51 शक्तिपीठ - देवी माँ के पावन धाम
मध्य जून (असमिया माह 'अहार') के दौरान, जब सूर्य मिथुन राशि में प्रवेश करता है, तब असम में एक अनोखे उत्सव 'अंबुबाची मेला' की तैयारियाँ आरम्भ हो जाती हैं। इस समय ब्रह्मपुत्र नदी अपने उफान पर होती है और माना जाता है कि धरती की उर्वरक क्षमता अपने चरम पर होती है। तीन दिनों तक कामाख्या मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। यह देवी माँ के वार्षिक रजस्वला काल (मासिक धर्म) का समय होता है। किसान इस अवधि में भूमि की जुताई या बीज बोने से बचते हैं, ताकि 'धरती माँ' बिना किसी व्यवधान के विश्राम कर सके।
कामाख्या मंदिर स्त्री-शक्ति की सृजनात्मक क्षमता का उत्सव मनाता है। 51 शक्तिपीठों में से कामाख्या मंदिर देवी की योनि (गर्भ) का प्रतिनिधित्व करता है, जो समस्त सृष्टि के प्रारंभ का स्रोत है।
'शक्तिपीठ' या 'शक्तिपीठम्' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, 'शक्ति', जिसका अर्थ है परम ऊर्जा, जो माँ देवी के रूप में प्रकट होती है; और 'पीठ', जिसका अर्थ है आसन, वेदी या पवित्र निवास-स्थान। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्रम् के निम्नलिखित श्लोक में इसका उल्लेख मिलता है—
पञ्चाशदेकपीठानि एवं भैरवदेवताः ।
अङ्गप्रत्यङ्गपातेन विष्णुचक्रक्षतेन च ॥ ३॥
ममाद्यवपुषो देव हिताय त्वयि कथ्यते ।
— अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्रम्
(इस श्लोक में देवी माँ कहती हैं कि 51 पवित्र शक्तिपीठ और उनके भैरव उस समय प्रकट हुए, जब भगवान विष्णु के चक्र द्वारा उनके दिव्य शरीर के अंग-प्रत्यंग खंडित किए गए।)
शक्तिपीठ ब्रह्मांडीय ऊर्जा के केंद्र माने जाते हैं। माना जाता है कि जब दुःख से व्यथित भगवान शिव देवी सती के शरीर को उठाकर उग्र रुद्र तांडव नृत्य कर रहे थे, तब उनके शरीर के विभिन्न अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरे।
विभिन्न शक्तिपीठों का विस्तृत वर्णन कुलचूड़ामणि तंत्र (तंत्र चूड़ामणि) में मिलता है, जो शाक्त आगम परंपरा का एक प्रमुख ग्रंथ है। इस तांत्रिक ग्रंथ में, जो देवी और भगवान शिव के मध्य संवाद के रूप में प्रस्तुत है, देवी माँ शक्ति उपासना के सिद्धांतों का वर्णन करती हैं, जिनमें विधि-विधान, मंत्र और आध्यात्मिक साधनाएँ सम्मिलित हैं।
तंत्र चूड़ामणि के अंतर्गत 'पीठ निर्णय तंत्र' अथवा 'महापीठनिरूपण' नामक खंड में पवित्र शक्तिपीठों की सूची दी गई है तथा प्रत्येक स्थान पर पूजित देवी (स्त्री ऊर्जा) के विशिष्ट स्वरूप का वर्णन है। इसमें प्रत्येक पीठ से संबंधित भैरव (भगवान शिव का एक रूप तथा पुरुष ऊर्जा का प्रतीक) की भी पहचान बताई गई है।
प्रमुख बातें:
- 51 शक्तिपीठों की पूर्ण सूची
- शक्तिपीठों की स्थापना : देवी सती और भगवान शिव की कहानी
- भगवान भैरव : शक्तिपीठ के संरक्षक
- 51 का गहन संबंध : शक्तिपीठों के स्थान और मातृकाएँ
- महादेव से देवी माँ तक
51 शक्तिपीठों की पूर्ण सूची
देवी भागवत पुराण के अनुसार, देवी सती का शरीर 108 स्थानों पर गिरा, जिन्हें शक्तिपीठ कहा जाता है। वर्तमान में 51 शक्तिपीठ मान्यता प्राप्त हैं, जिनमें से 18 को अष्टादश महाशक्तिपीठ कहा जाता है और इन्हें प्रमुख केंद्र माना जाता है।
भारतीय उपमहाद्वीप में अनेक पवित्र शक्तिपीठ स्थित हैं। प्रत्येक पीठ एक शाश्वत मंदिर है, जहाँ देवी माँ की शक्ति संसार को आशीर्वाद और सुरक्षा प्रदान करती रहती है। ये शक्तिपीठ पूर्वोत्तर के रहस्यमय पहाड़ियों में, हिमालय की ऊँचाइयों में, पश्चिमी तटों के किनारों पर, दक्षिणी समुद्रों तक और यहाँ तक कि पड़ोसी देशों में भी फैले हुए हैं।
उत्तर भारत एवं मध्य भारत
- उमा शक्तिपीठ, मिथिला (बिहार)
- मंगला गौरी शक्तिपीठ, गया (बिहार)
- जय दुर्गा शक्तिपीठ (हृदय पीठ), बैद्यनाथ (झारखंड)
- विशालाक्षी शक्तिपीठ, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
- पंचसागर शक्तिपीठ, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
- ललिता देवी शक्तिपीठ, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)
- कात्यायनी शक्तिपीठ, वृंदावन (उत्तर प्रदेश)
- शिवानी देवी शक्तिपीठ, रामगिरी (उत्तर प्रदेश)
- भद्रकाली शक्तिपीठ, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)
- त्रिपुरमालिनी देवी शक्तिपीठ, जालंधर (पंजाब)
- ज्वालाजी शक्तिपीठ, कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)
- महामाया शक्तिपीठ, अमरनाथ (जम्मू और कश्मीर)
- श्री पर्वत (सुंदरी) शक्तिपीठ, लद्दाख
- अवंती शक्तिपीठ, भैरव पर्वत, उज्जैन (मध्य प्रदेश) प्रदेश)
- मंगल चंडिका शक्तिपीठ, उज्जैन (मध्य प्रदेश)
- कालमाधव देवी शक्तिपीठ, अमरकंटक (मध्य प्रदेश)
- नर्मदा शक्तिपीठ, अमरकंटक (मध्य प्रदेश)
पूर्वी भारत
- त्रिपुरा सुंदरी शक्तिपीठ, उदयपुर (त्रिपुरा)
- कामाख्या देवी शक्तिपीठ, कामगिरी (असम)
- जयंती देवी शक्तिपीठ, जैंतिया हिल्स (मेघालय)
- कालीघाट शक्तिपीठ, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
- जोगद्या शक्तिपीठ, क्षीरग्राम (पश्चिम बंगाल)
- बहुला शक्तिपीठ, केतुग्राम, कटवा (पश्चिम बंगाल)
- त्रिस्त्रोता शक्तिपीठ, शालबाड़ी गाँव, फालाकाटा, जलपाईगुड़ी ज़िला, पश्चिम बंगाल
- नलहाटी शक्तिपीठ, नलहाटी, बीरभूम ज़िला, पश्चिम बंगाल
- फुल्लारा देवी शक्तिपीठ, अट्टहास (पश्चिम बंगाल)
- रत्नावली शक्तिपीठ, हुगली (पश्चिम बंगाल)
- महिषमर्दिनी शक्तिपीठ, बीरभूम (पश्चिम बंगाल)
- नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ, बीरभूम (पश्चिम बंगाल)
- किरीटेश्वरी देवी शक्तिपीठ, मुर्शिदाबाद, (पश्चिम बंगाल)
- बरगभीमा देवी शक्तिपीठ, ईस्ट मिदनापुर, (पश्चिम बंगाल)
पश्चिम भारत
- त्र्यंबकेश्वर भ्रामरी देवी शक्तिपीठ, पंचवटी, नासिक (महाराष्ट्र)
- श्री महालक्ष्मी (अंबाबाई) मंदिर, कोल्हापुर (महाराष्ट्र)
- मणिबंध शक्तिपीठ, पुष्कर (राजस्थान)
- विराट शक्तिपीठ , विराटनगर, जयपुर (राजस्थान)
- कालिका शक्तिपीठ, पावागढ़ (गुजरात)
- चंद्रभागा शक्तिपीठ, प्रभास, गिरना हिल्स (गुजरात)
दक्षिण भारत
- श्रीशैलम शक्तिपीठ, श्रीशैलम (आंध्र प्रदेश)
- उमा कोटिलिंगेश्वर स्वामी / गोदावरी तीर शक्तिपीठ, राजमुंदरी (आंध्र प्रदेश)
- देवगर्भा शक्तिपीठ, कांचीपुरम (तमिलनाडु)
- कन्याश्रम शक्तिपीठ, कन्याकुमारी (तमिलनाडु)
- विरजा क्षेत्र (माँ बिरजा मंदिर), जाजपुर, (ओडिशा)
पड़ोसी देशों में स्थित शक्तिपीठ
- गंडकी देवी शक्तिपीठ, मुक्तिनाथ (नेपाल)
- गुह्येश्वरी शक्तिपीठ, काठमांडू (नेपाल)
- दाक्षायनी देवी शक्तिपीठ, मानस (तिब्बत)
- भवानीपुर शक्तिपीठ, करतोया, भबानीपुर (बांग्लादेश)
- जशोरेश्वरी देवी शक्तिपीठ, जेसोर (बांग्लादेश)
- सुगंधा देवी शक्तिपीठ, शिकारपुर (बांग्लादेश)
- चट्टला शक्तिपीठ, सीताकुंड, (बांग्लादेश)
- कोट्टरी देवी शक्तिपीठ, हिंगलाज (पाकिस्तान)
- इंद्राक्षी शक्तिपीठ, मणिपल्लवम (श्रीलंका)
आइए अब हम शक्तिशाली शक्तिपीठों की कहानी को और गहराई से जानें तथा उनमें निहित आध्यात्मिक सत्यों को समझें।
शक्तिपीठों की स्थापना - देवी सती और भगवान शिव की कहानी
विष्णु पुराण और पद्म पुराण के अनुसार, भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक प्रजापति दक्ष थे। प्रजापति दक्ष को उनकी पत्नी प्रसूति से चौबीस पुत्रियाँ हुईं। सबसे छोटी पुत्री देवी सती थीं, जिन्हें दाक्षायणी के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने अपने पिता की कड़ी असहमति के बावजूद भगवान शिव से विवाह किया।

(दक्ष द्वारा किए गए अपमान के बाद देवी सती ने स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया)
ओम स्वामी जी द्वारा लिखित ' कुंडलिनी : एक अनकही कथा' पुस्तक में वर्णित कहानी के अनुसार, देवी सती के भगवान शिव से विवाह के पश्चात प्रजापति दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, ऋषिगण, वसु, आदित्य तथा अनेक अन्य देवताओं को आमंत्रित किया गया था। इस यज्ञ के ऋत्विक स्वयं बृहस्पति देव थे। जब सभी देवता वहाँ उपस्थित थे, तब भगवान शिव कैलाश पर्वत पर शांत भाव से ध्यानमग्न थे।
भव्य समारोह को लेकर देवी सती अत्यंत उत्साहित थीं। उन्होंने इसमें सम्मिलित होने का निश्चय किया, यद्यपि प्रजापति दक्ष ने उन्हें और महादेव को आमंत्रित नहीं किया था। भगवान शिव द्वारा वहाँ जाने से मना करने के बावजूद, उन्होंने यज्ञ में जाने का निर्णय लिया।
जब देवी सती यज्ञ में पहुँचीं, तो उन्होंने देखा कि उनके और उनके पति भगवान शिव के लिए कोई आसन निर्धारित नहीं था। जब उन्होंने अपने पिता से इसका कारण पूछा, तो राजा दक्ष ने क्रोधित होकर कहा कि वे अब भी भगवान शिव को उनके पति के रूप में स्वीकार करने के निर्णय से असहमत हैं और उनके लिए वहाँ कोई स्थान नहीं है।
देवी भागवत पुराण और कालिका पुराण के अनुसार, देवी सती इस घटना से हैरान थीं और यह अपमान सहन नहीं कर पा रही थीं। दुःखी हृदय के साथ देवी सती ने घोषणा की कि वे उस नश्वर शरीर में नहीं रहेंगी, जिसे उन्होंने दक्ष की पुत्री (दक्षपुत्री) के रूप में प्राप्त किया था, क्योंकि राजा दक्ष ने 'शंकर' का अपमान किया था। इसके तुरंत बाद देवी सती ने अपनी आंतरिक शक्ति का आवाहन किया और स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया।
जब भगवान शिव को यह समाचार मिला, तो उनका शोक प्रचंड क्रोध में परिवर्तित हो गया। उनकी जटाओं से शक्तिशाली योद्धा वीरभद्र तथा उग्र देवी स्वरूप भद्रकाली प्रकट हुए। उन्होंने दक्ष के यज्ञ पर धावा बोल दिया और सब कुछ नष्ट कर दिया। वीरभद्र ने प्रजापति दक्ष का मस्तक काट दिया। यह देखकर वहाँ उपस्थित देवता भय से काँप उठे।

(भगवान शिव द्वारा देवी सती के शरीर को ले जाते हुए, एक प्रतीकात्मक चित्र)
शोक और क्रोध से व्याकुल भगवान शिव देवी सती के शरीर को अपने कंधों पर उठाए हुए रुद्र तांडव (विनाश का नृत्य) कर रहे थे। महादेव के इस प्रचंड क्रोध से ब्रह्मांड का संतुलन बिगड़ने लगा। यह देखकर देवताओं ने श्री विष्णु से पुनः संतुलन स्थापित करने की प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया और देवी सती के शरीर को अनेक भागों में विभाजित कर दिया।
यत्र यत्र पतत् अङ्गं सतीदेहस्य भूतले
तत्र तत्र स्थिताः शक्तिः पीठरूपेण शाश्वती ॥
(तंत्र चूड़ामणि)
भावार्थ : जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर देवी सती के शरीर के अंग गिरे, वहाँ-वहाँ वे सदा के लिए शक्तिपीठ के रूप में स्थापित हो गईं।
रोचक बात यह है कि प्रत्येक शक्तिपीठ के साथ एक विशिष्ट भैरव भी जुड़ा होता है।
भगवान भैरव - शक्तिपीठ के संरक्षक

(काल भैरव, उज्जैन के संरक्षक एवं नगर कोतवाल)
धीरे-धीरे जब माँ सती का शरीर पूर्णतः पृथ्वी पर गिर गया, तब भगवान शिव का शोक और क्रोध भी कम होने लगा और ब्रह्मांड का संतुलन पुनः स्थापित हो गया। कैलाश पर्वत पर गहन ध्यान में लीन होने के लिए प्रस्थान करने से पहले महादेव ने प्रत्येक शक्तिपीठ को आशीर्वाद दिया। साथ ही, उन्होंने हर स्थान पर अपने ही एक अंश को भैरव के रूप में स्थापित किया, जो रक्षक या क्षेत्रपाल के रूप में सदैव शक्ति के साथ रहते हैं।
तांत्रिक दर्शन के उच्चतम सिद्धांत के अनुसार देवी और भैरव कभी अलग नहीं होते। कुलार्णव तंत्र की एक प्रसिद्ध उक्ति है— "भैरवोऽहम् परा शक्तिः", अर्थात् "मैं भैरव हूँ; मैं ही परम शक्ति हूँ।"
कौल या कौलाचार (एक तांत्रिक परंपरा, जिसमें शिव-शक्ति की विशिष्ट विधियों द्वारा उपासना की जाती है) में एक प्रमुख सिद्धांत है, 'शक्तिहीन शिव शव', अर्थात् शक्ति के बिना भगवान शिव एक शव के समान हैं। किंतु इसका उल्टा भी उतना ही सत्य है, भैरव अर्थात् चेतना के अभाव में शक्ति अनियंत्रित हो जाती है।
उन्नत कौल आचार्यों के अनुसार, देवी सती के शरीर का पृथ्वी पर गिरना ब्रह्मांडीय ऊर्जा के मानव शरीर में विभाजन का प्रतीक है। इसलिए पीठ ब्रह्मांड में भी और मानव शरीर (सूक्ष्म जगत) में भी पवित्र स्थान या ऊर्जा केंद्र माने जाते हैं।
भगवान भैरव प्रत्येक शक्तिपीठ पर जाग्रत चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं और साथ ही शरीर के प्रत्येक मातृका ऊर्जा-केंद्र में भी उसी चेतना के रूप में विद्यमान माने जाते हैं। (इस विषय पर बाद में विस्तार से चर्चा की जाएगी।)
इसलिए तांत्रिक परंपराएँ कहती हैं कि देवी के समीप पहुँचने के लिए सबसे पहले शिव साधना के माध्यम से आंतरिक स्थिरता (भैरव चेतना) का आवाहन करना आवश्यक है। इसी प्रकार, किसी शक्तिपीठ के दर्शन करते समय भगवान भैरव के दर्शन और पूजन करना अनिवार्य माना जाता है।
51 का गहन संबंध - शक्तिपीठों के स्थान और मातृकाएँ

(भारत में शक्ति का पवित्र सम्बन्ध)
51 शक्तिपीठों का प्रतीकात्मक संबंध संस्कृत वर्णमाला के 51 अक्षरों से माना जाता है। कहा जाता है कि ये अक्षर भगवान शिव के डमरू के नाद (ध्वनियों) से प्रकट हुए थे। ये अक्षर देवी माँ की सृजनात्मक ध्वनि-तरंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं और सामूहिक रूप से मातृकाएँ कहलाते हैं, जिन्हें देवी का सूक्ष्म स्वरूप माना जाता है।
ललिता सहस्रनाम में दिव्य माता की स्तुति 'पञ्चाशत् पीठ रूपिणी' के रूप में की गई है, जिसका अर्थ है, 'वे जो 50 पवित्र उपासना-स्थलों में विद्यमान हैं।'
सूक्ष्म शरीर के संदर्भ में यह विचार संकेत देता है कि शक्तिपीठ केवल बाहरी पवित्र स्थल ही नहीं हैं, बल्कि आंतरिक आध्यात्मिक केंद्र भी हैं। ये केंद्र मातृका शक्ति से जुड़े माने जाते हैं; अर्थात् संस्कृत वर्णमाला के अ (अ) से क्ष (क्ष) तक के 50 अक्षर, या फिर अनुस्वार (बिंदु) और विसर्ग को मिलाकर कुल 51 अक्षर, जो दिव्य ध्वनि और शक्ति के प्रतीक हैं।
इस प्रकार देवी सूक्ष्म शरीर में मातृका शक्ति, अर्थात् पवित्र ध्वनि के रूप में निवास करती हैं। साथ ही, वे बाह्य रूप से पवित्र शक्तिपीठों में भी पूजित होती हैं, जो इन आंतरिक आध्यात्मिक केंद्रों की बाहरी अभिव्यक्ति हैं। श्री विद्या उपासना में इस विचार को 'पीठ न्यास' नामक एक विशेष धार्मिक क्रिया के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। इसमें साधक अपने शरीर में शक्तिपीठों और मातृकाओं की ऊर्जा को स्थापित करता है और शरीर को देवी माँ का पवित्र निवास-स्थान मानता है।
चलिए इस पावन यात्रा को आगे बढ़ाते हैं और 51 शक्तिपीठों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी आपसे साझा करते हैं।
उमा शक्तिपीठ, (बिहार)
यह शक्तिपीठ बिहार के दरभंगा नगर में स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का वाम स्कंध (बायाँ कंधा) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा माँ उमा के रूप में और भगवान शिव की पूजा महोदर भैरव के रूप में की जाती है।
मंगला गौरी शक्तिपीठ, गया (बिहार)
मंगला गौरी शक्तिपीठ बिहार के गया नगर में स्थित है। यह वह पवित्र स्थान माना जाता है जहाँ देवी सती के स्तन गिरे थे। यहाँ देवी माँ की पूजा सर्वमंगला स्वरूप में की जाती है, और यहाँ भगवान शिव महेश्वर के रूप में विराजमान हैं।
जय दुर्गा शक्तिपीठ (हृदय पीठ), बैद्यनाथ (झारखंड)
यह शक्तिपीठ झारखंड के गिरिडीह जिले के देवघर में बैद्यनाथ धाम के ठीक सामने स्थित है, जो भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यहाँ माता सती का हृदय (हृदयस्थल) गिरा था। देवी माँ को यहाँ माँ जय दुर्गा के रूप में पूजा जाता है और उनके भैरव भगवान बैद्यनाथ हैं।
विशालाक्षी शक्तिपीठ, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
यह शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश के वाराणसी (काशी) में मीर घाट के पास, मणिकर्णिका घाट के समीप स्थित है। मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती के दाहिने कान का मणि-कुण्डल गिरा था। यहाँ देवी विशालाक्षी के साथ भगवान शिव काल भैरव के रूप में विराजमान हैं।
पंचसागर शक्तिपीठ, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
पंचसागर शक्तिपीठ वाराणसी (काशी) में स्थित है और यह माँ वाराही को समर्पित माना जाता है। मान्यता के अनुसार, यहाँ देवी सती का निचला जबड़ा (निचले दाँत) गिरा था। यहाँ के रक्षक भैरव महारुद्र है।
ललिता देवी शक्तिपीठ, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)
ललिता देवी शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में पवित्र नदियों के संगम पर स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती के हाथ की अंगुलियों का समूह (अंगुली-वृंद) गिरा था। यहाँ देवी माँ की पूजा ललिता, माधवेश्वरी और राजराजेश्वरी स्वरूपों में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव को भव कहा जाता है।
कात्यायनी शक्तिपीठ, वृंदावन (उत्तर प्रदेश)
यमुना के तट पर स्थित कात्यायनी शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र के पवित्र नगर वृंदावन में स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती के केश (बाल) गिरे थे। यहाँ देवी की पूजा माँ कात्यायनी के रूप में की जाती है।इस शक्तिपीठ में उनके साथ विराजमान भैरव को भैरव भूतेष कहा जाता है।
शिवानी देवी शक्तिपीठ, रामगिरी (उत्तर प्रदेश)
यह शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा के निकट रामगिरी क्षेत्र में स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का दायाँ स्तन गिरा था। इस शक्तिपीठ में देवी माँ शिवानी और भैरव चंड की पूजा की जाती है।
भद्रकाली शक्तिपीठ, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)
भद्रकाली शक्तिपीठ हरियाणा के कुरुक्षेत्र में ब्रह्म सरोवर के निकट स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का टखना (एड़ी का ऊपरी भाग) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा भद्रकाली स्वरूप में और भगवान शिव की पूजा स्थाणु भैरव के रूप में की जाती है।
त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ, जालंधर (पंजाब)
यह शक्तिपीठ पंजाब के जालंधर में स्थित है, जिसे देवी तालाब मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ देवी सती का बायाँ स्तन गिरा था। इस शक्तिपीठ के भैरव को भीषण कहा जाता है।देवी त्रिपुरमालिनी को ज्ञान, समृद्धि और शक्ति की अधिष्ठात्री माना जाता है।
ज्वालाजी शक्तिपीठ, कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)
हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी में स्थित ज्वालाजी शक्तिपीठ वह स्थान माना जाता है, जहाँ देवी सती की जिह्वा गिरी थी। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ देवी की पूजा प्राकृतिक और अखंड ज्योतियों के रूप में की जाती है, न कि प्रतिमा के रूप में। यहाँ के भैरव उन्मत्त नाम से जाने जाते हैं।
महामाया शक्तिपीठ, अमरनाथ (जम्मू-कश्मीर)
यह शक्तिपीठ जम्मू-कश्मीर की अमरनाथ गुफा में स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का कंठ (गला) गिरा था। यहाँ देवी माँ की पूजा महामाया के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव त्रिसंध्येश्वर कहलाते हैं।
श्री पर्वत (सुंदरी) शक्तिपीठ, लद्दाख
श्री पर्वत शक्तिपीठ, जिसे सुंदरी शक्तिपीठ भी कहा जाता है, यह लद्दाख क्षेत्र की एक ऊँची पर्वत-चोटी में स्थित है। यहाँ देवी सती का दाहिना नूपुर (पायल) अथवा उनके दाहिने चरण का तलवा गिरा था। देवी माँ को यहाँ श्री सुंदरी के रूप में और भगवान शिव को सुंदरानंद भैरव के रूप में पूजित किया जाता है।
अवंती शक्तिपीठ, भैरव पर्वत, उज्जैन (मध्य प्रदेश)
यह शक्तिपीठ मध्य प्रदेश के उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर स्थित भैरव पर्वत पर स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का ऊपरी होंठ गिरा था। यहाँ देवी की पूजा अवंती माँ, गढ़कालिका अथवा महाकाली के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव लंबकर्ण हैं।
मंगल चंडिका शक्तिपीठ, उज्जैन (मध्य प्रदेश)
यह शक्तिपीठ मध्य प्रदेश के उज्जैन में रुद्र सागर झील के समीप स्थित है, जिसे हरसिद्धि माता मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती की कुर्पर (कोहनी) गिरी थी। यहाँ देवी की पूजा मंगल चंडिका के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव कपिलाम्बर कहलाते हैं।
कालमाधव देवी शक्तिपीठ, अमरकंटक (मध्य प्रदेश)
यह शक्तिपीठ मध्य प्रदेश के अमरकंटक में स्थित है, जो विंध्य, मैकाल और सतपुड़ा पर्वतमालाओं के संगम पर नर्मदा नदी के पवित्र उद्गम के निकट स्थित है।मान्यता है कि यहाँ देवी सती का बायाँ नितम्ब (कूल्हा) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा काली स्वरूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव असितांग (रुरु) कहलाते हैं।
नर्मदा शक्तिपीठ, अमरकंटक (मध्य प्रदेश)
नर्मदा शक्तिपीठ, कालमाधव देवी शक्तिपीठ के समीप स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का दाहिना नितम्ब (कूल्हा) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा शोणा (सोना) स्वरूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव भद्रसेन हैं।
कालीघाट शक्तिपीठ, कलकत्ता (पश्चिम बंगाल)
यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के कलकत्ता शहर के दक्षिणी भाग में आदि गंगा नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती के दाहिने पैर की उंगलियाँ गिरी थीं। यहाँ देवी की पूजा दक्षिणा काली के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव नकुलेश्वर कहलाते हैं।
युगाद्या शक्तिपीठ, क्षीरग्राम (पश्चिम बंगाल)
यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले के क्षीरग्राम गाँव में स्थित है। यहाँ देवी सती का कौन-सा अंग गिरा था, इसे लेकर मतभेद है। ‘चंडीमंगल’ में इसे देवी की पीठ बताया गया है, वहीं ‘तंत्रचूडामणि’ के पीठनिर्णय खंड में इसे “दक्षिण-पाद-अंगुष्ठ”, अर्थात् दाहिने पैर का अंगूठा माना गया है। यहाँ देवी की पूजा युगाद्या के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव क्षीरखंड हैं।
बहुला शक्तिपीठ, केतुग्राम (पश्चिम बंगाल)
यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के पूर्व बर्द्धमान जिले के केतुग्राम में अजय नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का बाहु (हाथ) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा बहुला माता के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव भिरुक हैं।
त्रिस्त्रोता शक्ति पीठ, जलपाईगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
त्रिस्त्रोता शक्ति पीठ, जिसे भ्रामरी देवी मंदिर भी कहा जाता है, जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल में तीस्ता नदी के तट पर स्थित है। यह वह स्थान है जहाँ देवी सती का बायाँ पैर (या बाएँ पैर का अँगूठा) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा भ्रामरी के रूप में और भगवान शिव की पूजा भैरवेश्वर के रूप में की जाती है।
नलहाटी शक्ति पीठ, बीरभूम (पश्चिम बंगाल)
नलहाटी शक्ति पीठ या नलतेश्वरी मंदिर, बीरभूम, पश्चिम बंगाल में स्थित है। यह वह स्थान है जहाँ देवी सती का नला (स्वर-नली, स्वरतंत्री ) गिरा था। यहाँ आदि शक्ति की पूजा माँ नलाटेश्वरी के रूप में की जाती है, और भगवान शिव की पूजा योगेश भैरव के रूप में की जाती है।
फुल्लारा देवी शक्तिपीठ, अट्टहास (पश्चिम बंगाल)
फुल्लारा (अट्टहास) शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के लाबपुर क्षेत्र में स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का ओष्ठ (होंठ) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा फुल्लारा के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव विश्वेश हैं।
रत्नावली शक्तिपीठ, हुगली (पश्चिम बंगाल)
यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में रत्नाकर नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का दक्षिण स्कंध (दाहिना कंधा) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा कुमारी स्वरूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ में भगवान शिव की पूजा घंटेश्वर स्वरूप में की जाती है।
महिषमर्दिनी शक्तिपीठ, बीरभूम (पश्चिम बंगाल)
यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में पापहरा नदी के तट पर स्थित बक्रेश्वर (वक्रेश्वर) मंदिर परिसर में स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का भ्रूमध्य (दोनों भौहों के मध्य स्थित भाग, जो आज्ञा चक्र के समकक्ष है) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा महिषासुरमर्दिनी स्वरूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव वक्रनाथ हैं।
नंदीकेश्वरी शक्तिपीठ, बीरभूम (पश्चिम बंगाल)
यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के नंदीपुर गाँव में मयूराक्षी नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का हार गिरा था। यहाँ देवी की पूजा नंदिनी अथवा नंदीकेश्वरी के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव नंदीकेश्वर हैं।
किरीटेश्वरी देवी शक्तिपीठ, मुर्शिदाबाद (पश्चिम बंगाल)
यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के किरीटकोना गाँव में स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का किरीट (मुकुट) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा किरीटेश्वरी अथवा विमला के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव संवर्त हैं।
बरगभीमा देवी शक्तिपीठ, पूर्वी मिदनापुर (पश्चिम बंगाल)
यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले के तमलुक में रूपनारायण नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का चरण (टखना) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा बरगभीमा, भीमरूपा और भीमकाली स्वरूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव सर्वानंद हैं।
भ्रामरी (सप्तशृंगी) शक्तिपीठ, नासिक (महाराष्ट्र)
यह शक्तिपीठ महाराष्ट्र के नासिक से लगभग 24 किलोमीटर दूर सप्तशृंगी पर्वतमाला में स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का चिबुक (ठोड़ी) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा भ्रामरी देवी अथवा सप्तशृंगी देवी के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव विकृताक्ष हैं।
श्री महालक्ष्मी मंदिर, कोल्हापुर (महाराष्ट्र)
श्री महालक्ष्मी शक्तिपीठ जिसे अंबाबाई मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, महाराष्ट्र के कोल्हापुर में पंचगंगा नदी के तट पर स्थित है। शाक्त परंपरा के अनुसार, यहाँ माँ सती का नेत्र (कुछ परंपराओं में "आँखें" उल्लेखित हैं, जबकि अन्य में त्रिनेत्र) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा महालक्ष्मी और भगवान शिव की क्रोधिश भैरव के रूप में की जाती है।
मणिबंध शक्तिपीठ, पुष्कर (राजस्थान)
मणिवेदिका शक्तिपीठ, श्री राजराजेश्वरी पुरुहूत मंदिर या स्थानीय रूप से चामुंडा माता मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध, यह शक्तिपीठ राजस्थान में पुष्कर के पास गायत्री पहाड़ी (पुरुहूत पहाड़ी) की तलहटी में स्थित है। यह वह स्थान है जहाँ देवी सती का मणिबंध (कंगन) गिरा था, जबकि कुछ लोग इसे वह स्थान मानते हैं जहाँ उनकी कलाई गिरी थी।
अधिष्ठात्री देवी की पूजा आदिशक्ति माँ गायत्री के रूप में की जाती है। यहाँ पूजे जाने वाले भगवान भैरव का रूप भगवान सर्वानंद हैं, 'वह जो सभी को आनंद प्रदान करते हैं'।
विराट शक्तिपीठ, जयपुर (राजस्थान)
विराट शक्तिपीठ, जिसे अंबिका शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है, राजस्थान के जयपुर जिले के विराटनगर (पूर्व में बैराट) में स्थित है। इस स्थल पर देवी सती के बाएं पैर की उंगलियाँ (कुछ क्षेत्रीय ग्रंथ दाहिने पैर की उंगलियाँ बताते हैं) गिरी थीं। यहाँ अधिष्ठात्री देवी की पूजा माँ अंबिका (आदि माता) के रूप में की जाती है। भगवान शिव की पूजा अमृतेश्वर भैरव के रूप में की जाती है।
कालिका शक्तिपीठ, पावागढ़ (गुजरात)
यह शक्तिपीठ गुजरात के पंचमहल जिले में वडोदरा के निकट स्थित पावागढ़ पर्वत पर स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था। यहाँ देवी की पूजा माँ कालिका के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव लाकुलीश (नकुलीश) हैं।
चंद्रभागा शक्तिपीठ, प्रभास (गुजरात)
यह शक्तिपीठ गुजरात के गिर सोमनाथ जिले के प्रभास क्षेत्र में, त्रिवेणी संगम के निकट स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का उदर (पेट) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा चंद्रभागा स्वरूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव वक्रतुंड हैं।
श्रीशैलम शक्तिपीठ, श्रीशैलम (आंध्र प्रदेश)
यह शक्तिपीठ आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम शहर में, श्रीपर्वत (जो नल्लमलाई पर्वतमाला का भाग हैं) पहाड़ियों पर कृष्णा नदी के निकट स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती की ग्रीवा (कंठ) गिरी थी। यहाँ देवी की पूजा भ्रामराम्बा देवी के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव संवरानंद हैं।
गोदावरी तीर (सर्वशैल) शक्तिपीठ, राजमहेंद्रवरम (आंध्र प्रदेश)
यह शक्तिपीठ आंध्र प्रदेश के राजमहेंद्रवरम (राजमुंदरी) में गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती के दोनों गाल (गंड) गिरे थे। यहाँ देवी की पूजा विश्वेश्वरी (विश्वमातृका) तथा राकिनी स्वरूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ में माँ विश्वेश्वरी के साथ दण्डपाणि तथा राकिनी देवी के साथ वत्सनाभ भैरव विराजमान हैं।
देवगर्भा शक्तिपीठ, कांचीपुरम (तमिलनाडु)
यह शक्तिपीठ तमिलनाडु के कांचीपुरम में स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का कंकाल गिरा था। कुछ परंपराओं के अनुसार यहाँ देवी की नाभि भी गिरी थी। यहाँ देवी की पूजा कामाक्षी अथवा देवगर्भा स्वरूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव रुरु हैं।
कन्याश्रम शक्तिपीठ, कन्याकुमारी (तमिलनाडु)
यह शक्तिपीठ तमिलनाडु के कन्याकुमारी में भारत के दक्षिणतम छोर पर स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का पृष्ठभाग (रीढ़ का भाग) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा सर्वाणी स्वरूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव निमिष हैं।
विराजा क्षेत्र या माँ बिराजा जाजपुर, ओडिशा
ओडिशा में विराजा क्षेत्र, भुवनेश्वर के पास वैतरणी नदी के तट पर स्थित है। तंत्र चूड़ामणि के अनुसार, यहाँ देवी सती की नाभि गिरी थी। यहाँ देवी की पूजा देवी बिराजा (दुर्गा की एक अवतार) के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव भगवान जगन्नाथ माने जाते हैं।
जयंती देवी शक्तिपीठ, नर्तियांग (मेघालय)
यह शक्तिपीठ मेघालय के जयंतिया पहाड़ी क्षेत्र के नर्तियांग गाँव में स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती की वाम जंघा (बाईं जंघा) गिरी थी। यहाँ देवी की पूजा जयंतेश्वरी स्वरूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव कामदीश्वर महादेव हैं।
त्रिपुरा सुंदरी शक्तिपीठ, उदयपुर (त्रिपुरा)
यह शक्तिपीठ त्रिपुरा के उदयपुर नगर में एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का दाहिना चरण (पैर) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा त्रिपुरा सुंदरी स्वरूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव त्रिपुरेश हैं।
कामाख्या शक्तिपीठ, गुवाहाटी (असम)
यह शक्तिपीठ असम के गुवाहाटी में नीलाचल पर्वत पर स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती की योनि गिरी थी। यहाँ देवी की पूजा कामाख्या स्वरूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव उमानंद हैं।
गंडकी देवी शक्तिपीठ, मुक्तिनाथ (नेपाल)
यह शक्तिपीठ नेपाल के मुस्तांग जिले में स्थित पवित्र मुक्तिनाथ धाम में, गंडकी नदी के उद्गम क्षेत्र के निकट स्थित है। मान्यता है कि यहाँ माता सती का दाहिना गाल (गंड) गिरा था। इसी कारण यह स्थान “गंडकी देवी शक्तिपीठ” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहाँ देवी की पूजा गंडकी चण्डी के रूप में की जाती है तथा इस शक्तिपीठ के भैरव चक्रपाणि हैं।
गुह्येश्वरी शक्तिपीठ, काठमांडू (नेपाल)
यह शक्तिपीठ नेपाल की राजधानी काठमांडू में, पवित्र बागमती नदी के तट पर पशुपतिनाथ मंदिर के निकट स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का गुह्यांग (प्रजनन अंग) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा गुह्येश्वरी अथवा गुह्यकाली के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव कपाली हैं।
दाक्षायणी देवी शक्तिपीठ, मानसरोवर (तिब्बत)
यह शक्तिपीठ तिब्बत में कैलाश पर्वत की तलहटी में स्थित पवित्र मानसरोवर झील के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का दाहिना हाथ गिरा था। यहाँ देवी की पूजा दाक्षायणी अथवा मानसा देवी के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव अमर हैं।
भवानीपुर शक्तिपीठ, करतोया (बांग्लादेश)
यह शक्तिपीठ बांग्लादेश के बोगरा जिले में करतोया नदी के तट पर स्थित भवानीपुर में स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का बायाँ नूपुर (पायल) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा अपर्णा रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव वामन-भैरव हैं।
जेशोरेश्वरी शक्तिपीठ, जेसोर (बांग्लादेश)
यह शक्तिपीठ बांग्लादेश के जेसोर क्षेत्र में स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती की बाईं हथेली गिरी थी। कुछ परंपराओं में दोनों हथेलियों और चरणतल के गिरने का भी उल्लेख मिलता है। यहाँ देवी की पूजा जेशोरेश्वरी काली के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव चण्ड हैं।
सुगंधा देवी शक्तिपीठ, शिकारपुर (बांग्लादेश)
यह शक्तिपीठ बांग्लादेश के शिकारपुर गाँव में सुगंधा नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती की नासिका (नाक) गिरी थी। यहाँ देवी की पूजा सुगंधा अथवा सुनंदा देवी के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव त्र्यम्बक हैं।
चट्टला शक्तिपीठ, सीताकुंड, (बांग्लादेश)
चट्टला शक्तिपीठ जिसे चंद्रनाथ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, वर्तमान बांग्लादेश में सीताकुंड के पास स्थित है। इस स्थान पर देवी की दक्षिण भुजा (दाहिना हाथ) गिरी थी। यहाँ देवी की पूजा माँ भवानी, "समस्त सृष्टि को अस्तित्व प्रदान करने वाली" के रूप में की जाती है और भगवान शिव की पूजा चंद्रशेखर भैरव के रूप में की जाती है।
कोट्टरी देवी शक्तिपीठ, हिंगलाज (पाकिस्तान)
यह शक्तिपीठ वर्तमान पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में हिंगोल नदी के तट पर स्थित हिंगलाज क्षेत्र की एक प्राकृतिक पर्वतीय गुफा में स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का ब्रह्मरंध्र (मस्तक का शीर्ष भाग) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा कोट्टरी अथवा हिंगलाज माता के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव भीमलोचन हैं।
इन्द्राक्षी शक्तिपीठ, मणिपल्लवम (श्रीलंका)
यह शक्तिपीठ श्रीलंका के नैणातीवु द्वीप पर स्थित है, जिसे प्राचीन काल में मणिपल्लवम कहा जाता था। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का नूपुर (पायल) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा इन्द्राक्षी, नागपूशनी अथवा भुवनेश्वरी के रूप में की जाती है। इस शक्तिपीठ के भैरव राक्षसेश्वर हैं।
महादेव से देवी माँ तक
शिव साधना साधक को आंतरिक स्थिरता, संरक्षण और शुद्धि प्रदान करती है, जिससे वह माँ आद्यशक्ति की उपासना के लिए तैयार होता है। यदि आपने इस वर्ष साधना ऐप पर महारुद्र साधना के माध्यम से महादेव का आवाहन किया है, तो अब आप नव दुर्गा साधना के द्वारा माँ आद्यशक्ति की उपासना का अनुभव कर सकते हैं।
यदि आपने अब तक महारुद्र साधना या कोई अन्य साधना नहीं की है, तब भी आप आगामी नव दुर्गा साधना (15 जुलाई से 24 जुलाई) में भाग ले सकते हैं। माँ आद्यशक्ति अपनी संतानों की भक्ति को स्वीकार करती हैं और अपनी कृपा व संरक्षण से उन्हें आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करती हैं।
नोट-
विभिन्न शास्त्रों में शक्तिपीठों की संख्या अलग-अलग बताई गई है। श्रीमद् देवी भागवत पुराण में 108 शक्तिपीठों का उल्लेख मिलता है, जबकि आदि शंकराचार्य रचित अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्रम् में 18 शक्तिपीठों का वर्णन है। विभिन्न परंपराओं और शास्त्रीय विवरणों में देवी माँ के अनेक मंदिरों और तीर्थस्थलों को शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाता है।
हालाँकि, कृपया ध्यान दें कि इस ब्लॉग में दी गई 51 शक्तिपीठों की सूची पुस्तक Shakti: 51 Sacred Peethas of the Goddess by Dr. Alka Pande से ली गई है, जो उनके व्यापक शास्त्रीय शोध पर आधारित है
(Pande, Alka. Shakti: 51 Sacred Peethas of the Goddess. Rupa Publications, 2020. pp. 213–221)।
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Presented By Team Sadhana