माँ अंबिका और माँ कालरात्रि का उदय
ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते
-अर्गला स्तोत्रम्, देवी माहात्म्यम्
हे देवी माँ! हम आपके समक्ष विनम्रतापूर्वक नतमस्तक हैं।आप, जो सब पर विजय प्राप्त करती हैं (जयन्ती), जो सम्पूर्ण शुभता का अवतार हैं (मंगला), जो अंधकार का नाश करने वाली हैं (काली), जो कालातीत हैं (भद्रकाली), जो अशुद्ध विचारों के प्रतीक कपालों को धारण करती हैं (कपालिनी), जो समस्त कठिनाइयों का निवारण करती हैं और सदैव क्षमाशील हैं (दुर्गा, क्षमा), तथा जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड का आधार हैं (स्वाहा), हमारी श्रद्धा को स्वीकार करें (स्वधा)।
माँ कात्यायनी द्वारा महिषासुर और उसकी दुष्ट शक्तियों के विनाश के बाद नवदुर्गाओं की कथा आगे बढ़ती है। तीनों लोकों में शांति स्थापित हो गई थी। कई युगों और कल्पों तक समरसता बनी रही, लेकिन समय के साथ शुंभ और निशुंभ नामक दो राक्षसों के नेतृत्व में असुरी शक्ति पुनः बलशाली होने लगी।
दोनों भाई सत्ता और नियंत्रण प्राप्त करने के उद्देश्य से आगे बढ़े। उन्होंने एक विशाल सेना का निर्माण किया और देवलोक पर आक्रमण कर दिया। अपनी शक्ति और बल के आधार पर उन्होंने देवताओं को पराजित कर देवलोक पर अधिकार कर लिया। इस समस्या के समाधान की खोज में, देवराज इन्द्र देवताओं को साथ लेकर भगवान शिव और माँ पार्वती के दिव्य धाम पर पहुँचे।
देवताओं की विनम्र प्रार्थनाएँ सुनकर माँ पार्वती,जो उस समय स्नान कर रही थीं, ने संकल्प लिया कि वे असुरों के शासन से ब्रह्मांड की रक्षा करेंगी। उन्होंने अपने एक अत्यंत शक्तिशाली दिव्य रूप का सृजन किया, जिसे माँ अंबिका कहा गया। माँ अंबिका तेजस्विनी देवी थीं। वे दिव्य आयुधों से सुसज्जित थीं और उनके चारों ओर देव शक्तियाँ विद्यमान थीं। उन्हें यह सामर्थ्य प्राप्त हुआ कि वे असुरों से युद्ध कर देवलोक में पुनः शांति स्थापित करें।
जब माँ अंबिका के नेतृत्व में देव सेना रणभूमि की ओर अग्रसर हुई, तब शुंभ और निशुंभ ने अपने सबसे शक्तिशाली सेनापतियों, चंड और मुंड, को उनके विरुद्ध भेजा। असुरों को विश्वास था कि उनके ये सेनापति अजेय हैं और किसी को भी आसानी से परास्त कर सकते हैं। माँ अंबिका को केवल एक कोमल स्त्री समझना उनकी बहुत बड़ी भूल थी।
देवी अंबिका की शक्ति अद्वितीय थी। युद्ध में सहायता के लिए उन्होंने अपने एक भयावह स्वरूप ‘माँ कालरात्रि’ का आवाहन किया। माँ कालरात्रि को माँ काली के नाम से भी जाना जाता है। अत्यंत प्रचंड और शक्तिशाली माँ कालरात्रि असीम बल और उग्रता के साथ युद्धभूमि में उतरीं।
माँ अंबिका के साथ मिलकर उन्होंने चंड और मुंड का वध कर दिया, जिससे असुर सेना स्तब्ध रह गई। इसी कारण उन्हें ‘चामुंडा’ नाम प्राप्त हुआ। शुंभ और निशुंभ अपने सेनापतियों की हार से विचलित नहीं हुए। उन्होंने देवी चामुंडा (माँ काली) के विरुद्ध अपनी समस्त शक्ति लगा दी। देवी और असुरों के बीच संघर्ष और भी प्रबल होता गया।
माँ कालरात्रि द्वारा रक्तबीज का संहार
माँ कालरात्रि के प्रचंड चंडी रूप से व्याकुल होकर शुंभ और निशुंभ ने अब रक्तबीज को युद्ध में भेजा। रक्तबीज के पास एक अद्वितीय शक्ति थी, उसके शरीर से गिरने वाली प्रत्येक रक्तबूँद से उसका एक नया रूप उत्पन्न हो जाता था। इसी कारण उसका वध करना संभव नहीं था। जैसे ही उसकी रक्त की बूंद धरती पर गिरती, उसी क्षण असंख्य रक्तबीज उत्पन्न हो जाते थे।
देवी कालरात्रि ने रक्तबीज के विरुद्ध साहसपूर्वक युद्ध किया। किंतु जैसे ही वह घायल होता और उसका रक्त धरती पर गिरता, अनेक रक्तबीज उत्पन्न होकर युद्धक्षेत्र में फैल जाते। देवता यह भयावह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए। वे समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें।
माँ कालरात्रि द्वारा रक्तबीज का विनाश और युद्ध का निर्णायक मोड़
दिव्य प्रेरणा से माँ कालरात्रि ने अपनी लंबी जीभ फैलाई और रक्तबीज के रक्त की बूँदों को पीना प्रारंभ कर दिया, जिससे वे भूमि पर गिरने से पहले ही समाप्त हो जाती थीं। इस प्रकार उन्होंने उसकी शक्ति को निष्क्रिय कर दिया और उसके समस्त प्रतिरूपों का संहार कर डाला। रक्तबीज पर हुई विजय युद्ध का एक निर्णायक मोड़ थी। अब असुरों को यह भान होने लगा कि उनका प्रतिरोध अधिक समय तक टिक नहीं पाएगा।हालाँकि, देवी कालरात्रि अपने विनाशकारी रूप में इतनी उग्र हो गई थीं कि जो भी उनके मार्ग में आया, वह उनके प्रकोप से नहीं बच सका।
उनके इस विकराल विनाश को देखकर देवताओं ने भगवान शिव से सहायता की प्रार्थना की। देवी को शांत करने हेतु भगवान शिव स्वयं उनके चरणों के नीचे लेट गए। जब माँ कालरात्रि ने देखा कि वे अपने पति पर पैर रख चुकी हैं, तो उन्होंने आश्चर्य और ग्लानि से अपनी जीभ काट ली। यह दृश्य प्रायः उनकी मूर्तियों और चित्रों में दर्शाया जाता है। इस प्रकार भगवान शिव ने क्रुद्ध देवी को शांत किया। अंततः माँ अंबिका (जिन्हें देवी चंडी भी कहा जाता है) ने शुंभ और निशुंभ से एक भीषण युद्ध किया और उन्हें पराजित कर दिया।
शास्त्रों में अन्य उल्लेख
श्रीमद् देवी भागवतम् में माँ कालरात्रि से संबंधित एक और कथा मिलती है। जब माँ अंबिका देवताओं की सहायता हेतु देवी पार्वती के शरीर से प्रकट हुईं, तब माँ पार्वती की त्वचा अत्यंत काली हो गई,जैसे आकाश में मंडराते घने काले बादल। इसी कारण माँ पार्वती को ‘कालिका’ और ‘कालरात्रि’ भी कहा जाता है। इसी प्रकार महाभारत (सौप्तिक पर्व, 10.8.64–65) में भी माँ कालरात्रि का उल्लेख मिलता है। वहाँ उन्हें युद्धभूमि में देखा गया, जहाँ भीषण नरसंहार हो रहा था, चारों ओर कटे हुए सिर और अंग बिखरे पड़े थे।
पांडवों के शिविर में योद्धाओं ने कालरात्रि के साक्षात रूप को देखा—एक काले रंग की देवी, जिनका मुख और नेत्र रक्तिम थे। उन्होंने लाल पुष्पों की माला पहनी थी, वे लाल चंदन से लिप्त थीं और एक ही लाल वस्त्र धारण किए हुए थीं। उनके हाथ में एक फंदा था और उनका स्वरूप किसी वृद्धा के समान प्रतीत हो रहा था। वे दारुण स्वर में कुछ गूढ़ शब्दों का उच्चारण कर रही थीं। वे भयावह देवी पुरुषों, अश्वों (घोड़ो) और गजों (हाथियों) को एक मज़बूत रस्सियों से बाँधकर ले जाने के लिए खड़ी थीं।
माँ कालरात्रि अंधकारमयी रात्रि की देवी हैं। वे हमारे भीतर निहित भय को स्वीकार करने की शक्ति का प्रतीक रूप हैं। उनकी उपासना से हमें अपने भय को देखने, उन्हें स्वीकार करने और प्रकाश एवं मुक्ति की ओर बढ़ने का साहस प्राप्त होता है।
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