भारत के बाहर स्थित शक्तिपीठ : नेपाल, तिब्बत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका के पावन धाम

भारत के बाहर स्थित शक्तिपीठ : नेपाल, तिब्बत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका के पावन धाम

'ॐ विश्वरूपिण्यै नमः।'

यह माँ ललिता त्रिपुरा सुंदरी के सहस्र नामों में से एक है, जिसका उल्लेख ललिता सहस्रनाम में मिलता है। 'विश्वरूपिणी' के रूप में वे वही हैं, जिनका शरीर ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड है। चूँकि देवी माँ सम्पूर्ण सृष्टि में विराजमान हैं और वे किसी प्रकार की भौतिक सीमाओं में बंधी हुई नहीं हैं। इसलिए उनकी कृपा भी मानसिक और भौतिक सीमाओं से परे है। उनकी कृपा सृष्टि के समस्त तत्व और सर्वत्र व्याप्त है।

शोक में डूबे भगवान शिव की सहायता करने तथा समस्त सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर को अनेक भागों में विभाजित कर दिया। देवी के अंग पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों पर गिरे, जिससे पवित्र शक्तिपीठों की उत्पत्ति हुई। अपने पिछले लेखों में हमने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित शक्तिपीठों की यात्रा की थी।

इस ब्लॉग में हम उन पावन शक्तिपीठों के बारे में जानेंगे, जो भारत के बाहर विभिन्न देशों में स्थित हैं तथा जहाँ देवी माँ आज भी अपनी दिव्य उपस्थिति से भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करती हैं।

प्रमुख बातें

गंडकी देवी शक्तिपीठ (मुक्तिनाथ), नेपाल

नेपाल के मुक्तिनाथ में स्थित गंडकी देवी शक्तिपीठ

(नेपाल के मुक्तिनाथ में स्थित गंडकी देवी शक्तिपीठ)

नेपाल बौद्ध, शैव, वैष्णव और शाक्त परंपराओं के अद्भुत संगम से आलोकित पावन भूमि है, जहाँ अनेक प्राचीन मंदिर स्थित हैं। इसे देवी उपासना के प्रमुख स्थलों में माना जाता है। इसी पवित्र भूमि पर मुक्तिनाथ में गंडकी देवी शक्तिपीठ स्थित है।

मान्यता है कि यहाँ देवी सती का दाहिना गाल गिरा था। संस्कृत में 'गंड' का अर्थ गाल होता है, इसी कारण यह शक्तिपीठ गंडकी देवी शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस शक्तिपीठ में भगवान शिव भैरव चक्रपाणि रूप में विराजमान हैं, अर्थात् वे जिनके हाथ में चक्र है।

मुक्तिनाथ को चुमिंग ग्यात्सो के नाम से भी जाना जाता है। इसी पवित्र भूमि से गंडकी नदी प्रवाहित होती है। गंडकी (जिसे गंडक और नारायणी भी कहा जाता है) एक पवित्र नदी है, जो इस शक्तिपीठ के समीप बहती है और सिद्धियाँ प्रदान करने वाली मानी जाती है। यही नदी अत्यंत पूजनीय शालिग्राम शिलाओं (भगवान विष्णु के स्वरूप) का उद्गम स्थल है, जिन्हें स्वयं देवी का वरदान माना जाता है।

मुक्तिनाथ बौद्धों की तांत्रिक साधनाओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पावन स्थल भगवान विष्णु के 108 दिव्य देशमों में से एक है। दिव्य देशम वे पवित्र मंदिर हैं, जिनका उल्लेख तमिल अलवार संतों ने अपनी रचनाओं में किया है।

मुक्तिनाथ की भूमि का संबंध राजा दशरथ द्वारा किए गए अश्वमेध यज्ञ से भी माना जाता है। मान्यता के अनुसार, राजा दशरथ ने विभिन्न राज्यों पर अपना अधिकार स्थापित करने के लिए इस यज्ञ का आयोजन किया था। एक पवित्र श्वेत अश्व, जिसे इन राज्यों में स्वतंत्र रूप से विचरण करने के लिए छोड़ा गया था, मिथिला पहुँचते-पहुँचते थक चुका था। मिथिला पर माता सीता के पिता राजा जनक का शासन था। माता सीता ने अपनी करुणा और बुद्धिमत्ता से न केवल उस यज्ञ को रोक दिया, बल्कि घायल और थके हुए घोड़े की देखभाल भी की।

गुह्येश्वरी शक्तिपीठ, काठमांडू (नेपाल)

काठमांडू में स्थित गुह्येश्वरी शक्तिपीठ

(काठमांडू में स्थित गुह्येश्वरी शक्तिपीठ)

काठमांडू की घाटी से बहने वाली बागमती नदी हिंदू और बौद्ध धर्म, दोनों के अनुयायियों के लिए अत्यंत आध्यात्मिक महत्व रखती है। इसी पवित्र नदी के तट पर माँ गुह्यकाली शक्तिपीठ स्थित है। माँ गुह्येश्वरी के पश्चिम में उनके सहचर भगवान पशुपतिनाथ का मंदिर है।

'गुह्य' शब्द का अर्थ है, गुप्त, रहस्यमय या छिपा हुआ अर्थात् वह जो सामान्य इंद्रियों से परे या छिपा हुआ हो। मान्यता है कि इसी स्थान पर देवी सती का प्रजनन अंग गिरा था।

गुह्यकाली रूप में देवी इस शक्तिपीठ में बागमती घाट स्थित श्मशान भूमि की संरक्षिका देवी के रूप में पूजित हैं। इस शक्तिपीठ में भगवान शिव की पूजा कपाली रूप में भी की जाती है, जिसका अर्थ है — कपाल (खोपड़ियों) को धारण करने वाले।

महायान बौद्ध परंपरा में इस शक्तिपीठ की देवी की उपासना उनके वज्रयोगिनी स्वरूप में की जाती है। तांत्रिक साधनाओं में देवी के इस रूप की आराधना को ज्ञान और आत्मबोध की प्राप्ति का माध्यम माना जाता है। वज्रयोगिनी देवी को प्रायः तांत्रिक उपासना की दस महाविद्याओं में से एक माँ छिन्नमस्ता से भी संबंधित माना जाता है।

दाक्षायणी देवी शक्तिपीठ, मानसरोवर झील (तिब्बत)

दाक्षायणी देवी शक्तिपीठ, मानस

(दाक्षायणी देवी शक्तिपीठ, मानस)

कैलाश पर्वत को भौतिक और आध्यात्मिक जगत के संगम का पावन स्थल माना जाता है। इन पर्वतों की तलहटी में, मानसरोवर झील के तट पर देवी माँ दाक्षायणी देवी अथवा मानसा देवी के रूप में विराजमान हैं।

दाक्षायणी अर्थात् राजा दक्ष की पुत्री। अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह के बाद देवी सती का दाहिना हाथ तिब्बत में इस स्थान पर गिरा था। इस शक्तिपीठ के अधिष्ठाता भैरव भगवान अमर हैं।

दाक्षायणी देवी शक्तिपीठ की एक विशेषता यह है कि यहाँ कोई पारंपरिक मंदिर संरचना या विग्रह (मूर्ति) नहीं है। यह एक प्राकृतिक खुला स्थल है, जहाँ देवी की पूजा शिलाखंड स्वरूप में की जाती है। पवित्र गौरी कुंड या पार्वती सरोवर, जहाँ माँ पार्वती ने भगवान गणेश की रचना की, कैलाश पर्वत के ही निकटवर्ती क्षेत्र में स्थित है।

भवानीपुर (भबानीपुर) शक्तिपीठ, करतोया, भवानीपुर (बांग्लादेश)

भवानीपुर शक्तिपीठ

(भवानीपुर शक्तिपीठ)

शक्ति उपासना के कुछ प्रमुख केंद्र बांग्लादेश में स्थित हैं, जो भौगोलिक रूप से पश्चिम बंगाल के बहुत समीप हैं। बांग्लादेश में तीन प्रमुख शक्तिपीठ स्थित हैं। उनमें से पहला है भवानीपुर शक्तिपीठ, जो बांग्लादेश के बोगरा ज़िले में करतोया नदी के तट पर स्थित है। यहाँ सती देवी का बायाँ नूपुर (पायल) गिरा था।

यह मंदिर देवी दुर्गा को समर्पित है। यहाँ देवी की पूजा 'अपर्णा' रूप में की जाती है, जिसका अर्थ है — "वे जिन्होंने साधना के दौरान पत्तों का भी सेवन नहीं किया।" यह नाम भगवान शिव को पुनः प्राप्त करने के लिए की गई उनकी कठोर तपस्या का स्मरण कराता है।

मंदिर के गर्भगृह में नूपुर का प्रतीक मानी जाने वाली एक पवित्र शिला तथा माँ काली की प्रतिमा स्थापित हैं, जिनकी श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है।

मंदिर परिसर में पंचमुंड आसन (पाँच मानव कपालों से निर्मित आसन) तथा पाताल भैरव का एक मंदिर स्थित है, जो इस शक्तिपीठ के अधिष्ठाता भैरव 'वामन-भैरव' को समर्पित है।

मंदिर से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा शंख-पुकुर (शंख की चूड़ियों वाला सरोवर) की है। कहा जाता है कि एक शंख-चूड़ी विक्रेता की भेंट तत्कालीन भवानीपुर मंदिर के समीप जंगल में स्थित एक सरोवर पर एक छोटी बालिका से हुई। उस बालिका के मस्तक पर सिंदूर का तिलक सुशोभित था। बालिका ने उस विक्रेता से चूड़ियाँ खरीदीं और स्वयं को राजबाड़ी महल की पुत्री बताते हुए भुगतान के लिए उसे रानी भवानी के पास भेज दिया।

वास्तव में राजबाड़ी महल में कोई कन्या थी ही नहीं। जब रानी भवानी को इस पूरी घटना का पता चला, तो वे तुरंत उस सरोवर तक पहुँची। चूड़ी विक्रेता की प्रार्थना पर देवी भवानी जल से प्रकट हुईं और अपने हाथों में नई शंख-चूड़ियाँ धारण कर दर्शन दिए। इस चमत्कार के बाद मंदिर की ख्याति पूरे उपमहाद्वीप में फैल गई। आज भी श्रद्धालु देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु इस पवित्र सरोवर, शंख-पुकुर में स्नान करते हैं।

जेशोरेश्वरी देवी शक्तिपीठ, जेसोर (येशोर, बांग्लादेश)

जशोरेश्वरी देवी, बांग्लादेश

(जशोरेश्वरी देवी, बांग्लादेश)

"जेशोरेश्वरी" नाम का शाब्दिक अर्थ है — 'जेशोर (येशोर) नगर की देवी'। यहाँ देवी की पूजा माँ काली के उग्र, किंतु संरक्षणकारी स्वरूप में की जाती है।

जेशोरेश्वरी वह पवित्र स्थान है, जहाँ देवी सती की बाईं हथेली (या दोनों हथेलियाँ और चरणतल) गिरे थे। इसलिए यह स्थल देवी के करकमलों का शक्तिशाली प्रतीक माना जाता है, जो आशीर्वाद प्रदान करते हैं, भय का नाश करते हैं और भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। भगवान शिव यहाँ उग्र चंड भैरव के रूप में उनकी रक्षा करते हैं।

ऐसी मान्यता है कि मूल रूप से "सौ द्वारों (दरवाज़ों) वाला" यह मंदिर अनारी नामक एक ब्राह्मण द्वारा स्थापित किया गया था, जिसका बाद में राजा लक्ष्मण सेन और प्रतापादित्य ने अपने शासनकाल में जीर्णोद्धार कराया। आज इस प्राचीन मंदिर के केवल ऐतिहासिक स्तंभ ही शेष रह गए हैं।

एक अन्य प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जेसोर के राजा प्रतापादित्य के एक सेनापति को झाड़ियों के बीच हथेली के आकार का एक प्रकाशमान पत्थर दिखाई दिया, जो दिव्य आभा से चमक रहा था। राजा ने माँ काली की उपासना आरंभ की और उस पवित्र हथेली के आकार की शिला के चारों ओर विधिवत मंदिर बनवाने का आदेश दिया।

सुगंधा देवी शक्तिपीठ, शिकारपुर (बांग्लादेश)

देवी सुगंधा

(देवी सुगंधा)

बारीसाल के निकट स्थित शिकारपुर गाँव में सुगंधा देवी शक्तिपीठ स्थित है। यह वह पावन स्थल है जहाँ देवी सती की नासिका (नाक) गिरी थी। यह शक्तिपीठ सुगंधा (या सुनंदा) नदी के तट पर स्थित है।

आगम शास्त्र के अनुसार किसी भी मंदिर की छाया का प्रवाहमान यानी बहते हुए जल पर पड़ना अशुभ माना जाता है। किंतु यह मंदिर अपनी एक विशेष विशेषता के कारण अद्वितीय है, क्योंकि इसकी परछाई सीधे समीपवर्ती नदी पर पड़ती है, जिससे उस पवित्र नदी में आध्यात्मिक ऊर्जा और शुभता का संचार होता है।

यहाँ देवी की पूजा उनके भैरव त्र्यम्बक के साथ की जाती है, जो तीनों लोकों के स्वामी माने जाते हैं। यह मंदिर शिव चतुर्दशी के प्रसिद्ध अनुष्ठान के लिए जाना जाता है, जो मार्च माह की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। इस अवसर पर हजारों भक्त एकत्र होकर भगवान त्र्यम्बक की आराधना करते हैं।

यह शक्तिपीठ नवग्रह-तंत्र से भी जुड़ा हुआ माना जाता है, जहाँ देवी सुगंधा को बुध ग्रह (Mercury) से संबंधित बताया गया है। ऐसा विश्वास है कि देवी का यह स्वरूप भक्तों को बुद्धि, यश और सांसारिक सफलता का आशीर्वाद प्रदान करता है।

कोट्टरी देवी शक्तिपीठ, हिंगलाज (पाकिस्तान)

कोट्टरी देवी

(कोट्टरी देवी)

कुलार्णव तंत्र में हिंगलाज माता मंदिर को अठारह शक्तिपीठों में से एक बताया गया है। यहाँ देवी कोट्टरी की पूजा सभी समुदायों और धर्मों के लोग करते हैं। वर्तमान पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के पथरीले क्षेत्र में स्थित यह प्राचीन मंदिर, हिंगलाज माता मंदिर, देवी कोट्टरी को समर्पित है। यह मंदिर हिंगोल राष्ट्रीय उद्यान के भीतर, हिंगोल नदी के तट पर स्थित एक प्राकृतिक पर्वतीय गुफा में अवस्थित है।

पीठ निर्णय तंत्र में इस मंदिर को वह स्थान बताया गया है जहाँ देवी सती का ब्रह्मरंध्र (मस्तक का शीर्ष भाग) गिरा था। यहाँ के अधिष्ठाता भैरव भीमलोचन हैं, जिसका अर्थ है, "भयावह नेत्रों वाले।"

ऐसा कहा जाता है कि भगवान राम ने रावण का वध करने के पश्चात उसके वध के प्रायश्चित हेतु इस मंदिर की यात्रा की थी।

स्थानीय कथाओं के अनुसार, त्रेता युग में विचित्र नाम वाले तातार-मंगोल राजा के दो अत्यंत क्रूर पुत्र थे, हिंगोल और सुंदर। जब भगवान गणेश ने प्रजा की रक्षा के लिए सुंदर का वध कर दिया, तब हिंगोल भक्तों को डराने लगा। अंततः लोगों ने देवी कोट्टरी से प्रार्थना की। तब देवी ने हिंगोल को एक गुफा में बंद कर उसका वध कर दिया। अपने अंतिम क्षणों में हिंगोल ने देवी से प्रार्थना की कि इस पवित्र गुफा का नाम उसके नाम पर रखा जाए। देवी ने उसकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली, और तभी से यह मंदिर हिंगलाज माता मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली हिंगलाज यात्रा में एक लाख से अधिक हिंदू श्रद्धालु, विशेष रूप से सिंधी-हिंदू और कच्छी-गुजराती समुदायों के लोग शामिल होते हैं। ये श्रद्धालु कठिन रेगिस्तानी मार्ग पार करते हुए तथा सैकड़ों पर्वतीय सीढ़ियाँ चढ़कर इस पवित्र मंदिर तक पहुँचते हैं।

मंदिर-मार्ग में स्थित चंद्रगुप नामक मिट्टी का ज्वालामुखी इस यात्रा का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग माना जाता है। इसकी पूजा भगवान शिव के स्वरूप के रूप में की जाती है, इसलिए इसे बाबा चंद्रगुप कहा जाता है।

स्थानीय सूफ़ी मुस्लिम समुदाय भी इस पवित्र स्थल के प्रति गहरी श्रद्धा रखते हैं। वे देवी को "बीबी नानी" (नानी माँ) कहकर संबोधित करते हैं तथा मंदिर को "नानी पीठ", "नानी मंदिर" अथवा "नानी अम्मा की हज" के नाम से जानते हैं। मंदिर की सुरक्षा और संरक्षण में भी वे सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।

शिवहरकराय शक्तिपीठ, कराची (पाकिस्तान)

देवी दुर्गा महिषासुरमर्दिनी स्वरूप, शिवकराय शक्तिपीठ

(देवी दुर्गा महिषासुरमर्दिनी स्वरूप, शिवकराय शक्तिपीठ)

पाकिस्तान के कराची शहर में करवीपुर अथवा शिवहरकराय शक्तिपीठ स्थित है। यह आदि शंकराचार्य द्वारा रचित शक्तिपीठ स्तोत्रम् में वर्णित 51 शक्तिपीठों की सूची में तीसरे स्थान पर आता है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का त्रिनेत्र (तीन नेत्र) गिरा था।

इस शक्तिपीठ में देवी की उपासना महिषासुरमर्दिनी स्वरूप में की जाती है, अर्थात् वह स्वरूप जिसने महिषासुर नामक असुर का वध किया था। देवी का यह रूप साधकों को अपनी आंतरिक पशुवत प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देता है। उनका सिंह मानव की शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इन प्रवृत्तियों को नियंत्रित करके सृष्टि के कल्याण में लगाना ही इस स्वरूप का संदेश है।

उनके सहचर भगवान भैरव, क्रोधीश रूप में मंदिर की रक्षा करते हैं। क्रोधीश का अर्थ है, क्रोध का प्रतिनिधित्व करने वाले।

प्रतिवर्ष अप्रैल माह में चार दिवसीय शोभायात्रा अथवा तीर्थ-यात्रा का आयोजन किया जाता है, जिसमें पूरे उपमहाद्वीप से श्रद्धालु देवी माँ को श्रद्धांजलि अर्पित करने आते हैं।

इन्द्राक्षी शक्तिपीठ, मणिपल्लवम (श्रीलंका)

इंद्राक्षी शक्तिपीठ, श्रीलंका

(इंद्राक्षी शक्तिपीठ, श्रीलंका)

पाल्क खाड़ी के उस पार स्थित श्रीलंका में एक प्राचीन शक्तिपीठ है, जहाँ देवी की आराधना स्वयं श्रीराम और रावण दोनों ने की थी। यह शक्तिपीठ श्रीलंका की प्राचीन राजधानी के निकट नैणातीवु द्वीप पर स्थित है।

ऐसी मान्यता है कि यहाँ देवी का नूपुर (पायल) गिरा था, इसलिए भक्त यहाँ देवी को श्रद्धापूर्वक पायल अर्पित करते हैं।

देवी इंद्राक्षी की मूर्ति स्वयं इंद्रदेव द्वारा स्थापित मानी जाती है, जिन्होंने यहाँ देवी की आराधना की थी। "इंद्राक्षी" नाम का अर्थ है, 'इंद्रदेव की आँख'।

यह मंदिर मुख्य रूप से नैणातिवु नागपूशनी अम्मन मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ देवी की पूजा पार्वती के एक स्वरूप के रूप में की जाती है, जिन्हें स्थानीय रूप से नागपूशनी अथवा भुवनेश्वरी कहा जाता है। उनके सहचर भगवान शिव यहाँ नयनायर या राक्षसेश्वर के रूप में पूजित हैं, जिसका अर्थ है, 'राक्षसों के स्वामी'।

भुवनेश्वरी के रूप में देवी दस महाविद्याओं में से एक मानी जाती हैं। वे सम्पूर्ण ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री हैं। समस्त सृष्टि को उनके शरीर का प्रतीक माना जाता है और सभी प्राणियों को उस अनंत शक्ति के आभूषण स्वरूप देखा जाता है। देवी में त्रिमूर्ति (सृष्टि, पालन और संहार) की शक्तियाँ समाहित हैं। उनका संबंध माँ त्रिपुरा सुंदरी अथवा राजराजेश्वरी से भी माना जाता है, जो ब्रह्मांड की सर्वोच्च दिव्य स्त्री शक्ति हैं। देवी पार्वती को देवी भुवनेश्वरी के सगुण रूप के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजा जाता है।

नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देशों में स्थित देवी माँ के ये पावन धाम सनातन संस्कृति की प्राचीन जड़ों को आज भी जीवंत बनाए हुए हैं। प्रत्येक शक्तिपीठ अपने भीतर एक अद्भुत पौराणिक कथा, आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्ति-भाव समाहित किए हुए है।

ये मंदिर केवल तीर्थस्थल नहीं, बल्कि देवी माँ के उस अखंड स्वरूप के प्रतीक हैं, जो समय और सीमाओं से परे है। यदि आप आदिशक्ति माँ दुर्गा की कृपा और संरक्षण प्राप्त करना चाहते हैं, तो साधना ऐप पर आषाढ़ गुप्त नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि के अवसर पर अत्यंत शक्तिशाली नवदुर्गा साधना अवश्य संपन्न करें।

Frequently Asked Questions

Clearing doubts on your sacred journey

भारत के बाहर कितने शक्तिपीठ हैं?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, 51 शक्तिपीठों में से लगभग 9 शक्तिपीठ भारत के बाहर नेपाल, तिब्बत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका में स्थित हैं।

भारत के बाहर सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठ कौन-सा है?

पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित हिंगलाज माता मंदिर (कोट्टरी देवी शक्तिपीठ) सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। प्रतिवर्ष एक लाख से अधिक हिंदू श्रद्धालु यहाँ दर्शन के लिए आते हैं। यह मंदिर स्थानीय सूफ़ी मुस्लिम समुदाय द्वारा भी पूजनीय माना जाता है।

क्या तीर्थयात्री भारत से बाहर स्थित शक्तिपीठों के दर्शन के लिए जा सकते हैं?

हाँ, तीर्थयात्री भारत से बाहर स्थित शक्तिपीठों के दर्शन के लिए जा सकते हैं। प्रत्येक देश के अनुसार वहाँ पहुँचने की सुविधा अलग-अलग है। नेपाल के शक्तिपीठों (गंडकी देवी और गुह्येश्वरी) तक आसानी से पहुँचा जा सकता है। पाकिस्तान में हिंगलाज यात्रा के दौरान दर्शन संभव है। तिब्बत में दाक्षायणी देवी मंदिर जाने के लिए विशेष अनुमति आवश्यक होती है, और श्रीलंका में नैनतीवू द्वीप तक नाव से पहुँचना पड़ता है। 

नेपाल के गंडकी देवी शक्तिपीठ में देवी सती का कौन सा अंग गिरा था?

मान्यता है कि यहाँ देवी सती का दाहिना गाल (गण्ड) गिरा था। संस्कृत में 'गण्ड' का अर्थ गाल होता है, इसी कारण इसे गंडकी देवी शक्तिपीठ कहा जाता है।

क्या गुह्येश्वरी शक्तिपीठ केवल हिंदुओं के लिए पवित्र है?

 नहीं। काठमांडू स्थित गुह्येश्वरी शक्तिपीठ महायान बौद्ध परंपरा में भी अत्यंत पवित्र माना जाता है। यहाँ देवी की उपासना वज्रयोगिनी स्वरूप में की जाती है, जिन्हें ज्ञान और आत्मबोध की प्राप्ति का साधन माना जाता है।

बांग्लादेश के सुगंधा देवी शक्तिपीठ की क्या विशेषता है?

आगम शास्त्र के अनुसार, किसी मंदिर की छाया बहते जल पर नहीं पड़नी चाहिए। किंतु सुगंधा देवी मंदिर अद्वितीय है, क्योंकि इसकी परछाई सीधे समीपस्थ सुगंधा नदी पर पड़ती है, जिसे एक दिव्य आध्यात्मिक वरदान माना जाता है। 

बांग्लादेश में कौन-कौन से शक्तिपीठ स्थित हैं?

बांग्लादेश में तीन शक्तिपीठ हैं: भवानीपुर शक्तिपीठ (करतोया), जेशोरेश्वरी देवी शक्तिपीठ (जेसोर) और सुगंधा देवी शक्तिपीठ (शिकारपुर, बारीसाल के निकट)।

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