शक्तिपीठ: माँ आद्यशक्ति के शाश्वत धाम
उज्जैन को प्राचीन काल में अवंतिका पुरी के नाम से जाना जाता था। भारत की आध्यात्मिक परंपरा में इस नगरी का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। यह केवल महाकाल की नगरी ही नहीं, बल्कि शक्ति उपासना का भी एक महत्त्वपूर्ण केंद्र रही है।
उज्जैन का अवंती शक्तिपीठ, जिसे आज गढ़कालिका माता मंदिर के रूप में भी जाना जाता है, शक्ति साधना की प्राचीन परंपरा का साक्षी है। माँ गढ़कालिका को तंत्र साधना की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। साथ ही, महाकवि कालिदास की आराध्या होने के कारण भी इस मंदिर का विशेष सांस्कृतिक महत्त्व है।
इसी पावन नगरी में मंगल चंडिका शक्तिपीठ भी स्थित है, जो हरसिद्धि माता मंदिर के नाम से विख्यात है। तांत्रिक परंपरा में इस स्थान को सिद्धपीठ माता के रूप में भी जाना जाता है। स्कंदपुराण के अनुसार, चण्ड और प्रचण्ड नामक दैत्यों का संहार करने के कारण देवी का नाम हरसिद्धि पड़ा।
उज्जैन के ये दोनों शक्ति स्थल मध्य भारत की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के गौरवशाली प्रतीक हैं। किंतु माँ शक्ति की महिमा केवल उज्जैन तक सीमित नहीं है। इस ब्लॉग में हम मध्य भारत और उत्तर भारत में स्थित प्रमुख शक्तिपीठों की पौराणिक कथाओं, धार्मिक महत्त्व, विशेष मान्यताओं तथा उनसे जुड़ी अन्य रोचक और महत्त्वपूर्ण जानकारियों को विस्तार से जानेंगे।
प्रमुख बातें:
- महामाया शक्तिपीठ, अमरनाथ (जम्मू-कश्मीर)
- श्री पर्वत (सुंदरी) शक्तिपीठ, लद्दाख
- अवंती शक्तिपीठ, भैरव पर्वत, उज्जैन (मध्य प्रदेश)
- मंगल चंडिका शक्तिपीठ, उज्जैन (मध्य प्रदेश)
- कालमाधव देवी शक्तिपीठ, अमरकंटक (मध्य प्रदेश)
- नर्मदा शक्तिपीठ, अमरकंटक (मध्य प्रदेश)
महामाया शक्तिपीठ, अमरनाथ (जम्मू-कश्मीर)

(महामाया शक्तिपीठ, अमरनाथ, जम्मू-कश्मीर)
जम्मू और कश्मीर की हिमाच्छादित पहाड़ियों में स्थित अमरनाथ गुफा में महामाया शक्तिपीठ स्थित है। यह पवित्र स्थल लगभग 12,700 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का कंठ (गला) गिरा था। यहाँ देवी माँ की पूजा महामाया के रूप में की जाती है। महामाया अर्थात् वह मायाशक्ति जो प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रजस और तमस) से परे है।
यहाँ के भैरव त्रिसंध्येश्वर के रूप में पूजित हैं, जिन्हें दिन के तीन संधिकालों (प्रातः, मध्यान्ह और संध्या) का स्वामी माना जाता है। श्रावण मास में होने वाली पवित्र अमरनाथ यात्रा के दौरान हर वर्ष हजारों श्रद्धालु बाबा अमरनाथ के साथ-साथ देवी सती के इस शक्तिपीठ के भी दर्शन करते हैं।
श्री पर्वत (सुंदरी) शक्तिपीठ, लद्दाख
(श्री पर्वत (सुंदरी) शक्तिपीठ, लद्दाख)
श्री पर्वत शक्तिपीठ को सुंदरी शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है। अधिकांश पारंपरिक मान्यताएँ इसका संबंध लद्दाख क्षेत्र की एक ऊँची पर्वत-चोटी से मानती हैं।
श्री पर्वत शक्तिपीठ लद्दाख के उच्च हिमालयी एवं रहस्यमय मरुस्थलीय क्षेत्र में स्थित है। प्राकृतिक शांति और एकांत से घिरा यह शक्तिपीठ साधकों को विशेष आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करता है।
यह वही पावन स्थान है जहाँ देवी सती का दाहिना नूपुर (पायल) अथवा उनके दाहिने चरण का तलवा गिरा था। इसी कारण यहाँ की अधिष्ठात्री शक्ति श्री सुंदरी के रूप में पूजित हैं, जो प्रकृति की शाश्वत पवित्रता, सौम्यता और दिव्य सौंदर्य का प्रतीक मानी जाती हैं। इस शक्तिपीठ के भैरव सुंदरानंद हैं। इस नाम का अर्थ है,"परमानंदमय एवं सुंदर स्वरूप वाले।"
मंदिर के गर्भगृह में लगभग 30 इंच ऊँची काले पत्थर की देवी प्रतिमा प्रतिष्ठित है। यद्यपि यहाँ नवरात्रि का पर्व नौ दिनों तक अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है, फिर भी फाल्गुन मास में आने वाली महाशिवरात्रि इस मंदिर का सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण उत्सव माना जाता है।
अवंती शक्तिपीठ, भैरव पर्वत, उज्जैन (मध्य प्रदेश)

(अवंती शक्तिपीठ, भैरव पर्वत, उज्जैन)
उज्जैन को प्राचीन काल में उज्जयिनी के नाम से जाना जाता था। यह अवंती राज्य की राजधानी रहा है और इसे हिंदू परंपरा की सप्तपुरियों (सात पवित्र नगरों) में भी गिना जाता है। इस शक्तिपीठ का उल्लेख आदि शंकराचार्य द्वारा रचित अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र में वर्णित 18 शक्तिपीठों में भी मिलता है। उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर स्थित भैरव पर्वत के शिखर पर अवंती शक्तिपीठ स्थित है।
यहाँ देवी माँ की आराधना अवंती माँ, गढ़कालिका अथवा महाकाली के रूप में की जाती है। कथा के अनुसार, यह वही पवित्र स्थान है जहाँ राजा दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह के पश्चात देवी सती का ऊपरी होंठ गिरा था। इस पवित्र स्थल की रक्षा लंबकर्ण, अर्थात् लंबे कानों वाले भैरव, करते हैं।
मंगल चंडिका शक्तिपीठ, उज्जैन (मध्य प्रदेश)

(मंगल चंडिका शक्तिपीठ, उज्जैन)
रुद्र सागर झील के समीप स्थित मंगल चंडिका शक्तिपीठ को हरसिद्धि माता मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन काल में देवी को मंगल चंडिका के नाम से जाना जाता था। वे सम्राट विक्रमादित्य (56–57 ईसा पूर्व) की कुलदेवी थीं। इस पवित्र स्थान पर देवी सती की कुर्पर (कोहनी) गिरी थी।
मंदिर में स्थापित देवी की प्रतिमा प्रायः गहरे सिंदूरी रंग में दर्शाई जाती है, जो शक्ति और दिव्य संरक्षण का प्रतीक है। इस मंदिर में माँ महालक्ष्मी, माँ महाकाली और माँ महासरस्वती, इन तीनों देवियों की एक साथ पूजा की जाती है। इस पीठ के सहचर भैरव कपिलाम्बर के नाम से जाने जाते हैं, जिसका अर्थ है लाल वस्त्र धारण करने वाले। गर्भगृह में प्रतिष्ठित श्री यंत्र इस मंदिर की गहन तांत्रिक परंपरा को दर्शाता है, जो मंगल चंडिका देवी और माँ त्रिपुर सुंदरी के बीच एक दिव्य संबंध स्थापित करता है।
कालमाधव देवी शक्तिपीठ, अमरकंटक (मध्य प्रदेश)

(कालमाधव देवी शक्तिपीठ, अमरकंटक)
यह शक्तिपीठ मध्य प्रदेश के अमरकंटक में स्थित है, जो विंध्य, मैकाल और सतपुड़ा पर्वतमालाओं के संगम पर नर्मदा नदी के पवित्र उद्गम के निकट स्थित है। अमरकंटक तीन पवित्र नदियों—नर्मदा, सोन और जोहिला—का भी उद्गम स्थल है।
यह वह पावन स्थान है जहाँ देवी सती का नितम्ब (बायाँ कूल्हा) गिरा था। अमरकंटक में प्रचलित एक स्थानीय परंपरा के अनुसार, निकटवर्ती क्षेत्र में दो शक्तिपीठों की पहचान की जाती है, कालमाधव और नर्मदा शक्तिपीठ। यद्यपि कुछ परंपराएँ दोनों को मान्यता देती हैं, परंतु अनेक प्राचीन ग्रंथों में केवल नर्मदा शक्तिपीठ का ही उल्लेख मिलता है, जिसके बारे में आप अगले भाग में पढ़ेंगे। यहाँ देवी की पूजा उनके उग्र और काली स्वरूप में की जाती है। इस पीठ से संबंधित भैरव असितांग (रुरु) के नाम से जाने जाते हैं।
नर्मदा शक्तिपीठ, अमरकंटक (मध्य प्रदेश)

(नर्मदा शक्तिपीठ, अमरकंटक)
नर्मदा शक्तिपीठ, कालमाधव देवी शक्तिपीठ के समीप स्थित है। इसे नर्मदा उद्गम मंदिर तथा शोंदेश शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है। इस स्थान पर देवी सती का दाहिना नितंब (दाहिना कूल्हा) नर्मदा नदी के तट के पास गिरा था। दैवी माँ की उपासना शोणा या सोना के रूप में, भैरव भद्रसेन के साथ की जाती है।
नर्मदा नदी की आध्यात्मिक महिमा का वर्णन अनेक पवित्र ग्रंथों में मिलता है। स्कंद पुराण (रेवा खंड) में नर्मदा नदी (जिसे रेवा भी कहा जाता है) को अमरत्व के प्रतीक के रूप में वर्णित किया गया है। शिव पुराण में वर्णन आता है कि स्वयं माँ गंगा नदी अपने संचित पापों के भार से ग्रस्त होकर एक काली गाय का रूप धारण कर नर्मदा के जल में स्नान करने आईं, जिससे वे शुद्ध हो सकें। यह प्रसंग नर्मदा नदी की अत्यंत पावन और शुद्ध करने वाली शक्ति का प्रतीक है।
ॐ श्री मात्रे नमः!
संदर्भ:
- Pande, Alka. Shakti: 51 Sacred Peethas of the Goddess. Rupa Publications, 2020.
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