गायत्री मंत्र – समस्त वैदिक ज्ञान का आधार
इस ब्लॉग की मुख्य बातें:
कई परिवारों में नवजात शिशु के जन्म के पश्चात सर्वप्रथम उसके कानों में गायत्री मंत्र कहने की परंपरा होती है। कुछ लोग अपने दिन का आरंभ सकारात्मक ऊर्जा के साथ करने के लिए प्रातःकाल नियमित रूप से गायत्री मंत्र का जप करते हैं। अनेक आश्रमों, घरों, मंदिरों और विद्यालयों में भी गायत्री मंत्र का जप एक दैनिक अभ्यास के रूप में किया जाता है।
आखिर ऐसा क्यों है? वास्तव में गायत्री मंत्र सबसे प्राचीन और शक्तिशाली प्रार्थनाओं में से एक है। यह हमारी बुद्धि को मार्गदर्शन देता है और सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। यह शारीरिक शुद्धीकरण करता है तथा हमारी आत्मा के साथ एक गहन संबंध स्थापित करता है। आइए, गायत्री मंत्र की उत्पत्ति तथा हमारे दैनिक जीवन में उसके व्यापक महत्व के विषय में विस्तार से पढ़ें।
गायत्री मंत्र की उत्पत्ति
अपने अंतर्मन के नेत्रों के साथ वह (विश्वामित्र) उस एक मंत्र को देख चुके थे जो वेदों का सार है, जो सृजन का उद्देश्य है; वह मंत्र जिसमें किसी को भी विपरीत परिस्थितियों से बाहर निकाल सकने की शक्ति निहित है, जो दैवीय ध्वनियों का ऐसा समागम है, जो किसी को भी अपने अकल्पनीय स्वप्न को पूरा करने में सहायक हो सकता है। एकमात्र मंत्र, गायत्री मंत्र, जिसका आवाहन वह (विश्वामित्र) महर्षि वशिष्ठ का आश्रम छोड़ने के बाद से सदैव करते रहे थे।
– ओम स्वामी ( जयको मुद्रण 2025, पृष्ठ सं. 7), गायत्री मंत्र का रहस्य।
गायत्री मंत्र की उत्पत्ति कैसे हुई, यह जानने के लिए हमें वैदिक काल की ओर लौटना होगा। कन्नौज (कन्याकुब्ज) के राजा कौशिक एक बार अपनी सेना के साथ लौट रहे थे। लंबे युद्ध के कारण सैनिक थके हुए और भूखे थे। जब वे वन क्षेत्र से होकर गुजर रहे थे, तब राजा कौशिक के मंत्री ने महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में विश्राम करने का सुझाव दिया।
जब वे आश्रम पहुँचे, तो राजा कौशिक ने महर्षि वशिष्ठ को सादर प्रणाम किया। मुख पर दिव्य तेज और श्वेत जटाओं से सुशोभित महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें विश्राम करने के लिए कहा और स्वयं उनके भोजन की व्यवस्था करने लगे।
इस पर आश्चर्यचकित राजा कौशिक ने महर्षि वशिष्ठ से कहा कि किसी तपस्वी ऋषि के लिए राजा की पूरी सेना को भोजन कराना असंभव है। तब महर्षि वशिष्ठ ने राजा से कहा कि वे ऋषि की तपस्या की शक्ति को कम न आँकें और नदी में स्नान करके आएँ, तब तक भोजन की व्यवस्था हो जाएगी।
जब उनकी सेना और राजा कौशिक लौटकर आए, तो वे महर्षि वशिष्ठ की अद्भुत क्षमता को देखकर चकित रह गए। तभी राजा को नंदिनी (कामधेनु की बछिया) के विषय में पता चला। कामधेनु इच्छा-पूर्ति करने वाली दिव्य गऊ (गाय) थी, जिसे भगवान इंद्र ने महर्षि वशिष्ठ को प्रदान किया था।
राजा कौशिक के मन में दिव्य गऊ को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा जाग्रत हुई। उन्होंने अपने सैन्य बल के आधार पर नंदिनी गाय को प्राप्त करने का प्रयास किया। तब महर्षि वशिष्ठ ने एक अत्यंत शक्तिशाली मंत्र का उच्चारण किया, जिसके प्रभाव से राजा की विशाल सेना जड़वत हो गई। राजा के अनुनय-विनय करने पर महर्षि वशिष्ठ ने राजा और उनकी सेना को मुक्त कर दिया।
प्रतिशोध की भावना से भरकर राजा ने एक हज़ार वर्षों तक कठोर तपस्या की। भगवान शिव की कृपा से उन्हें अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्राप्त हुए। किंतु जब महर्षि वशिष्ठ के समक्ष उनकी समस्त तपस्या निष्फल सिद्ध हुई, तो राजा पूर्णतः टूट गए। इस बार उन्होंने पुनः एक हजार वर्षों तक भगवान ब्रह्मा की आराधना की। भगवान ब्रह्मा ने राजा कौशिक को अपना ब्रह्मास्त्र प्रदान किया। निराशा और क्रोध से भरे राजा ने पुनः महर्षि वशिष्ठ का सामना किया, किंतु इस बार भी उन्हें केवल निराशा ही हाथ लगी। अंततः राजा ने अपनी पराजय के साथ-साथ यह भी स्वीकार कर लिया कि वे महर्षि वशिष्ठ को पराजित नहीं कर सकते। तब महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें इस रहस्य से परिचित कराते हुए कहा—
‘ हे राजन! यह मेरी शक्ति नहीं है, यह कुछ और नहीं बल्कि इतना है कि मैं कौन हूँ। आपकी पहचान इससे नहीं होती कि आपके पास क्या है अथवा आप क्या कर सकते हैं, बल्कि इससे होती है कि आप अपनी अंतरात्मा की गहराई में कौन हैं। आप कुछ पाने के लिए ये सारी तपस्याएं करते रहे हैं, लेकिन आपने अपनी उपलब्धियों को भुला दिया। आपने अपने अंदर विद्यमान देवत्व को नहीं जगाया।’
महर्षि वशिष्ठ ने कहना जारी रखा, ‘आपके पास बस कुछ सिद्धियाँ, अलौकिक शक्तियाँ भर है ताकि आप अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकें। आप अपनी ऊर्जा के वास्तविक स्रोत का उपयोग नहीं कर रहे, अतः आप संपूर्ण विश्व के शस्त्र प्राप्त कर सकते हैं, किंतु फिर भी मेरी बराबरी नहीं कर सकते क्योंकि मेरे लिए, मेरि शक्ति इस दंड (छड़ी) में नहीं है, बल्कि इस कथ्य में है कि ‘मैं कौन हूँ’। यह कहते हुए उन्होंने (महर्षि वशिष्ठ) ने उस दंड को एक तरफ फेंक दिया।’
– ओम स्वामी ( जयको मुद्रण 2025, पृष्ठ सं. 6), गायत्री मंत्र का रहस्य।
राजा ने यह समझ लिया कि अस्त्र-शस्त्रों अथवा बाह्य बल का वास्तव में कोई स्थायी महत्व नहीं है। इसलिए उन्होंने महर्षि वशिष्ठ के समान चेतना-स्तर को प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या करने का निश्चय किया। अनेक राज्यों को जीतने के लिए उत्सुक राजा के बजाए अब वह ऐसे ऋषि बन चुके थे जिनका शासन लोगों के ह्दयों पर था। यहां तक कि उन्हें ‘विश्वामित्र’ (संपूर्ण विश्व का मित्र ) की उपाधि मिली।
अपनी जाग्रत अवस्था में उन्होंने समस्त मंत्रों में सर्वाधिक रहस्यमय मंत्र का साक्षात्कार किया। विश्वामित्र ने इतना उच्च-स्थान अर्जित कर लिया कि उन्हें ‘ब्रह्मऋषि’ (एक ब्राह्मण ऋषि) माना जाने लगा, जो किसी भी ऋषि को प्राप्त होने वाला सर्वोच्च सम्मान है। उन्होंने ही मानव-जाति के कल्याण के लिए इस संसार को अत्यंत शक्तिशाली गायत्री मंत्र प्रदान किया।
गायत्री मंत्र का सार

( गायत्री मंत्र का मन और शरीर पर सर्वांगीण प्रभाव)
सनातन धर्म के चार स्तंभों में से एक के रूप में प्रतिष्ठित, गायत्री मंत्र को सर्वाधिक पूजनीय मंत्र माना जाता है।
गीता गङ्गा च गायत्री गोविन्देति हृदि स्थिते
चतुर्गकारसंयुक्ते पुनर्जन्म न विद्यते।।
अर्थात् गीता, गंगा, गायत्री और गोविन्द—इन गकारयुक्त (ग अक्षर से आरंभ होने वाले) चार नामों को हृदय में धारण कर लेने पर मनुष्य जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।
(भीष्म पर्व, महाभारत में उल्लिखित एक सुभाषितम् अथवा स्वर्णिम कथन)
माँ गायत्री को वेदमाता, अर्थात् समस्त वेदों की जननी कहा जाता है। गायत्री मंत्र को समस्त वैदिक मंत्रों का बीज माना जाता है। मंत्र-साधना के मार्ग में सर्वप्रथम वेदमाता गायत्री का आवाहन करना प्रत्यके साधक के लिए महत्वपूर्ण होता है। उन्हें देवमाता (दिव्य गुणों को प्रकट करने में सहायक) तथा विश्वमाता (सार्वभौमिक चेतना की जननी) के नाम से भी जाना जाता है।
क्या आप जानते हैं कि गायत्री मंत्र का उल्लेख किस वेद में मिलता है? गायत्री मंत्र का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद के तृतीय सर्ग, 62वें अध्याय और 10वें श्लोक में मिलता है।गायत्री मंत्र में 24 अक्षर हैं, जो आठ-आठ अक्षरों के तीन खंडों में विभाजित हैं। जप को सरल करने, मंत्रों को याद रखने और उनका शुद्ध उच्चारण बनाए रखने के लिए वेदों के मंत्रों को छंद के रूप में व्यवस्थित किया गया।
‘ गायन्तं त्रायते इति गायत्री ’
(एक पारंपरिक व्युत्पत्तिगत व्याख्या (निरुक्ति))
अर्थात् माँ गायत्री उस व्यक्ति की रक्षा करती हैं जो उनके मंत्र का जप करता है।
इस विशेष छंद को गायत्री छंद कहा जाता है। इसमें गायत्री छंद के अनेक मंत्र हैं जिनमें से गायत्री मंत्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। दूसरे शब्दों में गायत्री मंत्र का छंद ही गायत्री ही है।
सवितुर गायत्री मंत्र का महत्व
( अपने दिव्य वाहन हंस पर पंचमुखी स्वरूप में विराजमान माँ गायत्री)
ऋग्वेद में उल्लिखित मूल गायत्री मंत्र इस प्रकार है:
तत्सवितुर्वरेण्यम
भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्।
गहन ध्यान और समाधि के पश्चात ऋषियों ने बाद में मंत्र की शुरुआत में महाव्यर्थी, अर्थात् महान उच्चारण, ॐ भूर्भुवः स्वः जोड़ दिया।
गायत्री मंत्र का यह रूप, जिसे सवितुर गायत्री मंत्र के नाम से भी जाना जाता है, की संरचना को चतुष्पदी है। चतुष् का अर्थ चार और पदी का हैं अर्थ , जो चार वेदों और मंत्र में चार पंक्ति-विरामों के अनुरुप हैं। माँ गायत्री को पाँच मुखों वाले स्वरूप में चित्रित किया गया है। सवितुर गायत्री मंत्र सूर्यदेव सवितृ का आवाहन है, जिनकी ऊर्जा माँ गायत्री हैं। उन्हें सविता के नाम से भी जाना जाता है। आइए, अब हम गायत्री मंत्र के हिंदी अर्थ को समझें।
ॐ : हमारी प्राण शक्ति से उत्पन्न होने वाली प्रणव ध्वनि ओम, हमें सार्वभौमिक ऊर्जा क्षेत्र से जोड़ती है।
भूर्भुवः स्वः : अस्तित्व के तीन स्तर, तीन प्रकार की चेतना, भौतिक प्रकृति के तीन स्वरूप ; सत्व, रजस, तमस अर्थात् भलाई, अनुराग और अज्ञानता, को संदर्भित करता है।
तत् : तत् का अर्थ है वह।
सवितुर : सवितुर से आशय किसी प्रकाशमान वस्तु से है ; यह सूर्य एवं प्रकाशमान, दैवीय ऊर्जा का भी नाम है।
वरेण्यम् : कुछ ऐसी वस्तु जिसका रंग केसर की भाँति हो, अथवा कोई ऐसी वस्तु जो उपासना के योग्य हो।
भर्गो : प्रकाशमान या दीप्तिमान।
देवस्य : देवस्य दैवीय को कहते हैं।
धीमहि : किसी विषय पर ध्यान लगाना।
धियो : बुद्धि
यो : जो
न : अर्थात् हम
प्रचोदयात् : किसी क्रिया को गतिशील करना।
हमने गायत्री मंत्र के विस्तृत अर्थ को समझा। संक्षेप इस मंत्र का अर्थ है कि हम अब उस एकमात्र परम ऊर्जा का ध्यान कर रहे हैं, जो अकेले ही उपासना के योग्य है। वह दैवीय प्रकाशमान, वह दैवीय ऊर्जा, जो प्रकाश से परिपूर्ण है, हमारी बुद्धि का मार्गदर्शन करें। यह हमारी बुद्धि को गतिशील करें, जिससे हमारे पास उपयोग के लिए बुद्धि की एक निश्चित संपदा उपलब्ध हो। गायत्री मंत्र का यही आधार है।
(अर्थ-स्रोत : गायत्री मंत्र का रहस्य — ओम स्वामी)
अतः गायत्री मंत्र का जप अपने भीतर के प्रकाश और आंतरिक बुद्धि का आवाहन करने का एक अत्यंत शक्तिशाली माध्यम है।
गायत्री मंत्र के प्रकार
गायत्री मंत्र को महामंत्र कहा जाता है। गायत्री मंत्र के कई प्रकार हैं, जैसे विष्णु गायत्री मंत्र, सूर्य गायत्री मंत्र, और कृष्ण गायत्री मंत्र। विभिन्न देवताओं के गायत्री मंत्र उस ज्ञान अथवा गुण को प्राप्त करने में सहायता करते हैं, जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं। उदाहरण के लिए, लक्ष्मी गायत्री मंत्र का जप उस ज्ञान को जाग्रत करने के लिए किया जाता है, जिससे हम अपने जीवन में उनकी समृद्धि का अनुभव कर सकें। इस मंत्र का जप कर हम देवी माँ से प्रार्थना करते हैं कि वे अपनी दिव्य कृपा से सदैव हमें धर्म के पथ पर आगे बढ़ने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करें और हमारी बुद्धि को आलोकित करें।
गायत्री मंत्र के लाभ
गायत्री मंत्र का सबसे लोकप्रिय रूप सवितुर गायत्री मंत्र है, जो शब्द सावित्री से लिया गया है, जो देवी माँ का एक नाम है। सामान्यत: वैदिक गायत्री मंत्र उस विशेष देवता के गुणों को जाग्रत करने में सहायक होते हैं, जबकि तांत्रिक परंपरा में गायत्री मंत्र का प्रयोग किसी विशिष्ट इच्छापूर्ति के उद्देश्य से किए जाते हैं।
गायत्री मंत्र का जप संध्यावंदन के समय किया जाता है, जो प्रतिदिन प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल में संपन्न होने वाला एक अनुष्ठान है। यह दिन के विभिन्न समयों में मंत्र की ऊर्जा से जुड़ने में सहायता करता है।
शक्तिशाली सवितुर गायत्री मंत्र में सभी वेदों का सार निहित है, जो व्यक्ति की आध्यात्मिक संपदा में वृद्धि करने और उसकी समस्याओं को दूर करने में सहायक होता है। इसके अनेक लाभ हैं, जैसे वैचारिक शुद्धि और उत्तम स्वास्थ्य। परंपरागत रूप से, यह मंत्र छात्रों को उपनयन संस्कार (यज्ञोपवीत) के भाग के रूप में पढ़ाया जाता था, जो वैदिक साहित्य के अध्ययन की शुरुआत का संकेत है। प्रारंभ में केवल एक सीमित वर्ग के पुरुषों को ही इसका जप करने की अनुमति थी। बाद में हिंदू सुधार आंदोलनों ने गायत्री मंत्र को सार्वभौमिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज इस मंत्र का प्रयोग महिलाओं सहित समाज के सभी वर्गों के लोगों द्वारा व्यापक रूप से किया जाता है।
गायत्री मंत्र कई लाभ प्रदान करता है, जैसे उत्तम स्वास्थ्य, तंत्रिका तंत्र को मजबूत करना और प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार करना। इसके अतिरिक्त, गायत्री मंत्र के जप के अनेक अन्य लाभ भी हैं। कुछ साधक प्रतिदिन 1 माला (108 बार गायत्री मंत्र) का जप करते हैं, जिसका सकारात्मक प्रभाव उनके जीवन में भी दिखाई देता है। निस्संदेह, यह मंत्र एक शक्तिशाली मंत्र है, जो सभी सीमाओं को पार करता है और प्रत्येक साधक को लाभ पहुंचाता है।