दक्षिण भारत में स्थित भगवान शिव के पावन ज्योतिर्लिंग – श्रीशैलम और रामेश्वरम
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारंममलेश्वरम्॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥
एतानि ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रातः पठेन्नरः।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥
आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह श्लोक भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग का महत्व बताता है।जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल इन ज्योतिर्लिंगों के नामों का श्रद्धापूर्वक जप करता है, उसके सात जन्मों तक के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। जिस कामना की पूर्ति के लिए वह नित्य इन पावन नामों का पाठ करता है, उसे शीघ्र ही उसका फल प्राप्त होता है। इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन मात्र से ही मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है, यही भगवान शिव की अद्भुत महिमा है। इस ब्लॉग में हम भगवान शिव के दो पावन ज्योतिर्लिंगों और उनके आध्यात्मिक महत्व के बारे में जानेंगे।
इस ब्लॉग की प्रमुख बातें
- ज्योतिर्लिंग क्या है ?
- बारह ज्योतिर्लिंग के नाम
- मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (श्रीशैलम, आंध्र प्रदेश)
- ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ
- श्रीशैलम ज्योतिर्लिंग का पौराणिक इतिहास
- भगवान कार्तिकेय की निराशा
- दानव अरुणासुर का वध
- रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग (तमिलनाडु)
- पौराणिक कथा
ज्योतिर्लिंग क्या है ?

( ज्योतिर्लिंग-भगवान शिव का प्रतीक)
भगवान शिव देवों के देव, महादेव हैं। वे पृथ्वी पर बारह ज्योतिर्लिंगों के रूप में विराजमान हैं। ‘ज्योतिर्लिंग’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—‘ज्योति’ और ‘लिंग’। ‘ज्योति’ का अर्थ है ‘प्रकाश’ और ‘लिंग’ का अर्थ है ‘चिन्ह’। अतः ज्योतिर्लिंग का अर्थ है ‘भगवान शिव का तेजस्वी अथवा प्रकाशमान स्वरूप’, जो एक स्तंभ के रूप में प्रकट हुआ। उनके इस स्वरूप का न तो कोई आदि है, न ही कोई अंत। बारह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के स्वयंभू अवतार माने गए हैं। शिवपुराण और नंदी उपपुराण में स्वयं भगवान शिव ने कहा है— “मैं सर्वत्र उपस्थित हूँ, परंतु विशेष रूप से बारह रूपों और स्थानों में ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थित हूँ।”
बारह ज्योतिर्लिंग के नाम

भारत में कुल 12 ज्योतिर्लिंग है। देश के विभिन्न भागों में स्थापित महादेव के प्रत्येक ज्योतिर्लिंग के पीछे एक विशिष्ट पौराणिक कथा निहित है, और इन सभी बारह ज्योतिर्लिंगों का अपना-अपना विशेष आध्यात्मिक महत्व है। शिव पुराण के अनुसार, इन बारह ज्योतिर्लिंग के नाम इस प्रकार हैं—
- सोमनाथ (गुजरात)
- मल्लिकार्जुन (श्रीशैलम, आंध्र प्रदेश)
- महाकालेश्वर (उज्जैन, मध्य प्रदेश)
- ओंकारेश्वर (मध्य प्रदेश)
- केदारनाथ (उत्तराखंड)
- भीमाशंकर (महाराष्ट्र)
- काशी विश्वनाथ (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)
- त्र्यंबकेश्वर (महाराष्ट्र)
- वैद्यनाथ (बैद्यनाथ धाम, झारखंड)
- नागेश्वर (गुजरात)
- रामेश्वरम (तमिलनाडु)
- घृष्णेश्वर (महाराष्ट्र)
भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से दो मध्यप्रदेश, दो गुजरात, तीन महाराष्ट्र तथा दो दक्षिण भारत में स्थित हैं। दक्षिण भारत की पुण्यभूमि पर मल्लिकार्जुन और रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग प्रतिष्ठित हैं। आंध्र प्रदेश में भगवान शिव मल्लिकार्जुन के रूप में पूजित हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एक ज्योतिर्लिंग होने के साथ-साथ शक्तिपीठ भी है। यह स्थल शिव-शक्ति के एकत्व का प्रतीक माना जाता है। वहीं तमिलनाडु के रामेश्वरम में स्थित ज्योतिर्लिंग का महाकाव्य रामायण से गहन संबंध है। ये दोनों ज्योतिर्लिंग दक्षिण भारत की एक पहचान हैं।
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (श्रीशैलम, आंध्र प्रदेश)

( मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग )
“श्रीशैल शिखरं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते।”
— श्रीशैल खंड, स्कंद पुराण
अर्थात् श्रीशैलम के शिखर (मंदिर) के दर्शन मात्र से ही मनुष्य जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।
श्री भ्रमराम्बा मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर कृष्णा नदी के तट पर नल्लमाला पहाड़ियों के घने वनों के बीच स्थित है। यह प्राचीन मंदिर भारत के महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से एक है। संस्कृत में ‘भ्रमर’ का अर्थ भौंरा (भंवरा) होता है। मान्यता है कि माँ पार्वती ने इस स्थान पर भगवान शिव की उपासना करने हेतु भ्रमर का रूप धारण किया था, और तभी से वे माँ भ्रमराम्बा के नाम से जानी जाने लगीं। भगवान शिव यहाँ अर्जुन वृक्ष के रूप में निवास करते थे। यह वृक्ष मल्लिका (जास्मीन) की बेल के साथ लिपटा हुआ था, जो माता पार्वती का प्रतीक है। इसी कारण भगवान शिव को मल्लिकार्जुन के नाम से जाना जाने लगा।
ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ
अक्सर लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग एक शक्तिपीठ है। हाँ, यह वास्तव में एक शक्तिपीठ भी है। जब माँ पार्वती ने भगवान शिव से कैलाश पर्वत के अतिरिक्त उनके सबसे प्रिय स्थान के बारे में पूछा, तो उन्होंने श्रीशैलम को चुना। यह मंदिर ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ दोनों के रूप में मान्य है, जिससे यह हिंदू परंपरा के अति-दुर्लभ और शक्तिशाली आध्यात्मिक स्थलों में से एक है। श्रीशैलम को श्रीगिरि, सिरिगिरि, श्रीपर्वतम और श्रीनागम के नामों से भी पहचाना जाता हैं।
शास्त्रों में उल्लेख है कि सतयुग में भगवान नरसिंह, त्रेतायुग में माँ सीता के साथ भगवान राम, द्वापरयुग में पाँचों पांडव, और कलियुग में महर्षि अगस्त्य, महर्षि वशिष्ठ सहित अनेक योगी और ऋषियों ने श्रीशैलम की यात्रा की। यहाँ उन्होंने भ्रमराम्बिका देवी और मल्लिकार्जुन स्वामी के आशीर्वाद प्राप्त किए।
श्रीशैलम ज्योतिर्लिंग का पौराणिक इतिहास

(माँ भ्रमराम्बा श्रीशैलम)
श्रीशैलम प्राचीन काल से ही एक पावन स्थल रहा है। इसकी उत्पत्ति से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। आइए, हम इस पावन ज्योतिर्लिंग के वैभवशाली अतीत के बारे में जानें।
- भगवान कार्तिकेय की निराशा
जैसा कि शिवपुराण में उल्लेख है, भगवान शिव और माँ पार्वती इस दुविधा में थे कि भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय में से किसका विवाह पहले किया जाए। इस दुविधा का समाधान करने के लिए उन्होंने एक प्रतियोगिता की घोषणा की। नियम यह था कि जो पुत्र सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करेगा, उसका विवाह पहले किया जाएगा।
शास्त्रों के अनुसार माता-पिता समस्त ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए, भगवान गणेश ने पृथ्वी की परिक्रमा करने के बजाय अपने माता-पिता, भगवान शिव और माता पार्वती, की परिक्रमा की। भगवान गणेश की बुद्धिमत्ता से भगवान शिव और माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्हें विजेता घोषित किया गया और उनका विवाह देवी रिद्धि (समृद्धि) और देवी सिद्धि (आध्यात्मिक शक्ति) से संपन्न हुआ।
जब भगवान कार्तिकेय लौटे और उन्हें पूरा घटनाक्रम पता चला, तो उनके मन को ठेस पहुँची और वे क्रोधित हो गए। वे ब्रह्मचारी जीवन व्यतीत करने के लिए क्रौंचगिरी (जो कि कर्नाटक में स्थित है) की ओर चले गए। अपने पुत्र के निर्णय से दुखी होकर, भगवान शिव और माता पार्वती भी उसी क्षेत्र के समीप स्थित एक पर्वत पर निवास करने लगे। वहाँ माता पार्वती मल्लिका और भगवान शिव अर्जुन के रूप में विराजमान हुए, और यही पर्वत मल्लिकार्जुन कहलाया। उन्होंने यह इसलिए किया ताकि वे अपने पुत्र के समीप रह सकें। ऐसी मानयता है कि प्रत्येक पखवाड़े के अंत में वे अपने पुत्र से मिलते हैं, भगवान शिव अमावस्या को और माता पार्वती पूर्णिमा को।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान राम ने अपने वनवास के दौरान श्रीशैलम का भ्रमण किया और भगवान मल्लिकार्जुन से प्रार्थना की। पांडवों ने भी अपने वनवास के समय यहाँ पूजा-अर्चना की थी।
- दानव अरुणासुर का वध
दुर्गा सप्तशती में दानव अरुणासुर की कथा का उल्लेख है। भगवान ब्रह्मा ने अरुणासुर को आशीर्वाद दिया था कि उसे कोई ऐसा जीव नहीं मार सकेगा जिसके दो या चार पैर हों। तब माँ पार्वती ने भ्रमरी (भौंरों की देवी) का रूप धारण किया और अपने शरीर से हजारों छह-पैर वाले भौंरे उत्पन्न किए। इन भौंरों ने अरुणासुर का वध कर दिया, और देवी इसी रूप में श्रीशैलम में विराजमान हुईं।
- नाद विद्या स्वरूपिनी के रूप में माँ भ्रमराम्बिका

(देवी माँ भ्रमराम्बा के रूप में)
माँ भ्रमराम्बा को ध्वनि के सर्वोच्च ज्ञान का रूप माना जाता है। श्रीशैलम में माँ ‘नाद विद्या स्वरूपिणी’ के रूप में प्रकट हुईं, जो भ्रामरी प्राणायाम (भौंरों की श्वास) के माध्यम से व्यक्त होता है। श्रीशैलम परंपरा में भ्रामरी प्राणायाम को रक्त वर्णा कुंडलिनी (लाल रंग की कुंडलिनी) से जोड़ा जाता है। इस प्राणायाम को करने से ऐसे ध्वनि स्पंदन (साउंड वाइब्रेशन) उत्पन्न होते हैं, जो मनुष्य के माथे (ललाट) से गुज़रते हुए पाँचों इंद्रियों और प्राण शक्तियों को स्पर्श करते हैं। ये मानव को सुरक्षा प्रदान करते हैं।
भक्त श्री भ्रमराम्बिका मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर में देवी के प्रांगण के पीछे अपने कान लगाकर इस ध्वनि को सुनने का प्रयास करते हैं।

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग (तमिलनाडु)

(रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग)
भगवान शिव के अनेक नामों में से एक है ‘रामानाथ’ और ‘रामेश्वर’, अर्थात् श्रीराम के इष्ट। रामेश्वरम मंदिर को ‘रामनाथस्वामी’ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत के तमिलनाडु राज्य के रामेश्वरम द्वीप पर स्थित है। यह पावन स्थल भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इस मंदिर का भारतीय महाकाव्य रामायण से गहरा आध्यात्मिक संबंध है। भगवान राम ने लंका पहुँचने से पूर्व यहाँ रेत का शिवलिंग स्थापित किया था। यह ज्योतिर्लिंग पितृ-मुक्ति के लिए विशेष रूप से पूजित है। यहाँ भगवान शिव के द्वारपाल नंदी की लगभग 17.5 फीट ऊँची भव्य मूर्ति भी स्थित है, जो यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है।
पौराणिक कथा

( रेत के शिवलिंग की पूजा करते हुए भगवान राम)
शिव महापुराण के अनुसार, लंका पहुंचने के लिए समुद्र पार करने से पहले, श्री राम ने रेत का एक शिवलिंग बनाया और महादेव का आशीर्वाद पाने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर, भगवान शिव ने श्री राम को रावण पर विजय का आशीर्वाद दिया और स्वयं को रामानाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट करने के लिए सहमत हो गए।
लिंग पुराण में एक और रोचक कथा का उल्लेख है। लंका युद्ध के बाद, करुणामूर्ति श्री राम का हृदय पश्चाताप से भर गया था। रावण, एक महान विद्वान होने के अतिरिक्त, ऋषि विश्रवा का पुत्र अथवा एक ब्राह्मण था। उसका वध करना ब्रह्म-हत्या के समान था।
श्री राम ने इस पाप का प्रायश्चित करने के लिए अपने इष्ट महादेव की शरण ली। ऋषियों के सुझाव पर, उन्होंने भगवान शिव के लिए एक मंदिर स्थापित करने का निर्णय लिया और एक शिव लिंग स्थापित किया। सेवा के लिए सदैव तत्पर, भगवान हनुमान ने श्री राम के अनुरोध पर काशी से लिंग लाने के लिए प्रस्थान किया। ऋषि अगस्त्य ने अगम परंपरा के अनुसार ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति पाने के लिए पूजा करने का शुभ मुहूर्त सुझाया, लेकिन अंजनेय (देवी अंजना के पुत्र, अर्थात् श्री हनुमान) समय पर वापस नहीं आ पाए। शुभ मुहूर्त निकाला जा रहा था। समय के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए, माँ सीता ने रेत से एक शिवलिंग बनाया। श्रीराम ने पवित्र मंत्रों का उच्चारण किया, महादेव को फूल अर्पित किए और उनसे क्षमा याचना की।
ऐसा माना जाता है कि जब पूजा समाप्त होने वाली थी, तभी श्री हनुमान दो लिंग लेकर आ गए।वे निराश हो गए, क्योंकि अपने प्रभु श्री राम के लिए समय पर शिवलिंग नहीं ला सके। दुखी होकर, अंजनेय ने अपनी पूंछ से रेत के लिंग को उठाने की कोशिश की, लेकिन वह उसे हिला भी नहीं सकें। अंजनेय को सांत्वना देते हुए, श्री राम ने लिंग में से एक का नाम 'काशी विश्वनाथ' या 'काशीलिंग' रखा और आशीर्वाद दिया कि जो भी रामेश्वरम की तीर्थ यात्रा करेगा उसे पहले श्री हनुमान के 'काशीलिंग' की पूजा करनी होगी और फिर रामलिंग की।
रामेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान राम की भक्ति और शिव तत्त्व के अद्भुत संगम का साक्षात प्रतीक है। हज़ारों श्रृद्धालु प्रतिवर्ष भगवान शिव के इस पावन धाम के दर्शन करने के लिए आते है।
हमारे इस ब्लॉग में आपने दक्षिण भारत में स्थित दो प्रमुख ज्योतिर्लिंग के बारे में जाना।हमारे आने वाले लेखों में आपको मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र सहित देश के अन्य हिस्सों में स्थित ज्योतिर्लिंगों के आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व के बारे में विस्तार से जानने को मिलेगा।
भगवान शिव भोले भंडारी हैं और सरलता से प्रसन्न हो जाते हैं। साधना ऐप पर होने वाली महारुद्र साधना (15 फ़रवरी ’26 से 26 फ़रवरी ’26) में भाग लीजिए और अपने जीवन में समृद्धि तथा भगवान शिव की सुरक्षा का अनुभव कीजिए। अधिक जानकारी के लिए साधना ऐप डाउनलोड कीजिए।
हर हर महादेव!
We are proud Sanatanis, and spreading Sanatan values and teachings, our core mission. Our aim is to bring the rich knowledge and beauty of Sanatan Dharm to every household. We are committed to presenting Vedic scriptural knowledge and practices in a simple, accessible, and engaging manner so that people can benefit and internalize them in their lives.
Presented By Team Sadhana
Leave a comment
Comments (0)
No comments yet. Be the first to share your thoughts.
Related Articles
सबरीमाला जाने से पहले 41 दिन का व्रत क्यों अनिवार्य है? जानिए मंदिर की पौराणिक कथा
श्री हनुमान से जुड़े दस महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर।
श्री हनुमान द्वादशाक्षरी मंत्र साधना क्या है और इसके लाभ?
नाम रामायण—जानिए राम नाम की अद्भुत महिमा