Kundalini: An untold story (Hindi)
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Description
कुंडलिनी – एक अनकही कथा
वैदिक शास्त्रों के अनुसार, हमारे शरीर में सात प्रमुख ऊर्जा केंद्र (चक्र) होते हैं—मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धि चक्र, आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र। कुंडलिनी जागरण का अर्थ है हमारी मेरुदंड (रीढ़ की हड्डी) में सुप्त पड़ी ऊर्जा को सक्रिय करना। आज यह विषय साधकों के बीच अत्यंत आकर्षण का केंद्र है, लेकिन सही मार्गदर्शन के अभाव में अनेक लोग भ्रमित भी हो जाते हैं।
वर्तमान में चक्रों के नाम पर कई भ्रांतियाँ फैली हुई हैं। चक्र-ब्रैसलेट, मैट, चित्र, संगीत या वस्त्रों का वास्तविक साधना से कोई संबंध नहीं है। इस प्रकार के दावे करने वाले लोग केवल आपको भ्रमित करने का प्रयास करते हैं।
इन्हीं भ्रांतियों को दूर करने के लिए श्रीविद्या सिद्ध ओम स्वामी जी ने अपनी पुस्तक कुंडलिनी – एक अनकही कथा लिखी है। उन्होंने इस पुस्तक में ललिता सहस्रनाम के माध्यम से कुंडलिनी जागरण की विस्तारपूर्वक व्याख्या की है। ललिता सहस्रनाम में ही कुंडलिनी जागरण और चक्रों का प्राचीनतम वर्णन मिलता है। भगवान विष्णु के एक रूप, अश्व के शीश वाले ह्यग्रीव भगवान ने यह दिव्य ज्ञान मुनि अगस्त्य को सौंपा, ताकि इसका प्रयोग मानवजाति के कल्याण के लिए किया जा सके। इसमें वे बताते हैं कि कुंडलिनी साधना कोई रहस्यमय या चमत्कारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि आंतरिक परिष्कार और गहन साधना की यात्रा है।
मूलाधारैक-निलया ब्रह्मग्रन्थि-विभेदिनी ।
मणि-पूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थि-विभेदिनी ।। 38 ।।
आज्ञा-चक्रान्तरालस्था रुद्रग्रन्थि-विभेदिनी ।
सहस्राराम्बुजारूढ़ा सुधा-साराभिवर्षिणी ।। 39 ।।
ललिता सहस्रनाम के इस श्लोक में वर्णित है कि कुंडलिनी ऊर्जा मूलाधार चक्र से होकर विभिन्न ग्रन्थियों को भेदते हुए सहस्रार चक्र तक पहुँचती है। माँ ललिता अपने कुंडलिनी रूप में साधक के चक्रों में निवास करती हैं और प्रत्येक ग्रंथि को भेदती हैं, जिससे साधक के जीवन में दिव्य अमृत का प्रवाह होता है और उसकी आंतरिक शक्ति एवं चेतना जागृत होती है।
कुंडलिनी जागरण, आंतरिक ऊर्जा का उपयोग कर अपनी सीमाओं को पार करने और जीवन में जो कुछ भी आप चाहें, उसे प्राप्त करने का मार्ग है। ऋषि अगस्त्य से श्री ललिता सहस्रनाम और देवी साधना का ज्ञान वैदिक परंपरा के माध्यम से महर्षि वेद व्यास तक पहुँचा। धरती पर सर्वप्रथम महर्षि वेदव्यास को ही कुंडलिनी साधना की दीक्षा दी गई थी। वे कुंडलिनी साधना और देवी उपासना करने वाले प्रथम साधक थे। देवी साधना ने उनके सृजनात्मक सामर्थ्य को प्रकट किया। इसके पश्चात महर्षि वेदव्यास ने ब्रह्मांड पुराण की रचना की, जिसमें ललिता सहस्रनाम का पहला लिखित प्रमाण मिलता है।
लोग सोचते हैं कि कुंडलिनी जागरण से केवल रहस्यमय अवस्थाएँ प्राप्त होंगी, लेकिन वास्तव में यह आपको अपनी सर्वोच्च क्षमता तक पहुँचने में सहायता करती है। यही कुंडलिनी का पूर्ण सत्य और चक्रों की वास्तविकता है। जिस क्षण साधक चक्रों का भेदन अनुभव करता है या कुंडलिनी जागरण को समझता है, उसी क्षण वह परमानंद की उस अवस्था में प्रवेश करता है जहाँ से कोई वापसी नहीं है।
यह पुस्तक क्यों पढ़ें?
- कुंडलिनी और चक्रों से जुड़ी प्रचलित भ्रांतियों का स्पष्ट समाधान प्रस्तुत करती है।
- ओम स्वामी जी के साधना-सिद्ध अनुभवों पर आधारित, एक प्रमाणिक और विश्वसनीय मार्गदर्शक है।
- कुंडलिनी जागरण की गौरवशाली परंपरा से परिचित कराती है।
- ब्रह्म ग्रन्थि, रुद्र ग्रन्थि और विष्णु ग्रन्थि—इन तीनों ग्रन्थियों का कुंडलिनी जागरण से संबंध और उनकी विस्तृत व्याख्या करती है।
- हमारे शरीर में चक्रों की वास्तविक स्थिति और सातों चक्रों की गहन जानकारी प्रदान करती है।
यदि आप जानना चाहते हैं कि कुंडलिनी जागरण का वास्तविक अर्थ क्या है, यह यात्रा कैसे प्रारंभ होती है और साधक अपनी सुप्त ऊर्जा को किस प्रकार कल्याणकारी कार्यों में नियोजित कर सकता है, तो कुंडलिनी – एक अनकही कथा आपके लिए एक सच्ची और विश्वसनीय मार्गदर्शक सिद्ध होगी।
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