भारत माता : मानचित्र से देवी माँ तक, हर भारतीय के हृदय में विराजमान
साल 1905। लॉर्ड कर्ज़न के नेतृत्व में अंग्रेज़ों ने एक बार फिर अपनी 'फूट डालो और राज करो' की नीति का सहारा लिया। उन्होंने बंगाल प्रेसीडेंसी को धार्मिक आधार पर दो हिस्सों में बांट दिया। इस निर्णय से आक्रोशित होकर पूरे बंगाल में भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने 'स्वदेशी आंदोलन' आरंभ किया। लोगों ने ब्रिटिश संस्थानों और वस्तुओं का बहिष्कार किया। उन्होंने मैनचेस्टर के कपड़े का त्याग किया,जिसने भारतीय वस्त्र उद्योग को भारी नुकसान पहुँचाया था। सड़कों पर 'वंदे मातरम्' के नारों की गूंज सुनाई देने लगी और साथ ही ब्रिटिश वस्तुओं की होली जलाई जाने लगी।

(स्वदेशी आंदोलन के दौरान विदेशी वस्तुओं की होली जलाते हुए)
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इस समय एक विचार ने लोगों को एकता के सूत्र में बाँधने का कार्य किया। वे अपनी उस 'माँ' की रक्षा के लिए एकजुट हो गए, जिसने उनका पालन-पोषण किया और उनकी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति की। लोग रैलियों और आंदोलनों में 'बंग माता' के चित्र वाले पोस्टर हाथ में लिए दिखाई देने लगे। यही वह पहली पेंटिंग (चित्र) थी, जो आगे चलकर भारत माता के रूप में लोकप्रिय हुई। 'राष्ट्र' की अमूर्त अवधारणा को एक साकार रूप मिल गया था। भारत अब केवल एक मानचित्र नहीं रहा, बल्कि एक पूजनीय देवी के रूप में प्रतिष्ठित हो गया था।
इस ब्लॉग को पढ़िए और जानिए कि भारत को देवी माँ के रूप में कैसे चित्रित किया गया है तथा यह अवधारणा शास्त्रों और वैदिक जीवन-पद्धति से किस प्रकार गहराई से जुड़ी हुई है।
इस ब्लॉग की प्रमुख बातें:
- अवनीन्द्रनाथ टैगोर की चित्रकला: बंग माता से भारत माता तक
- भारत माता के विभिन्न चित्रण
- मातृभूमि की अवधारणा (विचार) : पाश्चात्य या भारतीय?
अवनीन्द्रनाथ टैगोर की चित्रकला (पेंटिंग) : बंग माता से भारत माता तक
भारत माता की पहली चित्रकला (पेंटिंग) के पीछे कलाकार और लेखक अवनीन्द्रनाथ टैगोर की रचनात्मक प्रतिभा थी। वे बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट के संस्थापक भी थे। उनकी प्रेरणा का स्रोत महान बंगाली साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय थे। बंकिम चंद्र का ऐतिहासिक उपन्यास 'आनंद मठ' अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बंगाल में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध हुए सन्यासी विद्रोह की कहानी बताता है। इस उपन्यास का एक गीत अत्यंत लोकप्रिय हुआ। मातृभूमि को समर्पित यह गीत है, 'वंदे मातरम्'।
बंकिम चंद्र ने राष्ट्र की कल्पना एक सर्वव्यापी देवी के रूप में की। वे चमचमाती नदियों की पावन धाराओं से लेकर हरे-भरे उपवनों, मंद-मंद बहती हवा, लहलहाते खेत-खलिहानों और धरती के कण-कण में विद्यमान थीं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मातृभूमि को देवी माँ के रूप में देखने वाला पहला क्षेत्र बंगाल बना। बंगाल में शक्ति उपासना का वर्चस्व था। वहाँ देवी माँ की आराधना काली, दुर्गा, मनसा और चंडी आदि रूपों में की जाती थी।
वंदे मातरम गीत की पंक्तियों में बंकिम चंद्र लिखते हैं,
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदल विहारिणी।
वाणी विद्यादायिनी नमामि त्वाम्,
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्,
सुजलां सुफलां मातरम्॥
वंदे मातरम्॥
भावार्थ- 'आप ही युद्ध में शस्त्र धारण करने वाली माँ दुर्गा हो, कमलों के बीच विहार करने वाली कमला ( माँ लक्ष्मी) हो, और समस्त ज्ञान प्रदान करने वाली वाणी (माँ सरस्वती) हो। हे माँ! मैं आपको नमन करता हूँ।'
'वंदे मातरम्' के जोशीले नारे ने अनेक स्वतंत्रता सेनानियों और कलाकारों को प्रेरित किया; उन्हीं में से एक अवनीन्द्रनाथ टैगोर भी थे। सन् 1905 में बंगाल के विभाजन के उत्तर में अवनीन्द्रनाथ ने एक शांत, सौम्य देवी का चित्र बनाया। केसरिया साड़ी ओढ़े वह एक साध्वी जैसी प्रतीत होती थीं और अपने चार हाथों में धान की बालियाँ, एक सफेद कपड़ा, ताड़ के पत्ते या कागज़, तथा एक रुद्राक्ष माला धारण किए हुए थीं।
उनके आशीर्वाद वे मूलभूत आवश्यकताएँ थीं जो एक अच्छे जीवन के लिए आवश्यक हैं; भोजन, वस्त्र, ज्ञान और आध्यात्मिक आंतरिक शक्ति। अपनी इस पेंटिंग के माध्यम से अवनीन्द्रनाथ ने सामान्य बंगाली महिला को श्रद्धा और आभार व्यक्त किया। लोग इस रूप से आसानी से जुड़ाव अनुभव करने लगे।

(अवनीन्द्रनाथ द्वारा बनाई गई भारत माता की पेंटिंग)
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एक बंगाली पत्रिका प्रवासी (प्रबासी) ने इस चित्र को 'मातृमूर्ति' (माँ का रूप) शीर्षक के साथ प्रकाशित किया। इसका प्रभाव इतना व्यापक था कि यह चित्र-प्रति देश भर में स्वतंत्रता सेनानियों और आम लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हो गई। स्वामी विवेकानंद की शिष्या, आयरिश-भारतीय दार्शनिक, लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता सिस्टर निवेदिता ने अवनीन्द्रनाथ की इस चित्रकला (पेंटिंग) का नाम 'भारत माता' रखा। उन्होंने लिखा…
'शुरू से अंत तक यह चित्र भारतीय भाषा में भारतीय दिल से एक अपील है। यह एक नई शैली में पहली महान उत्कृष्ट कृति है। यदि मैं कर पाती, तो मैं इसे हजारों-हजारों प्रतियों में पुनर्मुद्रित करके देशभर में पहुंचा देती, ताकि केदारनाथ से केप कोमोरिन (कन्याकुमारी) तक, किसी भी किसान की कुटिया या कारीगर की झोपड़ी की दीवार ऐसी न हो जहाँ भारत माता का यह चित्र न लगा हो।'
( हिंदी अनुवाद- Nivedita, Sister; Atmaprana, Pravrajika (11 June 2018). The Complete Works of Sister Nivedita – Volume 3. Source: Wikipedia)
भारत माता के विभिन्न चित्रण

(इन्थिया मैगज़ीन कवर: अप्रैल 1907)
Source: https://contrarianworld.blogspot.com/2016/06/bharat-mata-ki-jai-reaction-to.html
आगामी कुछ वर्षों में 'भारत' को 'माँ' के रूप में व्यक्त करने की धारणा अत्यंत लोकप्रिय हो गई। कई प्रकार के नए चित्र और प्रिंट सामने आए। तमिल कवि, कार्यकर्ता और लेखक सुब्रमण्यम भारती ने भारत माता की कल्पना परम शक्ति के रूप में की। उनकी कविताएँ देशभक्ति, राष्ट्र सेवा और महिलाओं के सशक्तिकरण को प्रोत्साहित करती थीं।
अप्रैल 1907 में 'इन्थिया' पत्रिका (भारतीयों द्वारा संचालित) के कवर पृष्ठ पर एक देवी माँ को चट्टान पर बैठे हुए दिखाया गया। उनका एक हाथ ग्लोब पर रखा था, जिसमें भारत का मानचित्र अंकित था, और उनके सामने भारतीयों का एक समूह झुककर उन्हें नमन कर रहा था।

(भारत के मानचित्र के साथ भारत माता और माँ दुर्गा के स्वरूप में बने पोस्टर)
Source: Generated with AI
इसी प्रकार, बाद के चित्रों में भारत माता को भारत के मानचित्र की पृष्ठभूमि में स्थापित दिखाया गया। उनकी लहराती साड़ी ने देश की भौगोलिक सीमा का रूप ले लिया। अनेक चित्रों में उनका स्वरूप साध्वी से बदलकर त्रिशूल धारण किए, ध्वज हाथ में लिए हुए योद्धा देवी, माँ दुर्गा के समान, दिखाया गया। कुछ चित्रों में वे महात्मा गांधी और अन्य राष्ट्रवादी नेताओं को आशीर्वाद देती हुई भी दिखाई गई।
कुछ विद्वानों और इतिहासकारों का मानना है कि भारत माता की कल्पना उन्नीसवीं शताब्दी में इसी प्रकार के चित्रण से प्रेरित थी, जब 'राष्ट्र-राज्य' (नेशन स्टेट्स) की अवधारणा लोकप्रिय हो रही थी। उदाहरण के लिए, जर्मनी को 'जर्मेनिया', इटली को 'इतालिया' और ब्रिटेन को 'ब्रिटानिया' के रूप में दर्शाया जाता था। ये सभी शक्तिशाली स्त्री आकृतियाँ थीं, जो अपने-अपने राष्ट्रों की सामूहिक पहचान का प्रतिनिधित्व करती थीं। हालाँकि अब प्रश्न यह उठता है कि क्या भारत माता के चित्रण के लिए वास्तव में वे ही एकमात्र प्रेरणा थीं?

(जर्मनी, 'जर्मेनिया' के रूप में चित्रित)
Source: Wikimedia Commons
मातृभूमि की अवधारणा (विचार) : पाश्चात्य या भारतीय?
विचार तेज़ी से फैलते हैं, और यह संभव है कि मानचित्र पर भारत माता का चित्रण पाश्चात्य अवधारणाओं से प्रभावित रहा हो। किंतु प्रेरणा का एकमात्र स्रोत पश्चिम को मान लेना वास्तव में हमारी नासमझी या भोलापन होगा। देश को देवी माँ के रूप में सम्मान देने का मूल भाव भारतीय सभ्यता के लिए नया नहीं था। भारत में हर पालन-पोषण करने वाली शक्ति को सदा ही माँ की भाँति पूजनीय माना गया है, चाहे वे हमारी पवित्र नदियाँ हों, धरती माँ, गौ माता या प्रकृति माँ।
वैदिक काल से ही पृथ्वी को 'भू-देवी' के रूप में पूजा गया है। दक्षिण भारत में भू-देवी को सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु की अर्धांगिनी माना जाता है। अपने वराह अवतार में भगवान विष्णु ने भू-देवी को हिरण्याक्ष नामक दैत्य से मुक्त कराया था। वहीं उत्तर भारत में पृथ्वी का संबंध माँ सीता से जोड़ा जाता है, जो स्वयं 'भूमिजा,' अर्थात पृथ्वी से उत्पन्न हुई हैं।
प्राचीन काल से ही भारत में भूमि जोतने से पहले पृथ्वी माता की पूजा की परंपरा रही है। यहाँ तक कि राजा भी पहली जुताई के समय धरती माँ को प्रणाम कर क्षमा याचना करते थे और उनका आभार व्यक्त करते थे। आज भी किसी भी अनुष्ठान के आरंभ में पृथ्वी-पूजा मंत्र उच्चारित किया जाता है।
"ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवीत्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय माँ देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥"
अर्थ: यह मंत्र धरती माता (जिन्हें श्री विष्णु धारण करते हैं) के प्रति आभार व्यक्त करता है कि उन्होंने धैर्यपूर्वक साधक का भार वहन किया और उसे शुद्ध तथा स्थिर आसन प्रदान किया।
इसी प्रकार, अथर्ववेद के भूमि सूक्त में पृथ्वी को एक संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत और सचेत सत्ता के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसका सम्मान और संरक्षण किया जाना चाहिए। भूमि सूक्त के 12वें श्लोक से एक लोकप्रिय पंक्ति आती है:
'माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः'
(अर्थ: यह पृथ्वी मेरी माता है, और मैं उसकी संतान हूँ)
पूरे सूक्त में भूमि (पृथ्वी) को एक दैवीय सत्ता के रूप में संबोधित किया गया है, जो हमारी प्रार्थनाओं को सुनती है और उनका उत्तर देती है। वे 'देखती' है, 'जानती' है, 'हमें धारण' करती है, 'हमारी रक्षा' करती है, 'हमें शुद्ध' करती है, और 'हमें आशीर्वाद' देती है।
सनातन शास्त्रों में मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की एक समृद्ध परंपरा है। प्राचीन ग्रंथों में राष्ट्र को अक्सर 'मातृभूमि' और 'जन्मभूमि' के रूप में संबोधित किया गया है। रामायण के विभिन्न संस्करणों में एक प्रसिद्ध श्लोक मिलता है। कुछ संस्करणों में इसे श्री राम के द्वारा बताया गया है, जबकि अन्य में इसे ऋषि भारद्वाज के नाम से जोड़ा गया है।
'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी'
(माता और जन्म-भूमि स्वर्ग से भी महान और पूजनीय हैं।)
यह शक्तिशाली वाक्यांश नेपाल द्वारा उनके राष्ट्रीय आदर्श वाक्य (मोटो) के रूप में अपनाया गया था। अक्सर यह कहा जाता है कि ब्रिटिश शासन से पूर्व भारतीय राष्ट्र की कोई मूल भावना नहीं थी।
भारत सदा से कई राज्यों का समूह था, फिर भी प्राचीन समय से ही भारत में एक साझा संस्कृति और पहचान का बोध होता था। विष्णु पुराण में भारत का उल्लेख उस क्षेत्र के रूप में किया गया है जो महासागर के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में स्थित है। वहाँ निवास करने वाले लोगों को 'भारती' कहा गया है।
भारत माता केवल पश्चिम से उधार लिया गया एक भावुक विचार नहीं हैं। वह भारतीय सभ्यता की जड़ों से गहराई से जुड़ी हुई हैं। भारत माता भारतीय जनता की कल्पना का प्रतीक हैं। देवी माँ के रूप में, वे केवल भारत-भूमि या उसकी सीमाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं, बल्कि वे भारत की आत्मा और शक्ति हैं, जो धर्म, संस्कृति और उसके लोगों की साझा आशाओं का प्रतीक हैं।
इस गणतंत्र दिवस पर मातृभूमि के रूप में देवी माँ के प्रति आभार व्यक्त करें।
जय माँ भारती!