माँ कात्यायनी का अवतरण

माँ कात्यायनी का अवतरण

‘जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते’
(‘हे महिषासुर का संहार करने वाली, सुन्दर जटाओं वाली, पर्वत की पुत्री,  आपको बार-बार नमन।’)

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र में गूँजती यह शक्तिशाली पंक्ति देवी भक्तों को प्रेरणा देती है, जो इसकी मंत्रमुग्ध कर देने वाली लय और धुन पर आनंदित हो उठते हैं। माँ आदिशक्ति के दिव्य नामों में से एक गौरवशाली नाम है ‘महिषासुरमर्दिनी’। आइए, लौटते हैं द्वितीय मन्वंतर(समय मापने की एक खगोलीय अवधि) के उस युग में, जब देवी आदि पराशक्ति ने देवताओं और समस्त ब्रह्मांड को असुर महिषासुर के क्रूर शासन से मुक्त कराने के लिए, माँ दुर्गा के कात्यायनी स्वरूप में अवतार लिया।

महिषासुर की कथा: रंभ का पुत्र

महिषासुर का जन्म एक असामान्य संयोग से हुआ था, एक असुर रंभ और एक महिषी (मादा भैंस) के मिलन से। रंभ ने हजारों वर्षों तक अग्निदेव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। उसने अग्निदेव से वरदान माँगा कि उसे एक ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो तीनों लोकों पर शासन करे, जो एक पराक्रमी योद्धा हो और इच्छानुसार रूप बदल सकने में सक्षम हो।

अग्निदेव ने वर देते हुए कहा, "तथास्तु। किसी भी नारी का चयन करो, तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी।"
और इतना कहकर अग्निदेव अंतर्धान हो गए।

वर्षों की तपस्या के बाद रंभ के भीतर भोग की तीव्र इच्छा जाग उठी। तभी उसकी दृष्टि एक सुंदर भैंस पर पड़ी। वासना के वशीभूत होकर रंभ ने उसके साथ संभोग किया। जब वह भैंस को पाताल लोक ले जा रहा था, तभी एक विशाल नर भैंस ने उस पर आक्रमण कर दिया और रंभ की हत्या कर दी। शोक में डूबी वह मादा भैंस रंभ की चिता में कूद गई। तभी एक तेज़ चमक के साथ एक अद्भुत प्रकाश प्रकट हुआ, और उससे एक अर्ध-मानव, अर्ध-भैंस बालक का जन्म हुआ। उस बालक के  सिर पर सींग थे और पूँछ क्रोध से फड़क रही थी। यही था महिषासुर। कुछ क्षण बाद, अग्नि से एक और विकृत चेहरा और रक्तवर्ण आँखों वाला राक्षस प्रकट हुआ। यह था रंभ, जिसने पुत्र के प्रति गहरी आसक्ति के कारण ही रक्तबीज के रूप में, अर्थात् ‘बीज से उत्पन्न’ होकर, पुनः जन्म लिया।

ब्रह्मा जी का वरदान और अत्याचार का युग

महिषासुर एक भयानक और क्रूर योद्धा के रूप में बड़ा हुआ। उसकी आसुरी सेनाएँ पूरे ब्रह्मांड में अत्याचार फैलाने लगीं। उसने सहस्रों वर्षों तक ब्रह्माजी की तपस्या की। जब पितामह ब्रह्मा प्रकट हुए, तो महिषासुर ने तुरंत अमरता का वरदान माँग लिया।

ब्रह्माजी बोले, “जो भी जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है। गहरे समुद्र, ऊँचे पर्वत, पृथ्वी और आकाशगंगाएँ भी एक दिन नष्ट हो जाएँगी। अतः हे असुरराज, अमरता को छोड़कर कुछ और वर माँगो।”

महिषासुर ने कहा, “हे पूज्य ब्रह्मा, तो मुझे यह वरदान दीजिए कि तीनों लोकों, पृथ्वी, पाताल और स्वर्ग, का कोई पुरुष मुझे न मार सके।”

अहंकार और गर्व में अंधे होकर वह यह सोच भी नहीं पाया कि कोई स्त्री भी उसे चुनौती दे सकती है। मुस्कराहट दबाते हुए उसने कहा, “यदि मेरी मृत्यु हो, तो वह किसी स्त्री के हाथों ही हो।”

ब्रह्माजी ने उसे यह वरदान दे दिया। अनजाने में ही महिषासुर ने अपने विनाश का बीज बो दिया। यही वरदान माँ कात्यायनी के अवतरण का कारण भी बना। समय के साथ, महिषासुर पृथ्वी का निरंकुश सम्राट बन गया। उसे कोई रोकने वाला नहीं रहा। उसका शासन विनाशकारी था। वह यज्ञों में विघ्न डालता और पूजन को नष्ट करता। बाद में उसने देवराज इन्द्र पर भी आक्रमण कर दिया।

देवताओं ने उसकी शक्ति को बहुत हल्के में लिया था। जहाँ एक ओर राक्षस वर्षों से युद्ध की तैयारी कर रहे थे, वहीं देवता विलास में डूबे हुए थे और दुर्बल हो चुके थे। यहाँ तक कि त्रिदेवों और देवताओं की सम्मिलित शक्तियाँ भी महिषासुर को रोकने में असमर्थ रहीं।

जब उन्हें ज्ञात हुआ कि ब्रह्मा जी का वरदान महिषासुर के पक्ष में है, जिससे उनके सारे प्रयास निष्फल हो रहे हैं, तब भगवान विष्णु और महादेव अपने-अपने लोकों को लौट गए। देवताओं ने युद्ध जारी रखा, पर अंततः वे पराजित होकर गहन वनों और गुफाओं में छिप गए। अनेक वर्षों तक निराशा में रहने के बाद, देवताओं ने साहस जुटाया और त्रिदेव,  ब्रह्मा, विष्णु और महादेव, की शरण में गए।

माँ आदि शक्ति का प्राकट्य

भगवान शिव ने सभी को स्मरण कराया कि केवल एक स्त्री ही महिषासुर का वध कर सकती है। भगवान विष्णु के सुझाव पर, समस्त देवताओं और त्रिदेवों ने अपनी-अपनी शक्तियाँ एकत्र कर एक ऐसी देवी की रचना करने का संकल्प लिया, जो महिषासुर को पराजित कर सके। ब्रह्मा जी के भ्रूमध्य से एक दिव्य स्त्रैण ऊर्जा का प्रकाश-पुंज प्रकट हुआ। इसी प्रकार, भगवान शिव के भ्रूमध्य से एक चाँदी-सी चमकती तेजस्वी शक्ति और भगवान विष्णु से एक दीप्तिमान नीली ज्वाला प्रकट हुई।

ये तीनों शक्तियाँ , रजस, तमस और सत्व की प्रतीक थी, जो एकत्र होकर एक विशाल ज्वाला में परिवर्तित हो गईं। इस अद्भुत दृश्य को देख देवताओं ने भी अपनी-अपनी शक्तियाँ उसमें समर्पित कीं।  शीघ्र ही वह ज्वाला एक विशाल अग्निपुंज में बदल गई जिसकी आभा से संपूर्ण दिशा-विदिशाएँ कांप उठीं। इस लहलहाती अग्नि से एक तेजस्वी नारी का स्वरूप आकार लेने लगा। ऐसा सौंदर्य और दिव्यता देवताओं ने न कभी देखी थी, न कभी इसकी कल्पना की थी। वे स्तब्ध रह गए। आकाश के समान ऊँचाई वाली उस देवी की अठारह भुजाएँ थीं, जिनमें विविध आयुध सुशोभित थे। उन्होंने अत्यंत भव्य आभूषण धारण किए थे, जिनकी न तो कोई कल्पना कर सकता था और न ही उन्हें बनाया जा सकता था।

भगवान विष्णु ने सभी देवताओं को आदेश दिया कि वे अपने श्रेष्ठतम् आयुध उन्हें अर्पित करें। इन्द्रदेव ने अपना वज्र दिया, यमदेव ने अपना दंड,भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से एक और चक्र निकाला, भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से एक नया त्रिशूल उनके लिए बनाया, वरुणदेव ने जलपाश, ब्रह्मा ने गंगाजल से भरा कमंडल, कालदेव ने परशु (कुल्हाड़ी) उन्हें अर्पित की। इन सभी दिव्य आयुधों से सुसज्जित, माँ आदि पराशक्ति अपनी संपूर्ण महिमा में प्रकट हुईं। देवताओं ने माँ की स्तुति की और प्रणाम करते हुए उनसे प्रार्थना की कि वे उन्हें महिषासुर के अत्याचार से मुक्त करें।

उस देवी के अधरों पर एक चतुर मुस्कान तिर गई। उन्होंने कहा—

“हे देवताओं! कितना आश्चर्य है कि त्रिदेव और समस्त देवगण एक असुर से भयभीत होकर मेरे समक्ष खड़े हैं। निःसंदेह, काल (समय) ही सबसे बड़ा देवता है।”

वे अपने क्रूर वाहन, सिंह पर आरूढ़ हुईं और महिषासुर तथा उसकी सेना के संहार के लिए प्रस्थान किया। देवताओं ने जयकार की—

‘सिंहवाहिनी माँ दुर्गा की जय!’ ‘विजयी भव!’
वे एक साथ योद्धा, माँ और रक्षिका—इन तीन रूपों का पूर्ण समन्वय थीं।

देवी माँ का कात्यायनी रूप में अवतरण

इसी बीच, महर्षि कात्यायन, जो देवी के परम भक्त थे, उन्हें अपनी पुत्री के रूप में पाने की तीव्र इच्छा से कठोर तप कर रहे थे। देवी ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार की और पृथ्वी पर उनकी पुत्री के रूप में प्रकट हुईं। इस प्रकार वे कात्यायनी कहलाईं।

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