महाकालेश्वर और श्री ओंकारेश्वर: मध्य प्रदेश के पावन ज्योतिर्लिंग
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं।
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं।
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं॥
रुद्राष्टकम् श्लोक-1
अर्थात्— हे मोक्षरूप, विभु, व्यापक ब्रह्म, वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर और हम सबके स्वामी शिवजी, आपको मैं नमस्कार करता हूँ। निज स्वरूप में स्थित, चेतन, इच्छा-रहित, भेद-रहित, चित्त रूपी भीतर के आकाश में वास करने वाले भगवान शिव, मैं आपको सदा भजता हूँ।
मध्यप्रदेश को अपनी भौगोलिक पहचान के कारण भारत का दिल कहा जाता है। मध्यप्रदेश भारत के मध्य में स्थित है और इसीलिए इस राज्य का नाम मध्यप्रदेश पड़ा। यह राज्य अपनी समृद्ध परंपरा, गौरवशाली इतिहास, सांस्कृतिक विविधता और आध्यात्मिक वैभव के कारण पहचाना जाता है। मध्यप्रदेश में भगवान शिव के दो प्रमुख ज्योतिर्लिंग स्थित हैं। पहला है महाकाल मंदिर, उज्जैन, जिसे महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से भी जाना जाता है। उज्जैन नगर का प्राचीन नाम अवंतिकापुरी है, जिसका वर्णन महाकवि कालिदास ने अपनी अमरकृति मेघदूत में भी किया है।
दूसरा ज्योतिर्लिंग है ओंकारेश्वर। इस शहर का भगवान शिव के साथ गहन आध्यात्मिक और पौराणिक संबंध है। "ओंकारेश्वर" नाम का अर्थ है, "ओंकार के स्वामी" अथवा "ॐ ध्वनि के देवता"। यह ध्वनि आदि ध्वनि है, शाश्वत स्वरूप है और समस्त मंत्रों का आधार है। यह दोनों ज्योतिर्लिंग न केवल भक्तों के लिए दिव्य स्थल हैं, बल्कि उनकी पौराणिक कथाएँ, स्थापत्य कला और शांतिपूर्ण वातावरण तीर्थयात्रियों के मन और आत्मा को गहराई से प्रभावित करते हैं।
मध्यप्रदेश अपनी गौरवशाली संस्कृति और आध्यात्मिक वैभव के लिए पहचाना जाता है। आज हमारे इस ब्लॉग में हम मध्यप्रदेश में स्थित भगवान शिव के इन दो प्रमुख ज्योतिर्लिंगों के आध्यात्मिक, पौराणिक और सांस्कृतिक महत्व के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।
प्रमुख बातें:
- ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा और आध्यात्मिक महत्व
- महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का आध्यात्मिक महत्व
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा और आध्यात्मिक महत्व

(ॐ के प्रतीक स्वरूप द्वीप पर स्थित औंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग)
कावेरिका नर्मद्यो पवित्र समागमे, सज्जन तारानाये |
सदायव मांधात्रपुरे वसंतम्, ओंकारमीषम् शिवयेकामीदे ||
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम्
आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह श्लोक ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के महत्व का वर्णन करता है। इसमें भगवान शिव को ओंकार स्वरूप तथा भक्तों का उद्धार करने वाला बताया गया है। वे कावेरी-नर्मदा संगम पर स्थित मांधाता पर्वत (ओंकारेश्वर) में नित्य निवास करने वाले हैं। भगवान शिव ही एकमात्र आराध्य हैं, जिनकी शरण में जाकर साधक का कल्याण होता है।
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में स्थित है। विशेष बात यह है कि इस द्वीप का स्वरूप ऊपर से देखने पर "ॐ" या "ओंकार" के प्रतीक जैसा प्रतीत होता है। यहाँ नर्मदा नदी दो भागों में विभक्त होती है, जिससे मंधाता अथवा शिवपुरी नामक एक द्वीप का निर्माण होता है। यह द्वीप लगभग 4 किलोमीटर लंबा और 2 किलोमीटर चौड़ा है। इसी कारण, इस जगह को ओंकारेश्वर कहा जाता है। यह द्वीप मंधाता पर्वत अथवा ओंकार पर्वत के नाम से भी प्रसिद्ध है। प्राचीन समय में ओंकारेश्वर को मंधाता नगर के नाम से जाना जाता था।
देश-विदेश से श्रद्धालु यहाँ भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने तथा पावन नर्मदा तट पर प्रार्थना और साधना करने के लिए आते हैं। श्री आदि शंकराचार्य की गूढ़ शिक्षाओं को समर्पित एकात्म धाम इस नगर की आध्यात्मिक गरिमा को और भी सुदृढ़ करता है। यह स्थल साधकों, संतों और योगियों के लिए शांति, साधना और आत्मचिंतन का केंद्र है, जहाँ वे ओंकारेश्वर की समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा का अनुभव कर सकते हैं।
विंध्य पर्वत का तप

(मध्यप्रदेश में स्थित ओंकारेश्वर मंदिर का सुंदर दृश्य)
पुराणों के अनुसार, विंध्य पर्वत ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव की आराधना की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें आशीर्वाद देते हुए प्रणव (ओंकार) लिंगम के रूप में प्रकट हुए। ऐसा भी कहा जाता है कि देवताओं की प्रार्थना पर यह लिंग दो भागों में विभाजित हो गया—एक ओंकारेश्वर और दूसरा ममलेश्वर। मान्यता है कि ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर में स्थित है, जबकि भौतिक शिवलिंग ममलेश्वर (अमरेश्वर) के रूप में प्रतिष्ठित है।

(ममलेश्वर शिवलिंग)
एक अन्य कथा के अनुसार, इक्ष्वाकु वंश के राजा मंधाता ने इसी स्थान पर कठिन तपस्या की थी। उनकी साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव यहाँ प्रकट हुए और आशीर्वाद प्रदान किया। इसी कारण भगवान शिव इस स्थान पर सदा उपस्थित रहते है।
संगम स्थल पर स्नान का विशेष महत्व
ओंकारेश्वर में दो नदियों का मिलन होता है, नर्मदा और कावेरी, जिसे संगम कहा जाता है। कावेरी ओंकार पर्वत के पास बहने वाली एक छोटी सहायक नदी है। यहाँ नर्मदा नदी स्वयं दो धाराओं में विभक्त होकर 'ॐ' आकार का स्वरूप बनाती है। यह कावेरी नदी दक्षिण भारत की प्रसिद्ध कावेरी नदी नहीं है। ओंकारेश्वर में प्रवाहित होने वाली इस नदी का वास्तविक नाम 'कॉवेरिका' (कावेरिका) है, जिसे कालांतर में लोग कावेरी कहने लगे।
ओंकारेश्वर के इस संगम स्थल पर स्नान का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। यहाँ स्नान करने से आत्म-शुद्धीकरण होता है और साधक को आध्यात्मिक शांति की अनुभूति होती है। पौराणिक के अनुसार, ओंकारेश्वर में कुबेर देव ने कठोर तपस्या की थी। उनकी जटाओं से एक लघु जलधारा प्रकट हुई, जिसे कॉवेरिका कहा गया। यही धारा आगे चलकर नर्मदा में मिलती है।
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दिव्य दर्शन के पश्चात अब हमारी यात्रा उज्जैन की उस पावन भूमि की ओर बढ़ती है, जहाँ काल भी भगवान शिव की महिमा के आगे नतमस्तक हो जाता है, महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग। भगवान महाकाल को लेकर एक कथन अत्यंत प्रचलित है, "काल उसका क्या बिगाड़े, जो भक्त हो महाकाल का।" चलिए, अब बात करते हैं महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की।
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का आध्यात्मिक महत्व

(उज्जैन स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग में भगवान शिव महाकाल के रूप में पूजे जाते हैं)
महाकाल ज्योतिर्लिंग, महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह मध्य प्रदेश के उज्जैन नगर में स्थित है, जिसे प्राचीन काल में अवंतिका पुरी के नाम से जाना जाता था। महाकालेश्वर मंदिर का इतिहास अत्यंत प्राचीन है और यह वैदिक एवं पौराणिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, इसी स्थान पर देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने हेतु कठोर तपस्या की थी। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग विश्व का एकमात्र मंदिर है, जहाँ प्रतिदिन पवित्र भस्म आरती होती है।
उज्जैन भस्म आरती का महत्व

(उज्जैन भस्म आरती)
उज्जैन के महाकाल मंदिर में होने वाली भस्म आरती यह दर्शाती है कि संसार की प्रत्येक वस्तु नश्वर है और अंततः राख में परिवर्तित हो जाती है। भगवान शिव स्वयं भस्म धारण कर यह संदेश देते हैं कि भौतिक सुख-सुविधाएँ क्षणिक हैं, जबकि आत्मा शाश्वत है। भस्म का उनका श्रृंगार इस बात का प्रतीक है कि उन्होंने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली है; इसी कारण वे महाकाल कहलाते हैं।
एक मात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की एक अन्य विशेषता यह भी है कि बारह प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में केवल महाकालेश्वर ही दक्षिणमुखी हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार दक्षिण दिशा के अधिपति भगवान यमराज माने जाते हैं। इसी कारण यह धार्मिक मान्यता प्रचलित है कि जो भक्त श्रद्धा और भक्ति भाव से भगवान महाकालेश्वर के दर्शन एवं पूजन करता है, उसे मृत्यु के पश्चात यमराज द्वारा दी जाने वाली यातनाओं से मुक्ति प्राप्त होती है।
पौराणिक कथा
जिस स्थान पर आज महाकालेश्वर मंदिर स्थित है, वहाँ प्राचीन काल में घना वन क्षेत्र हुआ करता था, जिसके स्वामी स्वयं भगवान महाकाल माने जाते थे। इसी कारण यह क्षेत्र महाकाल वन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। स्कंद पुराण के अवंती खंड, शिव महापुराण तथा मत्स्य पुराण सहित अनेक पुराणों में महाकाल वन का विस्तृत उल्लेख प्राप्त होता है।
शिव महापुराण के उत्तरार्ध के 22वें अध्याय के अनुसार, जब अवंतिका पुरी (उज्जैन) के लोग दानव दूषण के अत्याचारों से पीड़ित थे, तब उन्होंने भगवान शिव से रक्षा के लिए प्रार्थना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव एक दिव्य ज्योति (प्रकाश) के रूप में प्रकट हुए और उस दानव का संहार किया। इसके पश्चात वे उज्जैन में ज्योतिर्लिंग स्वरूप में विराजमान हो गए।
कर्पूरगौरं करुणावतारं
संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम् ।
सदावसंतं हृदयारविंदे
भवं भवानीसहितं नमामि ॥
(कृष्ण यजुर्वेद, तैत्तिरीय शाखा)
अर्थात् कर्पूर (कपूर) के समान श्वेत वर्ण वाले, करुणा के अवतार, संसार के सार और भुजंगों (सांपों) को धारण करने वाले भगवान शिव, जो हमेशा मेरे हृदय-कमल में निवास करते हैं, उन्हें माँ पार्वती के साथ मैं नमन करता हूँ।
भगवान शिव भोले भंडारी हैं और सरलता से प्रसन्न हो जाते हैं। साधना ऐप पर होने वाली महारुद्र साधना (15 फ़रवरी '26 से 26 फ़रवरी '26) में भाग लीजिए और अपने जीवन में समृद्धि तथा भगवान शिव की सुरक्षा का अनुभव कीजिए। अधिक जानकारी के लिए साधना ऐप डाउनलोड कीजिए।
मध्यप्रदेश के अतिरिक्त गुजरात, महाराष्ट्र सहित भारत के कई अन्य राज्यों में भी भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग स्थित है। आपने अब तक भगवान शिव के मध्यप्रदेश में स्थित बारह ज्योर्तिलिंग में से दो प्रमुख ज्योतिर्लिंगों के बारें में हमारे लेखों के माध्यम से जानकारी प्राप्त की। यह यात्रा अभी अधूरी है। हमारे अगले ब्लॉग में आपको इस यात्रा को पूर्ण करने का अवसर मिलेगा। आध्यात्म से जुड़ी जानकारियाँ प्राप्त करने के लिए हमारे ब्लॉग पढ़ते रहिए।
महाकाल बाबा की कृपा सदैव आप पर बनी रहें।