जीवन में माँ का स्थान क्या है?
नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रपा॥
-महाभारत, शांति पर्व
अर्थ - माँ के समान कोई छाँव नहीं, माँ के समान कोई आश्रय नहीं, माँ के समान कोई रक्षक नहीं, माँ वह अनंत स्रोत है, जो स्नेह की धारा बनकर सदा अपने बच्चों का पालन करती रहती है।
एक माँ अपने बच्चे के जीवन को आकार देती है, उसका लालन-पालन करती है और हर संकट से उसकी रक्षा करती है। वास्तव में, वह अपनी संतान के लिए सृष्टिकर्ता, पालनहार और रक्षक—तीनों होती है। भारत विश्व की सबसे प्राचीन सभ्याताओं में से एक है और यहाँ सदा से ही मातृत्व का सम्मान किया जाता है। आज के इस ब्लॉग में हम आपको सनातन धर्म में की कुछ चर्चित माताओं के प्रेरणादायक स्वरूपों से परिचित करवाएँगे।
प्रमुख बातें-
- सनातन धर्म में माँ को किस रूप में देखा जाता है?
-
सनातन धर्म में प्रसिद्ध माताएँ कौन हैं?
- माँ यशोदा — वात्सल्य-भक्ति का आदर्श
- माँ अंजना — शक्ति और समर्पण की प्रतीक
- माँ अनुसूया – त्रिदेवों की माता
- माँ शतरूपा – नर (मानवता) और नारायण (श्री विष्णु) की माता
- माँ मदालसा – अपने पुत्रों को आत्मज्ञान देने वाली गुरु
- क्या भारत में कोई मातृसत्तात्मक समाज हैं?
सनातन धर्म में माँ को किस रूप में देखा जाता है?
"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी"
रामायण के बाद कुछ संस्करणों में इस पंक्ति का उल्लेख मिलता है। श्री लक्ष्मण को संबोधित करते हुए भगवान श्रीराम कहते हैं कि माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान हैं। सनातन धर्म में माँ केवल एक भूमिका नहीं है, बल्कि एक पवित्र भाव और सर्वव्यापी दिव्य शक्ति का स्वरूप है। भारतीय सभ्यता यह मानती है कि समस्त व्यक्त और अव्यक्त रूप, देवी माँ (आद्य पराशक्ति) की अभिव्यक्तियाँ हैं, जो समस्त ऊर्जा का मूल स्रोत हैं। वे ही वह धरती हैं जिस पर हम चलते हैं; वे ही जल की शीतलता और अग्नि की ऊष्मा हैं। उनकी उपस्थिति का सम्मान पशुओं, नदियों, वनस्पतियों तथा हमें जीवन देने वाली माता के रूप में भी किया जाता है।
सनातन धर्म में प्रसिद्ध माताएँ कौन हैं?
माँ हम सभी के अस्तित्व का आधार है। सनातन धर्म में अनेक महान व्यक्तित्व अपनी माताओं के नाम से पहचाने जाते हैं, जैसे— 'कौशल्या-नंदन' श्रीराम, 'यशोदा-नंदन' श्रीकृष्ण। लक्ष्मण और शत्रुघ्न जी को 'सौमित्र' कहा जाता है। इसी प्रकार, आदित्य देवताओं के नाम उनकी माता देवी अदिति से जुड़े हैं। श्रीकृष्ण अक्सर अर्जुन को 'कौन्तेय' (कुंती के पुत्र) कहकर संबोधित करते हैं, जबकि कुरुवंश के पितामह भीष्म का एक अन्य नाम 'गंगापुत्र' है। यह परंपरा आगे भी जारी रही, जब अनेक प्रसिद्ध राजाओं ने अपने नामों के माध्यम से अपनी माताओं को सम्मान दिया, जैसे— गौतमीपुत्र सातकर्णि और वशिष्ठिपुत्र पुलुमावी।
आइए, सनातन धर्म की उन माताओं के बारे में जानें, जिन्होंने हमारे महान नायकों के जीवन को आकार दिया।
माँ यशोदा — वात्सल्य-भक्ति का आदर्श
जब भी इस पृथ्वी पर ईश्वर अवतरित हुए हैं, किसी भाग्यशाली माँ ने अपनी गोद में उनका लालन-पालन किया है। माँ और संतान का यह संबंध दिव्य प्रेम तथा ईश्वरीय लीला को अभिव्यक्त करने का एक सुंदर माध्यम बन जाता है। यह पवित्र संबंध श्रीकृष्ण के जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जहाँ भगवान ने अपनी माता के माध्यम से वात्सल्य-भक्ति को व्यक्त किया।
(माँ यशोदा नटखट कान्हा को रस्सी से बाँधते हुए।)
माँ यशोदा के निःस्वार्थ मातृ-प्रेम ने वह आत्मीय वातावरण निर्मित किया, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण की अनेक दिव्य बाल-लीलाएँ घटित हुईं। हांडियाँ तोड़ने, माखन चुराने, शरारती बालक को रस्सी से बाँधने और उनके मुख में संपूर्ण ब्रह्मांड देखने जैसी प्रत्येक लीला में माँ यशोदा ने श्रीकृष्ण को पूर्ण समर्पण के साथ प्रेम किया। यही कारण है कि वृंदावन के लोग और बाद में सभी भक्त श्रीकृष्ण को केवल एक देवता नहीं, बल्कि अपनी संतान 'बाल गोपाल' के रूप में पूजते और उनकी सेवा करते हैं।
हालाँकि, श्रीकृष्ण की कथाएँ गहन आध्यात्मिक संदेश भी देती हैं। श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के नौवें अध्याय में एक रोचक प्रसंग का उल्लेख मिलता है।
एक बार श्रीकृष्ण को शरारत करने और माखन चुराने से रोकने के लिए माता यशोदा ने उन्हें ऊखल से बाँधने का प्रयास किया। श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक स्वयं को निर्दोष बताते हुए उनसे विनती करने लगे। किंतु उस दिन माता यशोदा उन्हें अनुशासन की सीख देने के लिए दृढ़ संकल्पित थीं। वे एक रस्सी लाईं, ताकि श्रीकृष्ण को एक स्थान पर बाँधकर बैठा दें और तब तक अपने घर के कार्य पूरे कर सकें।
माता यशोदा ने रस्सी श्रीकृष्ण की कमर के चारों ओर लपेटी, पर वह दो अंगुल छोटी रह गई। तब वे एक और लंबी रस्सी लाई, किंतु वह भी दो अंगुल छोटी निकली। माता यशोदा आश्चर्य में पड़ गईं। वे तो नींद में भी श्रीकृष्ण की कमर का माप बता सकती थीं। आखिर बालकृष्ण की नन्ही कमर में करधनी बाँधना उनका दैनिक कार्य था।
आश्चर्य की बात यह थी कि जब उन्होंने घर की सारी रस्सियों को जोड़कर भी श्रीकृष्ण को बाँधने का प्रयास किया, तब भी रस्सी हर बार दो अंगुल छोटी ही रह जाती थी।
जब श्रीकृष्ण ने अपनी माँ को इस प्रकार प्रयास करते देखा, तो करुणावश उन्होंने स्वयं को बँध जाने दिया। इसी कारण वे 'दामोदर' कहलाते हैं, अर्थात् "जिनके उदर (पेट) को रस्सी से बाँधा गया हो।"
इस कथा से अनेक गहन शिक्षाएँ प्राप्त होती हैं। रस्सी का हर बार दो अंगुल छोटी रह जाना भक्त और भगवान के मध्य प्रतीकात्मक दूरी को दर्शाता है। ये दो अंगुल 'भक्त-निष्ठा' (भगवान की सेवा के प्रति अटूट श्रद्धा और दृढ़ प्रयास) तथा 'अनुग्रह' (भक्त के प्रयासों को देखकर भगवान की कृपा) का प्रतीक हैं। जब माता यशोदा के प्रयासों में उनकी सच्ची निष्ठा प्रकट हुई, तब श्रीकृष्ण तुरंत बँध गए।
इसके अतिरिक्त, श्रीकृष्ण का यह कृत्य माँ और संतान के बीच के सर्वोच्च संबंध का प्रतीक है। सम्पूर्ण सृष्टि के रचयिता को कोई रस्सी बाँध नहीं सकती, किंतु वे अपनी माता के निःस्वार्थ प्रेम से स्वयं बँध जाना स्वीकार कर लेते हैं।
माँ अंजना — शक्ति और समर्पण की प्रतीक
कभी-कभी माँ का प्रेम, प्रार्थना और गहन तपस्या का रूप लेकर किसी दिव्य संतान के अवतरण की परिस्थितियाँ निर्मित करता है। श्रीहनुमान का नाम "अंजनीपुत्र" या "आञ्जनेय" माता अंजना के प्रति श्रद्धांजलि है। देवी अंजना की कठोर तपस्या के फलस्वरूप ही श्री हनुमान (श्री रुद्र के अवतार) उन्हें पुत्र रूप में प्राप्त हुए। इस प्रकार, श्री हनुमान की दिव्य एवं अलौकिक शक्तियाँ केवल भगवान शिव, वायुदेव और अन्य देवताओं के वरदान ही नहीं, बल्कि उनकी माता की साधना का फल भी हैं।
श्री हनुमान की असाधारण शक्ति और बुद्धि को पहचानते हुए माता अंजना ने उन्हें सूर्यदेव के पास शास्त्रों का ज्ञान ग्रहण करने के लिए भेजा। यह दर्शाता है कि एक माँ केवल बच्चे के बाहरी संसार का पालन-पोषण (भोजन और सुरक्षा) ही नहीं करती, बल्कि उसके आंतरिक संसार के पोषण के लिए आध्यात्मिक शिक्षा और अनुशासन का भी मार्गदर्शन करती है।
जब बाल हनुमान सूर्यदेव को फल समझकर उनकी ओर छलाँग लगाते हुए आहत हो गए, तब माता अंजना के शोक और ममतामयी पुकार सुनकर ही इंद्रदेव और वायुदेव उनके पास आए। परिणामस्वरूप, देवताओं ने उन्हें असीम शक्ति, गति और चिरंजीवी होने का वरदान प्रदान किया।
माता अंजना की तपस्या से प्राप्त शक्ति और पवित्रता श्री हनुमान के असीम बल, साहस और अटूट भक्ति के रूप में स्पष्ट दिखाई देती है। भगवान शिव और वायुदेव के प्रति उनकी समर्पित भक्ति श्री हनुमान के श्रीराम और माता सीता के प्रति आजीवन विनम्र सेवा में झलकती है।
अपनी करुणामयी और दृढ़ रक्षक माता की तरह, श्री हनुमान भी सभी भक्तों के रक्षक हैं, जो निर्बलों और पीड़ितों की सहायता करते हैं। श्री हनुमान ने अपनी माँ की विनम्रता को जीवन में आत्मसात किया तथा अपनी सभी शक्तियों का श्रेय श्रीराम को देते हुए सेवा-भाव से युक्त जीवन व्यतीत किया।
माँ अनुसूया – त्रिदेवों की माता

(ब्रह्मा जी, श्री विष्णु और महादेव माता अनुसूया की परीक्षा लेते हुए)
जहाँ कुछ माताएँ ईश्वरीय अवतार का माध्यम बनीं, वहीं माता अनुसूया की जीवन-गाथा एक विशिष्ट आध्यात्मिक शक्ति को दर्शाती है। उनकी गहन साधना, पवित्रता और मातृप्रेम ने उन्हें ऐसी शक्ति प्रदान की कि वे भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान महेश का शिशु रूप में अपने बच्चों की भाँति पालन-पोषण कर सकीं।
माँ अनुसूया, महर्षि अत्रि की पत्नी थीं। उन्होंने ब्रह्मा जी, श्री विष्णु और भगवान शिव के समान गुणों वाली संतान प्राप्त करने तथा अपने पति को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाने की इच्छा के साथ लंबे समय तक कठोर तप किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर त्रिदेवों ने यह वरदान देने का निश्चय किया, किंतु उससे पूर्व उन्होंने उनकी पवित्रता और तप की परीक्षा लेने का निर्णय लिया।
त्रिदेव ऋषियों के वेश में उनके आश्रम में आए और उनसे कहा कि वे उन्हें भोजन कराएँ, वह भी निर्वस्त्र अवस्था में। यह उनकी मर्यादा और पवित्रता की परीक्षा थी। वे भली-भाँति जानते थे कि माँ अनुसूया के लिए इस शर्त का पालन करना उनके सतीत्व और सदाचार को भंग करने के समान होगा।
अपनी मर्यादा की रक्षा हेतु उन्होंने अपनी तपशक्ति का उपयोग करते हुए ऋषियों पर जल का छिड़काव किया। ऐसा करते ही त्रिदेव तीन नवजात शिशुओं के रूप में परिवर्तित हो गए। इसके बाद उन्होंने एक माता की भाँति स्नेहपूर्वक उन्हें अपने स्तन से दूध पिलाकर उनका पालन-पोषण किया। इस प्रकार, उन्होंने अपनी पवित्रता और धर्म को अक्षुण्ण रखते हुए उनकी भिक्षा की याचना भी पूर्ण कर दी।
बाद में, त्रिदेवियों (माँ सरस्वती, माँ लक्ष्मी और माँ पार्वती) के अनुरोध पर माँ अनुसूया ने त्रिदेवों को उनके मूल स्वरूप में परिवर्तित कर दिया। इस घटना के फलस्वरूप, उन्हें और महर्षि अत्रि को ऐसे पुत्रों का वरदान मिला, जो त्रिगुणात्मक दिव्यता के स्वरूप माने जाते हैं: दत्तात्रेय (भगवान विष्णु का अंश), चंद्रदेव (भगवान ब्रह्मा का अंश) और ऋषि दुर्वासा (भगवान शिव का अंश)।
कई परंपराओं में विशेष रूप से भगवान दत्तात्रेय को ब्रह्मा–विष्णु–महेश के संयुक्त स्वरूप के रूप में देखा जाता है, इसलिए माँ अनुसूया को त्रिदेवों की जननी के रूप में अत्यंत श्रद्धा से पूजा जाता है।
माता अनुसूया आध्यात्मिक मातृत्व का प्रतीक हैं; उनकी तपस्या और मातृप्रेम ने त्रिदेवों को कुछ समय के लिए ऐसे शिशुओं में बदल दिया, जिन्हें उनकी देखभाल की आवश्यकता थी। यह दर्शाता है कि सच्ची साधना और पवित्रता देवताओं को भी विनम्र बना सकती है और उन्हें एक भक्त-माता के प्रेम की शरण में ला सकती है।
माँ शतरूपा – नर (मानवता) और नारायण (श्री विष्णु) की माता
एक अन्य अद्भुत कथा माता शतरूपा की है, जिन्होंने स्वयं भगवान नारायण के समान पुत्र की कामना की थी।
देवी भागवत पुराण के अनुसार, माँ शतरूपा स्वायंभुव मनु की पत्नी थीं, जो भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र थे। राजा मनु वर्तमान कल्प के प्रथम राजा और विधि-निर्माता माने जाते हैं।
श्री तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में उल्लेख किया है कि कई वर्षों तक राज्य करने के बाद देवी शतरूपा और राजा मनु ने अपना राज्य छोड़ दिया और पवित्र नैमिषारण्य में जाकर तपस्या करने लगे। वहाँ उन्होंने हजारों वर्षों तक एकाग्र भक्ति के साथ परमेश्वर का ध्यान किया। उनकी तपस्या इतनी कठोर थी कि उनके शरीर बहुत दुर्बल हो गए और वे कंकाल के समान दिखाई देने लगे।
जब श्री विष्णु परम पुरुष नारायण के रूप में उनके समक्ष प्रकट हुए, तो वे उनके दर्शन पाकर धन्य हो गए। उन्होंने यह वरदान माँगा कि उन्हें श्री विष्णु के समान ही एक पुत्र प्राप्त हो। श्री नारायण ने उन्हें यह वरदान प्रदान कर आश्वासन दिया कि त्रेता युग में वे उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। कुछ वैष्णव परंपराओं में इसे राजा दशरथ और माता कौशल्या के पुत्र श्रीराम के जन्म से जोड़ा जाता है, जिन्हें मनु और शतरूपा का ही अवतार माना जाता है।
ब्रह्म पुराण के अनुसार, श्रीहरि विष्णु के मत्स्य अवतार ने राजा मनु और माता शतरूपा को यह वरदान दिया था कि महाप्रलय के बाद वे नई मानव जाति के सृजनकर्ता बनेंगे। उनकी संतानों को 'मनुष्य' कहा जाएगा, जो 'मनु' शब्द से बना है। धर्म और सभ्यता की पुनः स्थापना के लिए श्री विष्णु ने उन्हें वेद भी प्रदान किए।
इस प्रकार, माता शतरूपा की तपस्या सामान्य वरदानों के लिए नहीं थी, बल्कि सर्वोच्च आध्यात्मिक फल की प्राप्ति हेतु थी—स्वयं श्रीहरि विष्णु को अपने पुत्र रूप में प्राप्त करना। उनकी कठोर तपस्या ने उन्हें इस दिव्य वरदान के योग्य बनाया।
माँ मदालसा – अपने पुत्रों को आत्मज्ञान देने वाली गुरु

(माता मदालसा अपने पुत्रों को कर्तव्य-आधारित शिक्षा प्रदान करते हुए।)
माँ की करुणा और ममता की कोई सीमा नहीं होती। वह अपने पालन-पोषण और संस्कारों के माध्यम से संतान को संन्यासी भी बना सकती है और योद्धा भी। मार्कण्डेय पुराण में गंधर्व राजकुमारी मदालसा की कथा वर्णित है, जो राजा ऋतध्वज की पत्नी तथा एक ब्रह्मवादिनी (ब्रह्मज्ञान का उपदेश देने वाली अत्यंत विदुषी स्त्री) थीं। उन्होंने अपनी लोरी को ही जीवन के गहन उपदेशों में परिवर्तित कर दिया और अपने बच्चों को शरीर तथा संसार से परे सत्य को देखने की शिक्षा दी।
माता मदालसा की महानता उनके चारों पुत्रों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। स्वयं गहन आध्यात्मिक ज्ञान से संपन्न होने के कारण, उनकी सबसे गहरी भावना अपने पुत्रों को भौतिक संसार के मोह-माया के बंधनों से मुक्त करना थी। उनके प्रथम तीन पुत्र, विक्रांत, सुबाहु और शत्रुमर्दन ने उनकी प्रसिद्ध लोरी 'मदालसा उपाख्यान' अथवा 'मदालसा उपदेश' से यह ज्ञान आत्मसात किया, जिसमें वे बार-बार रोते हुए शिशु से कहती हैं कि—
शुद्धोसि बुद्धोसि निरंजनोऽसि संसारमाया परिवर्जितोऽसि ।
संसारस्वप्नं त्यज मोहनिद्रां मदालसोल्लपमुवाच पुत्रम् ॥
-प्रथम श्लोक
अर्थ- तुम शुद्ध हो, तुम ज्ञानस्वरूप हो, तुम निष्कलंक हो। तुम संसार की माया से परे हो। इस सांसारिक अस्तित्व के स्वप्न को त्यागो और मोह की गहरी निद्रा से जागो।
उनके प्रथम तीनों पुत्र संसारिक सुखों से विरक्त होकर संन्यासी बन गए और राज्य त्यागकर वन की ओर चले गए। माता मदालसा यह समझती थीं कि आत्मा के लिए सबसे बड़ा दुःख शरीर और इंद्रियों के बंधन में बँधे रहना है। इसलिए, अपने पुत्रों को संन्यास के मार्ग पर अग्रसर करना भले ही देखने में कठोर प्रतीत हो, किंतु वास्तव में यह उनकी करुणा का सर्वोच्च रूप था। इसके लिए उन्हें यह भी स्वीकार था कि उनके पुत्र उनसे और राजमहल से दूर चले जाएँ।
उनके पति, राजा ऋतध्वज, राज्य के लिए एक योग्य उत्तराधिकारी चाहते थे। उनकी चिंता और मनोभाव को समझते हुए माता मदालसा ने अपने चौथे पुत्र अलर्क को राजधर्म और शासन की शिक्षा दी। उन्होंने अपने चौथे पुत्र को एक धर्मनिष्ठ शासक के रूप में तैयार किया। उन्होंने उसे वीरता के गीत सुनाए, धर्म का पालन करना सिखाया, स्त्रियों को माता के समान सम्मान देना और मन को शुद्ध रखने के लिए सदा भगवान का स्मरण करने की प्रेरणा दी। राज्य संचालन की शिक्षा के साथ-साथ माता मदालसा ने अपने पुत्र को आध्यात्मिक गहराई भी प्रदान की। इस प्रकार उन्होंने एक धर्मपरायण और निडर योद्धा-राजा का निर्माण किया।
संक्षेप में, रानी मदालसा की महानता इस बात में निहित है कि उन्होंने केवल शरीर ही नहीं, बल्कि आत्मा का भी पोषण किया। अपने आध्यात्मिक मूल्यों को बनाए रखते हुए परिस्थितियों और कर्तव्यों के अनुसार स्वयं को ढाल लेने की उनकी क्षमता ही उन्हें महान बनाती है। वे दर्शाती हैं कि एक माँ का प्रेम और ज्ञान अपने बच्चों के जीवन को ज्ञानप्राप्ति या आदर्श शासक, दोनों दिशाओं में आकार दे सकता है।
क्या भारत में कोई मातृसत्तात्मक समाज हैं?
जहाँ शास्त्रीय कथाएँ मातृत्व के आध्यात्मिक स्वरूप को उजागर करती हैं, वहीं कुछ समुदायों में माँ को केंद्रीय स्थान दिया जाता है और वंश और उत्तराधिकार माता के आधार पर निर्धारित होते हैं। हाँ, भारत में कई प्रमुख मातृसत्तात्मक समाज पाए जाते हैं। मेघालय के खासी, गारो और जयंतिया समुदाय, कर्नाटक के बंट और बिलावा, तथा लक्षद्वीप के मिनिकॉय द्वीप के लोग आज भी अपनी वंश परंपरा और संपत्ति को स्त्री वंश के माध्यम से आगे बढ़ाते हैं। हालाँकि समय के साथ ऐसे कई समाज, जैसे केरल की नायर-एझवा मातृवंशीय संयुक्त-परिवार प्रणाली, अब समाप्त हो चुके हैं।
समय के साथ व्यवस्थाएँ भले ही बदल जाएँ, लेकिन हर घर और समाज में माँ का स्थान एक ध्रुवतारे के समान होता है—शाश्वत और मार्गदर्शक। इस मदर्स डे पर, आइए हम हर माँ का उत्सव मनाएँ, जो अपनी शक्ति से मार्ग दिखाती है और अपने हृदय से बच्चे की दुनिया को आकार देती है।
माँ हमारी पहली गुरु होती हैं, हमारा पहला घर होती हैं, और वह मौन शक्ति होती हैं जो हमारे आंतरिक संसार को गढ़ती हैं। तैत्तिरीय उपनिषद इसे अत्यंत सुंदर रूप में व्यक्त करता है:
"मातृ देवो भव"
(माता साक्षात ईश्वर के समान है।)
मदर्स डे के विशेष अवसर पर अपनी माँ को हमारे Special Gift Bundles के साथ एक खूबसूरत अनुभव दें और उनके दिन को खुशियों से भर दें।
सामान्य प्रश्न
प्रश्न 1: माताओं के बारे में कुछ शक्तिशाली संस्कृत श्लोक और वैदिक उद्धरण कौन-से हैं?
यहाँ माँ के सम्मान में कुछ अत्यंत गहन संस्कृत उद्धरण दिए गए हैं—
-
उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता।
सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते ।।
(मनुस्मृति, अध्याय 2, श्लोक 145)
अर्थात्, दस उपाध्यायों से श्रेष्ठ एक आचार्य होता है, सौ आचार्यों से श्रेष्ठ पिता होता है, और पिता से हजार गुना अधिक गौरवमयी माता होती है।
- "न मातुः परदैवतम्"
अर्थ - माँ से बढ़कर कोई देवता नहीं है।
-
सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमयः पिता,
मातरं पितरं चैव यस्तु कुर्यात्प्रदक्षिणम्।
(पद्म पुराण, 1.50.11)
अर्थ- माता समस्त तीर्थों का स्वरूप हैं और पिता समस्त देवताओं का स्वरूप हैं। जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक माता और पिता की परिक्रमा करता है (अर्थात उनका सम्मान और सेवा करता है), वह अत्यंत पुण्य का भागी होता है।
प्रश्न 2: मदर्स डे को आध्यात्मिक और वैदिक तरीके से कैसे मनाया जा सकता है?
माँ का आशीर्वाद एक रक्षा-कवच की तरह कार्य करता है। भारतीय संस्कृति में प्रतिदिन माँ और धरती माता को प्रणाम करने की परंपरा रही है। आज के इस विशेष दिन पर अपनी माँ के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद अवश्य प्राप्त करें। यदि आप उन्हें कोई विशेष उपहार देना चाहते हैं, तो रुद्राक्ष माला अथवा श्री हरि विग्रह सेट भेंट कर सकते हैं।
आज के दिन जगन्नमाता, माँ जगदम्बा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें और उनसे संरक्षण एवं कल्याण की प्रार्थना करें। आप चाहें तो साधना ऐप पर माँ दुर्गा, माँ लक्ष्मी अथवा वेदमाता गायत्री के किसी भी वैदिक अनुष्ठान को संपन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।
साथ ही, अपनी माँ के नाम पर कोई पुण्य-कार्य करने का संकल्प लें, जैसे जरूरतमंदों को अन्नदान करना या किसी की शिक्षा में सहयोग देना।
प्रश्न 3: मदर्स डे पर माँ को कौन-सा आध्यात्मिक उपहार भेंट किया जा सकता है?
माँ हमारे व्यक्तित्व को आकार देती हैं और जीवन को सही दिशा प्रदान करती हैं। ऐसे में मन में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि जिन्होंने हमें यह जीवन दिया, गुरु की भाँति ज्ञान दिया और हमारे संस्कारों की नींव रखी, उन्हें आखिर हम क्या उपहार दें।
आपकी माँ के लिए साधना टेबलेट एक अत्यंत आत्मीय उपहार हो सकता है। साधना टेबलेट पर आपको 7 विशेष रूप से तैयार किए गए आध्यात्मिक ऐप्स, 200+ जागृत मंत्र एवं मंत्र-जप की सुविधा, 20 से अधिक देवताओं की वैदिक विधि से पूर्णतः मार्गदर्शित पूजा तथा 150+ 3D वैदिक अनुष्ठानों का अनूठा अनुभव प्राप्त होता है।
यह केवल एक उपहार नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शांति, भक्ति और साधना से जुड़ने का एक सुंदर माध्यम है, जो आपकी माँ के दैनिक जीवन को और अधिक आनंदमय एवं आध्यात्मिक बना सकता है।
प्रश्न 4: क्या मदर्स डे एक पश्चिमी पर्व है या सनातन परंपरा?
मदर्स डे की वर्तमान तिथि, अर्थात् मई के दूसरे रविवार को इसे मनाने की परंपरा, पश्चिमी देशों से आई है। इसकी शुरुआत 1908 में अमेरिकी एक्टिविस्ट एना जार्विस द्वारा अपनी माँ के सम्मान में की गई थी। इसलिए, यह कहना उचित होगा कि इस उत्सव की तिथि पश्चिमी परंपरा से प्रेरित है।
किन्तु "माँ" के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान का भाव सनातन धर्म में हजारों वर्षों से विद्यमान है। यहाँ मातृत्व केवल एक संबंध नहीं, बल्कि दिव्यता का स्वरूप माना गया है। सनातन परंपरा हमें प्रतिदिन प्रकृति के प्रत्येक पोषक तत्व को "माँ" के रूप में सम्मान देना सिखाती है, अन्न के लिए माँ अन्नपूर्णा, जल के लिए माँ गंगा और हमारा भार वहन करने वाली धरती माता। सनातन धर्म के चार प्रमुख स्तंभ—गौमाता, माँ गंगा, श्रीमद्भगवद्गीता और वेदमाता गायत्री—भी हमारी संस्कृति में अत्यंत पूजनीय हैं।
*इस ब्लॉग में प्रयुक्त सभी चित्र प्रतीकात्मक हैं और एआई द्वारा निर्मित किए गए हैं।
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Presented By Team Sadhana
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Nice information
We are grateful to the team of Guru ji who are constantly providing knowledge of Sanatan to people like us.
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