विजय, उल्लास और रंगों का पर्व—होली
फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥
सील संतोख की केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे।
उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे॥
घटके सब पट खोल दिये हैं लोकलाज सब डार रे।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर चरणकंवल बलिहार रे॥
-संत मीराबाई
अर्थ- मैंने अपने प्रिय संग होली खेलने के लिए शील और संतोष रूपी केसर का रंग घोल लिया है। मेरा प्रेम ही होली खेलने की पिचकारी है। उड़ते हुए गुलाल से सारा आकाश लाल हो गया है। अब मुझे लोक लज्जा का कोई भय नहीं है। इसलिए मैंने अपने ह्दय रूपी घर के द्वार खोल दिए हैं। अंत में मीराबाई कहती हैं, मेरे प्रियवर, मेरे स्वामी तो, गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले भगवान श्रीकृष्ण हैं। मैंने उनके चरण कमलों में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया है।
होली का त्यौहार प्रेम, उत्साह और उमंग का पर्व है। रंग-बिरंगे रंग जीवन में ऊर्जा का संचार करते हैं, लेकिन अपने आराध्य की भक्ति से गहरा रंग और किसका हो सकता है? अपने आराध्य के प्रेम-रंग में रंगकर एक भक्त अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देता है, जैसा संत मीराबाई और राधारानी ने किया।
श्रीकृष्ण के प्रेमरंग में स्वयं को रंगने का उत्साह ही होली है। होली क्यों मनाई जाती है, इसे लेकर पुराणों में विभिन्न कथाओं का उल्लेख मिलता है। हमारे इस लेख में हम जानेंगे कि होली का त्यौहार कब, क्यों और कैसे मनाया जाता है। साथ ही हम आपको होलिका दहन के शुभ मुहूर्त के बारे में भी बताएँगे।
प्रमुख बातें:
- होली क्यों मनाई जाती है?
- रंगों का भावनात्मक प्रभाव
- होलिका दहन 2026 शुभ मुहूर्त
- होलिका दहन पूजा विधि
- होली पर चंद्रग्रहण
- ग्रहणकाल में साधना क्यों महत्वपूर्ण है
होली क्यों मनाई जाती है?
होली का त्यौहार न केवल भारत में, बल्कि विश्व के कई अन्य देशों में भी धूमधाम से मनाया जाता है। नेपाल में इसे 'फागू' या 'फागू पूर्णिमा' के नाम से मनाया जाता है। पश्चिम बंगाल में होली 'डोल जात्रा' के रूप में मनाई जाती है, जिसे डोल पूर्णिमा भी कहा जाता है। इसी प्रकार का उत्सव बांग्लादेश में भी मनाया जाता है, जहाँ इसे 'डोल जात्रा' या 'बोशोंटो उत्सव' (बसंत उत्सव) के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार, रंगों का यह उत्सव सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है।
होली का त्यौहार केवल आनंद के लिए नहीं मनाया जाता, बल्कि यह हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण पाठ भी सिखाता है। पुराणों और धर्मशास्त्रों में होली की विभिन्न कथाओं का भी उल्लेख मिलता है।
श्रीकृष्ण और राधारानी की कहानी

(श्रीकृष्ण और राधारानी होली खेलते हुए)
'यशोमती मैया से बोले नंदलाल
राधा क्यों गोरी मैं क्यों काला'
इस भजन को हम सभी ने सुना है लेकिन क्या आप जानते है कि इस भजन का संबंध होली के पर्व से है। होली का त्यौहार राधा-कृष्ण के पवित्र प्रेम से जुड़ा हुआ है। ब्रज, जिसे व्रज भी कहा जाता है, यमुना नदी के दोनों ओर फैला एक पवित्र क्षेत्र है, जिसका मुख्य केंद्र मथुरा और वृंदावन (उत्तर प्रदेश) हैं। ब्रज की होली अपने भक्ति-भाव और उत्साहपूर्ण वातावरण के कारण पूरे भारत में प्रसिद्ध है।
कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण छोटे थे, तब उन्होंने यशोदा मैया से राधारानी के गोरे होने और अपने सांवले रंग का कारण पूछा। तब स्नेहमयी माँ यशोदा ने बालकृष्ण से कहा, 'मेरे प्यारे लल्ला, तुम जो रंग चाहो, राधारानी के चेहरे पर लगा सकते हो, और उनका चेहरा भी तुम्हारी इच्छा अनुसार उसी रंग में रंग सकते हो।
श्रीकृष्ण को यह सुझाव भा गया और उन्होंने ऐसा ही किया। जब श्रीकृष्ण ने राधा जी को रंग लगाया, तो राधा जी ने भी उन्हें रंगों में रंग दिया। मान्यता है कि तभी से होली का पर्व मनाने का चलन शुरु हुआ। ब्रज में आज भी होली का त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है। ब्रज की लट्ठमार होली दुनियाभर में प्रसिद्ध है।

(ब्रज की लट्ठमार होली।)
जीवन की सीख: श्रीकृष्ण और राधारानी से जुड़ा यह प्रसंग हमें सिखाता है कि प्रेम का अर्थ बाहरी आकर्षण से कहीं अधिक गहरा होता है। यह पर्व हमें एक-दूसरे की भिन्नताओं को स्वीकार कर उनका उत्सव मनाना सिखाता है।
भक्त प्रह्लाद और होलिका की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार होलिका दहन का संबंध मुख्य रूप से भक्त प्रह्लाद और होलिका से है। भक्त प्रह्लाद का जन्म राक्षस कुल में हुआ था। प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप असुर कुल के एक बड़े राजा थे। हिरण्यकश्यप ने अपने राज्य में भगवान विष्णु की भक्ति पर प्रतिबंध लगा दिया था। वह श्रीविष्णु की भक्ति करने वालों को कड़ी सजा देता था, लेकिन उसका स्वयं का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। हिरण्यकश्यप को अपने पुत्र का भगवान विष्णु की भक्ति करना बिल्कुल भी पसंद नहीं था। उसने प्रह्लाद को अनेक कष्ट दिए, लेकिन वह नारायण की भक्ति में लीन रहा। जब हिरण्यकश्यप का कोई उपाय काम नहीं आया, तो उसने अपनी बहन होलिका से सहायता माँगी।
कौन थी होलिका?

(भगवान विष्णु ने होलिका की गोद में बैठे अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की।)
होलिका महर्षि कश्यप और दिति की पुत्री थी। वो हिरण्यकश्यप की बहन और प्रह्लाद की बुआ थी। होलिका को भगवान ब्रह्मा से यह वरदान मिला था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती है। हिरण्यकश्यप ने होलिका की मदद से प्रह्लाद को अग्निकुंड में जिंदा जलाने का फैसला किया। होलिका अपने वरदान के अहंकार में प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्निकुंड में बैठ गई। भक्त प्रह्लाद की विष्णु भक्ति के फलस्वरूप होलिका जल गई और प्रह्लाद सकुशल अग्नि से बाहर आ गया। शक्ति पर भक्ति के विजय के उत्सव के रूप में होली का त्यैाहार मनाया जाने लगा।
जीवन की सीख: होलिका को भगवान ब्रह्मा से वरदान मिला था लेकिन उसकी एक शर्त थी कि यदि वह अपनी शक्ति का प्रयोग कर किसी का अहित करेगी तो उसका वरदान काम नहीं करेगा। ऐसा ही हुआ भी। भगवान विष्णु की भक्ति भक्त प्रह्लाद का सुरक्षा कवच बनी, और होलिका का अंत हुआ। यदि हम अपनी शक्तियों का प्रयोग दूसरों के अहित के लिए करते है तो अंततः हमारा ही अहित होता है।
रंगों का भावनात्मक प्रभाव
होली का त्यौहार आपसी मतभेद भुलाकर बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव है। यह त्यौहार न केवल संबंधों में मधुरता लाता है, बल्कि हमारे मानसिक स्वास्थ्य को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। रंगों के त्यौहार होली के पीछे का मनोविज्ञान अत्यंत गहरा है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो होली में प्रयोग होने वाले चमकीले रंग हमारे जीवन में आनंद, ऊर्जा और उत्साह का संचार करते हैं। इनका हमारे मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ये मस्तिष्क द्वारा स्रावित होने वाले "हैप्पी हार्मोन" डोपामिन के स्राव को सक्रिय करते हैं। डोपामिन प्रेरणा, एकाग्रता और संतुष्टि की भावना को बढ़ाता है। इसके कारण हम भीतर से पुनः ऊर्जावान, प्रसन्न और तरोताज़ा महसूस करते हैं।
प्राचीन समय में होली प्राकृतिक (ऑर्गेनिक) रंगों से खेली जाती थी। उदाहरण के लिए, पीले रंग के लिए हल्दी का उपयोग किया जाता था और अन्य रंगों के लिए हरी पत्तियों तथा सूखे फूलों का प्रयोग किया जाता था। इन रंगों के उपयोग से त्वचा पर जमी अशुद्धियाँ दूर हो जाती थीं और त्वचा स्वस्थ बनी रहती थी। उस समय होली के रंग बनाने के लिए पलाश, गुड़हल, चंदन, अनार, केसर, मेहंदी, बिल्व पत्र, गेंदे के फूल और अमलतास जैसे पौधों का प्रयोग किया जाता था, जो हमारी त्वचा के लिए लाभदायक होते थे।
होलिका दहन कब—2 या 3 मार्च?

(होलिका दहन से पहले सामूहिक रूप से पूजा करते लोग।)
हिंदू पंचांग के अनुसार, होली का त्यौहार वर्ष के अंतिम माह फाल्गुन की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसे होलिका दहन, होलिका दीपक और छोटी होली के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व दो दिन तक मनाया जाता है, पहले दिन होलिका दहन होता है और अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। वर्ष 2026 में होली कब मनाई जाएगी, इसे लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। इसका कारण पूर्णिमा तिथि का दो दिन होना है।
होलिका दहन 2026 शुभ मुहूर्त
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ — 2 मार्च 2026 को 05:55 PM।
पूर्णिमा तिथि समाप्त — 3 मार्च 2026 को 05:07 PM।
नोट : होलिका दहन पूर्णिमा तिथि में प्रदोष काल के दौरान किया जाना चाहिए। वर्ष 2026 में पंचांग के अनुसार पूर्णिमा तिथि 2 मार्च को 05:55 PM से आरंभ होगी और 3 मार्च को 5:07 PM तक रहेगी। यद्यपि 3 मार्च को अधिकांश समय पूर्णिमा तिथि रहेगी, किंतु यह केवल सायं 5:07 PMबजे तक ही रहेगी। प्रदोष काल 3 मार्च को सूर्यास्त के पश्चात आरंभ होगा। 3 मार्च 2026 को होली मनाने का कारण उदय व्यापिनी और प्रदोष व्यापिनी के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत पर आधारित है। धर्मशास्त्र में समय के दो प्रमुख सिद्धांत बताए गए हैं—
उदय व्यापिनी तिथि – वह तिथि जो सूर्योदय के समय विद्यमान हो।
प्रदोष व्यापिनी तिथि – वह तिथि जो प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) में विद्यमान हो।
2 मार्च को प्रदोष काल प्रारंभ हो चुका हो सकता है या अत्यंत समीप हो सकता है, किंतु उस दिन को पूर्णिमा के मुख्य उत्सव दिवस के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता। परंपरानुसार होलिका दहन उस पूर्णिमा से संबंधित होता है, जो होली के दिन में प्रविष्ट होती है, न कि उससे पूर्व की संध्या की पूर्णिमा से।
अतः 3 मार्च को ही पूर्णिमा का उत्सव मनाया जाएगा, और होलिका दहन सायंकाल (प्रदोष काल) में ही किया जाना चाहिए। यह निर्णय पंचांग के शास्त्रीय नियमों पर आधारित है। इसलिए, यद्यपि पूर्णिमा तिथि सूर्यास्त से कुछ पहले समाप्त हो रही होगी, फिर भी होलिका दहन 3 मार्च 2026 को ही मनाया जाएगा।
हालाँकि, वर्ष 2026 में चंद्र गणनाओं और ग्रहण के प्रभाव के कारण कुछ परंपराएँ वैकल्पिक मुहूर्तों पर भी विचार करती हैं। 2 मार्च 2026 को भद्रा के प्रभाव से पूर्व एक अल्प प्रदोष काल उपलब्ध है, जो सायं 6:24 बजे से 6:36 बजे तक रहेगा।
इस बार होलिका दहन वाली रात्रि में भद्रा का प्रभाव रहेगा। हिंदू पंचांग के अनुसार, भद्राकाल में शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं, इसलिए इस समय होलिका दहन या पूजा नहीं होती है। भद्राकाल से बचने के लिए होलिका दहन सूर्यास्त के बाद शाम को प्रदोष काल में किया जाता है। यदि उस समय भद्रा हो, तो यह अनुष्ठान भद्रा पूँछ यानी भद्रा के अंतिम भाग के समाप्त होने के बाद ही किया जाता है। भद्रा का प्रारम्भिक चरण भद्रा मुख कहलाता है, जिसे अशुभ माना जाता है। इसके विपरीत, अंतिम चरण भद्रा पूँछ कहलाता है, जो अपेक्षाकृत कम अशुभ होता है और इसमें कुछ सीमित कार्य किए जा सकते हैं।
भद्रा पूँछ: 3 मार्च, 1:25 AM से 2:35 AM तक।
भद्रा मुख: 3 मार्च, 2:35 AM से 4:30 AM तक।
होलिका दहन का शुभ मुहूर्त: 3 मार्च (मंगलवार) 06:22 PM से 08:50 PM तक।
अवधि: 02 घंटे 28 मिनट
होलिका दहन के अगले दिन, 4 मार्च को, होली खेली जाएगी, जिसे धुलेंडी अथवा धूलिवंदन के नाम से जाना जाता है। 'धूलि' का अर्थ होलिका की राख से है और 'वंदन' का अर्थ पूजा करना होता है। परंपरागत रूप से इस दिन होलिका की राख को माथे पर लगाकर होली के उत्सव की शुरुआत की जाती है।
होलिका दहन पूजा विधि
होली दहन पूजन को विधिपूर्वक संपन्न करने के लिए निम्नलिखित पूजा सामग्री की आवश्यकता होती है:
- पूजा सामग्री - एक जल पात्र, गोबर से बनी बड़कुल्ले की माला (गाय के गोबर से बने छोटे-छोटे गोलों की माला), रोली, अक्षत, अगरबत्ती अथवा धूप, पुष्प, कच्चा सूती धागा, हल्दी की गांठें, साबुत मूंग दाल, बताशे, गुलाल, नारियल। इसके अतिरिक्त नई फसल, जैसे गेहूँ और चना, के साबुत दाने भी ले सकते हैं।
होलिका स्थापना कैसे करें
जिस स्थान पर होलिका स्थापित की जाती है, उसे गोबर से लीपकर तथा गंगाजल से शुद्ध किया जाता है। उसके मध्य में एक लकड़ी का डंडा स्थापित किया जाता है। इसके चारों ओर गोबर से बने खिलौनों या मालाओं को सजाया जाता है, जिन्हें गुलरी, भरभोलिये या बड़कुला भी कहा जाता है। इसके ऊपर सामान्यतः गोबर से बनी होलिका और प्रह्लाद की मूर्तियाँ रखी जाती हैं। होलिका के ढेर को ढाल, तलवार, सूर्य, चंद्रमा, तारे तथा अन्य गोबर से बने खिलौनों से सजाया जाता है।
होलिका दहन के समय प्रह्लाद की मूर्ति को बाहर निकाल लिया जाता है। साथ ही अग्नि प्रज्वलित करने से पूर्व गोबर के चार बड़कुले सुरक्षित रख लिए जाते हैं। पहला पितरों के नाम का, दूसरा भगवान हनुमान के नाम का, तीसरा माँ शीतला के नाम का और चौथा परिवार के नाम का सुरक्षित रखा जाता है।
पूजन विधि
- शुद्धीकरण
- स्वस्तिवाचन एवं गणपति आवाहन
- भगवान गणेश की पंचोपचार पूजा
- माँ दुर्गा की पंचोपचार पूजा
- श्री हरि विष्णु की पंचोपचार पूजा
- इसके पश्चात होलिका को अक्षत, सुगंध (अगरबत्ती/धूप), पुष्प, साबुत मूंग दाल, हल्दी की गांठें, नारियल तथा भरभोलिये (सूखे गोबर से बनी माला, जिसे गुलरी या बड़कुला भी कहा जाता है) अर्पित किए जाते हैं।
- होलिका की परिक्रमा करते हुए उसके चारों ओर कच्चे सूत के तीन, पाँच या सात फेरे बाँधे जाते हैं। इसके बाद जल पात्र से अर्घ्य दिया जाता है।
- अगली सुबह, धुलेंडी (रंगों वाली होली) के दिन, होलिका दहन की अग्नि से प्राप्त राख एकत्र की जाती है और उसे शरीर पर लगाया जाता है। इस राख को पवित्र माना जाता है और ऐसी मान्यता है कि इसे लगाने से शरीर और आत्मा शुद्ध हो जाते हैं।
होलिका पूजन से शक्ति, समृद्धि और धन की प्राप्ति होती है। होलिका दहन की परंपरा सभी प्रकार के भय को दूर करने के उद्देश्य से आरंभ की गई थी। इसलिए होलिका, भले ही एक राक्षसी थीं, फिर भी होलिका दहन से पूर्व प्रह्लाद के साथ उनकी पूजा की जाती है। इस वर्ष होली के दिन चंद्रग्रहण भी है, जो आध्यात्मिक अभ्यास के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।
होली पर चंद्रग्रहण
इस वर्ष होलिका दहन, अर्थात छोटी होली के दिन चंद्रग्रहण रहेगा। चंद्रग्रहण 3 मार्च 2026, मंगलवार को फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि पर लगेगा।
चंद्रग्रहण का समय
- चंद्रग्रहण प्रारम्भ — 03:20 PM
- खग्रास (Total Lunar Eclipse) प्रारम्भ — 04:34 PM
- ग्रहण मध्य — 05:04 PM
- खग्रास समाप्त — 05:33 PM
- चंद्रग्रहण समाप्त — 06:47 PM
- खग्रास काल — 59 मिनट
सूतक काल कब से कब तक रहेगा?
ज्योतिष के अनुसार चंद्रग्रहण का सूतक काल अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष का पहला चंद्रग्रहण भारत में दिखाई देगा, इसलिए इसका सूतक काल भी मान्य होगा। चंद्रग्रहण के आरम्भ होने से 9 घंटे पहले सूतक लग जाएगा। ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में शुभ कार्य करने से बचना चाहिए।
सूतक प्रारम्भ — 3 मार्च, 09:33 AM
सूतक समाप्त — 3 मार्च, 06:46 PM
नोट: सूतक काल का समय आपके स्थान (भौगोलिक स्थिति) के अनुसार थोड़ा बहुत भिन्न हो सकता है।
ग्रहणकाल में साधना क्यों महत्वपूर्ण है
ग्रहणकाल में ग्रहों की ऊर्जा कुछ भिन्न होती है। मानो कोई चक्र चल रहा हो और उसमें अचानक एक विघ्न आ गया हो। इस भिन्न ऊर्जा के संदर्भ में हमारे ऋषि-मुनियों ने अनुभव किया कि उस काल में साधना का प्रभाव भी विशेष होता है। सूर्य और चंद्रमा की तरंगों का हमारे मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। धर्मशास्त्रों का भी यही मत है कि चाहे सूर्यग्रहण हो या चंद्रग्रहण, उस समय साधना अवश्य करनी चाहिए तथा जप या किसी धार्मिक अनुष्ठान में सम्मिलित होना चाहिए।
ग्रहणकाल में नवार्ण मंत्र का जप करना अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। साधना ऐप पर माँ दुर्गा के पावन धाम कंदब वन में अपनी क्षमता और समय की उपलब्धता के अनुसार नवार्ण मंत्र का जप करें और माँ दुर्गा की कृपा एवं संरक्षण प्राप्त करें।
ग्रहणकाल में नवार्ण मंत्र का जप करना अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।साधना ऐप पर माँ दुर्गा के पावन धाम कदंब वन में अपनी क्षमता और समय की उपलब्धता के अनुसार नवार्ण मंत्र का जप करें और माँ दुर्गा की कृपा एवं संरक्षण प्राप्त करें।
होली के पावन पर्व की शुभकामनाएँ।
We are proud Sanatanis, and spreading Sanatan values and teachings, our core mission. Our aim is to bring the rich knowledge and beauty of Sanatan Dharm to every household. We are committed to presenting Vedic scriptural knowledge and practices in a simple, accessible, and engaging manner so that people can benefit and internalize them in their lives.
Presented By Team Sadhana
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