शक्तिपीठ: माँ आद्यशक्ति के शाश्वत धाम
देवी सती का एक स्वरूप माँ छिन्नमस्तिका है, जो अत्यंत उग्र और विकराल माना जाता है। अपने इस स्वरूप में उन्होंने अपना मस्तक अपने एक हाथ में धारण किया हुआ है। अब यह प्रश्न उठता है कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया? प्रथम दृष्टि में उनका स्वरूप अत्यंत उग्र और भयानक प्रतीत होता है, लेकिन वास्तव में यह जीवनदायिनी और कल्याणकारी है। माँ अपने बच्चों के पोषण और कल्याण के लिए कुछ भी करने को तत्पर रहती हैं, और ऐसा ही देवी माँ ने अपने छिन्नमस्तिका स्वरूप में किया।
छिन्नमस्तिका शक्तिपीठ, जिसे चिंतपूर्णी शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है, हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले के चिंतपूर्णी नगर में सोलह सिंघी पर्वतमाला पर स्थित है।
छिन्नमस्तिका देवी की उत्पत्ति से जुड़ी कथा अत्यंत रोचक और रहस्यमय है। मार्कण्डेय पुराण और शिव पुराण के अनुसार, जब देवी ने चण्डी का रूप धारण कर राक्षसों का संहार किया, तो चारों ओर जयघोष गूँज उठा। परन्तु उनकी सहायक योगिनियाँ, जया और विजया, अपनी रक्त पिपासा शांत नहीं कर पाईं। इसे शान्त करने के लिए माँ ने स्वयं अपना मस्तक काटकर उनकी प्यास बुझाई। यही कारण है कि माता को 'छिन्नमस्तिका' कहा जाने लगा। तंत्र शास्त्र में छिन्नमस्तिका देवी को प्रचण्ड चण्डिका और चिन्तपूर्णी माता भी कहा जाता है।
असम के माँ कामख्या मंदिर के बाद, यह शक्तिपीठ दूसरे सबसे बड़े शक्तिपीठ के रूप में विख्यात है। इस ब्लॉग में हम इस शक्तिपीठ से जुड़ी अन्य पौराणिक कथाओं का विवरण देंगे तथा उत्तर भारत एवं मध्य भारत में स्थित अन्य प्रमुख शक्तिपीठों के पौराणिक एवं आध्यात्मिक महत्व के बारे में भी विस्तार से जानेंगे।
प्रमुख बातें:
- ब्रजेश्वरी देवी शक्तिपीठ, कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)
- छिन्नमस्तिका देवी शक्तिपीठ, चिंतपूर्णी, ऊना (हिमाचल प्रदेश)
- महामाया शक्तिपीठ, अमरनाथ (जम्मू-कश्मीर)
- अवंती शक्तिपीठ, भैरव पर्वत, उज्जैन (मध्य प्रदेश)
- मंगल चंडिका शक्तिपीठ, उज्जैन (मध्य प्रदेश)
- शारदा देवी शक्तिपीठ, मैहर (मध्य प्रदेश)
- कालमाधव देवी शक्तिपीठ, अमरकंटक (मध्य प्रदेश)
- नर्मदा शक्तिपीठ, अमरकंटक (मध्य प्रदेश)
- देवी दंतेश्वरी शक्तिपीठ, बस्तर (छत्तीसगढ़)
1. ब्रजेश्वरी देवी शक्तिपीठ, कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)

(पिंडी स्वरूप में माँ ब्रजेश्वरी)
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में, शिवालिक और धौलाधार पर्वत श्रेणियों के मध्य स्थित ब्रजेश्वरी (बजेश्वरी) देवी शक्तिपीठ को एक अत्यंत शक्तिशाली सिद्धपीठ माना जाता है। यहाँ माता सती के शरीर का ऊपरी भाग (बायां स्तन) गिरा था। इसी कारण मंदिर में देवी की पूजा पिंडी स्वरूप में की जाती है। यहाँ देवी की पूजा माँ त्रिपुर सुंदरी (सौम्य) और माँ त्रिपुर भैरवी (उग्र) दोनों रूपों में की जाती है। मंदिर परिसर में माँ काली, माँ तारा, माँ अन्नपूर्णा, माँ सरस्वती आदि देवी के विभिन्न रूप भी विराजमान हैं, जो देवी माँ के बहुआयामी स्वरूप को दर्शाते हैं। प्रसिद्ध ब्रजेश्वरी देवी शक्तिपीठ के भैरव 'बाबा लाल भैरव' (भैरवनाथ) माने जाते हैं।
महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार, देवी माँ ने पांडवों को स्वप्न में दर्शन देकर नागरकोट (वर्तमान कांगड़ा) में अपना मंदिर स्थापित करने का निर्देश दिया था। उसी के पश्चात पांडवों ने इस मंदिर का निर्माण कराया।
यहाँ मकर संक्रांति का पर्व अत्यंत विशेष होता है। इस अवसर पर देवी की पिंडी को विधिवत मक्खन से ढका जाता है। मान्यता है कि महिषासुर का वध करने के बाद देवी माँ ने अपने घावों का उपचार मक्खन लगा कर किया था।
2. छिन्नमस्तिका देवी शक्तिपीठ, चिंतपूर्णी, ऊना (हिमाचल प्रदेश)

(छिन्नमस्तिका देवी शक्तिपीठ)
चिंतपूर्णी शक्तिपीठ हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले के चिंतपूर्णी नगर में, सोलह सिंघी पर्वतमाला पर स्थित है। यहाँ की अधिष्ठात्री देवी को चिंतपूर्णी माता के नाम से जाना जाता है। "चिंतपूर्णी" नाम संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ है सांसारिक चिंताओं का निवारण करने वाली। यहाँ देवी सती के चरण का एक भाग गिरा था।
यहाँ माँ को छिन्नमस्ता देवी तथा छिन्नमस्तिका देवी के रूप में भी पूजा जाता है। इस शक्तिपीठ पर देवी माँ की पूजा पिंडी स्वरूप में की जाती है। यहाँ के भैरव रुद्र महादेव हैं।
इस स्वरूप से संबंधित दो अत्यंत गूढ़ कथाएँ प्रचलित हैं। पहली कथा उनकी सहायक योगिनियों जया-विजया से जुड़ी है, जिसके बारे में हमने ब्लॉग के प्रारंभ में बताया है। दूसरी कथा में वर्णित है कि एक भीषण युद्ध के पश्चात देवी माँ ने यह स्वरूप युद्ध की विनाशकारी ऊर्जा को शांत करने के लिए धारण किया था। देवी सती का यह स्वरूप परिवर्तन और आध्यात्मिक जागरण का सूचक है।
प्रचंड चंडिका के नाम से भी पहचानी जाने वाली यह देवी शाक्त परंपरा की दस महाविद्याओं में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। वे जीवन और मृत्यु, सृष्टि और संहार, तथा बलिदान और पोषण—इन सभी विरोधाभासी तत्वों का अद्वितीय समन्वय हैं।
3. महामाया शक्तिपीठ, अमरनाथ (जम्मू-कश्मीर)

(महामाया शक्तिपीठ, अमरनाथ, जम्मू-कश्मीर)
जम्मू और कश्मीर की हिमाच्छादित पहाड़ियों में स्थित अमरनाथ गुफा में महामाया शक्तिपीठ स्थित है। यह पवित्र स्थल लगभग 12,700 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का कंठ (गला) गिरा था। यहाँ देवी माँ की पूजा महामाया के रूप में की जाती है। महामाया अर्थात् वह मायाशक्ति जो प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रजस और तमस) से परे है।
यहाँ के भैरव त्रिसंध्येश्वर के रूप में पूजित हैं, जिन्हें दिन के तीन संधिकालों (प्रातः, मध्यान्ह और संध्या) का स्वामी माना जाता है। श्रावण मास में होने वाली पवित्र अमरनाथ यात्रा के दौरान हर वर्ष हजारों श्रद्धालु बाबा अमरनाथ के साथ-साथ देवी सती के इस शक्तिपीठ के भी दर्शन करते हैं।
4. अवंती शक्तिपीठ, भैरव पर्वत, उज्जैन (मध्य प्रदेश)

(अवंती शक्तिपीठ, भैरव पर्वत, उज्जैन)
उज्जैन को प्राचीन काल में उज्जयिनी के नाम से जाना जाता था। यह अवंती राज्य की राजधानी रहा है और इसे हिंदू परंपरा की सप्तपुरियों (सात पवित्र नगरों) में भी गिना जाता है। इस शक्तिपीठ का उल्लेख आदि शंकराचार्य द्वारा रचित अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र में वर्णित 18 शक्तिपीठों में भी मिलता है। उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर स्थित भैरव पर्वत के शिखर पर अवंती शक्तिपीठ स्थित है।
यहाँ देवी माँ की आराधना अवंती माँ, गढ़कालिका अथवा महाकाली के रूप में की जाती है। कथा के अनुसार, यह वही पवित्र स्थान है जहाँ राजा दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह के पश्चात देवी सती का ऊपरी होंठ गिरा था। इस पवित्र स्थल की रक्षा लंबकर्ण, अर्थात् लंबे कानों वाले भैरव, करते हैं।
5. मंगल चंडिका शक्तिपीठ, उज्जैन (मध्य प्रदेश)

(मंगल चंडिका शक्तिपीठ, उज्जैन)
रुद्र सागर झील के समीप स्थित मंगल चंडिका शक्तिपीठ को हरसिद्धि माता मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन काल में देवी को मंगल चंडिका के नाम से जाना जाता था। वे सम्राट विक्रमादित्य (56–57 ईसा पूर्व) की कुलदेवी थीं। इस पवित्र स्थान पर देवी सती की कुर्पर (कोहनी) गिरी थी।
मंदिर में स्थापित देवी की प्रतिमा प्रायः गहरे सिंदूरी रंग में दर्शाई जाती है, जो शक्ति और दिव्य संरक्षण का प्रतीक है। इस मंदिर में माँ महालक्ष्मी, माँ महाकाली और माँ महासरस्वती, इन तीनों देवियों की एक साथ पूजा की जाती है। इस पीठ के सहचर भैरव कपिलाम्बर के नाम से जाने जाते हैं, जिसका अर्थ है लाल वस्त्र धारण करने वाले। गर्भगृह में प्रतिष्ठित श्री यंत्र इस मंदिर की गहन तांत्रिक परंपरा को दर्शाता है, जो मंगल चंडिका देवी और माँ त्रिपुर सुंदरी के बीच एक दिव्य संबंध स्थापित करता है।
6. शारदा देवी शक्तिपीठ, मैहर (मध्य प्रदेश)

(शारदा देवी शक्तिपीठ, मैहर)
शारदा देवी शक्तिपीठ मैहर शहर के त्रिकूट पर्वत की चोटी पर स्थित है। यह देवी सती के सरस्वती स्वरूप को समर्पित एक अत्यंत पूजनीय तीर्थ है। मैहर शब्द 'माई' (अर्थात् माँ) और 'हार' (अर्थात् माला) से मिलकर बना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मध्य प्रदेश के सतना जिले में स्थित इस स्थान पर देवी सती के गले का हार गिरा था। इसी कारण इस शहर का नाम मैहर पड़ा।
यहाँ देवी की पूजा शारदा माँ के रूप में की जाती है, जो शक्ति का एक तेजस्वी स्वरूप हैं और ज्ञान तथा विद्या का प्रतीक हैं। उनकी पवित्र प्रतिमा पंचधातु (पाँच धातुओं का मिश्रण) से निर्मित है। उन्हें वीणा और पुस्तक धारण किए हुए दर्शाया गया है, जो कला और ज्ञान के प्रतीक हैं। इस मंदिर के मुख्य भैरव कालभैरव माने जाते हैं, जो भगवान शिव के उग्र और रक्षक स्वरूप हैं।
यह शक्तिपीठ प्रसिद्ध वीर भाइयों आल्हा और ऊदल की कथा से भी जुड़ा है। एक लोकप्रिय कथा के अनुसार, जब युद्ध में ऊदल का वध हो गया, तब आल्हा शोक और क्रोध से व्याकुल हो उठे। कहा जाता है कि उन्होंने देवी शारदा को प्रसन्न करने के लिए अपना सिर अर्पित कर दिया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने दोनों भाइयों को पुनः जीवन प्रदान किया और उन्हें अपना संरक्षण दिया।
7. कालमाधव देवी शक्तिपीठ, अमरकंटक (मध्य प्रदेश)

(कालमाधव देवी शक्तिपीठ, अमरकंटक)
यह शक्तिपीठ मध्य प्रदेश के अमरकंटक में स्थित है, जो विंध्य, मैकाल और सतपुड़ा पर्वतमालाओं के संगम पर नर्मदा नदी के पवित्र उद्गम के निकट स्थित है। अमरकंटक तीन पवित्र नदियों—नर्मदा, सोन और जोहिला—का भी उद्गम स्थल है।
यह वह पावन स्थान है जहाँ देवी सती का नितम्ब (बायाँ कूल्हा) गिरा था। अमरकंटक में प्रचलित एक स्थानीय परंपरा के अनुसार, निकटवर्ती क्षेत्र में दो शक्तिपीठों की पहचान की जाती है, कालमाधव और नर्मदा शक्तिपीठ। यद्यपि कुछ परंपराएँ दोनों को मान्यता देती हैं, परंतु अनेक प्राचीन ग्रंथों में केवल नर्मदा शक्तिपीठ का ही उल्लेख मिलता है, जिसके बारे में आप अगले भाग में पढ़ेंगे। यहाँ देवी की पूजा उनके उग्र और काली स्वरूप में की जाती है। इस पीठ से संबंधित भैरव असितांग (रुरु) के नाम से जाने जाते हैं।
8. नर्मदा शक्तिपीठ, अमरकंटक (मध्य प्रदेश)

(नर्मदा शक्तिपीठ, अमरकंटक)
नर्मदा शक्तिपीठ, कालमाधव देवी शक्तिपीठ के समीप स्थित है। इसे नर्मदा उद्गम मंदिर तथा शोंदेश शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है। इस स्थान पर देवी सती का दाहिना नितंब (दाहिना कूल्हा) नर्मदा नदी के तट के पास गिरा था। दैवी माँ की उपासना शोणा या सोना के रूप में, भैरव भद्रसेन के साथ की जाती है।
नर्मदा नदी की आध्यात्मिक महिमा का वर्णन अनेक पवित्र ग्रंथों में मिलता है। स्कंद पुराण (रेवा खंड) में नर्मदा नदी (जिसे रेवा भी कहा जाता है) को अमरत्व के प्रतीक के रूप में वर्णित किया गया है। शिव पुराण में वर्णन आता है कि स्वयं माँ गंगा नदी अपने संचित पापों के भार से ग्रस्त होकर एक काली गाय का रूप धारण कर नर्मदा के जल में स्नान करने आईं, जिससे वे शुद्ध हो सकें। यह प्रसंग नर्मदा नदी की अत्यंत पावन और शुद्ध करने वाली शक्ति का प्रतीक है।
9. देवी दंतेश्वरी शक्तिपीठ, बस्तर (छत्तीसगढ़)

(देवी दंतेश्वरी शक्तिपीठ, बस्तर)
छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के आदिवासी अंचल में दंतेवाड़ा स्थित देवी दंतेश्वरी का पवित्र मंदिर है, जो लगभग 600 वर्ष पुराना शक्तिपीठ माना जाता है। यहाँ देवी सती का दंत (दाँत) गिरा था, इसी कारण देवी का नाम दंतेश्वरी पड़ा। दंतेश्वरी देवी को पूर्वकालीन काकतीय शासकों की कुलदेवी भी माना जाता है। इस शक्तिपीठ के भैरव कपाल भैरव हैं।
लोककथा के अनुसार, राजा अन्नमदेव (काकतीय वंश के अंतिम शासक, 1324 ईस्वी) ने जब युद्ध के समय देवी माँ से संरक्षण की प्रार्थना की, तब देवी ने स्वप्न में उन्हें दर्शन दिए। उन्होंने राजा से कहा कि वे उनके साथ चलकर उनके द्वारा विजय में प्राप्त भूमि को आशीर्वाद देंगी, लेकिन शर्त यह होगी कि राजा कभी पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे। जब वे शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम के निकट पहुँचे, तब जिज्ञासा के कारण राजा ने पीछे मुड़कर देख लिया। देवी उसी क्षण वहीं रुक गईं और वही स्थान इस शक्तिपीठ के रूप में पवित्र हो गया।
प्रत्येक शक्तिपीठ का विशेष आध्यात्मिक एवं पौराणिक महत्व है। शक्तिपीठ से जुड़े हमारे आगामी ब्लॉग्स में हम देवी सती के विविध रूपों और उनके महत्व के बारे में बात करेंगे। देवी सती की कृपा को अपने जीवन में अनुभव करने के लिए आप साधना ऐप पर आयोजित की जा रही नवदुर्गा साधना (19 मार्च से 28 मार्च, 2026 तक) में शामिल हो सकते हैं। हमारी शुभकामानएं है कि नवरात्रि का यह पावन काल आपकी आध्यात्मिक यात्रा में सकारात्मक परिवर्तन लाएं।
ॐ श्री मात्रे नमः!
संदर्भ:
- Pande, Alka. Shakti: 51 Sacred Peethas of the Goddess. Rupa Publications, 2020.
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