बसंत पंचमी : स्वर की देवी माँ सरस्वती आराधना का पावन दिवस

बसंत पंचमी : स्वर की देवी माँ सरस्वती आराधना का पावन दिवस

विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम् ।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥
हितोपदेशः — मित्रलाभः (प्रथम खण्ड)

अर्थ – विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता (योग्यता) आती है, पात्रता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म का संचालन होता है, और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है।

यह श्लोक हमारे जीवन में विद्या (ज्ञान) के महत्व को दर्शाता है। माँ सरस्वती बुद्धि और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी हैं और वह हम सभी को ज्ञान प्रदान करती हैं। बसंत पंचमी, जिसे वसंत पंचमी के नाम से भी जाना जाता है, माँ सरस्वती को समर्पित है। इस ब्लॉग में हम निम्नलिखित विषयों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

इस ब्लॉग की प्रमुख बातें:

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।
हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्॥
(पद्मपुराण, उत्तरखंड)

यह श्लोक देवी सरस्वती के पद्मपुराण के उत्तरखंड में वर्णित है, जिसका भावार्थ है—शुक्लवर्ण वाली, संपूर्ण चराचर जगत् में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिंतन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों से भयदान देने वाली, अज्ञान के अंधेरे को मिटाने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली और पद्मासन पर विराजमान बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, भगवती शारदा (सरस्वती देवी) की मैं वंदना करता हूँ ॥

मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः।।10.35।।
— श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि 'मासों में मैं मार्गशीर्ष हूँ' और 'ऋतुओं में वसंत हूँ'। वसंत को ऋतुओं का राजा कहा जाता है। बसंत पंचमी दो शब्दों से मिलकर बना है— बसंत, अर्थात वसंत ऋतु, और पंचमी, जिसका अर्थ है शुक्ल पक्ष का पाँचवाँ दिन। हर वर्ष माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बसंत (वसंत) पंचमी का पर्व मनाया जाता है। यह दिन वसंत ऋतु के आगमन का संकेत देता है। इस दिन ज्ञान, कला और संगीत की देवी माँ सरस्वती की पूजा की जाती है। बसंत पंचमी का दिन अनेक अर्थों में विशेष है।

बसंत पंचमी का महत्व

बसंत पंचमी पर विद्यारंभ संस्कार की परंपरा

(बसंत पंचमी पर विद्यारंभ संस्कार की परंपरा)

बसंत पंचमी का पर्व देवी सरस्वती के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसे सरस्वती पूजा के नाम से भी जाना जाता है। इस शुभ दिन पर छोटे बच्चों के लिए अक्षराभ्यासम् (अक्षरों का अभ्यास) और विद्यारंभम् (विद्या का प्रारंभ) संस्कार करवाए जाते हैं। यह औपचारिक शिक्षा की दिशा में पहला कदम होता है। योग और वेदांत में बसंत पंचमी को नई साधना की शुरुआत का श्रेष्ठ समय कहा गया है। इस दिन किया गया मंत्र-जप, ध्यान या अध्ययन मन को स्थिर करता है, एकाग्रता बढ़ाता है और साधक को दीर्घकालिक आध्यात्मिक लाभ प्रदान करता है।

नव आरंभ के लिए शुभ दिन

इस दिन को 'अबूझ मुहूर्त' (अच्छे कार्यों के आरंभ के लिए शुभ समय) माना जाता है। बसंत पंचमी के दिन विवाह, गृह प्रवेश, वाहन अथवा संपत्ति (प्रॉपर्टी) खरीदने जैसे कार्य अत्यंत शुभ माने जाते हैं। यह पूरा दिन ही पवित्र होता है, इसलिए इस दिन किसी भी शुभ कार्य के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती।

कामदेव और रति की पूजा

भगवान शिव की तपस्या भंग करने का प्रयास करते हुए कामदेव

(भगवान शिव की तपस्या भंग करने का प्रयास करते हुए कामदेव)

वसंत ऋतु में प्राकृतिक सौंदर्य अपने चरम पर होता है। बसंत पंचमी को प्रेम और सौंदर्य का पर्व भी मानते है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन कामदेव ने भगवान शिव के मन में माँ पार्वती के प्रति प्रेम-भाव जगाने हेतु उनकी तपस्या भंग करने का प्रयास किया था। इससे क्रोधित होकर महादेव ने कामदेव को राख में भस्म कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, पूरे संसार से प्रेम भावनाएँ समाप्त हो गईं। कामदेव की पत्नी रति ने अपने पति को पुनर्जीवित करने के लिए कठोर तपस्या की। भगवान शिव ने उनकी प्रार्थनाओं का उत्तर दिया और बसंत पंचमी के दिन कामदेव को पुनः जीवित कर दिया। इसलिए इस दिन कामदेव और रति की भी पूजा की जाती है।

बसंत पंचमी की पौराणिक कथा (कहानी)

माँ सरस्वती का प्राकट्य

(माँ सरस्वती का प्राकट्य)

उपनिषदों की कथा के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान ब्रह्मा ने जीवों, विशेष रूप से मनुष्य योनि की रचना की। लेकिन वे अपनी सजृन से संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है, जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है। ब्रह्माजी ने इस समस्या के निवारण के लिए अपने कमंडल से जल अपनी हथेली में लिया। इसके पश्चात संकल्प स्वरूप उस जल का छिड़काव करते हुए भगवान श्रीविष्णु की स्तुति करना आरंभ किया।

ब्रह्माजी द्वारा की गई स्तुति को सुनकर भगवान विष्णु उसी क्षण उनके समक्ष प्रकट हो गए। भगवान विष्णु ने ब्रह्माजी की समस्या सुनी। इसके पश्चात भगवान विष्णु ने आदिशक्ति माँ दुर्गा माता का आवाहन किया। माँ दुर्गा तुरंत ही वहाँ प्रकट हो गईं। तब भगवान ब्रह्मा और विष्णुजी ने उनसे इस संकट को दूर करने का निवेदन किया।

उसी क्षण आदिशक्ति माँ दुर्गा के शरीर से श्वेत रंग का एक प्रचंड तेज उत्पन्न हुआ, जो एक दिव्य नारी के रूप में परिवर्तित हो गया। यह स्वरूप एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था, जिनके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर-मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थीं।

प्रकट होते ही उन देवी ने वीणा का मधुर नाद किया, जिससे संसार के समस्त जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधाराओं में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन के चलने से सरसराहट होने लगी। तब सभी देवताओं ने शब्द और रस का संचार करने वाली उन देवी को वाणी की अधिष्ठात्री देवी "सरस्वती" नाम दिया।

माँ दुर्गा ने ब्रह्माजी से कहा कि देवी सरस्वती उनकी अर्धांगिनी बनेंगी; जैसे लक्ष्मी श्री विष्णु की शक्ति हैं और पार्वती महादेव शिव की शक्ति हैं, उसी प्रकार देवी सरस्वती आपकी शक्ति होंगी। ऐसा कहकर माँ दुर्गा अंतर्धान हो गईं और सभी देवता सृष्टि के संचालन में संलग्न हो गए।

भगवान श्रीकृष्ण ने दिया था वरदान

माँ सरस्वती को वागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। अक्सर लोग बसंत पंचमी का इतिहास के विषय में जानने के इच्छुक होते हैं। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने देवी सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन उनकी भी आराधना की जाएगी। और तभी से वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा होने लगी। ऋग्वेद में माँ सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है—

प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।

अर्थात वे परम चेतना हैं। माँ सरस्वती के रूप में वे हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है, उसका आधार माँ सरस्वती ही हैं। देवी माँ की समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है।

बसंत पंचमी 2026 तिथि एवं मुहूर्त

  • बसंत पंचमी तिथि प्रारंभ: 23 जनवरी 2026 को 02:28 AM
  • बसंत पंचमी तिथि समाप्त: 24 जनवरी 2026 को 01:46 AM
  • वसंत पंचमी सरस्वती पूजा मुहूर्त: 07:13 AM से 12:33 PM
  • अवधि: 05 घंटे 20 मिनट

वसंत पंचमी पर माँ सरस्वती का पूजन

बसंत पंचमी माँ सरस्वती पूजन विधि

(बसंत पंचमी माँ सरस्वती पूजन विधि)

  • प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें और पीले वस्त्र पहनें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें।
  • पूजा स्थल पर माँ सरस्वती की प्रतिमा या चित्र लकड़ी की चौकी पर स्थापित करें। इसें सफेद या पीले फूलों से सजाएँ।
  • पूजा के लिए पीले या सफेद फूल, हल्दी, चंदन, अक्षत (चावल), दूध, दही, घी, मधु, पंचामृत, भोग के लिए खीर, या हलवा, हवन सामग्री और दीपक एकत्रित करें।
  • माँ सरस्वती की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करें।
  • बसंत पंचमी के दिन यदि संभव हो तो हवन कर माता सरस्वती की आरती करें।
  • अनुष्ठान के बाद घर के सदस्यों में प्रसाद बाँटें।

वसंत पंचमी व्रत विधि

वसंत पंचमी पर व्रत करना अनिवार्य नहीं है। इस दिन माँ सरस्वती की पूजा का ही विशेष महत्व है। बसंत पंचमी के दिन पीले रंग के वस्त्र अवश्य पहनने चाहिए और देवी माँ को पीले रंग की वस्तुएँ एवं भोग अर्पित करना चाहिए। इस दिन ब्राह्मणों व जरूरतमंदों को पीले वस्त्र, अन्न और पुस्तकें दान करनी चाहिए।

व्रत का स्वरूप परंपरा के अनुसार

  • फलाहार या केवल एक समय सात्विक भोजन।
  • कुछ लोग केवल मखाने, कंद की खीर या दूध ही ग्रहण करते हैं।
Written by: Team Sadhana App
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