भारत के प्रमुख शक्तिपीठों की आध्यात्मिक यात्रा
शक्ति का सबसे सरल अर्थ है — सामर्थ्य। वैदिक साहित्य में यह शब्द संस्कृत धातु "शक्" से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है सक्षम होना अथवा किसी कार्य को करने की क्षमता या शक्ति रखना। इसलिए 'शक्ति' शब्द बल, ऊर्जा और कार्य करने की सामर्थ्य को दर्शाता है, जिसका प्रयोग बाद की परंपराओं में प्रायः देवी-स्वरूप के लिए किया गया।
देवी माँ सृजन और सतत रूपांतरण की गतिशील शक्ति हैं, जो जीवन को निरंतर गति और परिवर्तन की ओर प्रेरित करती हैं।
भारतवर्ष में इस दिव्य शक्ति को विग्रहों, अनुष्ठानों तथा पवित्र तीर्थ-स्थलों में प्रतिष्ठित किया गया है। आइए, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और पूर्वोत्तर राज्यों की एक आध्यात्मिक यात्रा पर चलें तथा वहाँ स्थित शक्तिपीठों के पवित्र इतिहास और प्राचीन कथाओं को जानें।
प्रमुख बातें
- माँ भ्रामरी देवी शक्तिपीठ, पंचवटी, नासिक (महाराष्ट्र)
- श्री महालक्ष्मी (अंबाबाई) मंदिर, कोल्हापुर (महाराष्ट्र)
- मणिबंध शक्तिपीठ (मणिवेदिका या चामुंडा माता मंदिर), पुष्कर (राजस्थान)
- विराट शक्तिपीठ (अंबिका शक्तिपीठ), विराटनगर (पूर्व नाम बैराट), जयपुर ज़िला, राजस्थान
- कालिका शक्तिपीठ, पावागढ़ (गुजरात)
- चंद्रभागा शक्तिपीठ, प्रभास, गिरनार पर्वत (गुजरात)
- उमाकोटिलिंगेश्वर स्वामी / गोदावरी तीर शक्तिपीठ, राजमहेंद्रवरम (आंध्र प्रदेश)
- देवगर्भा शक्तिपीठ, कांचीपुरम (तमिलनाडु)
- कन्याश्रम शक्तिपीठ, कन्याकुमारी (तमिलनाडु)
- जयंती देवी शक्तिपीठ, जयंतिया पहाड़ियाँ (हिल्स), मेघालय
- त्रिपुरा सुंदरी शक्तिपीठ, उदयपुर (त्रिपुरा)
- कामाख्या शक्तिपीठ, असम, गुवाहाटी
माँ भ्रामरी देवी शक्तिपीठ, पंचवटी, नासिक (महाराष्ट्र)

( देवी भ्रामरी)
महाराष्ट्र के नासिक (नाशिक) से 24 किलोमीटर दूर स्थित पवित्र त्र्यंबकेश्वर नगरी अपनी भौगोलिक सीमा में भगवान शिव और शक्ति, दोनों की प्रबल ऊर्जा को समाहित किए हुए है। दंडकारण्य वन में स्थित सप्तशृंगी पर्वतमाला में भ्रामरी देवी शक्तिपीठ विराजमान है, जिसका उल्लेख रामायण में भी मिलता है। देवी भागवत पुराण के अनुसार, ये सातों पर्वत मिलकर एक अत्यंत शक्तिशाली शक्तिपीठ का निर्माण करते हैं। यहाँ सप्तशृंगी देवी एक पवित्र शिला पर स्वयंभू रूप में प्रकट हुई थीं।
ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार, भगवान राम और माता सीता ने भी यहाँ आकर देवी माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया था। महर्षि मार्कंडेय ने इसी स्थान पर कठोर तपस्या की और दुर्गा सप्तशती के 700 श्लोकों की रचना की। विशेष बात यह है कि देवी की प्रतिमा इन स्तुतियों को सुनने के लिए बाईं ओर झुकी हुई प्रतीत होती है। आज भी भक्तगण देवी के दर्शन करने के बाद परंपरानुसार मार्कंडेय पर्वत के दर्शन करने जाते हैं।
यहाँ माता सती का चिबुक (ठोड़ी) गिरा था, इसलिए यहाँ की देवी माँ को चिबुका (अर्थात् ठोड़ी वाली) देवी कहा जाता है। इस शक्तिपीठ के भैरव को विकृताक्ष भैरव के नाम से जाना जाता है।
यहाँ देवी की पूजा अनेक अन्य नामों से भी की जाती है, जिनमें से एक नाम "भ्रामरी देवी" है। देवी भागवत पुराण के अनुसार, असुर अरुण का संहार करने के लिए माँ भगवती ने भ्रामरी स्वरूप धारण किया था। "भ्रमर" का अर्थ मधुमक्खी या भौंरा होता है। इस स्वरूप में देवी के चारों ओर असंख्य मधुमक्खियाँ थीं। उन्होंने उन मधुमक्खियों के झुंड को असुर पर आक्रमण करने और उसका विनाश करने के लिए भेजा।
इस शक्तिपीठ में देवी को सर्वसिद्धीश (समस्त आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्रदान करने वाली), ब्रह्मरूपिणी (ऐसी मान्यता है कि वे भगवान ब्रह्मा के कमंडलु से प्रकट हुई थीं), वाणी देवी तथा महिषासुर मर्दिनी (भैंसे के समान मुख वाले असुर महिषासुर का वध करने वाली) के नामों से भी जाना जाता है। पहाड़ी की तलहटी में, मंदिर की सीढ़ियों के आधार पर पत्थर से निर्मित भैंसे का एक सिर स्थित है।
श्री महालक्ष्मी (अंबाबाई) मंदिर, कोल्हापुर (महाराष्ट्र)
श्री अंबाबाई मंदिर महाराष्ट्र के कोल्हापुर शहर के मध्य में, पंचगंगा नदी के तट पर स्थित है। यह भारत के अष्टादश (18) शक्तिपीठों में से एक है। मंदिर का मूल गर्भगृह सातवीं शताब्दी ईस्वी का माना जाता है और इसका निर्माण चालुक्य वंश द्वारा कराया गया था। अपनी प्राचीनता, आध्यात्मिक महिमा और विशाल स्वरूप के कारण कोल्हापुर को 'दक्षिण काशी' अर्थात 'दक्षिण का वाराणसी' भी कहा जाता है।
(अम्बा देवी, कोल्हापुर)
शाक्त परंपरा के अनुसार, इस स्थान पर माता सती का नेत्र (कुछ परंपराओं में दोनों नेत्र, जबकि अन्य में त्रिनेत्र का उल्लेख मिलता है) गिरा था। यहाँ देवी की पूजा महालक्ष्मी के रूप में की जाती है। वे आदिशक्ति हैं, जो सृष्टि की रचना और पालन की मूल प्रेरक शक्ति हैं तथा समस्त सृष्टि में व्याप्त दिव्य चेतना का स्वरूप हैं।
देवी माँ का एक नाम 'करवीर निवासिनी' अर्थात् 'करवीर में निवास करने वाली' है। यह नाम कोल्हापुर के प्राचीन नाम करवीर से जुड़ा है, जिसका उल्लेख पीठनिर्णय तंत्र में मिलता है। भक्त देवी को प्रेमपूर्वक अंबाबाई (अर्थात् प्रिय माता) और कोल्हापुरी देवी के नाम से भी पुकारते हैं। यह नाम आज कोल्हापुर की पहचान का अभिन्न अंग बन चुका है।
इस मंदिर के भैरव क्रोधीश हैं, जिनका अर्थ है 'क्रोध के स्वामी'। वे इस शक्तिपीठ के उग्र रक्षक माने जाते हैं और सदैव इसकी रक्षा करते हैं।
वर्ष में दो बार, लगभग 31 जनवरी और 9 नवंबर के आसपास, मंदिर में अद्भुत किरणोत्सव मनाया जाता है। इस अवसर पर अस्त होते सूर्य की किरणें मंदिर के पश्चिमी द्वार से होकर सीधे महालक्ष्मी की स्वर्णमयी प्रतिमा पर पड़ती हैं और उनके मुखमंडल को आलोकित कर देती हैं। इस दिव्य और अलौकिक दृश्य के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु एकत्रित होते हैं।
अंबाबाई का महाराष्ट्र के जनजीवन में अत्यंत आत्मीय और विशेष स्थान है। वे विभिन्न जातियों और क्षेत्र के असंख्य परिवारों की कुलदेवी के रूप में पूजित हैं। विवाह, संतान के जन्म, परिवार में किसी के निधन या नए कार्य की शुरुआत जैसे हर महत्वपूर्ण अवसर पर लोग कोल्हापुर आकर देवी माँ का आशीर्वाद लेते हैं।
मणिबंध शक्तिपीठ (मणिवेदिका या चामुंडा माता मंदिर), पुष्कर (राजस्थान)
(मणिबंध शक्तिपीठ, पुष्कर, राजस्थान)
मणिबंध शक्तिपीठ, जिसे मणिवेदिका शक्तिपीठ, श्री राजराजेश्वरी पुरुहूत मंदिर तथा स्थानीय रूप से चामुंडा माता मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, राजस्थान के पुष्कर के समीप गायत्री पहाड़ी (पुरुहूत पहाड़ी) की तलहटी में स्थित है।
कुछ पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह वही स्थान है जहाँ देवी सती का मणिबंध (कंगन) गिरा था, जबकि कुछ परंपराओं में इसे वह स्थान माना गया है जहाँ उनकी कलाई गिरी थी।
इस शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री देवी आदिशक्ति माँ गायत्री के रूप में पूजित हैं। इसी कारण यह मंदिर माँ गायत्री मंत्र के ध्यान और जप के लिए सर्वोत्तम स्थलों में से एक माना जाता है। माँ गायत्री का ज्ञान और विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती से भी घनिष्ठ संबंध माना जाता है। मणिवेदिका शक्तिपीठ के भैरव सर्वानंद हैं। सर्वानंद अर्थात् ‘’सभी को आनंद प्रदान करने वाले’’।
मंदिर के गर्भगृह में त्रेता युग की एक अत्यंत प्राचीन एवं पवित्र प्रतिमा स्थापित है, जिसमें भगवान शिव और माँ पार्वती एक-दूसरे को प्रेमपूर्वक आलिंगन किए हुए हैं। देवताओं के इस स्नेहमय स्वरूप के कारण इसे प्रिय पीठ के नाम से जाना जाता है। यह पवित्र स्थल केवल विशेष एवं दुर्लभ धार्मिक अवसरों पर ही श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोला जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ दंपति सच्चे, अटूट और चिरस्थायी प्रेम का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करते हैं।
भौगोलिक दृष्टि से, पवित्र पुष्कर सरोवर के एक ओर प्रसिद्ध सावित्री मंदिर स्थित है, जबकि दूसरी ओर ठीक उसके सम्मुख मणिवेदिका गायत्री शक्तिपीठ विराजमान है। सरोवर के दोनों ओर आमने-सामने स्थित ये दोनों मंदिर मिलकर पूरे क्षेत्र में आध्यात्मिक संतुलन और दिव्य ऊर्जा का संचार करते हैं। यह शक्तिपीठ पुष्कर के भगवान ब्रह्मा मंदिर से लगभग 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
यहाँ शारदीय नवरात्रि (सितंबर–अक्टूबर), चैत्र नवरात्रि (मार्च–अप्रैल) और प्रसिद्ध पुष्कर मेले के समय विशेष पूजा, और विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
विराट शक्तिपीठ (अंबिका शक्तिपीठ), विराटनगर (पूर्व नाम बैराट), जयपुर ज़िला, राजस्थान
(माँ अंबिका, विराट शक्तिपीठ, राजस्थान)
विराट शक्तिपीठ, जिसे अंबिका शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है, राजस्थान के जयपुर ज़िले के प्राचीन नगर विराटनगर (पूर्व नाम बैराट) में स्थित है। यह शक्तिपीठ प्राचीन अरावली पर्वतमाला की विशाल शिलाओं के मध्य प्राकृतिक रूप से अवस्थित है।
हिंदू शास्त्रों के अनुसार, यही वह पावन स्थान है जहाँ देवी सती के बाएँ पैर की उँगलियाँ गिरी थीं। वहीं कुछ क्षेत्रीय मान्यताओं में इसे दाएँ पैर की उँगलियाँ गिरने का स्थान भी बताया गया है। इस शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री देवी माँ अंबिका के रूप में पूजित हैं, जो आद्यशक्ति एवं समस्त सृष्टि की जननी है।
मंदिर में स्थापित माँ अंबिका की मुख्य संगमरमर की प्रतिमा अपनी बड़ी, सजीव और आकर्षक नेत्रों के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
कालिका शक्तिपीठ, पावागढ़ (गुजरात)

(माँ कालिका)
वडोदरा से मात्र 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पावागढ़, गुजरात का एक प्राचीन ज्वालामुखीय पर्वत है, जो यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल चंपानेर–पावागढ़ पुरातात्त्विक उद्यान के अंतर्गत आता है।
मान्यता है कि इसी स्थान पर देवी सती के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था। यहाँ देवी की पूजा माँ कालिका के रूप में की जाती है, जो माँ का उग्र और रौद्र स्वरूप हैं। उनकी प्रतिमा पर एक चमकीला लाल मुख स्थापित है, जिसे मुखवटो कहा जाता है। यह देवी माँ की दुष्ट शक्तियों पर विजय का प्रतीक है।
माँ कालिका, आदिवासी परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई हैं। उन्हें भील समुदाय द्वारा अपनी प्राचीन संरक्षक देवी के रूप में पूजा जाता है। यहाँ के अधिष्ठाता भैरव लाकुलीश (जिन्हें नकुलीश भी कहा जाता है) हैं, जिनकी पूजा भगवान शिव को समर्पित एक निकटवर्ती मंदिर में की जाती है।
मान्यता है कि महर्षि विश्वामित्र ने यहाँ देवी की प्रतिमा स्थापित की थी तथा अपनी शक्ति से इस मंदिर को अभिमंत्रित किया था। पावागढ़ से निकलने वाली तीन प्रमुख नदियों में से एक का नाम उन्हीं के सम्मान में "विश्वामित्री" रखा गया।
एक अन्य लोककथा के अनुसार, महर्षि विश्वामित्र ने इस पर्वत के अस्तित्व में आने से पूर्व इसी स्थान पर तप और प्रार्थना की थी। तब देवताओं ने उन्हें यह पर्वत प्रदान किया, ताकि उनकी गायें आसपास की गहरी घाटी में गिरने से सुरक्षित रह सकें। कहा जाता है कि जो पर्वत उस घाटी से प्रकट हुआ, वह दिव्य पर्वत का एक-चौथाई भाग था, और इसी कारण इसका नाम "पावागढ़" (एक-चौथाई पर्वत) पड़ा।
चौदहवीं शताब्दी के दौरान इस क्षेत्र पर शासन करने वाले राजपूत चौहान वंश ने देवी काली को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजा। योद्धा होने के कारण वे युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए उनका आशीर्वाद लेते थे।
चंद्रभागा शक्तिपीठ, प्रभास, गिरनार पर्वत (गुजरात)

( चंद्रभागा शक्तिपीठ )
गुजरात के गिर सोमनाथ जिले के पवित्र प्रभास क्षेत्र में चंद्रभागा शक्तिपीठ स्थित है। मान्यता है कि इसी पवित्र स्थल पर माता सती का उदर (पेट) गिरा था, जिससे यह भूमि देवी माँ की दिव्य उपस्थिति का एक प्रमुख केंद्र बन गई।
प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर के निकट स्थित यह शक्तिपीठ गुजरात में शिव-शक्ति उपासना का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। यह हिरण, कपिला और सरस्वती नदियों के पवित्र संगम पर स्थित है। वक्रतुंड भैरव, अर्थात् वक्र शरीर वाले भैरव, इस पवित्र संगम के शाश्वत रक्षक हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार, चंद्रदेव ने राजा दक्ष प्रजापति की सभी 27 पुत्रियों से विवाह किया था, किंतु वे केवल रोहिणी से ही विशेष प्रेम करते थे, जबकि बाकी सभी की उपेक्षा करते थे। इससे क्रोधित होकर दक्ष ने चंद्रमा को क्षीण हो जाने का श्राप दे दिया। तब चंद्रदेव ने भगवान शिव की आराधना की और देवी चंद्रभागा ने उन्हें इस श्राप से रक्षा प्रदान की। चंद्रदेव की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव यहाँ प्रकट हुए, जिससे सोमनाथ मंदिर की स्थापना हुई। यही भूमि आगे चलकर देवी चंद्रभागा की उपासना का प्रमुख केंद्र बनी।
इसलिए इस शक्तिपीठ में देवी की पूजा "चंद्रभागा" के रूप में की जाती है, जिसका अर्थ है, चंद्रमा का एक अंश। 'चंद्रभागा' देवी माँ के उस सौम्य स्वरूप को संदर्भित करता है, जो चंद्रमा की शीतल और पालन-पोषण करने वाली ऊर्जा का प्रतीक है। विशेष बात यह है कि यहाँ देवी की कोई भौतिक प्रतिमा या अलग मंदिर स्थापित नहीं है। उनकी पूजा त्रिवेणी संगम पर उनके निराकार स्वरूप में की जाती है, जहाँ भक्त उनके दर्शन के लिए एकत्रित होते हैं।
नवरात्रि (आश्विन और चैत्र मास) के दौरान यह शक्तिपीठ विशेष रूप से जीवंत हो उठता है। यहाँ शिवरात्रि भी अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक वर्ष नवंबर में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर सोमनाथ में एक भव्य मेले का आयोजन होता है।
माँ की ऊर्जा और करुणा असीम है। साधक अपने घर में रहते हुए भी साधना ऐप में कदंब वन के माध्यम से माँ दुर्गा के जप और विभिन्न अनुष्ठानों द्वारा इस करुणा का अनुभव कर सकते हैं।
श्रीशैलम शक्तिपीठ, श्रीशैलम (आंध्र प्रदेश)

(माँ भ्रामराम्बा)
श्रीशैलम शक्तिपीठ, जिसे भ्रामराम्बा देवी मंदिर तथा श्री भ्रामराम्बा अम्मावारी शक्तिपीठम् मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले के श्रीशैलम नगर में स्थित है। यह मंदिर परिसर पवित्र कृष्णा नदी के निकट, श्रीपर्वत पहाड़ियों (जो नल्लमलाई पर्वतमाला का भाग हैं) के ऊपर स्थित है।
आदि शंकराचार्य रचित शक्तिपीठ स्तोत्रम् में इसे 18 महाशक्तिपीठों में से एक माना गया है। श्रीशैलखंडम् के 23वें अध्याय में श्री भ्रामराम्बिका देवी के महत्व और उनसे जुड़ी कथाओं का वर्णन मिलता है। यहाँ देवी सती की ग्रीवा (कंठ) गिरी थी।
मंदिर के भीतर एक गोलाकार शिला पर पवित्र श्रीचक्र (माँ त्रिपुरा सुंदरी का यंत्र) प्रतिष्ठित है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, आदि गुरु शंकराचार्य ने अपनी यात्रा के दौरान क्रोधित भ्रामराम्बा देवी को शांत करने के लिए स्वयं इस यंत्र की स्थापना की थी।
मंदिर परिसर में नंदीमंडप, उमा-महेश्वर मंदिर तथा मनोहर सहस्रलिंग (1,000 शिवलिंगों का पवित्र स्थल) भी स्थित हैं, जो पौराणिक कथाओं की सुंदर नक्काशियों से अलंकृत हैं। इस शक्तिपीठ के अधिष्ठाता भैरव "संवरानंद" हैं, जिसका अर्थ है, ध्यान एवं संयम से प्राप्त होने वाला आनंद।
देवी महात्म्य में भी यह उल्लेख मिलता है कि श्री भ्रामराम्बा शक्तिपीठम् में देवी ने अरुणासुर का वध करने के लिए भ्रमरी (मधुमक्खी) का स्वरूप धारण किया था। इसी लीला के कारण उन्हें "माँ भ्रामराम्बा" अथवा "भ्रामराम्बिका" नाम प्राप्त हुआ।
उमाकोटिलिंगेश्वर स्वामी / गोदावरी तीर शक्तिपीठ, राजमहेंद्रवरम (आंध्र प्रदेश)

(गोदावरी तीर शक्तिपीठ)
आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले में स्थित, तेलुगु भाषा एवं साहित्य की जन्मभूमि मानी जाने वाली भव्य नगरी राजमहेंद्रवरम (राजमुंदरी) में श्री उमाकोटिलिंगेश्वर स्वामी मंदिर स्थित है। इसे गोदावरी तीर शक्तिपीठ या सर्वशैल शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है। यहां माता सती के गंड ( दोनों, दायाँ और बायाँ गाल) गिरे थे।
यहाँ देवी की उपासना दोनों गालों के अनुरूप दो स्वरूपों में की जाती है। वे दाएँ गाल में विश्वेश्वरी (अर्थात् ब्रह्मांड की देवी) या विश्वमातृका (अर्थात् संपूर्ण जगत की माता) के रूप में जानी जाती हैं। बाएँ गाल में राकिनी के रूप में भी, जो एक उग्र और शक्तिशाली स्वरूप है।
विश्वमातृका के रूप में वे सार्वभौमिक माता हैं, जो पवित्र गोदावरी नदी के जल के माध्यम से इस भूमि को उर्वरता, पोषण और जीवन प्रदान करती हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार भगवान शिव स्वयं अपनी निरंतर उपस्थिति से इस नदी को आशीर्वादित करते हैं और उनके शाश्वत साथी एवं सहचर के रूप में यहाँ विराजमान रहते हैं।
इस शक्तिपीठ पर दो भैरव विराजमान है। इनमें से एक दण्डपाणि के नाम से जाने जाते हैं, जिसका अर्थ है हाथ में दंड (लाठी) धारण करने वाले, और वे माँ विश्वेश्वरी के साथ विराजति हैं। दूसरा स्वरूप वत्सनाभ है, जिसका अर्थ है शिशु के समान नाभि वाले, और वे राकिनी देवी के साथ विराजमान हैं। कुब्जिका तंत्र में गोदावरी नदी को सिद्धपीठों में से एक के रूप में वर्णित किया गया है।
गोदावरी के पवित्र जल में स्नान करने से आध्यात्मिक ज्ञान और सिद्धि की प्राप्ति होती है। ब्रह्म पुराण में वर्णित गोदावरी माहात्म्य (जिसे गौतमी माहात्म्य भी कहा जाता है) के अनुसार, ऋषि गौतम ने भगवान शिव की कठोर आराधना कर गोदावरी नदी को पृथ्वी पर अवतरित किया। उन्होंने ऐसा इसलिए किया, ताकि मानव जाति के सांसारिक पापों का शुद्धीकरण हो तथा धरती में उर्वरता और शुभता का प्रसार हो सके।
मान्यता है कि ऋषि गौतम ने स्वयं प्रायश्चित्त स्वरूप यहाँ नदी तट पर शिवलिंग की स्थापना की थी, जिससे पवित्र उमाकोटिलिंगेश्वर मंदिर का प्राकट्य हुआ।
देवगर्भा शक्तिपीठ, कांचीपुरम (तमिलनाडु)

(कांची कामाक्षी अम्मन)
यह शक्तिपीठ, जिसे सामान्यतः कांची कामाक्षी अम्मन मंदिर के रूप में जाना जाता है, तमिलनाडु के कांचीपुरम में स्थित है। काशी के साथ कांचीपुरम को भगवान शिव की दो नेत्रों में से एक माना जाता है। माँ कामाक्षी के इस शक्तिपीठ का निर्माण पल्लव वंश के संरक्षण में किया गया।
कांचीपुरम सप्तपुरियों (वे सात पवित्र नगर जो मोक्ष प्रदान करते हैं) में से एक है। इसे "100 मंदिरों का नगर" भी कहा जाता है, और इसकी पवित्र भूमि में भगवान शिव के 108 मंदिर स्थित हैं।
मान्यता है कि यह वही पवित्र स्थल है, जहाँ माता सती का कंकाल गिरा था। कुछ अन्य परंपराओं के अनुसार, यहाँ देवी की नाभि (मध्य भाग) गिरी थी, इसलिए इसे "नाभिस्थान ओड्याण पीठ" अथवा "नाभि पीठ" के नाम से भी जाना जाता है।
श्री कामाक्षी देवी, जिन्हें श्री महात्रिपुरसुंदरी, श्रीविद्या परमेश्वरी तथा राजराजेश्वरी के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजा जाता है, कांचीपुरम की अधिष्ठात्री देवी हैं। पृथ्वी पर स्थित 6,400 देवी पीठों में से तीन को सर्वोच्च माना गया है — कामराज पीठ, जालंधर पीठ और ओड्याण पीठ। कांचीपुरम के कामराज पीठ में भगवान हयग्रीव, ज्वालामुखी के जालंधर पीठ में महर्षि भृगु तथा कामरूप के नाभिस्थान ओड्याण पीठ में महर्षि व्यास द्वारा इन पीठों की उपासना की गई।
इन तीनों में से श्री कामाक्षी मंदिर के गर्भगृह स्थित बिलाकाश में स्थापित कामराज पीठम् को वैदिक ग्रंथों में मोक्ष, दिव्य ऊर्जा तथा परम सिद्धि प्रदान करने वाले स्थल के रूप में महिमामंडित किया गया है।
यहाँ देवी की उपासना "देवी कामाक्षी" के रूप में की जाती है, जिसका अर्थ है, जिनकी दृष्टि सभी कामनाओं को पूर्ण करती है। उन्हें "देवगर्भा" अर्थात् दिव्यता की गर्भस्थ शक्ति के रूप में भी पूजा जाता है। देवी पद्मासन में विराजमान हैं। उनके चार हाथों में गन्ने का धनुष, पुष्पबाण, पाश तथा अंकुश सुशोभित हैं।
वे दिव्य स्त्री शक्ति की त्रयी (माँ दुर्गा, माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती) का स्वरूप मानी जाती हैं। उन्हें माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी के रूप में भी पूजा जाता है। मंदिर की उत्तर दिशा में देवी की महिषासुरमर्दिनी (महिषासुर का वध करने वाली) स्वरूप में एक भव्य प्रतिमा स्थापित है।
देवगर्भा शक्तिपीठ के अधिष्ठाता भैरव "रुरु" हैं, जिनका नाम उस उग्र और अजेय शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जो यहाँ प्रतिष्ठित दिव्यता के पवित्र गर्भ की रक्षा करती है।
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, राजा दशरथ स्वयं संतान प्राप्ति के आशीर्वाद हेतु देवी कामाक्षी की उपासना करने कांचीपुरम आए थे। आज भी देशभर से अनेक दंपति संतान प्राप्ति की कामना लेकर देवी के इस पवित्र धाम में उनके आशीर्वाद के लिए आते हैं। यह भी कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने देवी के गर्भगृह में स्थित विग्रह के समक्ष श्रीचक्र की स्थापना की थी।
कन्याश्रम शक्तिपीठ, कन्याकुमारी (तमिलनाडु)

(देवी सर्वाणी)
भारत के दक्षिणतम छोर पर, तमिलनाडु के कन्याकुमारी में समुद्र से घिरी एक पहाड़ी पर पवित्र कन्याश्रम शक्तिपीठ स्थित है, जिसे "कालिकाश्रम" भी कहते हैं।
मान्यता है कि यही वह पवित्र स्थल है, जहाँ देवी सती का पृष्ठभाग (रीढ़ का भाग) गिरा था, जिससे यहाँ कुंडलिनी ऊर्जा का प्राकट्य हुआ। यहाँ देवी की उपासना "सर्वाणी" के रूप में की जाती है, जिसका अर्थ है, भगवान शिव की अर्धांगिनी। यह स्वरूप माँ पार्वती की सौम्य शक्ति तथा माँ दुर्गा के उग्र रूप, दोनों का प्रतिनिधित्व करता है। इस शक्तिपीठ के अधिष्ठाता भैरव "निमिष" हैं, जिसका अर्थ है, एक क्षण।
मंदिर के स्थल पुराण के अनुसार, इस मंदिर की प्रतिमा की स्थापना भगवान विष्णु के अवतार भगवान परशुराम ने की थी। यहाँ देवी माँ एक भव्य हीरे की नथ धारण किए हुए हैं। कहा जाता है कि यह नथ उन्हें नागराज से प्राप्त हुई थी। यह नथ इतनी चमकीली मानी जाती है कि एक बार एक नाविक ने उसकी चमक को प्रकाशस्तंभ समझ लिया और अपना जहाज कन्याकुमारी की चट्टानों की ओर मोड़ दिया। ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए गर्भगृह का पूर्वी द्वार वर्ष में केवल पाँच विशेष अवसरों पर ही खोला जाता है।
मंदिर परिसर में समुद्र तट के निकट स्थित मीठे जल का एक छोटा पवित्र कुंड, जिसे "पुष्करणी" (मंडूक तीर्थ स्थल) कहा जाता है। यह कुंड अपने उपचारात्मक गुणों के लिए प्रसिद्ध है।
कथा के अनुसार, असुरराज बाणासुर को यह वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल एक कुमारी कन्या ही कर सकती है। तब आद्याशक्ति ने एक कन्या का रूप धारण किया और इन तटों पर आकर तपस्या की। भगवान शिव उनसे विवाह करने हेतु सुचिंद्रम पहुँचे। किंतु देवी के कुमारी स्वरूप को बनाए रखने के लिए देवर्षि नारद ने हस्तक्षेप किया, जिससे विवाह स्थगित हो गया।
जब बाणासुर ने बलपूर्वक देवी को प्राप्त करने का प्रयास किया, तब देवी ने एक भीषण युद्ध में उसका संहार कर दिया। जिन चट्टानों पर देवी ने तपस्या की थी, उन्हें "श्रीपादपरै" कहा जाता है। बाद में जब स्वामी विवेकानंद ने इन चट्टानों पर ध्यान किया, तब वे "विवेकानंद रॉक" अथवा "विवेकानंद शिला स्मारक" के नाम से प्रसिद्ध हो गईं।
विरजा क्षेत्र (माँ बिरजा मंदिर), जाजपुर, ओडिशा
(माँ बिरजा, ओडिशा)
विरजा क्षेत्र, जिसे वर्तमान में ओडिशा के जाजपुर के नाम से जाना जाता है, वैतरणी नदी के तट पर, भुवनेश्वर से लगभग 125 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। यह भारत के अष्टादश शक्तिपीठों में से एक है। इसे ओडिशा का सबसे प्राचीन तांत्रिक पीठ माना जाता है।
यहाँ माँ दुर्गा के एक स्वरूप में माँ बिरजा की पूजा की जाती है। शाक्त परंपरा में इस क्षेत्र को ओड्डियान पीठ के नाम से भी जाना जाता है। ओड्डियान का अर्थ है स्त्रियों द्वारा नाभि के चारों ओर धारण किया जाने वाला आभूषण, जो इस शक्तिपीठ से जुड़ी पौराणिक कथा का प्रत्यक्ष संकेत देता है। तंत्र चूड़ामणि के अनुसार, इसी स्थान पर देवी सती की नाभि गिरी थी।
स्कंद पुराण में भी इस पवित्र क्षेत्र का उल्लेख मिलता है, जहाँ कहा गया है कि यहाँ दर्शन और तीर्थयात्रा करने से श्रद्धालुओं के पाप और अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं।
यहाँ माँ बिरजा, जिन्हें माँ दुर्गा का एक स्वरूप माना जाता है, की पूजा की जाती है। शाक्त परंपरा में इस क्षेत्र को ओड्डियान पीठ के नाम से भी जाना जाता है। ओड्डियान का अर्थ है स्त्रियों द्वारा नाभि के चारों ओर धारण किया जाने वाला आभूषण, जो इस शक्तिपीठ से जुड़ी पौराणिक कथा का प्रत्यक्ष संकेत देता है। तंत्र चूड़ामणि के अनुसार, इसी स्थान पर देवी सती की नाभि गिरी थी।
स्कंद पुराण में भी इस पवित्र क्षेत्र का उल्लेख मिलता है, जिसमें कहा गया है कि यहाँ दर्शन और तीर्थयात्रा करने से श्रद्धालुओं के पाप और अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं।
मंदिर परिसर में नाभि गया कुआँ स्थित है। इसे गयासुर की नाभि का स्थान माना जाता है। यहाँ प्रतिदिन श्राद्ध कर्म संपन्न किए जाते हैं। यह भारत के पंच गया क्षेत्रों में से एक महत्वपूर्ण पितृ तीर्थ (नाभि गया) है, जहाँ पूर्वजों की शांति के लिए विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि माँ बिरजा अपने भक्तों के सात पीढ़ियों तक के पितरों को मोक्ष प्रदान करती हैं।
ब्रह्मयामल तंत्र में वर्णित आद्य स्तोत्र में देवी विमला को पुरी की अधिष्ठात्री देवी तथा विरजा (गिरिजा) को प्राचीन उत्कल राज्य की अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। वहीं आदि शंकराचार्य ने भी अपनी अष्टादश शक्तिपीठ स्तुति में देवी की गिरिजा के रूप में स्तुति की है।
मंदिर परिसर में माँ बिरजा की प्रतिमा के दाहिनी ओर दशमहाविद्याओं में से एक श्री बगलामुखी देवी का भी पवित्र मंदिर स्थित है।इस शक्तिपीठ के भैरव भगवान जगन्नाथ के रूप में पूजित हैं। मंदिर का आधार त्रिकोणाकार यंत्र के स्वरूप में निर्मित है, जिसके प्रत्येक कोने पर एक-एक शिवलिंग स्थापित है।
ऐसी मान्यता है कि संपूर्ण जाजपुर क्षेत्र में लगभग एक करोड़ (कोटि) शिवलिंग विद्यमान हैं, जो इस पूरे क्षेत्र में भगवान शिव की सर्वव्यापकता का प्रतीक माने जाते हैं।
जयंती देवी शक्तिपीठ, जयंतिया पहाड़ियाँ (हिल्स), मेघालय

(जयंती देवी शक्तिपीठ, मेघालय)
यह शक्तिपीठ मेघालय के जयंतिया पहाड़ी क्षेत्र के नर्तियांग गाँव में स्थित है। प्राचीन समय में यह गाँव जयंतिया (जैंतिया) राजवंश की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करता था। मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती की वाम जंघा (बाईं जंघा) गिरी थी। पौराणिक परंपराओं और लोककथाओं के अनुसार, जयंतिया राजवंश के राजा देवी उपासना करते थे और युद्ध से पहले देवी का आशीर्वाद लेना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता था।
इस शक्तिपीठ में देवी जयंती "जयंतेश्वरी" स्वरूप में पूजित हैं, जबकि भगवान शिव "कामदीश्वर महादेव" के रूप में पूजे जाते हैं। कामदीश्वर अर्थात् वे भगवान जो समस्त संसार को सदैव गतिमान रखते हैं। भैरव मंदिर में जयंतिया राजवंश के प्राचीन शस्त्र और आयुध आज भी सुरक्षित रखे गए हैं, जो इस स्थान की ऐतिहासिक विरासत को दर्शाते हैं।
नर्तियांग का यह मंदिर स्थानीय जयंतिया समुदाय की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान यहाँ भव्य पूजा-अर्चना और पारंपरिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है।
त्रिपुरा सुंदरी शक्तिपीठ, उदयपुर (त्रिपुरा)
त्रिपुरा सुंदरी शक्तिपीठ, त्रिपुरा के उदयपुर शहर में एक छोटी पहाड़ी पर स्थित प्राचीन मंदिर है। इस पहाड़ी का आकार कछुए (कूर्म) के समान है, इसलिए इसे "कूर्म पीठ" भी कहा जाता है। "माताबाड़ी (माताबारी)" के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर माँ त्रिपुरा सुंदरी को समर्पित है। मान्यता है कि यहाँ माता सती का दाहिना चरण (पैर) गिरा था। यहाँ भगवान शिव 'त्रिपुरेश' के रूप में देवी के साथ विराजमान हैं।

(माँ त्रिपुर सुंदरी)
एक प्रचलित कथा के अनुसार, 16वीं शताब्दी में त्रिपुरा के राजा धन्यमाणिक को स्वप्न में माँ त्रिपुरा सुंदरी ने दर्शन दिए। देवी ने उन्हें बताया कि उनकी मूर्ति चिंतागाँव की पहाड़ियों में स्थित है और उसे तत्काल वहाँ से लाकर स्थापित किया जाए। राजा ने तुरंत अपने सैनिकों को मूर्ति लाने का आदेश दिया। सैनिक रातों-रात मूर्ति लेकर लौटे, लेकिन माताबाड़ी पहुँचते ही सूर्योदय हो गया। देवी की इच्छा मानकर उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया गया और मूर्ति स्थापित कर दी गई। यही मंदिर आगे चलकर त्रिपुरा सुंदरी शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, राजा उस स्थान पर पहले भगवान विष्णु का मंदिर बनवाना चाहते थे, किंतु देवी की मूर्ति प्रकट होने के पश्चात उन्होंने वहीं माँ त्रिपुरा सुंदरी का मंदिर बनवाया।
कामाख्या शक्तिपीठ, असम, गुवाहाटी
योनि-पीठं कामगिरौ कामाख्या तत्र देवता ।
यत्रास्ते त्रिगुणातीता रक्तपाषाणरूपिणी ॥
(कामगिरि में देवी की योनि का पवित्र पीठ स्थित है। वहाँ की अधिष्ठात्री देवी "कामाख्या" कहलाती हैं, जिसका अर्थ सृष्टि की इच्छा या सृजन की कामना है। यहाँ त्रिगुणों से परे देवी रक्तपाषाण (लाल पत्थर) के रूप में विराजमान हैं।)
माँ कामाख्या शक्तिपीठ असम की राजधानी दिसपुर के पास, गुवाहाटी से 8 किलोमीटर दूर नीलाचल पर्वत पर स्थित है। यह शक्तिपीठ तांत्रिक साधना का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि यहाँ माता सती की योनि गिरी थी। दस महाविद्याओं के मंदिरों से घिरा यह शक्तिपीठ देवी से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाओं और लोकमान्यताओं का केंद्र है।

(माँ कामाख्या शक्तिपीठ, असम)
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, कामाख्या मंदिर का निर्माण कामदेव ने करवाया था। कथा के अनुसार, भगवान शिव के तीसरे नेत्र से भस्म होने के पश्चात कामदेव ने विश्वकर्मा की सहायता से देवी के सम्मान में इस मंदिर का निर्माण कराया, जहाँ उन्हें पुनः अपना सौंदर्य और तेज प्राप्त हुआ।
माँ कामाख्या को कामना पूर्ण करने वाली शक्ति के रूप में पूजा जाता है, इसलिए उनकी उपासना माँ त्रिपुरा सुंदरी तथा "षोडशी" स्वरूप में भी की जाती है। मंदिर के मध्य कक्ष में देवी की एक अद्भुत प्रतिमा स्थापित है, जिसमें उन्हें 16 वर्षीय युवती के रूप में 12 भुजाओं और छह मुखों सहित दर्शाया गया है। देवी लाल साड़ी और गुड़हल (जवा) पुष्पों से अलंकृत हैं तथा विभिन्न आयुध धारण करती हैं।
मंदिर के गर्भगृह में स्थित प्राकृतिक शिला में बनी एक पवित्र आकृति को देवी की योनि का प्रतीक माना जाता है। यहाँ मुख्य रूप से इसी शिला की पूजा की जाती है। इसके नीचे एक प्राकृतिक जलस्रोत निरंतर प्रवाहित होता रहता है। शिला को साड़ी, पुष्प और सिंदूर से सजाया जाता है।
कामाख्या देवी शक्तिपीठ में अंबुवाची मेला सबसे प्रमुख उत्सव माना जाता है। मान्यता है कि आषाढ़ मास में तीन दिनों तक देवी रजस्वला होती हैं, इसलिए इस अवधि में मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। चौथे दिन विशेष पूजा के साथ मंदिर पुनः खोला जाता है और देवी को अर्पित सिंदूर एवं वस्त्र प्रसाद के रूप में वितरित किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ नवरात्रि तथा देवध्वनि (देबद्धनी) उत्सव भी अत्यंत श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाए जाते हैं।
साधक के लिए शक्तिपीठ की यात्रा केवल एक सामान्य यात्रा नहीं होती। यह उस गहन इच्छा का प्रतीक है, जिसमें वह हर क्षण देवी माँ के सजीव दर्शन की आकांक्षा रखता है। अमरनाथ की बर्फ से ढकी गुफाओं से लेकर कन्याकुमारी के समुद्री तटों तक, बस्तर की जंगलों वाली पहाड़ियों से लेकर कांचीपुरम के प्राचीन मंदिरों तक — ये केवल पूजनीय स्थल नहीं हैं। ये ऐसे पवित्र स्थान हैं, जहाँ साधक और देवी माँ के बीच की दूरी बहुत कम अनुभव होती है।
लेकिन इन पवित्र स्थलों की सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि देवी माँ केवल मंदिरों में ही नहीं रहतीं। हिमालय के तपस्वी ओम स्वामी जी अक्सर कहते हैं कि हमारा अपना साधना स्थान ही हमारा शक्तिपीठ है। जब हम शांत होकर भीतर की ओर ध्यान लगाते हैं और स्वयं को देवी को समर्पित करते हैं, तब हम स्वयं ही शक्ति के जीवित मंदिर बन जाते हैं। हर सच्ची साधना अपने आप में एक तीर्थयात्रा है।
Frequently Asked Questions
Clearing doubts on your sacred journey
देवी सती के स्तन कहाँ गिरे थे?
भारत के चार प्रमुख आदि शक्तिपीठ कौन-कौन से हैं?
सबसे पहले किस शक्तिपीठ के दर्शन करने चाहिए?
सबसे शक्तिशाली शक्तिपीठ कौन-सा है?
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