वट सावित्री व्रत 2026, व्रत के नियम, कथा एवं पूजा विधि

वट सावित्री व्रत 2026, व्रत के नियम, कथा एवं पूजा विधि

ज्येष्ठ मास (मई–जून) में, जब सूर्यदेव की ऊर्जा अपने चरम पर होती है और धरती भीषण गर्मी से तप रही होती है, तब भारत के विभिन्न हिस्सों में सुहागिन महिलाएँ एक अत्यंत कठिन व्रत का पालन करती हैं। यह है वट सावित्री व्रत। इस दिन महिलाएँ सोलह श्रृंगार कर, निर्जला उपवास रखते हुए वटवृक्ष की पूजा करती हैं। तेज धूप में नंगे पाँव चलकर वटवृक्ष को जल अर्पित करती हैं, और उसके चारों ओर कच्चा सूत (वट सूत्र) बाँधती हैं। वटवृक्ष की परिक्रमा करते हुए वे अपने परिवार की सुख-शांति और पति की दीर्घायु की कामना करती हैं।

(वटवृक्ष पर कच्चा सूत बाँधकर अखंड सौभाग्य की कामना करती सुहागिनें।)

वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में श्रद्धा, संकल्प और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इसकी परंपरा हज़ारों वर्षों पुरानी है। इस ब्लॉग में हम वट सावित्री व्रत की पौराणिक कथा, इतिहास और पूजा-विधि के बारे में जानेंगे।

प्रमुख बातें

वट सावित्री व्रत का गहन अर्थ क्या है?

संस्कृत में बरगद के वृक्ष को "वट" कहा गया है। वेदों और पुराणों में वटवृक्ष को सृष्टि और जीवन का प्रतीक माना गया है। इसकी शाखाओं से निकलने वाली जटाएँ जब धरती में समाकर नए तनों का रूप ले लेती हैं, तो यह एक से अनेक बनने की प्रक्रिया को दर्शाती हैं। इसी कारण वटवृक्ष को दीर्घायु, स्थिरता और निरंतर जीवन का प्रतीक माना जाता है।

वहीं 'सावित्री' शब्द के अर्थ को भी दो स्तरों पर समझा जा सकता है। पहले अर्थ में, सावित्री उस महान राजकन्या का नाम है, जिसकी निष्ठा, बुद्धिमत्ता और समर्पण की कथा इस व्रत का आधार है। वहीं, गहन आध्यात्मिक अर्थ में 'सावित्री', अर्थात् 'सविता', सूर्यदेव की दिव्य शक्ति को दर्शाती है। यह वह प्रकाशमयी ऊर्जा है, जो पूरे संसार का पोषण और संचालन करती है।

शास्त्रों में इस व्रत का उल्लेख कहाँ मिलता है?

सत्यवान-सावित्री की कथा का प्रथम उल्लेख देवी भागवतम् के नवें स्कंध में मिलता है। इसके अतिरिक्त महाभारत के 'पतिव्रता माहात्म्य पर्व' में भी इस व्रत का वर्णन आता है। वनवास के दौरान महर्षि मार्कण्डेय ने पांडवों को सावित्री और सत्यवान की यह कथा सुनाई थी।

आधुनिक काल में श्री अरबिंदो ने अपनी प्रसिद्ध कृति Savitri: A Legend and a Symbol में इस कथा को एक आध्यात्मिक महाकाव्य के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, यह केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि मानव चेतना की गहन आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक है।

इस कथा के गहन आध्यात्मिक अर्थ के बारे में हम आगे विस्तार से चर्चा करेंगे।

वट सावित्री पर्व कब और क्यों मनाया जाता है?

भारत के विभिन्न भागों में यह व्रत अलग-अलग पंचांग-परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे उत्तर भारतीय राज्यों में पूर्णिमान्त पंचांग का पालन होता है, और यहाँ यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या के दिन रखा जाता है, जिसे सामान्यतः वट सावित्री व्रत कहा जाता है। वहीं महाराष्ट्र, गुजरात तथा कुछ पश्चिमी क्षेत्रों में अमान्त पंचांग प्रचलित है, और वहाँ यह पर्व ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन वट पूर्णिमा व्रत के रूप में मनाया जाता है।

2026 वट सावित्री अमावस्या की तिथि और शुभ मुहूर्त

  • व्रत तिथि: शनिवार, 16 मई 2026
  • अमावस्या तिथि प्रारम्भ: 16 मई 2026, प्रातः 05:11 बजे
  • अमावस्या तिथि समापन: 17 मई 2026, रात्रि 01:30 बजे

2026 वट पूर्णिमा व्रत तिथि

  • व्रत तिथि: सोमवार, 29 जून 2026
  • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 29 जून 2026, प्रातः 03:06 AM
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त: 30 जून 2026, प्रातः 05:26 AM

वट सावित्री व्रत कथा क्या है?

चलिए, अब हम वट सावित्री व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा की ओर बढ़ते हैं।

मद्रदेश (वर्तमान सियालकोट, पाकिस्तान) में अश्वपति नाम के एक धर्मात्मा राजा का शासन था। उनकी रानी का नाम मालती था। वे अत्यंत धर्मपरायण थीं। राजा अत्यन्त ज्ञानी, वीर, वेद-वेदांगों के विद्वान और समस्त ऐश्वर्यों से सम्पन्न थे। किंतु उनके जीवन का सबसे बड़ा दुःख यह था कि उनकी कोई संतान नहीं थी।

संतान प्राप्ति की कामना के साथ वे महर्षि वशिष्ठ के पास गए। महर्षि वशिष्ठ के परामर्श से उन्होंने देवी सावित्री की उपासना आरंभ की। प्रारंभ में उन्होंने यह साधना महल के भीतर ही की। वर्ष बीतते गए, लेकिन साधना का कोई फल नहीं मिला। अंततः महर्षि वशिष्ठ की सलाह से राजा अश्वपति अपनी पत्नी के साथ पुष्कर सरोवर के पवित्र तट पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने देवी सावित्री के दर्शन के लिए कठोर तप किया।

तभी एक दिव्य आकाशवाणी हुई—"हे राजन, यदि तुम गायत्री मंत्र का दस लाख बार जप करोगे, तभी तुम्हारे हृदय की इच्छा पूर्ण होगी।"

इस दिव्य संकेत के पश्चात, कुछ समय बाद महर्षि पराशर उस पवित्र तपोभूमि पर पधारे, जो पुष्कर सरोवर के निकट स्थित थी। राजा अश्वपति और रानी मालती की अटूट भक्ति और समर्पण को देखकर वे अत्यंत प्रसन्न हुए।

ऋषि पराशर ने उन्हें त्रिकाल संध्या में देवी की ऊर्जा जाग्रत करने हेतु मुद्राओं, षोडशोपचार पूजा तथा मंत्र-जप के माध्यम से देवी के आवाहन की सुव्यवस्थित साधना-पद्धति प्रदान की। साथ ही, उन्होंने उन्हें एक संकल्प दिया और साधना प्रारंभ करने के लिए उपयुक्त शुभ तिथि का भी निर्देश दिया।

इसके पश्चात राजा अश्वपति और रानी मालती ने पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा के साथ अपनी कठोर तपस्या आरंभ की।

उनकी गहन भक्ति से प्रसन्न होकर देवी सावित्री उनके समक्ष प्रकट हुईं। उनका दिव्य स्वरूप अत्यंत तेजस्वी था। वे हज़ारों उगते हुए सूर्य के समान प्रकाशमान थीं। माँ के समान स्नेह और करुणा के साथ देवी सावित्री ने कहा,

"मालती, मेरी पुत्री, तुम्हें वह कन्या प्राप्त होगी जिसकी तुमने कामना की है। अश्वपति, तुम्हें भी वह पुत्र प्राप्त होगा जिसकी तुमने इच्छा की है।"

यह कहकर देवी ने दोनों को आशीर्वाद दिया और अपने दिव्य धाम को प्रस्थान कर गईं। इस घटना के कुछ समय पश्चात रानी मालती ने एक अत्यंत सुंदर कन्या को जन्म दिया। राजा अश्वपति ने देवी सावित्री के सम्मान में उस बालिका का नाम भी सावित्री रखा।

सावित्री दिव्य तेज, सौंदर्य और असाधारण आभा से युक्त थीं। जैसे-जैसे वह बड़ी हुईं, उनके सौंदर्य और तेज में निरंतर वृद्धि होने लगी। उस कन्या की तुलना देवी लक्ष्मी और स्वयं सावित्री देवी से की जाने लगी।

समय आने पर राजा चिंतित हो गए, क्योंकि सावित्री के लिए कोई भी योग्य वर नहीं मिल रहा था। चिंतित होकर राजा ने सावित्री से कहा,

"हे पुत्री! तुम्हारे विवाह का समय आ गया है, किन्तु कोई भी योग्य वर तुम्हारे लिए प्रस्ताव लेकर नहीं आ रहा है। अतः तुम्हें जो भी गुणवान वर मिले और जिसके कुल तथा व्यवहार से तुम्हें आनन्द प्राप्त हो, तुम स्वयं उसका चयन कर सकती हो।"

यह कहकर राजा ने योग्य वर की खोज हेतु वृद्ध मंत्रियों के साथ-साथ विविध वस्त्र-अलंकारों के साथ सावित्री को भेज दिया। अपनी खोज के दौरान सावित्री की भेंट सत्यवान से हुई, जो वन में निवास कर रहे थे। वे अपने दृष्टिहीन पिता राजा द्युमत्सेन की देखभाल कर रहे थे, जिन्होंने अपना राज्य खो दिया था। सावित्री उनके दयालु स्वभाव, साहस और माता-पिता के प्रति समर्पण से अत्यंत प्रभावित हुईं।

कुछ समय पश्चात् राजा अश्वपति के महल में देवर्षि नारद का आगमन हुआ। उन्होंने सावित्री के सौंदर्य और गुणों की प्रशंसा करते हुए उनके लिए योग्य वर चुनने की बात कही। तभी सावित्री भी राजमहल लौटी थीं। उन्होंने बिना किसी संकोच के सत्यवान को अपना पति चुना।

देवर्षि नारद ने तुरंत चेतावनी दी कि सत्यवान अत्यन्त गुणवान और धर्मात्मा होते हुए भी अल्पायु हैं तथा एक वर्ष के भीतर उनकी मृत्यु निश्चित है।

(यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राणों की याचना करती सावित्री।)

यह सुनकर राजा ने सावित्री को यह विवाह न करने की सलाह दी। लेकिन सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रहीं। उन्होंने कहा कि एक बार लिया गया निर्णय ही उनका धर्म है और वे किसी अन्य को पति रूप में स्वीकार नहीं करेंगी। सावित्री ने शांत भाव से स्वयं वेदमाता गायत्री मंत्र की साधना आरंभ कर दी। यह वही पवित्र मंत्र था, जो उनके माता-पिता को महर्षि पराशर से पुष्कर सरोवर के तट पर प्राप्त हुआ था।

अंततः सत्यवान और सावित्री का विवाह सम्पन्न हुआ और वे दोनों वन में जीवन व्यतीत करने लगे। विवाह के बाद भी सावित्री के मन में नारदजी के वचन गूँजते रहे।

जैसे-जैसे समय बीतता गया, सत्यवान की मृत्यु का दिन निकट आता गया। निर्धारित दिन पर सत्यवान लकड़ी काटने वन गए। सावित्री भी उनके साथ गईं। वन में अचानक सत्यवान के सिर में तीव्र पीड़ा हुई और वे वट वृक्ष के नीचे लेट गए। उसी क्षण यमदूत उनके प्राण लेने आए और फिर स्वयं यमराज सत्यवान की आत्मा लेकर जाने लगे।

सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं। यमराज ने उन्हें लौट जाने के लिए कहा, पर सावित्री अपने पतिव्रत धर्म पर अडिग रहीं। सावित्री ने यमराज से कर्म के नियम और मोक्ष से जुड़े प्रश्न किए।

उनकी बुद्धिमत्ता, धर्मनिष्ठा और वाणी से प्रसन्न होकर यमराज ने उनसे तीन वरदान माँगने को कहा, किंतु यह शर्त रखी कि वे सत्यवान के जीवन का वरदान नहीं माँगेंगी।

सावित्री ने पहले वर में अपने दृष्टिहीन सास-ससुर की नेत्रज्योति वापस माँगी, दूसरे वर में उनके खोए हुए राज्य की पुनः प्राप्ति, और तीसरे वर में अपने पति से सौ पुत्रों की प्राप्ति का वर माँगा।

जब उन्होंने तीसरा वर माँगा, तो यमराज स्वयं अपने वचन में बंध गए, क्योंकि यह वर सत्यवान के बिना संभव नहीं था। इस पर यमराज उनकी बुद्धिमत्ता, भक्ति और तीक्ष्ण विवेक से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने कहा—

 “बालिका, मैं तुम्हारी बुद्धि और शुद्ध हृदय से प्रसन्न हूँ। तुम वेदमाता गायत्री की साधना उसी मंत्र के साथ जारी रखो, जो तुम्हें उनकी कृपा से प्राप्त हुआ है। वे मूल प्रकृति तथा समस्त जगत की माता हैं। अपने पति के साथ घर लौट जाओ और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करो।”

वृक्ष के नीचे लौटकर सावित्री ने देखा कि सत्यवान का शरीर पुनः जीवन प्राप्त कर रहा है, मानो वे गहरी नींद से जाग रहे हों। प्रसन्न होकर सावित्री ने अपने पति को संपूर्ण घटना सुनाई।

इधर, द्युमत्सेन की दृष्टि भी पुनः लौट आई और उनके राज्य में न्याय एवं पुनर्स्थापना हो गई। शीघ्र ही समाचार आया कि उनके शत्रु का अंत हो चुका है और राज्य पुनः प्राप्त हो गया है।

अंततः सत्यवान और सावित्री राज्य लौटे, जहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ। समय के साथ सावित्री ने सौ पुत्रों को जन्म दिया और उनके जीवन में समृद्धि, सुख तथा धर्म की पुनर्स्थापना हुई।

यह कथा केवल दांपत्य प्रेम की कहानी नहीं है, बल्कि सत्य, श्रद्धा, संकल्प और अटूट भक्ति का प्रतीक है। वट सावित्री व्रत अथवा वट पूर्णिमा के पावन अवसर पर आप भी साधना ऐप में देवी सावित्री अर्थात् वेदमाता गायत्री की मध्यम पूजा (षोडशोपचार) कर उनके संरक्षण और कृपा की कामना करें।

वट सावित्री व्रत कथा का आध्यात्मिक रहस्य क्या है?

(वट सावित्री व्रत की पावन कथा सुनती हुई सुहागिन महिलाएँ।)

गहन आध्यात्मिक दृष्टि से देखें, तो इस कथा के पात्र चेतना की विभिन्न अवस्थाओं के प्रतीक हैं। 'सत्यवान', अर्थात् 'सत्य को धारण करने वाली', उस आत्मा का प्रतीक है, जो स्वभाव से नित्य और शुद्ध है, किन्तु संसार, काल और कर्म के बंधनों में उलझ जाती है। वहीं सावित्री उस दिव्य चेतना का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो यह जानते हुए भी कि संसार में दुःख और संघर्ष हैं, प्रेम और सत्य के लिए अवतरित होती है।

यमराज इस कथा में केवल मृत्यु के देवता नहीं, बल्कि धर्मराज हैं। वे शाश्वत नियमों, कर्म और कारण कार्य के सिद्धांत के प्रतीक हैं। सावित्री केवल अपने पति के प्राण वापस नहीं लातीं, बल्कि अपने ज्ञान, धैर्य और धर्मनिष्ठा के माध्यम से यह दर्शाती हैं कि सच्ची मुक्ति नियमों को तोड़ने से नहीं, बल्कि उन्हें गहराई से समझकर और धर्मपूर्वक जीने से प्राप्त होती है।

इस कथा का सबसे गहन संदेश यह है कि सावित्री यमराज के पीछे चलती रहती हैं। वे जीवन और मृत्यु की सीमा पर रुकती नहीं, बल्कि जाग्रत, अडिग और निर्भय होकर आगे बढ़ती हैं। यही शिक्षा कठोपनिषद् में नचिकेता की कथा में भी मिलती है। जो आत्मा के सत्य को जान लेता है, वह मृत्यु के भय से परे हो जाता है।

वट सावित्री व्रत पूजा विधि

अब इस व्रत की कथा का आध्यात्मिक अर्थ समझने के बाद हम पूजा विधि की ओर बढ़ते हैं।

  • व्रत के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व जागें। स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। सोलह श्रृंगार करें और माँग में सिंदूर लगाएँ। व्रत का संकल्प लेकर घर के पूजास्थल में दीप प्रज्वलित करें।
  • इसके पश्चात बाँस की टोकरी में भगवान ब्रह्मा, देवी सावित्री और सत्यवान का चित्र या मूर्ति रखें। साथ ही पूजन सामग्री, पुष्प, फल, धूप, दीप, अगरबत्ती तथा जल से भरा कलश तैयार करें।
  • सभी पूजन सामग्री लेकर किसी वट वृक्ष (बरगद) के पास जाएँ। वहाँ सावित्री और सत्यवान की मूर्ति या चित्र को श्रद्धापूर्वक स्थापित करें।
  • वट वृक्ष और सावित्री-सत्यवान को जल अर्पित करें। इसके पश्चात रोली, हल्दी, कुमकुम, अक्षत और पुष्प चढ़ाएँ। धूप एवं दीप प्रज्वलित करें। फल, भीगे चने, पूड़ी और मिठाई का भोग अर्पित करें।
  • कच्चे सूत अथवा कलावे को वट वृक्ष के चारों ओर सात बार अथवा 108 बार परिक्रमा करते हुए बाँधें। यह सूत्र रक्षा, सौभाग्य और दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है।
  • पंडित अथवा परिवार की बुजुर्ग महिला से वट सावित्री व्रत कथा का श्रवण करें। कथा के पश्चात श्रद्धापूर्वक सावित्री और सत्यवान की आरती करें।
  • पूजा सम्पन्न होने के बाद बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लें। भीगे हुए काले चने और जल ग्रहण कर व्रत का पारण करें। संध्या समय चंद्र दर्शन के पश्चात भोजन ग्रहण किया जाता है।

    सामान्य प्रश्न

    प्रश्न:1. ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाए जाने वाले वट सावित्री व्रत को अन्य किन नामों से जाना जाता है?

    उत्तर.  ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला वट सावित्री व्रत (16 मई 2026) को वट अमावस्या, सावित्री व्रत, बरगद अमावस्या तथा अमावस्या वट सावित्री व्रत के नामों से भी जाना जाता है। कुछ क्षेत्रों में इसे “वट पूजा व्रत” और “वट व्रत” भी कहा जाता है।

    प्रश्न.2. वट वृक्ष की कितनी परिक्रमा करनी चाहिए? 

     उत्तर. वट वृक्ष की सामान्यतः 7 अथवा 108 परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा के दौरान वट वृक्ष पर वटसूत्र (कच्चा सूत) बाँधा जाता है। 

    प्रश्न 3. क्या वट सावित्री व्रत निर्जला उपवास होता है?

    उत्तर: हाँ, वट सावित्री व्रत मुख्य रूप से निर्जला (बिना जल ग्रहण किए) रखा जाता है। हालांकि, आप अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार या जल ग्रहण करते हुए भी यह व्रत कर सकते हैं।

    प्रश्न 4. क्या अविवाहित लड़कियाँ वट सावित्री व्रत कर सकती हैं?

    उत्तर: हाँ, अविवाहित लड़कियाँ भी वट सावित्री व्रत कर सकती हैं। मान्यता है कि यदि इस दिन अविवाहित लड़कियाँ पूर्ण श्रद्धा और संकल्प के साथ यह व्रत करती हैं, तो उनके जीवन में आने वाली विवाह संबंधी बाधाएँ दूर होती हैं और शीघ्र विवाह के योग बनते हैं।

    प्रश्न 5. वट सावित्री व्रत के दौरान बरगद (वट) के वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है?

    उत्तर:  वट वृक्ष अर्थात् बरगद के पेड़ में साक्षात त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश )का वास माना जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा जी, तनों में भगवान विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का निवास बताया गया है। इसलिए बरगद के वृक्ष की पूजा करने से एक साथ त्रिदेवों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    वट सावित्री व्रत में बरगद (वट) के वृक्ष की पूजा मुख्य रूप से अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु तथा सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे ही यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण पुनः प्राप्त किए थे। इसी कारण इस वृक्ष को स्थिरता और अमरत्व का प्रतीक माना जाता है।

    प्रश्न 6. यदि आसपास बरगद (वट) का वृक्ष न हो, तो क्या करें?

    उत्तर: यदि आपके आसपास बरगद (वट) का वृक्ष न हो, तो आप घर में वट वृक्ष का चित्र अथवा उसकी छोटी टहनी स्थापित करके श्रद्धापूर्वक पूजा कर सकती हैं। सनातन परंपरा में पूजा का मुख्य आधार श्रद्धा, संकल्प और भक्ति को माना गया है। इसलिए यदि वास्तविक वट वृक्ष उपलब्ध न हो, तब भी श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत एवं पूजा करने से व्रत का पुण्य प्राप्त होता है।

    *इस ब्लॉग में प्रयुक्त सभी चित्र प्रतीकात्मक हैं और एआई द्वारा निर्मित किए गए हैं।
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