उच्छिष्ट गणपति : स्वरूप एवं महत्व
सारभूतमिमं मन्त्रं न देयं यस्य कस्यचित् ।
गुह्यं सर्वागमेष्वपि हितबुद्ध्या प्रकाशितम् ॥
न तिथिर्न च नक्षत्रं नो उपवासो विधीयते ।
यथेच्छितं चिन्तयन् मन्त्रः सर्वकामफलप्रदः ॥
-बृहत तंत्रसार
भावार्थः इस सार-मंत्र को सभी तंत्रों में गुप्त रखा गया है, लेकिन संसार के कल्याण के लिए प्रकट किया गया। भगवान की इस पूजा-पद्धति में तिथि-नक्षत्र आदि का कोई नियम नहीं है, न ही उपवास और अन्य विधियों की आवश्यकता है। उच्छिष्ट गणपति की पूजा करते समय साधक की जो भी इच्छाएँ होती हैं, वे सभी पूर्ण होती हैं।
श्री गणेश का एक तांत्रिक रूप उच्छिष्ट गणपति हैं। वे उच्छिष्ट गणपत्य संप्रदाय के प्रमुख देवता हैं, जो गणपत्यों (गणपति अनुयायियों) के छह प्रमुख संप्रदायों में से एक है।'उच्छिष्ट' का अर्थ है 'शेष'। अथर्ववेद के उच्छिष्ट ब्रह्म सूक्तम् में उच्छिष्ट गणपति को सृष्टि के उपरांत शेष बची हुई ब्रह्मांड की गुप्त अवशिष्ट ऊर्जा बताया गया है।
उनकी साधना बिना स्नान किए, अनुष्ठानिक रूप से अशुद्ध अवस्था में, भोजन का अंतिम निवाला थाली में छोड़कर और भोजन के बाद बिना मुँह धोए की जाती है। इस प्रकार, उच्छिष्ट गणपति साधना का उद्देश्य हमारे सामाजिक संस्कारों और द्वैत जैसे शुद्ध-अशुद्ध, अच्छा-बुरा आदि की धारणाओं को तोड़ना है।
हमारी चेतना स्वभावतः शुद्ध है, और हमें केवल अपनी श्वास को मंत्र के साथ लयबद्ध करना है। तंत्र के अनुसार जीवात्मा (व्यक्तिगत चेतना) परमात्मा (सर्वोच्च चेतना) से भिन्न नहीं है। अतः साधना के माध्यम से जीवात्मा परमात्मा के साथ एकाकार हो सकती है और किसी भी अवस्था में उनका आवाहन कर सकती है।
उच्छिष्ट गणपति का गूढ़ और विशिष्ट स्वरूप
उच्छिष्ट गणपति का गूढ़ और विशिष्ट स्वरूप अत्यंत अद्वितीय है।उनका वर्ण लाल है, वे त्रिनेत्र, चतुर्भुज, विशालकाय शरीर वाले, द्विदंती (दो दाँत वाले) और सदैव प्रसन्नमुख रूप में वर्णित किए गए हैं। उनके तीन हाथों में क्रमशः गन्ना, पाश और अंकुश हैं, तथा चौथा हाथ वरद-मुद्रा में है।
उनकी अर्धांगिनी देवी विघ्नेश्वरी (जिन्हें हस्ति पिशाची या नील सरस्वती भी कहा जाता है) उनकी बाएँ जंघा पर विराजमान हैं। वे दाम्पत्य मिलन के भाव में स्थित हैं, जो शिव-शक्तियेक-रूप सिद्धांत का प्रतीक है। इसका अर्थ है सृष्टि, पुरुष और प्रकृति के संयोग से ही उत्पन्न होती है। दोनों स्वयं में पूर्ण हैं, और इस सृजनात्मक संयोग से जो उत्पन्न होता है, वह भी पूर्ण ही है।
पिशाची उच्चतर कोटि की दिव्य स्त्री-शक्ति हैं। वे उच्छिष्ट गणपति की शक्ति हैं, जो बची हुई अवशिष्ट ऊर्जा को आत्मसात कर नई सृष्टि में परिवर्तित कर सकती हैं। श्री गणेश का विशाल गजमुख समस्त ज्ञान का भंडार और उनकी परम बुद्धि का प्रतीक माना जाता है। श्री उच्छिष्ट गणपति महायक्ष हैं, और उनकी अर्धांगिनी हस्ति पिशाची यक्षिणी मानी जाती हैं।
साधना के माध्यम से कुंडलिनी जागरण
‘उच्छिष्ट’ शब्द शेष बची हुई मूल ऊर्जा (कुंडलिनी) को दर्शाता है; यह श्री गणेश द्वारा शासित मूलाधार चक्र में कुंडलित और सुप्त अवस्था में स्थित रहती है। साधना के प्रयासों के माध्यम से, कुंडलिनी सहस्रार चक्र तक पहुँचती है, जहाँ शिव-शक्ति या पुरुष-प्रकृति ऐक्य (पुरुष और स्त्री तत्त्वों का संयोग) साधक के भीतर घटित होती है। साधना का अंतिम उद्देश्य यह है कि साधक, साध्य (देवता) और साधना एकाकार हो जाएँ। उच्छिष्ट गणपति साधना इस दिशा में पहला कदम है।
उच्छिष्ट गणपति साधना के लाभ
श्री उच्छिष्ट गणपति को क्षिप्र सिद्धि दायक, अर्थात् शीघ्र सिद्धि प्रदान करने वाला कहा जाता है। उनकी शक्तिशाली साधना बाधाओं और अच्छे-बुरे के सीमित धारणाओं को दूर करती है। वे विघ्नों का निवारण करते हैं, भौतिक समृद्धि और वाक्-सिद्धि प्रदान करते हैं, तथा परम लक्ष्य—निर्वाण की प्राप्ति कराते हैं। इस गणेश चतुर्थी, 27 अगस्त, आपको उच्छिष्ट गणपति साधना आरंभ करने का अद्वितीय अवसर है। आज ही साधना ऐप में साइन अप करें और अधिक जानकारी के लिए हमारे ब्लॉग पढ़ते रहें।
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Comments (3)
I want do this sadhna
Mujhe uchit ganpati ke bahre mai batahey.
Namo narayana
Mujhe ganpati sadhna ko bistar say bataye,mai mala say jaap kar sakti hoon ? Or es sadhna mai kya kya karna hoga
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