पश्चिम बंगाल में स्थित प्रमुख शक्तिपीठ कौन-कौन से हैं?

पश्चिम बंगाल में स्थित प्रमुख शक्तिपीठ कौन-कौन से हैं?

भारतवर्ष के अलग-अलग कोनों में भिन्न-भिन्न शक्तिपीठ स्थित हैं। ये पावन स्थल भारतभूमि को बहुमूल्य रत्नों की भाँति आध्यात्मिक प्रकाश से आलोकित करते हैं। किंतु इस विशाल भू-भाग के विभिन्न हिस्सों में पश्चिम बंगाल को एक अद्भुत गौरव प्राप्त है। यहाँ की पावन धरा पर शक्तिपीठों की दिव्य ज्योति का प्रकाश सर्वाधिक रूप से फैला हुआ है। पश्चिम बंगाल भारत का वह भाग्यशाली राज्य है, जहाँ सर्वाधिक शक्तिपीठ स्थित हैं, जिनमें से लगभग आधे केवल बीरभूम जिले में ही विद्यमान हैं।

पश्चिम बंगाल की यह देवभूमि, श्री रामकृष्ण परमहंस, रामप्रसाद सेन, कमलाकांत, कृष्णानंद आगमवागीश और बामाखेपा जैसे महान शाक्त संतों की जन्मभूमि रही है। इन संतों ने मानवता के बीच दिव्य साधना का मार्ग प्रशस्त किया और शाक्त परंपराओं के ज्ञान को भविष्य की पीढ़ियों तक पहुँचाकर उसे जीवंत बनाए रखा।

इस ब्लॉग में हम पश्चिम बंगाल के पावन शक्तिपीठ की आध्यात्मिक यात्रा करेंगे—उत्तर में भागीरथी नदी के तटों से लेकर बीरभूम की किंशुक-वर्णी (पलाश की लालिमा) मिट्टी तक, शक्तिशाली हुगली नदी के घाटों को पार करते हुए, महानगर कोलकाता के हृदयस्थल तक।

प्रमुख बातें:

  1. कालीघाट शक्तिपीठ, कलकत्ता (पश्चिम बंगाल)
  2. युगाद्या (जोगाद्या) शक्तिपीठ, क्षीरग्राम (पश्चिम बंगाल)
  3. बहुला शक्तिपीठ, केतुग्राम, कटवा (पश्चिम बंगाल)
  4. त्रिस्त्रोता शक्तिपीठ, शालबाड़ी गाँव, फालाकाटा, जलपाईगुड़ी ज़िला, पश्चिम बंगाल
  5. नलहाटी शक्तिपीठ, नलहाटी, बीरभूम ज़िला, पश्चिम बंगाल
  6. फुल्लारा (फुलारा) देवी शक्तिपीठ, अट्टहास (पश्चिम बंगाल)
  7. रत्नावली शक्तिपीठ, हुगली (पश्चिम बंगाल)
  8. महिषमर्दिनी शक्तिपीठ, बीरभूम (पश्चिम बंगाल)
  9. नंदीकेश्वरी (नंदिकेश्वरी) शक्तिपीठ, बीरभूम (पश्चिम बंगाल)
  10. किरीटेश्वरी देवी शक्तिपीठ, मुर्शिदाबाद (पश्चिम बंगाल)
  11. बरगभीमा (बर्गभीमा) देवी शक्तिपीठ, पूर्वी मिदनापुर (पश्चिम बंगाल)


कालीघाट शक्तिपीठ, कलकत्ता (पश्चिम बंगाल)

(कालीघाट मंदिर का रात्रि दृश्य)

कलकत्ता के दक्षिणी भाग में, एक ओर आदि गंगा और दूसरी ओर शहर के सबसे बड़े श्मशान घाट के बीच, प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर स्थित है। दस महाविद्याओं में प्रथम मानी जाने वाली माता काली के नाम पर इस मंदिर का नाम पड़ा है। यहाँ माता सती के दाहिने पैर की उंगलियाँ गिरी थीं। इसी कारण इसे शक्तिपीठों में आदि पीठ माना जाता है।

इस मंदिर में अधिष्ठात्री देवी को औपचारिक रूप से 'जय दुर्गा' या 'विजयी दुर्गा' के रूप में जाना जाता है, तथापि उनकी व्यापक उपासना तांत्रिक स्वरूप 'दक्षिणा काली' के रूप में की जाती है। उनका वर्ण काला है, वे दिगंबरी स्वरूप में हैं और श्मशान भूमि में निवास करती हैं। इसी कारण उन्हें 'श्मशान काली' के रूप में भी पूजा जाता है।

यहाँ देवी माँ स्वयं प्रकट पिंडी (पत्थर स्वरूप) के रूप में विराजमान हैं। उनके तीन प्रज्वलित नेत्र (त्रिनेत्र) हैं, उनकी जिह्वा बाहर निकली हुई है, और वे एक हाथ में हंसिया तथा दूसरे हाथ में कटा हुआ मानव मस्तक धारण करती हैं।

यहाँ की एक रोचक परंपरा यह है कि वार्षिक स्नान यात्रा के दौरान, जब माता की उत्सव मूर्ति को बाहर लाया जाता है, तब पुजारी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लेते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि जब वे माता का स्नान कराएँ, तो उनकी दिव्य तेजस्विता के कारण उनकी नेत्र-ज्योति प्रभावित न हो जाए।

युगाद्या (जोगाद्या) शक्तिपीठ, क्षीरग्राम (पश्चिम बंगाल)

पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले में कटवा के निकट स्थित क्षीरग्राम गाँव में माता युगाद्या को समर्पित एक मंदिर स्थित है। युगाद्या अर्थात् वह जो एक नए युग को जन्म देती हैं। देवी युगाद्या चारों युगों (सत, त्रेता, द्वापर और कलि) के आरंभ का प्रतीक मानी जाती हैं। युगाद्या शक्तिपीठ का उल्लेख कूजबिका तंत्र, चण्डीमंगल और तंत्रचूडामणि जैसे ग्रंथों में मिलता है। किंतु इस विषय पर मतभेद है कि यहाँ देवी का कौन-सा अंग गिरा था।

जहाँ 'चंडीमंगल' में इसे देवी की पीठ बताया गया है, वहीं 'तंत्रचूडामणि' के पीठनिर्णय खंड में इसे "दक्षिण-पाद-अंगुष्ठ", अर्थात दाहिने पैर का अंगूठा माना गया है। इसी ग्रंथ में "क्षीरखंड" को इस क्षेत्र का भैरव भी बताया गया है।

(देवी जोगाद्या)

मंदिर में स्थित माता की प्रतिमा, जो दस भुजाओं वाले रूप में काले पत्थर से अत्यंत सुंदर रूप से निर्मित है, मंदिर के निकट स्थित क्षीरदिघी तालाब में जलमग्न रखी जाती है। उनकी मूर्ति को वर्ष में केवल दो बार ही जल से बाहर निकालकर दर्शन हेतु लाया जाता है।

 

बहुला शक्तिपीठ, केतुग्राम, कटवा (पश्चिम बंगाल)

(माँ बहुला)

पश्चिम बंगाल के पूर्व बर्द्धमान जिले के केतुग्राम गाँव में, अजय नदी के किनारे स्थित एक मंदिर से मंदिर की घंटियों की मधुर ध्वनि और देवी माँ की स्तुति में उच्चारित मंत्र सुनाई देते हैं। इस मंदिर में माता बहुला अपने अत्यंत मातृस्वरूप में विराजमान हैं, साथ ही उनके दो पुत्र कार्तिकेय और गणेश भी उनके साथ हैं। पीठनिर्णय और शिवचरित के अनुसार यह वह शक्तिपीठ है जहाँ रुद्र तांडव के समय माता सती का बाहु (हाथ) गिरा था। पीठनिर्णय इस पीठ का वर्णन इस प्रकार करता है:

बहुलायां वामबाहुर्बहुलाख्या च देवता ।
भीरुको भैरवस्तत्र सर्वसिद्धिप्रदायकः ॥

अर्थ - देवी माँ की बायीं भुजा बहुला में गिरी थी। वहाँ वे बहुला देवी के रूप में विराजमान हैं, और उनके साथ उनके भैरव भिरुक भी हैं, जो सिद्धि प्रदान करने वाले माने जाते हैं।

त्रिस्त्रोता शक्तिपीठ, शालबाड़ी गाँव, फालाकाटा, जलपाईगुड़ी ज़िला, पश्चिम बंगाल

त्रिस्त्रोता शक्तिपीठ, जिसे भ्रामरी देवी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी ज़िले में तीस्ता नदी के तट पर स्थित है। "त्रिस्त्रोता" का अर्थ है "तीन धाराएँ"। यह नाम समीप बहने वाली तीस्ता नदी को समर्पित है। प्राचीन समय में यह नदी तीन अलग-अलग धाराओं में विभाजित होकर बहती थी। इसी कारण इस शक्तिपीठ का नाम त्रिस्त्रोता पड़ा।

(देवी भ्रामरी, त्रिस्त्रोता शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल)

यह वह स्थान है जहाँ देवी सती का बायाँ पैर (या बाएँ पैर का अँगूठा) गिरा था। पौराणिक कथा के अनुसार, जब अरुणासुर नामक असुर ने देवताओं को अत्यधिक कष्ट दिए, तब उनकी पत्नियों ने देवी माँ की शरण ली। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवी ने भ्रामरी (मधुमक्खियों की देवी) का रूप धारण किया और असंख्य मधुमक्खियों के झुंड उत्पन्न कर अरुणासुर का संहार कर दिया। इसी उग्र किंतु करुणामयी एवं रक्षक स्वरूप वाली देवी भ्रामरी इस शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री शक्ति हैं।

इस शक्तिपीठ के भैरव ईश्वर अथवा भैरवेश्वर के रूप में पूजित हैं।

यहाँ नवरात्रि के दौरान विशेष पूजाएँ होती हैं। इसके अतिरिक्त चैत्र (मार्च–अप्रैल) माह में मनाया जाने वाला कुंभम उत्सव भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह इस क्षेत्र का एक प्रमुख स्थानीय पर्व है।

ऐसी मान्यता है कि देवी भ्रामरी अपने भक्तों की रोगों तथा नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करती हैं। कुछ परंपराओं में उन्हें ऐसी दिव्य शक्ति माना गया है, जो अपने भक्तों की किसी सुरक्षा-कवच या अमोघ प्रतिरोधक की भाँति हर प्रकार के संकट से रक्षा करती हैं।

नलहाटी शक्तिपीठ, नलहाटी, बीरभूम ज़िला, पश्चिम बंगाल

 (नलहटी शक्तिपीठ)

नलहाटी शक्तिपीठ, जिसे नलाटेश्वरी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले के नलहाटी नगर में स्थित एक अत्यंत पवित्र तीर्थस्थल है। पीठनिर्णय तंत्र के अनुसार, यही वह स्थान है जहाँ देवी सती का नला (स्वर-नली, स्वरतंत्री ) गिरा था। इसी कारण इस शक्तिपीठ का नाम नलहाटी पड़ा।

गर्भगृह में एक ऊँचा स्थान है, जहाँ 'त्रिनयन' और सुनहरे-लाल रंग की जीभ का चिह्न बना है। इसके ठीक नीचे सती का 'नाला' अथवा गले का पवित्र प्रतीक प्रतिष्ठित है। 

मुख्य देवी की प्रतिमा के ठीक नीचे गले के आकार की एक प्राकृतिक, संकरी शिला-गुहा स्थित है। प्रतिदिन की पूजा के दौरान इस शिला-गुहा में चाहे जितना भी गंगाजल या दूध अर्पित किया जाए, यह न कभी भरती है और न ही इसमें जल दिखाई देता है। अर्पित किया गया समस्त जल एक अज्ञात भूमिगत मार्ग में समा जाता है। यह रहस्य आज भी वैज्ञानिकों और श्रद्धालुओं, दोनों के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ है।

यहाँ की अधिष्ठात्री शक्ति माँ नलाटेश्वरी के रूप में पूजित हैं, जिन्हें माँ काली अथवा ललिता का सौम्य एवं रक्षक स्वरूप माना जाता है। इस शक्तिपीठ के भैरव योगेश भैरव के रूप में पूजित हैं।

मान्यता है कि 15वीं शताब्दी में कामदेव ब्रह्मचारी नामक एक महान तपस्वी आसपास के घने जंगलों में तपस्या कर रहे थे। ध्यानावस्था में उन्हें गले के आकार वाले पत्थर के दर्शन हुए और उन्होंने देवी की छिपी हुई मूर्ति को ज़मीन से बाहर निकाला और इस स्थल की विधिवत स्थापना की।

मंदिर के भीतर एक अत्यंत गुप्त तांत्रिक साधना स्थल स्थित है, जिसे पंच-मुण्ड आसन के नाम से जाना जाता है। यह स्थान सामान्य श्रद्धालुओं के लिए प्रतिबंधित है और केवल सिद्ध तांत्रिक साधकों द्वारा अमावस्या की रात्रि में विशेष तांत्रिक साधनाओं के लिए उपयोग किया जाता है।

फुल्लारा (फुलारा) देवी शक्तिपीठ, अट्टहास (पश्चिम बंगाल)

यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्र के गहन वनों के बीच शांत रूप से स्थित है। पीठनिर्णय के अनुसार इसे वह पवित्र स्थान माना जाता है, जहाँ देवी सती का ओष्ठ (होंठ) गिरा था। यह मंदिर देवी फुल्लरा को समर्पित है। अपने नाम के अनुरूप, फूलों से सुसज्जित इस स्वरूप में देवी माँ को सदा प्रस्फुटित और युवा ऊर्जा स्वरूप माना जाता है। वे अपनी कृपा और जीवनशक्ति, दोनों में ही अत्यंत उदार और समृद्ध हैं।

(फुल्लारा शक्तिपीठ)

इस क्षेत्र के भैरव विश्वेश (विश्व के स्वामी) इस स्थान की रक्षा करते हैं, जहाँ उनकी शक्ति का स्वरूप एक 15–18 फुट चौड़े पूजनीय पत्थर के रूप में विद्यमान है, जिसे पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी के ओष्ठ (होंठ) के समान माना जाता है। इस मंदिर से जुड़ी कथाएँ इसे त्रेता युग से जोड़ती हैं। कृतिवास रामायण के अनुसार, लंका के राजा रावण के साथ युद्ध से पूर्व भगवान राम माँ चण्डिका का आवाहन करने में सफल नहीं हो सके थे। तब विभीषण के सुझाव पर भगवान राम ने देवी को 108 नीले कमल अर्पित करने का संकल्प लिया।

ये नीले कमल केवल फुल्लारा मंदिर के निकट स्थित देबीदह कुंड में पाए जाते थे, इसलिए भगवान हनुमान उन्हें एकत्र करने के लिए वहाँ गए। परंतु जब उन्होंने भगवान राम को पुष्प अर्पित किए, तो एक कमल कम निकला। यह देखकर भगवान राम ने निश्चय किया कि वे उस एक कमल के स्थान पर अपनी आँख अर्पित करेंगे, क्योंकि उनकी आँख भी कमल के समान ही है।

माँ भगवती उनकी भक्ति से प्रसन्न हुईं और उन्होंने भगवान राम को ऐसा करने से रोक दिया तथा उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया। आज भी अट्टहास वह पवित्र स्थल माना जाता है जहाँ उनकी कृपा सभी सच्चे भक्तों को अनुभव होती है।

रत्नावली शक्तिपीठ, हुगली (पश्चिम बंगाल)

पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में रत्नाकर नदी के तट पर रत्नावली शक्तिपीठ स्थित है। इस स्थान को 'आनंदमयी शक्तिपीठ' के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है—आनंद से परिपूर्ण देवी का आसन। यहाँ माता सती का दक्षिण स्कंध (दाहिना कंधा) धरती पर गिरा था।

(रत्नावली शक्तिपीठ)

यहाँ माता की पूजा कुमारी के रूप में की जाती है, जो माँ आद्यशक्ति का शुद्ध और युवा स्वरूप माना जाता है। यद्यपि सामान्य बोलचाल में, जिस लिंग में वे विराजमान हैं, उसे भी घंटेश्वर, अर्थात “घंटियों के स्वामी,” के नाम से जाना जाता है।

यहाँ के भैरव को देवी माँ के समान ही महत्व दिया जाता है और उनका मंदिर देवी के गर्भगृह से केवल कुछ ही कदमों की दूरी पर स्थित है। भक्तजन भगवान के समक्ष एकत्र होकर उन्हें बेलपत्र और श्रीफल (नारियल) अर्पित करते हैं तथा विभिन्न रोगों से मुक्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

महिषमर्दिनी शक्तिपीठ, बीरभूम (पश्चिम बंगाल)

ऐसी भूमि में, जहाँ तपस्वियों के तेज की भाँति पृथ्वी से गर्म जल के झरने फूटते हैं, पापों का नाश करने वाली पापहरा नदी के तट पर बक्रेश्वर (वक्रेश्वर) मंदिर स्थित है, जो भगवान शिव के वक्रेश्वर (वक्र-ईश्वर, अर्थात् टेढ़े स्वरूप वाले भगवान) रूप को समर्पित है। इसी मंदिर परिसर में महिषमर्दिनी शक्तिपीठ स्थित है।

यहाँ देवी सती का भ्रूमध्य (दोनों भौहों के मध्य स्थित भाग, जो आज्ञा चक्र के समकक्ष है) गिरा था।

(महिषमर्दिनी शक्तिपीठ)

देवी माँ अपने महिषासुरमर्दिनी स्वरूप में, अर्थात् महिषासुर का वध करने वाली देवी के रूप में, अष्टधातु (आठ धातुओं की मिश्रधातु—सोना, चाँदी, ताँबा, जस्ता, टिन, लोहा और सीसा आदि) से निर्मित अत्यंत सुंदर प्रतिमा में विराजमान हैं। गर्भगृह में देवी की दस भुजाओं वाली दिव्य प्रतिमा स्थित है, जिसके दोनों ओर भगवान शिव और विष्णु की प्रतिमाएँ हैं।

इस मंदिर की एक विशिष्ट परंपरा के अनुसार, देवी की दस भुजाओं में से केवल एक भुजा में वह भाला है, जिससे महिषासुर का संहार किया गया, जबकि शेष नौ भुजाएँ रिक्त रहती हैं। इससे भक्तजन अपने दर्शन के समय देवी को लघु अस्त्र अर्पित कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

नंदीकेश्वरी (नंदिकेश्वरी) शक्तिपीठ, बीरभूम (पश्चिम बंगाल)

मयूराक्षी नदी के तट पर स्थित शांत नंदीपुर गाँव में नंदीकेश्वरी शक्तिपीठ स्थित है। यहाँ माता सती का हार धरती पर गिरा था। इस शक्तिपीठ में देवी माँ की पूजा नंदिनी के रूप में की जाती है। 'नंदिनी' अर्थात् आनंद प्रदान करने वाली देवी। उन्हें यहाँ नंदीकेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है, अर्थात् वह देवी जिनकी पूजा भगवान शिव के वाहन नंदी द्वारा की जाती है।

उनके साथ उनके भैरव, भगवान नंदीकेश्वर, भी विराजमान हैं, जिनका मंदिर इसी परिसर में एक अलग स्थान पर स्थित है। यहाँ देवी और भैरव, दोनों के नामों में यह समानता देखने को मिलती है और दोनों को नंदी द्वारा पूजित माना गया है। यह समानता शिव और शक्ति की मूलभूत एकता की ओर संकेत करती है।

(माँ नंदीकेश्वरी)

दोचाला शैली के इस मंदिर के गर्भगृह में देवी माँ स्वयंसिद्ध स्वरूप में विराजमान हैं। वे एक काले शिला-रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिन पर त्रिनेत्री रूप में तीन स्वर्णिम नेत्र अंकित हैं। उनके मस्तक पर चाँदी का मुकुट सुशोभित है और वे असंख्य भक्तों द्वारा अर्पित सिंदूर से पूर्णतः रक्तवर्णी रूप धारण किए हुए हैं।

मंदिर के बाह्य भाग की दीवारें दस महाविद्याओं की कलात्मक मूर्तियों से अलंकृत हैं, जिनमें माता काली, तारा, त्रिपुरा सुंदरी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमलात्मिका शामिल हैं। जो भक्त मुख्य गर्भगृह की परिक्रमा करता है, वह वास्तव में देवी के इन दस दिव्य रूपों की भी परिक्रमा करता है।

किरीटेश्वरी देवी शक्तिपीठ, मुर्शिदाबाद (पश्चिम बंगाल)

(किरीटेश्वरी देवी शक्तिपीठ)

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में किरीटकोना नामक गाँव के एक कोने में यह प्राचीनतम मंदिर स्थित है, जिसके पास से भागीरथी नदी शांत रूप से प्रवाहित होती है। यह वही स्थल है, जिसे 'पीठनिर्णय' में किरीट कहा गया है, यहाँ की अधिष्ठात्री देवी विमला हैं और भैरव के रूप में भगवान संवर्त विराजमान हैं।

यह प्राचीन मंदिर शक्तिपीठों की सूची में उल्लिखित कुछ अन्य स्थलों के साथ उप-पीठ (उपशक्तिपीठ) माना जाता है, क्योंकि यहाँ देवी सती का कोई शारीरिक अंग धरती पर नहीं गिरा था। यहाँ उनका मुकुट (किरीट) गिरा था, जिसके कारण अधिष्ठात्री देवी को किरीटेश्वरी और मुकुटेश्वरी जैसे नामों से जाना जाता है।

पीठनिर्णय के अनुसार यहाँ की अधिष्ठात्री देवी विमला का स्वरूप पुरी में विराजमान देवी के समान ही माना जाता है। तथापि, लोक-प्रचलन में 'किरीटेश्वरी' नाम अधिक लोकप्रिय और व्यापक रूप से स्वीकृत हो गया है।

कंकालीतला और फुल्लरा शक्तिपीठों की तरह यहाँ भी माता की पूजा पिंडी स्वरूप में की जाती है। यह मंदिर एक हजार वर्ष से अधिक पुराना माना जाता है, जिसका उल्लेख भविष्य (भविष्य) पुराण में मिलता है। चूँकि देवी मुर्शिदाबाद के शासक वंश की कुलदेवी हैं, इसलिए कहा जाता है कि राजा दर्पणनारायण ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था।

बरगभीमा (बर्गभीमा) देवी शक्तिपीठ, पूर्वी मिदनापुर (पश्चिम बंगाल)

गंगा नदी की सहायक रूपनारायण नदी के तट पर, पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर (पुरब मिदनापुर) जिले के तमलुक—जिसे स्थानीय रूप से ताम्रलिप्त भी कहा जाता है—में पवित्र बरगभीमा मंदिर, प्रसिद्ध विभाष शक्तिपीठ में स्थित है।

मान्यता है कि यहाँ देवी सती के चरण (टखने) गिरे थे, जिससे तमलुक देवी माँ की दिव्य शक्ति का एक जीवंत केंद्र बन गया।

यहाँ देवी की पूजा बरगभीमा, भीमरूपा और भीमकाली के रूप में की जाती है, जो सभी स्वरूप देवी काली या कपालिनी से गहराई से जुड़े हुए हैं। यहाँ की मुख्य प्रतिमा देवी काली के उस प्रसिद्ध योद्धा रूप की है, जिसमें वे त्रिशूल और खड़्ग (तलवार) धारण किए हुए हैं तथा उनके हाथ में एक कटा हुआ सिर भी है। यह रूप देवी के उस उग्र और अजेय स्वरूप को दर्शाता है, जो अंधकार और दुष्ट शक्तियों के विरुद्ध युद्ध करती हुई दिव्य माँ की शक्ति का प्रतीक है।

(देवी बरगभीमा)

यहाँ के अधिष्ठाता भैरव सर्वानंद हैं, जिनका अर्थ है—"जो अनंत आनंद प्रदान करते हैं।" उन्हें मंदिर में देवी के साथ स्थापित एक शिवलिंग के रूप में दर्शाया गया है।

यह मंदिर मयूर-ध्वज वंश द्वारा बनवाया गया था, जिनकी कुलदेवी देवी बरगभीमा थीं। इस शक्तिपीठ की एक अनोखी विशेषता यह है कि यहाँ काली को चोरों की संरक्षक देवी के रूप में भी माना जाता है, जो इस बात का प्रतीक है कि वे सभी सामाजिक सीमाओं से परे हैं। उनकी शक्ति इतनी उग्र और अनियंत्रित है कि स्वयं भगवान शिव को भी ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ता है।

यहाँ की पूजा-पद्धति पूर्वी भारत की समृद्ध तांत्रिक और शाक्त परंपराओं को दर्शाती है, जहाँ काली को एक साथ उग्र और असीम करुणामयी स्वरूप में समझा जाता है।

संदर्भ:

  • Pande, A. (2020). Shakti: 51 Sacred Peethas of the Goddess. Rupa Publications India.
  • Sircar, D. C. (1973). The Śākta Pīṭhas (2nd ed.). Motilal Banarsidass.
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