भ:
- Chinnaiyan, Kavita. Shakti Rising: Embracing Shadow and Light. Non-Duality Press, 2017.
- Pande, Alka. Shakti: 51 Sacred Peethas of the Goddess. Rupa Publications, 2020.
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Presented By Team Sadhana