पोंगल : तमिलनाडु की फसल और समृद्धि का उत्सव

पोंगल : तमिलनाडु की फसल और समृद्धि का उत्सव

इस ब्लॉग की मुख्य बातें :

पोंगल : इतिहास और आरंभ

तमिलनाडु के समृद्ध कृषि क्षेत्रों का सुंदर दृश्य

(तमिलनाडु के समृद्ध कृषि क्षेत्रों का सुंदर दृश्य)

पोंगल पर्व तमिल में अरुवडै थिरुनल (फसल पर्व) और तमिलर थिरुनल (तमिल लोगों का उत्सव) के नाम से जाना जाता है। यह पर्व सूर्य की उत्तर दिशा की यात्रा (उत्तरायण) का प्रतीक है। पोंगल का इतिहास हज़ारों वर्ष पुराना है, जिसका सबसे प्राचीन उल्लेख हमें संगम काल की कविताओं और शास्त्रीय तमिल साहित्य में मिलता है।

पोंगल एक महत्वपूर्ण फसल उत्सव के रूप में विकसित हुआ, जिसने तमिलनाडु के विभिन्न समुदायों को एक सूत्र में बाँध दिया। प्राचीन तमिल काव्य रचना ऐंगुरुनूरु में पाँच थिनै (भू-दृश्य) के अनुरूप पाँच खंडों का वर्णन मिलता है। ये पाँच थिनै विशेष भौगोलिक परिवेश—पर्वत, वन, कृषि मैदान, तटीय क्षेत्र और मरुस्थल—से संबंधित हैं। प्रत्येक थिनै का अपना विशिष्ट भू-दृश्य, आराध्य देवता, आजीविका और जीवन-शैली होती है। इन थिनै में से एक को 'मरुतम,' कहा गया अर्थात्, आर्द्र अथवा कृषि क्षेत्र, वह भूमि जहाँ लोग प्रथम फसल के गीतों के साथ पोंगल का उत्सव मनाते थे।

पारंपरिक पोंगल व्यंजन (दूध, गुड़ और नई फसल के चावल से बनाया जाने वाला मीठा पकवान) और प्रसिद्ध पोंगल शुभकामनाएँ (पोंगल वाज़थु) की जड़े 2,000 वर्ष पुराने संगम साहित्य से जुड़ी हुई है।

इस पर्व के प्राचीन प्रमाण चोल काल (9वीं–13वीं शताब्दी) के शिलालेखों में मिलते हैं, जिनमें तिरुवोट्टियूर मंदिर में मनाए जाने वाले 'पुथु यीड़ु' (प्रथम फसल) का वर्णन है। इसके अलावा, विजयनगर वंश के शिलालेखों से भी इस उत्सव की जानकारी मिलती है, जहाँ इसे तमिल पंचांग के थाई मास में मनाए जाने वाले 'थाई थिरुनल' के रूप में दर्शाया गया है।

चार दिन, चार महत्वपूर्ण सांस्कृतिक मूल्य - पोंगल की भावना

चार दिवसीय पावन पोंगल उत्सव

(चार दिवसीय पावन पोंगल उत्सव)

पोंगल का प्रत्येक दिन अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाता है; हर परंपरा का विशेष महत्व होता है।

पहला दिन: पहले दिन भोगी उत्सव मनाया जाता है। इस दिन पुराने वस्त्र और वस्तुओं का त्याग करके उत्सव की शुरुआत होती है।

दूसरा दिन: लोग इसे सूर्य पोंगल के रूप में मनाते हैं और सूर्यदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

तीसरा दिन: इसे मट्टू पोंगल के रूप में मनाया जाता है। इस दिन खेती में सहायक पशुओं को सजाकर उनकी पूजा की जाती है।

चौथा दिन: उत्सव का समापन कान्नुम पोंगल से होता है। इस दिन लोग अपने प्रियजनों के साथ मिलकर खुशियाँ बाँटते हैं और त्योहार मनाते हैं।

भोगी पोंगल - त्याग और नव आरंभ का दिन

भोगी मंटालु : पहले दिन जलाया जाने वाला पवित्र अलाव

(भोगी मंटालु : पहले दिन जलाया जाने वाला पवित्र अलाव)

लोग भोगी पोंगल की शुरुआत एक-दूसरे को 'परैयान कड़ीतलुम, पुदियान पुगुतलुम' कहकर करते हैं, जिसका अर्थ है—पुराने को छोड़ो और नए का स्वागत करो। यह पुरानी आदतों, पुरानी समस्याओं और अवांछित वस्तुओं को त्यागने का प्रतीक है, ताकि नए मौसम में नए अवसरों के लिए जगह बनाई जा सके। लोग सूर्योदय से पहले उठकर अलाव जलाते हैं, जिसे भोगी कहते हैं। यह शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से स्वयं को शुद्ध करने का प्रतीक है।

भोगी पोंगल एक कृषि चक्र के पूरा होने और नए चक्र में भरपूर फसल की आशा का प्रतीक है। लोग अपने घरों को साफ करते हैं और उन्हें आम के पत्तों और गेंदे के फूलों से सजाते हैं। वे प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए चावल के आटे, फूल और हल्दी से सुंदर कोलम (रंगोली) भी बनाते हैं।

पोंगल कथा में भगवान श्री कृष्ण और भगवान इन्द्रदेव के बीच एक युद्ध का वर्णन मिलता है। श्री कृष्ण ने देखा कि ग्वाले डर के कारण इन्द्रदेव की पूजा कर रहे हैं। गोवर्धन पर्वत उनके लिए जीवनदायी था और उन्हें पोषण देता था। इसलिए श्रीकृष्ण ने उन्हें गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए कहा। इससे इन्द्रदेव क्रोधित हो गए और गोकुलवासियों को भारी वर्षा और तूफान का सामना करना पड़ा।

गोकुलवासियों और पशुओं की सुरक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा (छोटी) अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया। अंततः इन्द्रदेव को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण से क्षमा माँगी। इस अनुभूति के सम्मान में, श्रीकृष्ण ने भोगी पोंगल को इन्द्र देव की पूजा का विशेष दिन घोषित किया।

सूर्य पोंगल - कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन

सकरई पोंगल – पोंगल पर बनाया जाने वाला मीठा व्यंजन

(सकर पोंगल – पोंगल पर बनाया जाने वाला मीठा व्यंजन)

इस दिन को पेरिय पोंगल (बड़ा पोंगल) भी कहा जाता है। इस दिन लोग सूर्यदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। लोग नए बर्तनों में चावल को ताजे दूध, गुड़, भूरा चीनी, काजू और किशमिश के साथ पकाते हैं। इसे अच्छे से उबलने दिया जाता है, और जब दूध उफनकर बाहर आता है, तो परिवार के लोग आनंद के साथ 'पोंगलु पोंगल' कहते हैं। दूध का बाहर उफनना समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

लोग इस दिन सकर पोंगल भी बनाते हैं। तमिल भाषा में 'सकर' का अर्थ 'मीठा' होता है। यह चावल, गुड़, घी, काजू, किशमिश और इलायची डालकर बनाया जाने वाला विशेष व्यंजन है। इसका पहले भगवान को भोग लगाया जाता है और फिर परिवार के सदस्यों को परोसा जाता है।

पोंगल पर एक और विशेष व्यंजन वेन पोंगल बनाया जाता है। तमिल में 'वेन' का अर्थ सफेद होता है। इसे खारा पोंगल या घी-पोंगल के नाम से भी जाना जाता है। इसे चावल और पीली मूंग दाल से बनाया जाता है, जिसमें मसाले और ढेर सारा घी डाला जाता है। वेन पोंगल पारंपरिक रूप से चार दिवसीय पोंगल फसल उत्सव और अन्य हिंदू त्योहारों के दौरान बनाया जाता है। इसे नैवेद्यम (प्रसाद) के रूप में देवताओं को अर्पित किया जाता है।

कई लोग इस दिन पुल्ली कोलम (बिंदुओं की रंगोली) भी बनाते हैं। इसमें ज़मीन पर बराबर दूरी पर बिंदु बनाए जाते हैं और फिर इन बिंदुओं को जोड़ते हुए सीधी और घुमावदार रेखाएँ खींची जाती हैं। इससे सुंदर आकृतियाँ और पैटर्न तैयार होते हैं। इसे बनाने के लिए एकाग्रता और गणितीय सटीकता की आवश्यकता होती है। इन कोलम (रंगोली) डिज़ाइनों में सामान्यतः उफनता हुआ बर्तन (पोंगल पानै), गन्ना, सूर्यदेव और प्रकृति के विभिन्न तत्व चित्रित किए जाते हैं।

मट्टू पोंगल - पशुधन की पूजा का दिन

मट्टू पोंगल पर पशुधन की पूजा करते हुए

(मट्टू पोंगल पर पशुधन की पूजा करते हुए)

कृषि में बैल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। मट्टू पोंगल के दिन बैल की पूजा की जाती है। एक लोककथा के अनुसार, भगवान शिव ने अपने बैल भगवान नंदी से पृथ्वी पर जाकर मनुष्यों को यह संदेश देने को कहा था कि वे प्रतिदिन तेल मालिश कर स्नान करें, लेकिन भोजन महीने में केवल एक बार करें। किंतु भगवान नंदी ने भूलवश इसका उल्टा संदेश दे दिया।

इससे भगवान शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने नंदी भगवान को सदैव पृथ्वी पर ही रहने का आदेश दिया। उन्होंने नंदी भगवान को पृथ्वी पर खेत जोतने और लोगों को अधिक अन्न उत्पादन में सहायता करने के लिए कहा। भरपूर फसलों के कारण जब सभ्यताएँ फली-फूलीं, तब लोगों ने खेती में सहायक पशुओं, विशेष रूप से बैलों, की पूजा करना शुरू किया। इसी भावना के साथ मट्टू पोंगल का पर्व आरंभ हुआ।

कानुम/कन्नी पोंगल - एकता और मेल-मिलाप का दिन

कानुम पोंगल पर मधुर रिश्तों की साझेदारी

(कानुम पोंगल पर मधुर रिश्तों की साझेदारी)

यह पोंगल उत्सव का अंतिम दिन होता है, जब परिवार एकत्र होकर स्वादिष्ट भोजन और आपसी बातचीत के साथ समय बिताते हैं। 'कानुम' शब्द का अर्थ है 'देखना' या 'मिलने जाना'। परंपरागत रूप से गाँवों में लोग नदी के किनारे एकत्र होकर यह दिन एक साथ मनाते थे। आज भी लोग पार्क या समुद्र तटों पर पिकनिक के लिए जुटते हैं। कुछ स्थानों पर महान तमिल कवि के सम्मान में कानुम पोंगल को तिरुवल्लुवर दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

कानुम पोंगल परिवार और आपसी मेल-जोल का दिन है। इस दिन परिवार के छोटे सदस्य बड़ों से मिलने जाते हैं, उनका सम्मान करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह दिन महिलाओं के लिए भी विशेष महत्व रखता है, जो अपने भाइयों और परिवार के सदस्यों की कुशलता के लिए प्रार्थना करती हैं। साथ ही, कुम्मी और कोलाट्टम जैसे पारंपरिक नृत्य भी किए जाते हैं। लोग पारंपरिक खेल खेलते हुए दिन का आनंद लेते हैं और पारिवारिक व सामुदायिक संबंधों को मजबूत करते हुए चार दिवसीय पोंगल उत्सव का उल्लासपूर्ण समापन होता है।

अन्य राज्यों में पोंगल उत्सव

कर्नाटक – मकर संक्रमण 

एल्लू-बेल्ला - मकर संक्रांति पर कर्नाटक में बनाया जाने वाला पारंपरिक व्यंजन

(एल्लू-बेल्ला – मकर संक्रांति पर कर्नाटक में बनाया जाने वाला पारंपरिक व्यंजन)

कर्नाटक में पोंगल को सुग्गी या मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर लोग पतंग उड़ाते हैं, रंग-बिरंगी रंगोलियाँ बनाते हैं, अलाव जलाते हैं और पशुओं को सजाते हैं। इस दिन तिल, गुड़, मूंगफली और नारियल का प्रयोग कर ऐल्लु-बेल्ला नामक विशेष व्यंजन बनाया जाता है। इसके साथ ही परिवार पोंगल, होळिगे (मीठी रोटी), पायसम (चावल की खीर) और पानकम (गुड़ से बना पेय) भी तैयार करते हैं। तटीय क्षेत्रों में लोग यक्षगान लोकनाट्य का आनंद लेते हैं, जबकि उत्तर कर्नाटक में पुरुष कोलाटा नृत्य प्रस्तुत करते हैं।

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना – संक्रांति या संक्रांति संबारलू

चकर पोंगल, मकर संक्रांति पर बनाया जाने वाला पारंपरिक व्यंजन

(चकर पोंगल, मकर संक्रांति पर बनाया जाने वाला पारंपरिक व्यंजन)

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में, मकर संक्रांति परिवार के एकत्र होने, रंग-बिरंगी रंगोलियाँ (मोग्गु), अलाव (भोगी मंटालु), पशुओं की पूजा (कनुमा) और बैलों को सजाने (गंगरेद्द) का पर्व है। इसका एक विशेष आकर्षण हरिदासु होते हैं, जो घर-घर जाकर भगवान हरि की स्तुति में भजन गाते हैं।

इस अवसर पर घरों में अरिसेलु (चावल और गुड़ की बिस्कुट जैसी मिठाई), पूर्णालु (चावल के आटे, दाल और गुड़ से बनी मिठाई) और बेल्लम गावालु (शंख के आकार की मिठाई) जैसी मिठाइयाँ तैयार की जाती हैं। इस दिन बनाया जाने वाला लोकप्रिय व्यंजन चकर पोंगल है। चकर का अर्थ तेलुगु में 'मीठा' होता है, जिसे तमिलनाडु में सकर पोंगल कहा जाता है।

पोंगल उत्सव जीवन, प्रकृति और मानवता के बीच सूक्ष्म संतुलन का सम्मान करता है। लोग सूर्यदेव की पूजा करते हैं और उन्हें सभी जीवन का स्रोत मानकर श्रद्धा अर्पित करते हैं। वे खेती में सहायक पशुओं का उनके योगदान के लिए सम्मान करते हैं। इसके साथ ही परिवारिक रिश्तों को एकता और क्षमा से पुनर्जीवित किया जाता है। पायसम बनाने और उसे उफनने देने की परंपरा प्रेम, समृद्धि और सद्भावना का प्रतीक है, जो हमारे हृदय से स्वतंत्र रूप से बहती है। अंधविश्वास से दूर, ये प्रथाएँ गहन पारिस्थितिक और भावनात्मक बुद्धिमत्ता को दर्शाती हैं, जो हमारे अंदर, हमारे समुदायों में और प्रकृति के साथ सामंजस्य को बढ़ावा देती हैं। इसी भावना के साथ पोंगल सृजन के उत्सव के रूप में मनाया जाता है और हमें यह याद दिलाता है कि जब कृतज्ञता और प्रेम दर्शाते हैं, तो जीवन फल-फूल जाता है।

महत्वपूर्ण तिथियाँ

  • भोगी पोंगल: मंगलवार, 13 जनवरी 2026
  • पोंगल संक्रांति क्षण: बुधवार, 14 जनवरी 2026, 3:13 PM
  • मट्टू पोंगल: गुरुवार, 15 जनवरी 2026
  • कानुम पोंगल: शुक्रवार, 16 जनवरी 2026
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