ज्ञानी नानू की कहानियाँ: मूषकराज कैसे बने गणपति के वाहन?
शाम का समय था। नानू जी अपनी आरामदायक कुर्सी पर बैठकर एक मोटी-सी किताब पढ़ रहे थे। उनकी कुर्सी के आसपास किताबों के छोटे-बड़े ढेर लगे थे। तभी उछलती-कूदती मीरा कमरे में आई। उसकी नज़र किताबों के बड़े-से ढेर पर पड़ी। उसकी छोटी-छोटी आँखें बड़ी हो गईं और वह किताबों के पास जाकर उन्हें गिनने लगी। एक…दो…तीन..दस…फिर उत्सुकता से बोली, “अरे नानू! आपके पास तो इतनी सारी किताबें हैं! क्या आप इन्हें रोज़ पढ़ते हैं?
नानू मुस्कुराए और बोले, "हाँ मेरी प्यारी बिटिया रानी, मैं रोज़ कुछ न कुछ पढ़ने की कोशिश करता हूँ। इससे मुझे हर दिन कुछ नया सीखने को मिलता है। और फिर मुझे तुम्हारे ढेर सारे सवालों के जवाब भी तो देने होते हैं!"
मीरा उनकी कुर्सी के पास पसर कर बैठ गई। "लेकिन नानू, आपको मेरे हर सवाल का जवाब कैसे पता होता है?" उसने पूछा।
नानू ने पास रखी किताबों की ओर इशारा करते हुए कहा, "अरे बिटिया, यही तो मेरी सबसे अच्छी दोस्त हैं। इन्हें पढ़कर मुझे बहुत सारी नई बातें सीखने को मिलती हैं।"
यह सुनकर मीरा उछलकर ताली बजाते हुए बोली, "अब समझ गई!, आप तो सचमुच बहुत ज्ञानी हैं। आज से मैं आपको 'ज्ञानी नानू' बुलाऊँगी!"
"ज्ञानी नानू! "ज्ञानी नानू!" कहकर वह खिलखिलाकर हँसने लगी।
नानू ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "ठीक है बिटिया, अगर तुम्हें अच्छा लगता है तो तुम मुझे ज्ञानी नानू बुला सकती हो। लेकिन एक बात हमेशा याद रखना। ज्ञान केवल किताबें पढ़ने से ही नहीं मिलता, अच्छे सवाल पूछने से भी मिलता है।"
मीरा कुछ कहती, उससे पहले ही एक छोटा-सा काला चूहा मुँह में रोटी का टुकड़ा दबाए उनके सामने से भागा।
"अरे नानू! चूहा!" मीरा घबराकर बोली। "इसे भगाइए, भगाइए!"
नानू हँस पड़े। "अरे बिटिया रानी, उसे जाने दो। लगता है उसे बहुत भूख लगी है। वैसे भी मूषकराज तो तुम्हारे प्यारे गणपति बप्पा के वाहन हैं।"
मीरा ने मूषकराज को जाते हुए देखा। फिर उसकी नज़र गणपति बप्पा की मूर्ति पर गई। उसने सिर थोड़ा टेढ़ा किया और दोनों को बारी-बारी से देखने लगी।
फिर अचानक बोली, "नानू, एक बात बताइए। चूहा तो इतना-सा और गणपति बप्पा इतने बड़े। फिर मूषकराज उन्हें अपने ऊपर कैसे बैठाते होंगे?"
नानू मुस्कुराए। "वाह बिटिया! आज तो तुमने बहुत अच्छा सवाल पूछा है।"
फिर उन्होंने किताब बंद की और मुस्कुराते हुए बोले,"चलो, आज मैं तुम्हें मूषकराज की ही कहानी सुनाता हूँ।
कहानी सुनने के नाम से ही मीरा की गोल-गोल आँखे खुशी से चमक उठीं।
ज्ञानी नानू बोले, "बहुत समय पहले की बात है। एक असुर था, जिसका नाम था गजमुखासुर। उसका चेहरा हाथी जैसा था। वह दुनिया का सबसे शक्तिशाली असुर बनना चाहता था।"
"नानू, क्या वह गणपति बप्पा जैसा दिखता था?" मीरा ने बीच में पूछा। नानू हँस पड़े।
"नहीं बिटिया, हाथी जैसा मुख होना और गणपति बप्पा जैसा होना, दोनों अलग बातें हैं। गणपति बप्पा दयालु हैं, लेकिन गजमुखासुर बहुत घमंडी था।"
फिर नानू ने अपनी कहानी आगे बढ़ाई। गजमुखासुर कई वर्षों तक घने जंगल में बैठकर भगवान शिव की कठोर तपस्या करता रहा। आखिर उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव उसके सामने प्रकट हुए।
"माँगो, क्या वरदान चाहते हो?" महादेव ने पूछा।
गजमुखासुर बोला, "प्रभु, मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि कोई अस्त्र-शस्त्र, कोई देवता और कोई मनुष्य मुझे मार न सके।"
महादेव ने उसे वरदान दे दिया। बस फिर क्या था! गजमुखासुर सोचने लगा कि अब उसे कोई नहीं हरा सकता। धीरे-धीरे उसका घमंड बढ़ता गया। वह देवताओं, ऋषियों और साधारण लोगों को परेशान करने लगा। तीनों लोकों में उसका डर फैल गया। आखिर सभी देवता महादेव के पास पहुँचे और बोले, "प्रभु, हमें इस संकट से बचाइए।" महादेव मुस्कुराए और बोले, "इस समस्या का समाधान मेरे पुत्र गणेश करेंगे।"
यह सुनकर मीरा तपाक से बोली, " अरे वाह…मुझे तो पहले से पता था! मेरे गन्नु भैया ही सबकी मदद करेंगे!"
नानू ने सिर हिलाया। "हाँ बिटिया, लेकिन गजमुखासुर कोई साधारण असुर नहीं था। उसे हराने के लिए केवल ताकत नहीं, बल्कि तेज़ दिमाग की भी ज़रूरत थी।"
कुछ ही समय बाद गणपति बप्पा और गजमुखासुर आमने-सामने खड़े थे। एक तरफ थे बुद्धि और करुणा के देवता श्री गणेश। दूसरी तरफ अपने वरदान पर घमंड करने वाला गजमुखासुर।
युद्ध शुरू हुआ। चारों ओर आवाज़ें गूँज रही थीं, धड़ाम! धम्म! धा! धा! धमाक! लेकिन गजमुखासुर पर किसी अस्त्र का कोई असर नहीं हो रहा था। महादेव का वरदान उसकी रक्षा कर रहा था।
गजमुखासुर हँसते हुए बोला, "गणेश! मुझे कोई नहीं हरा सकता!"
नन्ही मीरा का दिल जोरों से धड़कने लगा, "नानू, फिर गन्नु भैया ने क्या किया?"
नानू मुस्कुराए। "यही तो गणपति बप्पा की खास बात है, बिटिया। जब कोई काम मुश्किल लगे, तो उनकी बुद्धि कोई न कोई उपाय ढूँढ़ लेती है।"
गणपति बप्पा कुछ क्षण सोचने लगे। तभी उनके मन में एक अनोखा उपाय आया। उन्होंने अपना एक दाँत तोड़ लिया।
"क्या? उन्होंने अपना ही दाँत तोड़ दिया?" मीरा ने आश्चर्य से पूछा।
"हाँ," नानू बोले, "इसीलिए तो उन्हें एकदंत भी कहा जाता है।"
गणपति बप्पा ने अपना टूटा हुआ दाँत गजमुखासुर की ओर फेंक दिया।
शूँऽऽऽ!
वह दाँत बिजली की तरह आकाश में चमका और सीधा असुर की ओर बढ़ा। गजमुखासुर घबरा गया। उसने ऐसा अस्त्र पहले कभी नहीं देखा था। डर के मारे उसने अपना रूप बदल लिया और एक छोटे-से मूषक में बदल गया।
"अरे! इतना बड़ा असुर इतना छोटा चूहा बन गया?" मीरा ने आश्चर्य से पूछा।
"हाँ बिटिया," नानू हँसते हुए बोले, "कभी-कभी डर सबसे ताकतवर व्यक्ति को भी छोटा बना देता है।"
लेकिन इससे पहले कि वह भाग पाता, गणपति बप्पा फुर्ती से उसकी पीठ पर बैठ गए।

अब तो मूषक के हाथ-पाँव फूल गए! वह कभी इधर भागता, कभी उधर, कभी दाएँ दौड़ता तो कभी बाएँ। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि जाए तो जाए कहाँ! लेकिन गणपति बप्पा आराम से उसकी पीठ पर विराजमान रहे। कुछ देर बाद मूषक थक गया। उसे समझ आ गया कि केवल ताकत ही सब कुछ नहीं होती। बुद्धि और विनम्रता उससे भी बड़ी शक्ति हैं। उसका सारा घमंड चकनाचूर गया। वह गणपति बप्पा के चरणों में झुक गया और बोला,"प्रभु, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने अपने बल और वरदान का घमंड किया।"
गणपति बप्पा बहुत दयालु है। उन्होंने मूषक को क्षमा कर दिया। मूषक ने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु, मुझे अपने पास रख लीजिए। मैं हमेशा आपकी सेवा करना चाहता हूँ।"
गणपति बप्पा मुस्कुराए और बोले, "आज से तुम मेरे वाहन बनोगे।" और तभी से मूषकराज, भगवान गणेश के प्रिय वाहन बन गए। कहानी समाप्त हुई तो मीरा खुशी से बोली, "वाह नानू! इसका मतलब अगर कभी मैं गलती से ज्यादा चॉकलेट खा लू पर मम्मी को बता दूँ, तो डाँट नहीं पड़ेगी मुझे।"
नानू ने प्यार से सिर हिलाया। "बिल्कुल बिटिया। लेकिन मम्मा तुम्हारी गलती एक बार माफ कर सकती हैं, बार-बार नहीं।"
फिर नानू ने मीरा से पूछा, "तो बताओ मीरा, आज की कहानी से तुमने क्या सीखा?"
मीरा कुछ देर सोचती रही। "हम्म… हम्म… नानू, आप ही बताओ न!"
नानू मुस्कुराए और बोले, "इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि कितनी भी ताकत क्यों न हो, घमंड बुद्धि और अच्छे व्यवहार के आगे टिक नहीं सकता।"
"गणपति बप्पा मोरया!" मीरा खुशी से बोली।
"मंगल मूर्ति मोरया!" नानू ने हँसते हुए जवाब दिया।
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