गणपति और पाञ्चजन्य शंख

गणपति और पाञ्चजन्य शंख

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मीरा नानू के साथ बालकनी में बैठी थी। सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था और पूरा आसमान लाल-नारंगी रंगों से भर गया था। मीरा बड़े ध्यान से सूरज को देख रही थी।

“नानू, सूरज चाचा अब कहाँ जा रहे हैं?” मीरा ने चहकते हुए पूछा।

नानू मुस्कुराए और बोले, “अब अपने घर जा रहे हैं, बिटिया। वो देखो, पंछी भी अपने घोंसलों में लौट रहे हैं।”

उसके बालों में हेयरबैंड लगाते हुए नानू बोले, “चलो मीरा, अब भगवान को दीपक दिखाने और आरती करने का समय हो गया है।”

“चलो!” वह उछलते हुए बोली। “नानू, आज आरती के समय मैं घंटी बजाऊँगी। आपने मुझसे वादा किया था, याद है न!” 

नानू पूजा की तैयारी में लग गए। मीरा कुछ देर चुपचाप उन्हें देखती रही। तभी उसकी नज़र उनके चश्मे पर पड़ी। मीरा के मन में एक शरारत सूझी।

उसने चुपके से नानू का चश्मा उठा लिया। फिर कुर्सी पर बैठकर चश्मा अपनी नाक पर लगाया, हाथ में एक किताब थामी  और नानू की तरह पढ़ने की एक्टिंग करने लगी।
पूजा करने के बाद  उन्होंने जैसे ही मीरा को देखा, उनकी हँसी छूट गई। 

“ओहो! मीरा, तुम तो आज बिल्कुल नानू बन गई हो!” लेकिन मीरा, एक बात याद रखो। बिना पूछे किसी की चीज़ नहीं लेनी चाहिए। जब किसी को अपनी ज़रूरत की चीज़ नहीं मिलती, तो उसे परेशानी होती है। अब चलो, मेरा चश्मा मुझे वापिस दे दो।”

मीरा ने चश्मा पीछे छिपाते हुए कहा, “नहीं दूँगी!”

नानू फिर हँस पड़े। “अरे वाह! तुम तो बिल्कुल अपने गन्नु भैय्या जैसी शरारत कर रही हो। उन्होंने भी एक दिन भगवान विष्णु का पाँचजन्य शंख उठा लिया था!”

“पांचजन्य शंख” - वो क्या होता है नानू ? और गन्नू भैया ने उसे क्यों ले लिया था ? 

मीरा नानू के पास खिसकते हुए, बोली, “अच्छा नानू, अब बताइए ना…प्लीज, प्लीज..प्लीज मेरे ज्ञानी नानू?” 

एक बार बाल गणेश ने माता पार्वती से पाञ्चजन्य शंख के बारे में सुना। माता पार्वती ने उन्हें बताया कि वह शंख बहुत सुंदर है और उसकी आवाज़ इतनी तेज़ है कि धरती-आसमान भी गूँज उठे।

गन्नु भैय्या भी तुम्हारी ही तरह थे। यह सुनकर उनके मन में सवाल आया, “आखिर पाञ्चजन्य शंख दिखता कैसा होगा?” उन्हें भी एक बार वह शंख बजाने का मन हुआ। तभी उन्हें एक शरारत सूझी। 

फिर, एक दिन गन्नु भैय्या ने अपने वाहन मूषकराज को बुलाया। दोनों ने मिलकर पाञ्चजन्य शंख को देखने की योजना बनाई। 

और फिर…!

मीरा की आँखें चमक उठी, फिर…फिर.. क्या हुआ नानू ? 

नानू ने मुस्कुराते हुए आँखें बड़ी कीं और बोले, “और फिर गन्नु भैया अपने गोल-मटोल शरीर के साथ मूषकराज पर बैठकर फुर्र से उड़ चले वैकुंठ की ओर!” 

वैकुंठ ? वो क्या होता है नानू ? मीरा ने कहा

वैकुंठ धाम, जहाँ भगवान विष्णु रहते थे, वहाँ बड़े-बड़े सोने के महल थे। महलों के लंबे-लंबे दरवाज़े भी सोने के बने थे। ऊँचे-ऊँचे खंभों पर मोती और हीरे जड़े हुए थे। उनकी चमक से पूरा महल जगमगा रहा था। चारों ओर चंदन की भीनी-भीनी खुशबू फैली हुई थी। वहाँ सुंदर तालाब थे, जो रंग-बिरंगे कमल के फूलों से भरे हुए थे। यह सब देखकर गन्नु भैय्या की आँखें चमक उठीं। वे कभी महलों को देखते, कभी तालाबों में खिले कमल के फूलों को। लेकिन तभी उनके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई और वे उदास होकर कुछ सोचने लगे।

मीरा ने हैरानी से पूछा, “क्यों नानू? क्या वैकुंठ उन्हें अच्छा नहीं लगा?”

नानू ने प्यार से सिर हिलाया, “नहीं राजदुलारी, ऐसा बिल्कुल नहीं था। वैकुंठ तो उन्हें बहुत अच्छा लगा। पर वो जिसे ढूँढने आए थे, वो कहीं दिख नहीं रहा था!”

मीरा की आँखें चमक उठीं। “पाञ्चजन्य, है ना नानू?”

उस समय भगवा विष्णु आराम कर रहे थे। वे गहरी नींद में थे। गणपति और मूषकराज ने उसे हर जगह ढूँढ़ा, लेकिन उन्हें शंख कहीं नहीं मिला।

विष्णु जी अपना प्रिय पाञ्चजन्य शंख हमेशा अपने पास ही रखते थे। तभी मूषकराज को विष्णु जी की पीठ के पास कुछ सफेद-सा दिखाई दिया। उनकी आँखें चमक उठीं और वे खुशी से चूँ-चूँ करने लगे।

‘मेरे प्रभु! देखिए, देखिए! आपका पाञ्चजन्य यहाँ है!’”

गन्नू भैया ने तुरंत इशारे से उसे धीरे बोलने को कहा। गन्नू भैया धीरे-धीरे दबे पाँव वहाँ पहुँचे और शंख उठाकर वापस कैलाश की ओर उड़ चले। बादलों के ऊपर से जाते हुए दोनों शंख को कभी इधर छिपाते, कभी उधर, ताकि कोई देवी-देवता उन्हें देख न ले!”

मूषकराज बहुत सावधानी से कैलाश पर उतरे। चारों ओर तेज़ ठंडी हवा चल रही थी। सारे गण अपनी-अपनी गुफाओं में दुबके हुए सो रहे थे।

इधर बाल गणेश की खुशी का ठिकाना न रहा। वे शंख को देखते हुए बोले, “ओहो! तो ये है वो पाञ्चजन्य शंख, जिसके बारे में माता बता रही थीं! सही कहा था उन्होंने, ये तो बहुत प्यारा है।”

वे कुछ देर तक शंख को बड़े गौर से देखते रहे।

फिर बाल गणेश ने मूषकराज की ओर देखकर मुस्कुराते हुए पूछा, “क्यों मूषकराज! पाञ्चजन्य बजाएँ?”

“हाँ प्रभु, ज़रूर!”

“फूऊऊ… वूऊऊ!… पों… पों… ॐ!”

एक बड़ी मज़ेदार-सी आवाज़ निकली। शंख जैसी गहरी और गूँजती आवाज़ नहीं, बल्कि बिल्कुल अजीब-सी आवाज़ थी।

गणपति जी का चेहरा पूरी ताकत से शंख फूँकते-फूँकते लाल हो गया। शंख की आवाज़ से पूरा कैलाश गूँज उठा। आवाज़ सुनते ही सभी गण जाग गए और अपनी-अपनी गुफाओं से बाहर दौड़ पड़े। सब इधर-उधर देखने लगे और सोचने लगे कि आखिर हो क्या रहा है!

गन्नू भैया ने पाञ्चजन्य को इतनी ज़ोर से फूँका कि उसकी आवाज़ कैलाश से निकलकर सीधे देवलोक और वैकुंठ तक जा पहुँची!

“फिर क्या हुआ, नानू?” मीरा ने उत्सुकता से पूछा।

नानू बोले, “जैसे ही भगवान विष्णु के कानों में पाञ्चजन्य की आवाज़ पहुँची, उनकी नींद खुल गई। इधर महादेव भी अपने ध्यान से उठ गए। आवाज़ का पीछा करते-करते भगवान विष्णु कैलाश आ पहुँचे।

वहाँ उन्होंने देखा कि बाल गणेश शंख फूँक-फूँककर मूषकराज के साथ ज़ोर-ज़ोर से हँस रहे थे।”

मीरा ने आँखें बड़ी करते हुए पूछा, “फिर तो गन्नू भैया को खूब डाँट पड़ी होगी ना!”

“नहीं…उन्हें डाँट तो नहीं पड़ी। सच तो यह है कि यह सब देखकर सबको बहुत हँसी आ रही थी। हाँ, भगवान शिव ने गन्नू भैया से इतना ज़रूर कहा कि अब ऐसा दोबारा मत करना। उनकी इस शरारत से पहले ही सब बहुत परेशान हो चुके थे।

गन्नू भैया को पाञ्चजन्य शंख बजाने में इतना मज़ा आ रहा था कि उन्हें समय का बिल्कुल ध्यान ही नहीं रहा। काफी देर तक महादेव और भगवान विष्णु वहीं खड़े मुस्कुराते रहे।
नन्हे गणपति जी अपने दाहिनी ओर मुड़ी हुई सूँड़ में पाञ्चजन्य शंख पकड़े हुए थे। वह एक वलंपुरी शंख था, जिसका मुँह दाहिनी ओर खुलता है। इसे बहुत शुभ माना जाता है।

गन्नू भैया शंख के साथ खेलने में इतने मग्न थे कि उन्हें समय का पता ही नहीं चला।

तभी भगवान विष्णु ने महादेव से कहा, “हे महादेव! आप गणपति से मेरा पाञ्चजन्य वापस दिला दीजिए न।”

महादेव मुस्कुराकर बोले, “प्रभु, गणेश से शंख वापस लेना इतना आसान नहीं है। आप उनके साथ थोड़ा खेलेंगे, तो शायद वे खुद ही शंख दे दें।”

भगवान विष्णु सब समझ गए। वे मुस्कुराए और बोले, “अच्छा! ऐसा है क्या? हाँ, हाँ, मैं ज़रूर उनके साथ खेलूँगा और उन्हें शंख बजाना सिखाऊँगा! इसमें तो मुझे सबसे ज़्यादा मज़ा आता है।” 

बस फिर क्या था! भगवान विष्णु और गन्नू भैया साथ में खेलने लगे। महादेव और कैलाश के सभी गण भी यह खेल देखकर खुश हो रहे थे।

खेलते-खेलते गन्नू भैया बहुत खुश हुए और उन्होंने पाञ्चजन्य शंख खुशी-खुशी भगवान विष्णु को वापस कर दिया।

और बस, हमारी आज की कहानी भी यहीं खत्म हुई।

“बिटिया रानी, अब तो मेरा चश्मा वापस कर दो!”

“हाहाहा… हाँ नानू! ये रहा आपका चश्मा!”

“बहुत अच्छे! अब मेरे साथ बोलो— गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया!”


बच्चों की दुनिया बेहद रंगीन होती है। हैरान न हों अगर यहाँ आपको गुलाबी रंग के बादलों में मछलियाँ तैरती मिल जाएँ। उनकी इसी रंगीन दुनिया को हमने सनातन धर्म की सुंदर और प्रेरणादायक कहानियों से सजाने का एक छोटा-सा प्रयास किया है। बच्चों के बालमन के अनुरूप इन कहानियों के पात्रों और कुछ प्रसंगों में रचनात्मक बदलाव किए गए हैं, ताकि हमारे बच्चे भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ें और सनातन परंपराओं को बेहतर ढंग से समझ सकें।
हम मानते हैं कि बचपन में दादा-दादी, नाना-नानी से सुनी कहानियाँ सिर्फ मधुर स्मृतियाँ नहीं होतीं, बल्कि अच्छे संस्कारों की नींव भी रखती हैं।

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