जगन्नाथ रथ यात्रा: कृपा की डोर थामने का दिव्य अवसर
क्या एक साधारण नारियल के रेशों से बनी रस्सी मनुष्य को इस संसार से जोड़कर सीधे मोक्ष तक की दूरी को समाप्त कर सकती है?
पुरी की वार्षिक जगन्नाथ रथ यात्रा के संदर्भ में इसका उत्तर है , हाँ। जब भक्त "जय जगन्नाथ!" के जयघोष के बीच विशाल रथों को खींचते हैं, तब वे वास्तव में अपनी चेतना को सांसारिक मोह-माया से हटाकर सीधे भगवान की ओर, मोक्ष की ओर ले जा रहे होते हैं। यह पावन उत्सव ओडिशा के तटीय नगर पुरी को भक्ति के महासागर में बदल देता है।
इस भव्य आयोजन में 'जगत के स्वामी' ( भगवान जगन्नाथ ) स्वयं हर वर्ष मंदिर से बाहर आकर सभी भक्तों पर अपनी कृपा बरसाते हैं। यह परंपरा उत्कल (वर्तमान ओडिशा) की भूमि में प्रचलित 'ओड़िया वैष्णव' संप्रदाय से जुड़ी है, जिसे ‘जगन्नाथ सम्प्रदाय’ भी कहा जाता है। स्कंद पुराण के वैष्णव खंड में वर्णित पुरुषोत्तम क्षेत्र माहात्म्य में भगवान जगन्नाथ के प्राकट्य और रथ यात्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है।
आइए भगवान के प्राकट्य की दिव्य कथा, संसार की सबसे बड़ी और सबसे प्राचीन रथ यात्रा के अर्थ, महत्व और उसके पीछे स्थित प्रतीकों को गहराई से समझें।
इस ब्लॉग की मुख्य बातें:
- जगन्नाथ रथ यात्रा क्या है?
- भगवान जगन्नाथ पुरी में कैसे प्रकट हुए?
- रथ यात्रा मनाने के पीछे क्या कथा है?
- माता लक्ष्मी ने भगवान जगन्नाथ के रथ को तुड़वाने का आदेश क्यों दिया?
- बाहुड़ा यात्रा क्या है?
- रथ यात्रा के तीनों रथ क्या दर्शाते हैं?
- भगवान जगन्नाथ का शाक्त परंपरा से क्या संबंध है?
- घर पर जगन्नाथ रथ यात्रा कैसे मनाएँ?
जगन्नाथ रथ यात्रा क्या है?
पुरी (ओडिशा) में हर वर्ष आयोजित होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा भव्य रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं।। यह उत्सव विश्व बंधुत्व और पूर्ण समानता का सुंदर प्रतीक है, क्योंकि जगत के स्वामी स्वयं बाहर आकर बिना किसी जाति-भेद के सभी पर अपनी कृपा बरसाते हैं।
रथ पर विराजमान भगवान के दर्शन को "रथ दर्शनम् पुण्यम्" कहा जाता है, और मान्यता है कि इससे आत्मा तत्काल शुद्ध हो जाती है।
भगवान का जगन्नाथ पुरी में प्राकट्य कैसे हुआ ?

( पवित्र श्रीक्षेत्र )
स्कंद पुराण के पुरुषोत्तम क्षेत्र माहात्म्य के अनुसार, मालवा के राजा इंद्रद्युम्न, भगवान नीलमाधव अर्थात् श्रीहरि विष्णु का नील वर्ण स्वरूप, जो ओडिशा भूमि में पूजनीय हैं की उपासना करना चाहते थे। राजा ने अपने दूत विद्यापति को भेजा, जिसने उस गुप्त स्थान को खोज निकाला और भगवान के होने की सूचना राजा तक पहुँचाई।
परंतु जब तक राजा वहाँ पहुँचे, वह मूर्ति अदृश्य हो चुकी थी, यह दिखाते हुए कि भगवान केवल अपनी इच्छा और कृपा से ही प्रकट होते हैं। राजा की गहन तपस्या और यज्ञों से प्रसन्न होकर भगवान समुद्र में एक दिव्य काष्ठ ‘दारु’ (दारु-ब्रह्म ,भगवान का दिव्य काष्ठ स्वरूप) के रूप में प्रकट हुए, जिस पर शंख और चक्र जैसे पवित्र चिह्न अंकित थे। इसी पावन काष्ठ से भगवान ने चतुर्धा मूर्ति (चार स्वरूपों) में दर्शन दिए:
- भगवान जगन्नाथ या जनार्दन - मेघ के समान श्याम वर्ण।
- भगवान बलभद्र - श्वेत वर्ण।
- देवी सुभद्रा - केसरिया वर्ण और सौम्य मुखमंडल।
- चक्रराज सुदर्शन - भगवान जगन्नाथ के बाईं ओर एक लकड़ी के स्तंभ के रूप में विराजमान। यही सुदर्शन चक्र मंदिर के शिखर पर विशाल नीलचक्र के रूप में स्थापित है, जो नगर की रक्षा करता है और पुरी में लगभग हर स्थान से दिखाई देता है।
इन चारों मूर्तियों को सामूहिक रूप से भगवान जगन्नाथ के एक जीवंत, गतिमान स्वरूप के रूप में पूजा जाता है।
रथ यात्रा क्यों मनाई जाती है?
एक लोककथा है कि एक बार देवी सुभद्रा ने अपनी मौसी (रानी गुंडिचा, राजा इंद्रद्युम्न की पत्नी) से मिलने और नगर घूमने की इच्छा प्रकट की। बहन की यह इच्छा पूर्ण करने के लिए भगवान जगन्नाथ और भगवान बलभद्र उन्हें भव्य रथ पर बिठाकर ले जाने को तैयार हुए। तीनों देवी-देवता लगभग 3 किलोमीटर की यात्रा कर गुंडिचा मंदिर पहुचें और वहाँ नौ दिनों तक ठहरे, यही यात्रा हर वर्ष भक्तों द्वारा उत्सव के रूप में मनाई जाती है।
इस उत्सव में भगवान स्वयं मंदिर से बाहर आकर सभी भक्तों को सहज दर्शन देते हैं। रथ की पावन रस्सी खींचना सामूहिक भक्ति और सेवा का प्रतीक है। यही कारण है कि रथयात्रा केवल एक उत्सव नहीं रह जाता अपितु भगवान की दिव्य कृपा का साक्षात् अनुभव है।
( जगन्नाथ महाप्रभु की स्नान यात्रा )
यात्रा आरंभ होने से पहले होने वाले विशेष अनुष्ठान इस उत्सव को और भी भव्य बनाते हैं। मुख्य यात्रा से कुछ सप्ताह पहले, ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि मे देवताओं को 108 घड़ों के जल से स्नान कराया जाता है, जिसे ‘स्नान यात्रा’ कहते हैं। मान्यता है कि इससे उन्हें ज्वर हो जाता है।
इसके पश्यात पंद्रह दिनों तक वे एकांतवास (अनासर) में रहकर औषधीय उपचार लेते हैं और जन-दर्शन से दूर रहते हैं। इस अवधि के दौरान भगवान की मूल लकड़ी की मूर्तियों (दारु विग्रह) के स्थान पर पट्टी दियन नामक विशेष पटचित्र चित्रों की पूजा की जाती है। पूर्ण स्वस्थ होने पर, नवयौवन दर्शन के दिन मंदिर के कपाट पुनः खुलते हैं और भक्त देवताओं को पूर्णतः नवीन और युवा स्वरूप में देखते हैं।
इसके पश्चात उत्सव आरंभ होता है छेरा पहरा से, जिसमें पुरी के राजा स्वयं सोने की झाड़ू से रथों के चारों ओर का मार्ग स्वच्छ करते हैं , जो यह दर्शाता है कि भगवान के समक्ष सभी समान हैं।
चक्रराज सुदर्शन सबसे आगे चलकर भगवान को गर्भगृह से रथों तक ले जाते हैं। अंततः लाखों भक्त मोटी नारियल की रस्सियों से नवनिर्मित लकड़ी के रथों को खींचते हैं। मान्यता है कि केवल इन रस्सियों के स्पर्श से या रथ पर भगवान के दर्शन मात्र से जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं और मोक्ष प्राप्त होता है।
माता लक्ष्मी ने भगवान जगन्नाथ के रथ को तुड़वाने का आदेश क्यों दिया?
उत्सव के दूसरे दिन भगवान गुंडिचा मंदिर पहुँचते हैं। देवी लक्ष्मी क्रोधित हो जाती हैं क्योंकि जब उनके पति भाई-बहन के साथ यात्रा पर जाते हैं तब वे मंदिर में अकेली रह जाती हैं। इस प्रकार वे पाँचवें दिन वे सजी-धजी पालकी (बिमान) में गुंडिचा मंदिर जाती हैं, उन्हें खोजने के लिए जाति हैं , इसी को ‘हेरा पंचमी’ कहते हैं, जहाँ "हेरा" का अर्थ है खोजना और "पंचमी" पाँचवाँ दिन।
क्रोध में वे भगवान से सीधे मिलने से मना कर देती हैं। इसके विपरीत उनकी सेविकाएँ रथ का एक छोटा टुकड़ा तोड़ देती हैं , इस अनुष्ठान को ‘रथ भंगा’ कहा जाता है। देवी को शांत करने के लिए भगवान जगन्नाथ उन्हें आज्ञामाला भेजते हैं। यह माला भगवान के शीघ्र लौट आने के वचन और उनकी आज्ञा का प्रतीक है। इसके बाद देवी संतुष्ट होकर एक गुप्त मार्ग से मंदिर लौट जाती हैं। इस मार्ग को हेरा गोहिरी कहा जाता है।

( महाप्रभु के दिव्य दर्शन )
अंतिम संध्या को विशाल जनसमूह गुंडिचा मंदिर में देवताओं के दर्शन के लिए एकत्र होता है, जहाँ वे आडपा मंडप पर विराजमान होकर गुंडिचा रसोई में बना महाप्रसाद ग्रहण करते हैं। इसे नवमी दर्शन या संध्या दर्शन कहा जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार इस संध्या दर्शन की एक झलक भी मुख्य मंदिर में जीवनभर की पूजा के समान फल देती है। वैष्णव परंपरा में गुंडिचा मंदिर को भगवान के प्रवास के दौरान वृंदावन के समान माना जाता है।
बाहुड़ा यात्रा क्या है?
बाहुड़ा यात्रा, जो उत्सव के नौवें दिन (आषाढ़ शुक्ल दशमी) मनाई जाती है, भगवान की गुंडिचा मंदिर से पुरी स्थित मुख्य जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार तक की वापसी यात्रा है।
वापसी के समय रथ श्रीमंदिर के सिंहद्वार के समीप पहुँचते हैं। इसके अगले दिन सुना बेशा का भव्य उत्सव मनाया जाता है, जिसमें तीनों विग्रहों को सिर से पैर तक स्वर्णाभूषणों से अलंकृत किया जाता है। यह अलंकरण भगवान जगन्नाथ के 'राजाधिराज' स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।

( अधरा पाना अनुष्ठान)
सुना बेशा के बाद संध्या में अधरा पाना मनाया जाता है। देवताओं को ऊँचे मिट्टी के घड़ों में एक विशेष मीठा, मसालेदार पेय अर्पित किया जाता है, और अर्पण के तुरंत बाद पुजारी इन घड़ों को जानबूझकर रथ पर फोड़ देते हैं। यह भक्तों के लिए नहीं, बल्कि रथों की नौ दिन तक रक्षा करने वाले अदृश्य रथ रक्षकों और अन्य दिव्य शक्तियों की तृप्ति और मुक्ति के लिए किया जाता है।
अंतिम अनुष्ठान नीलाद्रि बिजे में माता लक्ष्मी मंदिर के द्वार बंद कर देती हैं ताकि भगवान भीतर न आ सकें। अपनी अप्रसन्न पत्नी को मनाने के लिए भगवान जगन्नाथ उन्हें रसगुल्ला भेंट करते हैं। माता लक्ष्मी इस मधुर उपहार को स्वीकार कर भगवान को क्षमा कर देती हैं और भीतर प्रवेश देती हैं। यही सुंदर ओड़िया परंपरा पूरे राज्य में रसगोला दिवस के रूप में भी मनाई जाती है।
इसके बाद तीनों भाई-बहन अगले वर्ष की यात्रा तक अपने रत्न सिंहासन पर विराजमान हो जाते हैं। तीनों विशाल रथों को पूरी तरह भंग कर दिया जाता है, और उनकी लकड़ी वर्षभर मंदिर की रसोई में महाप्रसाद पकाने के काम आती है।
रथ यात्रा के तीनों रथ क्या दर्शाते हैं?

( भक्तों द्वारा खींचे जाने वाले तीन पवित्र रथ )
स्कंद पुराण में वर्णन है कि स्वयं श्रीहरि विष्णु ने राजा इंद्रद्युम्न को रथ बनवाने और गुंडिचा मंदिर की पावन यात्रा करने का निर्देश दिया था। हर वर्ष रथ उन्हीं मापदंडों के अनुसार बनाए जाते हैं।
इन रथों की अपनी विशिष्ट बनावट है, और ये मनुष्य की आत्मिक यात्रा के गहरे प्रतीक भी हैं।
नंदीघोष - भगवान जगन्नाथ का रथ, जिसका अर्थ है "आनंद लाने वाला" या "सुख की ध्वनि"। इसे गरुड़-ध्वज या कपि-ध्वज भी कहते हैं। यह सबसे ऊँचा रथ है , 45.6 फीट ऊँचा, 16 पहियों वाला, पीले और लाल वस्त्र से सजा। यह दिव्य आनंद, परम ज्ञान और सर्वोच्च चेतना का प्रतीक है , यह आत्मा की यात्रा का अंतिम गंतव्य, परम चेतना में विलीन होने को दर्शाता है।
तालध्वज - भगवान बलभद्र का रथ, जिसका अर्थ है "ताड़ के पेड़ के ध्वज वाला", इसे लांगल-ध्वज भी कहते हैं। इसमें 14 पहिए हैं और यह लाल व नीले-हरे वस्त्र से सजा है। शेषनाग के अवतार भगवान बलभद्र आदि शक्ति और स्थिरता के प्रतीक हैं, इसलिए उनका रथ आध्यात्मिक बल, दृढ़ता और जीवन की रक्षा का प्रतीक है।
दर्पदलन - देवी सुभद्रा का रथ, जिसका अर्थ है "अहंकार का नाश करने वाला", इसे देवदलन या पद्म-ध्वज भी कहते हैं। इसमें 12 पहिए हैं और यह लाल व काले वस्त्र से ढका हुआ है। काला रंग परंपरागत रूप से आद्यशक्ति का प्रतीक है, जिनका स्वरूप देवी सुभद्रा हैं। इस रथ का गूढ़ अर्थ है कि जब तक मनुष्य का अहंकार नष्ट नहीं होता, तब तक सच्ची भक्ति आरंभ ही नहीं हो सकती।
चक्रराज सुदर्शन का अपना अलग रथ नहीं होता, वे देवी सुभद्रा के रथ में ही विराजमान रहते हैं।
कठोपनिषद में वर्णित रथ का रूपक, रथ यात्रा के महत्व को समझने में सहायक है। रथ हमारे शरीर का प्रतीक है, जबकि उसमें विराजमान देवता आत्मा के प्रतीक हैं। रथ की गति आत्मा की उस यात्रा को दर्शाती है जो अज्ञान के अंधकार से आध्यात्मिक ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ती है। रथ के विशाल पहिए जीवन, काल और कर्म के अनवरत चक्र के प्रतीक हैं।
भगवान जगन्नाथ का शाक्त परंपरा से क्या संबंध है?
शाक्त परंपरा में भगवान जगन्नाथ को भगवान शिव के उग्र स्वरूप भैरव का रूप माना जाता है। यह मान्यता पास स्थित विमला देवी शक्तिपीठ में प्रचलित है, जहाँ भगवान जगन्नाथ को देवी बिमला के भैरव रूप में पूजा जाता है, और भगवान का भोग तभी महाप्रसाद कहलाता है जब वह पहले देवी बिमला को अर्पित किया जाए। कालिका पुराण और योगिनी तंत्र में पुरी नगर को पुरुषोत्तम कहा गया है।
ऋषि मार्कण्डेय ने भी भगवान जगन्नाथ और भगवान शिव को एक ही माना हैं। रत्न वेदी, जहाँ भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा विराजमान होते हैं, पर भी अनेक पवित्र यंत्र उकेरे हुए हैं।
देवी सुभद्रा को माता दुर्गा या माता योगमाया का ही स्वरूप माना जाता है, वही देवी जो श्रीकृष्ण के जन्म के साथ ही प्रकट हुई थीं।उनकी पूजा माता भुवनेश्वरी के बीज मंत्र से होती है। जगन्नाथ मंदिर के पुजारी शाक्त परंपरा से जुड़े हैं। नीलाद्रि महोदय (मंदिर से जुड़ी एक संस्कृत रचना) में वर्णन है कि भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की मूर्तियाँ क्रमशः चक्र यंत्र, शंख यंत्र और पद्म यंत्र पर स्थापित हैं - जो मंदिर के शाक्त दर्शन से गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।
भारत भर में रथ यात्रा कैसे मनाई जाती है?
पूरे भारत में लोग भगवान जगन्नाथ की इस पावन यात्रा को बड़े-बड़े जुलूसों और घर पर बनाए गए लघु रथों के साथ मनाते हैं। यह व्यापक भक्ति-भावना अहमदाबाद में एक भव्य रूप लेती है, जहाँ भारत की दूसरी सबसे बड़ी रथ यात्रा निकाली जाती है |
यह यात्रा 400 वर्ष पुराने मंदिर से आरंभ होती है और इसका इतिहास 1878 तक जाता है। पूर्व की ओर पश्चिम बंगाल चलें, तो सेरामपुर की महेश रथ यात्रा बंगाल की सबसे प्राचीन रथ यात्रा है, जिसकी शुरुआत 1396 ई. में हुई थी। पुरी के विपरीत, यहाँ लकड़ी की मूर्तियाँ हर 12 वर्ष में नहीं बदली जातीं।
पश्चिम बंगाल में ही आगे बढ़ें, तो महिषादल का रथ विश्व के सबसे ऊँचे काष्ठ-निर्मित रथ होने का गौरव रखता है। ओडिशा के मयूरभंज की सांस्कृतिक विशिष्टता यह है कि बारीपदा रथ यात्रा में देवी सुभद्रा का रथ 1975 से केवल महिलाओं द्वारा खींचा जाता है। एक और अनूठी परंपरा गुप्तिपाड़ा रथ यात्रा की वापसी यात्रा में देखने को मिलती है, जहाँ उत्साहित भक्त प्रसिद्ध 'भंडार लूट' में भाग लेकर पवित्र भोग-सामग्री प्राप्त करते हैं।
इसी उत्साह से भरपूर है छत्तीसगढ़ के बस्तर की गोंचा रथ यात्रा, जहाँ भक्त बांस से बनी पिस्तौलों से रथ पर 'टुपकी-सलामी' देते हुए एक चंचल परंपरा निभाते हैं। इम्फाल में भी एक ऐसा ही रचनात्मक रूपांतरण देखने को मिलता है, जहाँ मैतेई हिंदू इस पर्व को कांग चिंगबा के नाम से मनाते हैं। यह परंपरा अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को भी पार करती है, बांग्लादेश में विशाल धामराई जगन्नाथ रथ यात्रा आयोजित होती है। आज यह वैश्विक यात्रा उत्सव दक्षिण एशिया से कहीं आगे बढ़ चुकी है, और सैन फ्रांसिस्को, लंदन तथा ऑकलैंड जैसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय शहरों की सड़कों पर भी उतरती है, जहाँ स्थानीय समुदाय पुरी की पावन गलियों को दुनिया भर में पुनर्जीवित करते हैं।
घर पर जगन्नाथ रथ यात्रा कैसे मनाएँ?
पुरी में होने वाले अनुष्ठानों से प्रेरित होकर आप घर पर भी इसे सरलता से मना सकते हैं।
तैयारी: पूजा स्थान को स्वच्छ और शुद्ध करें। पीले या लाल वस्त्र से ढकी चौकी पर भगवान जगन्नाथ और उनके भाई-बहन का चित्र, मूर्ति या तस्वीर सही क्रम में स्थापित करें। फूलों, तुलसी पत्तों और रंगोली से स्थान को सजाएँ। एक छोटा रथ (लकड़ी या गत्ते का) बनाकर वेदी के सामने रखें।
संकल्प: स्वयं को मन ही मन श्रीक्षेत्र पुरी में उपस्थित मानते हुए महाप्रभु की रथ यात्रा के स्मरण के साथ अपनी आध्यात्मिक उन्नति और परिवार की भलाई के लिए यह पूजा अर्पित करें।
स्नान: चूँकि पारंपरिक लकड़ी की जगन्नाथ मूर्तियों को सीधे जल से स्नान नहीं कराया जाता, गंगाजल और तुलसी पत्तों से मिश्रित जल फूल द्वारा छिड़ककर प्रतीकात्मक स्नान कराएँ।
देवताओं को नए पीले, लाल या हरे वस्त्र अर्पित करें, भगवान जगन्नाथ व भगवान बलभद्र को चंदन तथा देवी सुभद्रा को कुमकुम लगाएँ। पुष्पमाला से शृंगार करें और भगवान जगन्नाथ के चरणों में तुलसी दल अर्पित करें। धूप और घी का दीपक जलाएँ।
भोग अर्पण: भगवान जगन्नाथ भोजन अत्यंत प्रिय है । मंदिर में जहाँ 56 प्रकार के भोग (छप्पन भोग) अर्पित होते हैं, वहीं घर पर आप सरल सात्विक भोजन बना सकते हैं। इस अवसर पर परंपरागत रूप से खीर, दालमा (बिना प्याज-लहसुन दाल और सब्जी का ओड़िया व्यंजन), मालपुआ और पोड़ा पीठा बनाए जाते हैं।
साधना: "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" (द्वादशाक्षरी) मंत्र, जगन्नाथाष्टकम, विष्णु सहस्रनाम या श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों का पाठ करें। आप साधना ऐप पर वैकुंठ में जा कर द्वादशाक्षरी मंत्र का जप कर सकते हैं।
अपने छोटे रथ को घर के पूजा स्थान में कुछ कदम खींचें, या आँखें बंद करके स्वयं को पुरी के विशाल नंदीघोष रथ की रस्सी खींचते हुए कल्पना करें। गीतगोविंद या भगवान जगन्नाथ के पारंपरिक भजनों का गायन कर घर के वातावरण को भक्तिमय बनाएँ। दिन का समापन घी के दीपक, कपूर की आरती और शंखनाद के साथ करें।
सेवा-भाव में लीन हों : सेवा-भाव से इस दिन को अन्नदान का अवसर मानें और प्रसाद पक्षियों, गायों या अभावग्रस्त जनों के साथ बाँटें। जगन्नाथ रथयात्रा आज ओड़िशा की एक परंपरा भर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को जोड़ने वाला आस्था का उत्सव बन चुकी है। भक्ति से प्रेरित ये पवित्र रथ विभिन्न संस्कृतियों और लोगों को भगवान जगन्नाथ के चरणों से जुड़ने का अवसर प्रदान करते हैं।
Frequently Asked Questions
Clearing doubts on your sacred journey
भगवान जगन्नाथ कौन हैं?
क्या भगवान जगन्नाथ श्रीकृष्ण का ही स्वरूप हैं?
श्रीक्षेत्र का क्या महत्व है?
पुरी के महाप्रसाद का क्या महत्व है?
We are proud Sanatanis, and spreading Sanatan values and teachings, our core mission. Our aim is to bring the rich knowledge and beauty of Sanatan Dharm to every household. We are committed to presenting Vedic scriptural knowledge and practices in a simple, accessible, and engaging manner so that people can benefit and internalize them in their lives.
Presented By Team Sadhana
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महाप्रभु जगन्नाथ जी की जय। बहुत सुंदर प्रस्तुति हैं।
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