भगवान रुद्र कौन हैं?
इस लेख में आप भगवान शिव के रौद्र स्वरूप ‘रुद्र’ के बारे में जानेंगे ।
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् |
त्रयः शूलनिर्मूलनं शूलपाणिं
भजेङहं भावानीपतिं भावगम्यम् ||
(‘उन्हें प्रणाम है, जो प्रचंड (रूद्रस्वरूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, और सर्व-शक्तिमान हैं। जो सर्वोच्च परमेश्वर, शाश्वत और संपूर्ण हैं। जिनका तेज लाखों सूर्य की किरणों के समान है। वे अपने हाथ में त्रिशूल धारण करते हैं, जो तीन प्रकार के शूलों (दुखों)—सत्त्व, रजस और तमस के बंधनों को निर्मूल अर्थात् जड़ से समाप्त करता है। जिन्हें माँ भवानी के पति के रूप में जाना जाता है, उन उमापति भगवान शंकर को मैं श्रद्धापूर्वक नमन करता हूँ।’)
यह श्लोक रुद्राष्टकम् से लिया गया है, जिसमें भगवान शिव के रौद्र (भयंकर) और सर्वशक्तिशाली स्वरूप 'रुद्र' की आराधना है। वेदों में भगवान शिव को सर्वप्रथम ‘रुद्र’ नाम से ही संबोधित किया गया है।
रुद्र’ शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?
‘रुद्र’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की ‘रुद’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है, ‘रूद्रन करना (रोना), गर्जना करना या दहाड़ना’। रुद्र को तूफानों की गर्जना और भगवान शिव के उग्र स्वरूप (रौद्र रूप) से जोड़ा गया है, जिनकी आंखें अग्नि के समान लाल हैं।
ऋग्वेद (2.33) में, रुद्र को ‘मरुतों के पिता’ के रूप में वर्णित किया गया है। ‘मरुत’ देवताओं का समूह है, जो तूफान के देवता माने जाते हैं। ‘रुद्र’ शब्द भगवान शिव द्वारा किए गए ‘रुद्र तांडव (विनाश का नृत्य)’ से भी निकटता से जुड़ा हुआ है। रुद्र तांडव यह दर्शाता है कि केवल विनाश के माध्यम से ही नवसृजन संभव है।
रुद्रम् की विस्तृत व्याख्या करने वाले ब्राह्मण ग्रंथ में उल्लेख किया गया है कि रूद्र वास्तव में यही अग्नि है। इसके दो रूप हैं—एक उग्र (रौद्र) और दूसरा शुभ (मंगलमय)। यदि कोई व्यक्ति रुद्रम् का जप करते हुए भगवान शिव का दुग्ध, जल आदि से अभिषेक करता है, तो वह उनके उग्र स्वरूप को शांत करता है।’
रुद्र के इन दो स्वरूपों को ‘घोर’ (भीषण और उग्र रूप) और ‘अघोर’ या शिव (शांत और शुभ रूप) के रूप में जाना जाता है। ये दोनों रूप एक ही सत्ता के दो पहलू हैं।
इस प्रकार, रुद्र और शिव दो नहीं, बल्कि एक ही हैं।
भगवान शिव के रुद्र रूप की कृपा प्राप्त करें
रुद्राष्टकम् में भगवान रुद्र की महिमा का गुणगान कुछ इस प्रकार किया गया है:
कालयतीत काल्पांत कल्याणकारी
सदा सज्जनानंद दाता पुरारि ||
(श्लोक 6.1-6.2)
(भावार्थ: श्री रुद्र को प्रणाम, जिनका शुभ स्वरूप भौतिक जगत के तत्वों से परे है; जो की एक कल्प (ब्रह्मांडीय चक्र) को समाप्त करते हैं। वे शुद्ध हृदय वाले लोगों के सतत आनंद का स्रोत हैं।)
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ॐ नमः शिवाय!
अधिक पढ़े - श्री रुद्रम् का महत्व
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