महाराष्ट्र के पावन ज्योतिर्लिंग : त्र्यंबकेश्वर, भीमाशंकर और घृष्णेश्वर
क्या आप जानते हैं कि कुंभकरण का एक पुत्र भी था, और उसके अत्याचारों के अंत के लिए ही भगवान शिव को स्वयं ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होना पड़ा? सह्याद्रि पर्वत की गोद में स्थित भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति की कथा अत्यंत रोचक है, जहाँ भगवान शिव ने कुंभकरण के पुत्र का वध कर अपने भक्तों की रक्षा की। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के साथ ही महाराष्ट्र में दो अन्य ज्योतिर्लिंग भी स्थित हैं—घृष्णेश्वर और त्र्यंबकेश्वर।
बारह ज्योतिर्लिंगों की इस यात्रा में हमें इनके आध्यात्मिक महत्व और पौराणिक इतिहास को जानने का अवसर मिल रहा है। तो चलिए, इस यात्रा को आगे बढ़ाते हैं और आज के इस लेख में महाराष्ट्र में स्थित भगवान शिव के इन तीन प्रमुख ज्योतिर्लिंगों के विषय में विस्तृत चर्चा करते हैं।
इस ब्लॉग की प्रमुख बातें
- भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग (महाराष्ट्र)
- त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग : महाराष्ट्र
- घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग (महाराष्ट्र)
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग (महाराष्ट्र)

(भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग, महाराष्ट्र)
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र में पुणे से लगभग 110 किलोमीटर दूर शिराढोन (शिराधन) गाँव में स्थित है। यह गाँव सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला के क्षेत्र में आता है। मंदिर के समीप भीमा नदी प्रवाहित होती है। मान्यता है कि भीमासुर और भगवान शिव के बीच युद्ध के दौरान भगवान शिव के शरीर से पसीने की कुछ बूंदें गिरीं, और उन्हीं से भीमा नदी का उद्गम हुआ।
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण के भाई कुंभकर्ण का सह्याद्रि पर्वत पर कर्कटी नामक राक्षसी से विवाह हुआ। विवाह के पश्चात कुंभकर्ण लंका लौट गया, जबकि कर्कटी राक्षसी पर्वत पर ही निवास करने लगी। उसके गर्भ से भीमा नामक बालक का जन्म हुआ। भीमा ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने का निश्चय किया। उसने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या कर अपार शक्ति का वरदान प्राप्त किया और वह पृथ्वी पर लोगों को परेशान करने लगा।
कामरूपेश्वर नामक एक राजा भगवान शिव के परम भक्त थे। एक दिन भीमा ने उन्हें भगवान शिव की पूजा करते हुए देखा और बंदी बना लिया। कारागार में भी राजा ने शिवलिंग स्थापित कर भगवान शिव की आराधना जारी रखी। जब भीमा ने उस शिवलिंग को तोड़ने का प्रयास किया, तब भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए।
इसके पश्चात भीमा और भगवान शिव के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें अंततः भगवान शिव ने भीमा का वध कर दिया। देवताओं के आग्रह पर भगवान शिव उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग स्वरूप में स्थापित हो गए। भीमा के साथ हुए इस युद्ध के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग का नाम भीमाशंकर पड़ा।
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के पश्चात हमारी यात्रा महाराष्ट्र में स्थित त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की दिव्य महिमा की ओर बढ़ती है, जहाँ भगवान शिव त्रिनेत्रधारी स्वरूप में विराजमान हैं। त्र्यंबक' शब्द का संबंध त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) से भी है।
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग (महाराष्ट्र)

(त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग, महाराष्ट)
महाराष्ट्र के नासिक जिले के त्र्यंबक शहर में, गोदावरी नदी के उद्गम स्थल पर, त्र्यंबकेश्वर मंदिर स्थित है। इसके गर्भगृह में एक त्रिमुखी ज्योतिर्लिंग विराजमान है, जो भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव की त्रिमूर्ति का प्रतीक है।
सह्याद्रिशीर्षे विमले वसन्तं गोदावरितीरपवित्रदेशे ।
यद्दर्शनात् पातकं पाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीडे ॥
(द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम्)
वे (भगवान शिव) पवित्र सह्याद्रि पर्वत की चोटी पर, गोदावरी नदी के तट पर निवास करते हैं। मैं उन भगवान शिव की उपासना करता हूँ, जो त्र्यंबक क्षेत्र में विराजमान हैं और जिनके दर्शन मात्र से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
त्र्यंबकेश्वर मंदिर को त्र्यम्बकेश्वर या त्रम्बकेश्वर नाम से भी जाना जाता है। यह भगवान शिव के नाम त्र्यम्बक से लिया गया है, जिसका अर्थ है "तीन नेत्र वाला।" शक्तिशाली महामृत्युंजय मंत्र को त्र्यम्बक मंत्र के नाम से भी जाना जाता है। यह भगवान शिव के 'त्र्यम्बक' स्वरूप को संबोधित करता है। इस मंत्र की शुरुआत "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे" से होती है, जो भगवान शिव का तीन नेत्रों वाले देवता के स्वरूप में आवाहन करता है। महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
त्र्यंबकेश्वर को पुराणों में उस ज्योतिर्लिंग के रूप में माना जाता है जहाँ गोदावरी अवतरित होती हैं। स्थानीय परंपरा में यह त्रि-संध्या गायत्री जप और भगवान गणेश के जन्मस्थान के रूप में भी महत्वपूर्ण है।त्र्यंबकेश्वर को नाथ और वारकरी परंपराओं में एक प्रमुख तीर्थस्थल माना जाता है। कहा जाता है कि यहाँ गोरखनाथ और निवृत्तिनाथ ने अपने शिष्यों को उपदेश दिया था।
वर्तमान त्र्यंबकेश्वर मंदिर का निर्माण तीसरे पेशवा, बालाजी बाजीराव ने 1740 से 1760 के बीच कराया था। इस मंदिर में चार प्रवेश द्वार हैं, जिनके मुख पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण की ओर हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से ये दिशाएँ जीवन की यात्रा का प्रतीक हैं—उत्तर ज्ञान के लिए, दक्षिण पूर्णता के लिए, पूर्व आरंभ के लिए और पश्चिम परिपक्वता के लिए।
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग का पौराणिक इतिहास

(त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग)
पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि गौतम और उनकी पत्नी अहल्या ब्रह्मगिरी पहाड़ियों में निवास करते थे। उनकी गहन भक्ति के कारण उनका आश्रम हमेशा अन्न से भरा रहता था, यहाँ तक कि अकाल के समय भी। अन्य ऋषियों को गौतम ऋषि से ईर्ष्या हुई और उन्होंने उन्हें गोहत्या के पाप में फंसाने की चाल चली। इस पाप से स्वयं को शुद्ध करने के लिए, गौतम ऋषि ने कठोर तपस्या की।
उनकी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न होकर, भगवान शिव ने उन्हें पवित्र गंगा नदी को मुक्त करने का वरदान दिया, जो बाद में गोदावरी के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस घटना के प्रतीक के रूप में, भगवान शिव ने त्रिमुखी ज्योतिर्लिंग का रूप धारण किया, जो भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान महेश का प्रतीक है।
कुशावर्त कुंड

(कुशावर्त का पवित्र कुण्ड)
त्र्यंबकेश्वर ब्रह्मगिरी, नीलगिरी और कालगिरी पहाड़ियों से घिरा हुआ है। मंदिर के प्रांगण में कुशावर्त कुंड स्थित है। इस पवित्र कुंड को प्रतीकात्मक रूप से गोदावरी नदी के उद्गम स्थल के रूप में माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इसमें स्नान करने से पाप धुल जाते हैं और आत्मा शुद्ध होती है।
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग में जहाँ भगवान शिव त्रिनेत्रधारी स्वरूप में विराजमान हैं, वहीं घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग में उनका करुणामय रूप प्रकट होता है। यहाँ भगवान शिव अपनी परम भक्त घृष्णा की अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी रक्षा के लिए स्वयं ज्योतिर्लिंग स्वरूप में प्रकट हुए।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग (महाराष्ट्र)

(घृष्णेश्वर मंदिर में भगवान शिव का त्रिशूल)
श्री घृष्णेश्वर मंदिर देवस्थान को घुश्मेश्वर या कुसुमेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजी नगर (औरंगाबाद) जिले के वेरुल गाँव में स्थित है। 'घृष्णेश्वर' शब्द का अर्थ है 'करुणा के देवता'। यूनेस्को विश्व धरोहर में सम्मिलित एलोरा की गुफाएँ इस मंदिर से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित हैं।
शिव पुराण और स्कंद पुराण जैसे शास्त्रों में घृष्णेश्वर मंदिर की उत्पत्ति का उल्लेख किया गया है। लगभग 1500 साल पहले इस मंदिर का निर्माण राष्टकूट वंश के राजा कृष्ण राज ने करवाया।इसके बाद इस मंदिर का कई बार पुनर्निर्माण हुआ, विशेष रूप से 16वीं शताब्दी में मालोजी भोंसले द्वारा, जो महान मराठा योद्धा छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा थे। वर्तमान मंदिर परिसर की संरचना इंदौर की मराठा रानी देवी अहिल्याबाई होलकर द्वारा किए गए पुनर्निर्माण एवं संरक्षण प्रयासों का परिणाम है।
मंदिर परिसर में शिवालय तीर्थ नामक एक पवित्र जलाशय है। माना जाता है कि कुंड के जल में चिकित्सीय गुण हैं। एक कथा के अनुसार, राजा एलराजा ने आठ तीर्थों (पवित्र स्थानों) के जल को इस कुंड में लाने के लिए कठोर तपस्या की थी। राजा भोंसले कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। जब उन्होंने इस पवित्र शिवालय कुंड में स्नान किया, तो वे ठीक हो गए। आज भी, महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर भगवान घृष्णेश्वर की पारंपरिक पालकी को इस पवित्र कुंड तक लाया जाता है और यहाँ पवित्र स्नान कराया जाता है।

(शिवालय तीर्थ कुंड)
मंदिर की वास्तुकला

मंदिर में एक सुंदर नक्काशीदार स्तंभ है, जिसमें हाथी और भगवान नंदी की मूर्तियाँ हैं। इस नक्काशी को हरि-हर मिलन (भगवान विष्णु और भगवान शिव के संयुक्त रूप) का प्रतीक माना जाता है।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग का पौराणिक इतिहास
महाशिवरात्रि सहित अन्य विशेष पर्वों के दौरान, मंदिर का वातावरण अत्यंत दिव्य होता है। श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी अनेक कथाएँ प्रचलित हैं, और प्रत्येक का अपना आध्यात्मिक महत्व है। आइए, इन कथाओं के बारे में विस्तार से चर्चा करें।
मंदिर का नाम भगवान शिव की परम भक्त घृष्णा के नाम से लिया गया है। उन्हें ग्रुष्णा या कुसुमा के नाम से भी जाना जाता है। शिव पुराण में उल्लेख है कि घृष्णा प्रतिदिन भगवान शिव की पूजा करती थीं और शिवलिंग को एक कुंड में डुबोकर आराधना किया करती थीं।
उनकी बहन का विवाह ब्राह्मण ब्रह्मवेत्ता सुधर्मा से हुआ था। जब उस दंपत्ति को संतान नहीं हुई, तो घृष्णा की बहन ने घृष्णा का विवाह अपने पति ब्रह्मवेत्ता से करवा दिया ताकि उन्हें पुत्र प्राप्त हो सके। बाद में, उसकी बहन घृष्णा से ईर्ष्या करने लगी और उसके पुत्र की हत्या कर दी। सभी कठिनाइयों के बीच भी घृष्णा ने भगवान शिव की दैनिक आराधना जारी रखी।घृष्णा की भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने उसके पुत्र को पुनः जीवित कर दिया और स्वयं घृष्णेश्वर में ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए।
क्या आप जानते हैं ?

(मंदिर के शिखर पर शिव परिवार की सुंदर मूर्ति)
- घृष्णेश्वर मंदिर एकमात्र ज्योतिर्लिंग मंदिर है, जहाँ शिव परिवार (भगवान शिव, माँ पार्वती, भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय) को नंदी पर एक साथ विराजमान दिखाया गया है। मंदिर के शिखर पर बनी शिव परिवार की यह मूर्ति द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा की पूर्णता का प्रतीक मानी जाती है। यह संकेत देती है कि अब यह दिव्य परिवार पुनः कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान कर रहा है।

(सम्मान के प्रतीक स्वरूप, घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में पुरुष अपनी शर्ट उतारते हैं।)
- श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की प्रचलित परंपरा के अनुसार, गर्भगृह में प्रवेश से पूर्व पुरुषों को अपनी शर्ट उतारनी होती है। शैव आगमों और मंदिर की पद्धतियों (अनुष्ठानों के विधान) में लिंग के समक्ष कमर के ऊपर का भाग बिना ढके हुए रखना 'अनावृत भाव' का प्रतीक माना गया है। इसका अर्थ है कि भगवान शिव और भक्त के मध्य कुछ भी छिपा नहीं रहता। भक्त पूर्ण समर्पण भाव के साथ महादेव की शरण में उपस्थित होता है। वक्षस्थल को ढकना 'उपभोग-वेश' (सांसारिक परिधान) माना जाता है, जिसे गर्भगृह के भीतर अनुपयुक्त समझा जाता है।
भगवान शिव करुणानिधि हैं और अपने भक्तों पर निरंतर अपनी कृपा बरसाते रहते हैं। साधना ऐप पर आयोजित महारुद्र साधना (15 फ़रवरी 2026 से 26 फ़रवरी 2026) में भाग लीजिए और महादेव का दिव्य संरक्षण प्राप्त करें। अधिक जानकारी के लिए साधना ऐप डाउनलोड कीजिए।
इस श्रृंखला के माध्यम से हमने मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में स्थित प्रमुख ज्योतिर्लिंगों के विषय में जाना। यह पावन यात्रा अभी पूर्ण नहीं हुई है। हमारे अगले ब्लॉग में हम देश के अन्य राज्यों में स्थित ज्योतिर्लिंगों की ओर आगे बढ़ेंगे और उनसे जुड़ी कथाओं, मान्यताओं तथा आध्यात्मिक महत्व को समझने का प्रयास करेंगे। आध्यात्म से जुड़ी ऐसी ही और जानकारियों के लिए हमारे ब्लॉग पढ़ते रहिए।
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